Beautiful Poem (Series-3)
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This book is not just a collection of poems, but it is also a platform for young artists to showcase their talent. The beauty and grace of these poems will touch the hearts of readers, who are sure to appreciate the sense of optimism and pride that these young writers have imbibed in their words.
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This book is not just a collection of poems, but it is also a platform for young artists to showcase their talent. The beauty and grace of these poems will touch the hearts of readers, who are sure to appreciate the sense of optimism and pride that these young writers have imbibed in their words.
Book Details
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ISBN8222665224
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Pages79
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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वर्तमान, जिसकी विडम्बनाओं, विद्रूपताओं और नई तकनीकों के प्रतिदिन बदलते चेहरे को हम जानते हैं। उसकी बर्बरता और अमानवीयता को हम जानते हैं और समय की गति को अचानक बदल देने वाले परिवर्तनों को भी हमने बहुत क़रीब से देखा है। लेकिन अदनान की कविता को पढ़ने के बाद चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आने लगती हैं। जैसे हमारे ऐनक का नम्बर एकाएक बदल गया हो। शायद इस कविता की एक बड़ी ख़ूबी यह भी है कि वह प्रत्यक्षतः जानने और कविता को पढ़कर जानने के बीच के अन्तर का एहसास हमें कराती है। अदनान की कविता बहुत मुखर होकर स्वयं बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं बोलती, जीवन की वास्तविकताएँ ही उसमें से बोलती हैं। इसलिए उसकी आवाज़ ज़्यादा विश्वसनीय लगती है। उसकी कविता में वाचिक कविता जैसा प्रवाह और उसकी प्रति-गति कविता के क़द को ऊँचा कर देती है। वह हमारी संवेदनाओं को झिंझोड़कर जागृत कर देती है और चीज़ों और स्थितियों के प्रति ज़्यादा वस्तुनिष्ठ बना देती है।
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राहत साहब जब माइक पर आते हैं तो लगता है कि ये ज़मीन से जुड़ा हुआ आदमी कुछ इस तरह खड़ा है कि ज़मीन ख़ुश है और वो जब हाथ ऊपर उठाते हैं तो लगता है कि आसमान छू रहे हैं। वे तालियों से बहुत ख़ुश हो जाएँ या अपने अशआर सुनाते वक़्त तालियों की अपेक्षा रखें, ऐसा नहीं होता। उनका अन्दाज़, उनके अल्फाज़, उनकी अदायगी, ज़बान पर उनकी पकड़, उनकी आवाज़ का थ्रो, उनके हाथों का संचालन, माइक से दूर और पास आने की उनकी कला, शब्द की अन्तिम ध्वनि को खींचने का उनका कौशल, एक पंक्ति को कई बार दोहराकर सोचने का समय देने की होशियारी, एक भी शब्द कहीं ज़ाया न हो जाए इसकी सावधानी, न कोई भूमिका और न उपसंहार, अगर होते हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अशआर। बहुत नहीं सुनाते हैं, लेकिन जो सुना जाते हैं, वह कम नहीं लगता। क्योंकि वे जो सुना गए, उस पर सोचने के लिए कई गुना वक़्त ज़रूरी होता है। वे सामईन को स्तब्ध कर देते हैं। वे अपने जादू की तैयारी नहीं करते, लेकिन जब डायस पर आ जाते हैं तो उनका जादू सिर चढ़कर बोलता है। राहत इन्दौरी का होना एक होना होता है। वे अपनी निज की अनोखी शैली हैं, दुनिया-भर के सैकड़ों शायर उनका अनुकरण करते हैं, लेकिन सिर्फ़ कहन की शैली से क्या होता है, शैली के पीछे सोच और समझ का व्यापक भंडार भी तो होना चाहिए।
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- Description: इन कविताओं के बारे में मैं किताब की भूमिका या अपनी बात लिखने से हमेशा परहेज़ करता हूँ, मगर इस किताब के बारे में कुछ लिखना मुझे ज़रूरी लगा, सो लिख रहा हूँ। 8 अप्रैल 2025 को मैंने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया। किसी व्यक्ति के हमेशा के लिए चले जाने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं, यह मेरे लिए पहला अनुभव था। मुझे ऐसा लगा कि मेरे अंदर का एक बड़ा हिस्सा टूट कर खो गया है। मैं अपने अंदर एक प्रकार का सूनापन, एक बड़ी ख़ला को महसूस करने लगा। पिता के जाने के ठीक तीसरे दिन मैं सुबह छह बजे अपनी टेबल पर अन्यमनस्क अवस्था में बैठा हुआ था। एक दिन पहले ही पिता की अस्थियों को नर्मदा में विसर्जित कर के आया था। मेरे सामने काग़ज़ और क़लम रखे हुए थे। मैंने क़लम को उठाया और यूँ ही कुछ लिखना शुरू किया, जो लिखा जा रहा था वह एक कविता जैसा था- 'पिता- तीन दिन बीत गये'। अगले दिन जब फिर बैठा तो फिर एक कविता लिखी... बस उसके बाद सिलसिला चलता रहा... दिनों नहीं बल्कि अगले कुछ महीनों तक... प्रारंभ में कविताएँ पिता पर लिखी गयीं... फिर धीरे-धीरे और विषय जुड़ते चले गये। इस प्रकार इन कविताओं का जन्म हुआ। इस किताब में सात कविताएँ- 'रबाब- एक मुसलसल इश्क़', 'गौतम राजऋषि के लिए', 'लिफ़ाफ़ा', 'ताना-बाना', 'तुम', 'पीली और उदास आँखें' तथा 'विश्वास' मेरी पुरानी कविताएँ हैं, बाक़ी सारी कविताएँ उसी तीन से चार माह की अवधि की हैं। उसे मैं 'जुनून-अवधि' भी कह सकता हूँ। मुझे नहीं पता कि ये कविताएँ भी हैं कि नहीं। मुझे नहीं पता कि इनको इस प्रकार सामने भी लाना चाहिए था अथवा नहीं। मगर अब ये कविताएँ आपके सामने हैं। इनको पढ़ें, और अगर ठीक नहीं लगें तो इनको ख़ारिज कर देने का भी पूरा अधिकार आपके पास है।
Pratinidhi Shairy : Mirza Rafi 'Sauda'
- Author Name:
Mirza Rafi 'Sauda'
- Book Type:

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Description:
मीर तक़ी ‘मीर’ के समकालीन मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ‘सौदा’ 18वीं सदी के चार प्रमुख उर्दू शायरों में गिने जाते हैं। आम तौर पर सौदा को क़सीदे का शायर समझा जाता है, और इसमें कोई शक नहीं कि, सौदा के कुछेक क़सीदे ग़ज़ब के हैं। लेकिन सच बात यह है कि सौदा को इस रूप में पेश करना उनके साथ नाइंसाफ़ी से कुछ कम नहीं है। अपनी हज्वियाती नज़्मों (निन्दा-काव्यों) में और अपने शह्र-आशोवों में सौदा का हमें एक और ही रूप दिखाई देता है जो न तो उनके क़सीदों में नज़र आता है और न उनकी ग़ज़लों में। इन हज्वियाती नज़्मों और शह्र-आशोवों में सौदा अपने वक़्त की कड़वी सामाजिक सच्चाइयों के बारे में, 18वीं सदी की पतनशील सामन्ती सभ्यता के बारे में जिस स्पष्ट दृष्टि का परिचय देते हैं, वैसी दृष्टि उनके किसी भी अग्रज या समकालीन शायर के यहाँ नहीं दिखाई देती। मीर और दर्द के यहाँ भी नहीं। इसमें शक नहीं कि सौदा ख़ुद इस सामन्ती संस्कृति से जुड़े हुए रहे और इसीलिए इसके पतन से उनका प्रभावित होना स्वाभाविक था, उनका अफ़सोस करना भी उतना ही स्वाभाविक था। लेकिन सौदा इस पतनशील संस्कृति का मातम ही नहीं करते, बढ़-चढ़कर उन लोगों पर चोटें करते हैं, उनकी क़लई खोलते हैं जो इस पतन के लिए ज़िम्मेदार थे। इस सिलसिले में सौदा ने जादू-बयानी का जो परिचय दिया है, वह अपनी मिसाल आप है।
अकसर आलोचकों ने मीर और सौदा के तुलनात्मक अध्ययन के प्रयास किए हैं, और यह नतीजा निकाला है कि मीर सौदा से कोसों आगे हैं। आलोचकों की इस राय में बहुत कुछ सच्चाई है। ख़ासकर ग़ज़लों में जहाँ मीर का अन्दाज़े-बयाँ दिल को छू लेने की हैसियत रखता है, वहीं सौदा का अन्दाज़े-बयाँ ज़्यादातर भाषा के खिलवाड़ों तक सीमित रहता है। फिर भी इसमें शक नहीं कि सौदा को कुछ कम करके आँकना ग़लत होगा—ख़ासकर हजो और शह्र-आशोब जैसी विधाओं में उनका कोई जवाब नहीं है। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कहें तो सौदा हिन्द के शायरों के पैग़म्बर तो नहीं हैं लेकिन सुख़न कहने में उन्हें एज़ाज़ ज़रूर हासिल है।
Sirhane ke pal
- Author Name:
Sulabha Kore
- Book Type:

- Description: मराठी भाषी हिंदी कवयित्री सुलभा कोरे का ताज़ा काव्य-संग्रह 'सिरहाने के पल' प्रकृति और जीवन, जीवन और देश, देश और सरोकार के अंतरसंबंधों की सचेत टोह लेती कविताओं का विलक्षण संकलन है। सुलभा कोरे कविता इसलिए लिखती हैं ताकि 'धरती साँस ले सके', पेड़ सपने देख सकें और चिडिय़ा दाना चुग सके। सदियों से जिनके मुँह पर पाबंदियाँ लगी हुई हैं, उन पाबंदियों को चुनौती देती सुलभा की कविताएँ उन्हें बोलने का आह्वान करती हैं। आह्वान करती हैं ताकि वह अपना आसमां $खुद तोल सकें। 'सिरहाने के पल' की कविताएँ इस्तकबाल करती हैं 'अंतिम छोर पर खड़ी औरतों' का, उनकी उड़ान का, उनकी जिम्मेदारियों का और 'गहरी खाई में उतरने' के उनके अदम्य साहस का। 'सिरहाने के पल' की कविताएँ सारे जलते-सुलगते सवालों से बहसतलब होती हैं। भूले-बिसरे यादों को ताज़ा करने का काव्य-आग्रह आपको कविता के पास ले जाएगा। 'अतीत के बवंडर में गुम हो गए पलों' की शिनाख्त करती सुलभा कोरे की कविता राजनीतिक छल-छद्म से भी दो-दो हाथ करती है। कविता अपने पाठकों से सावधान रहने की गुजारिश करती हुई याद दिलाती है कि इस देश में 'सब कुछ बेचा जाएगा', देशभक्ति भी बेची जाएगी और देशद्रोह भी, इमानदारी भी और बेईमानी भी। छोटी-छोटी किंतु निहायत ज़रूरी बातों, विचारों, घटनाओं और मुद्दों का काव्य रूपांतरण कविता को गरिमामयी बनाता है। —कमलानंद झा
Tumhen Saunpta Hun
- Author Name:
Trilochan
- Book Type:

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Description:
पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी कविता के परिदृश्य में त्रिलोचन की कविता का महत्त्व असाधारण रूप से बढ़ा है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इस महत्ता की स्वीकृति में पेशेवर साहित्य मर्मज्ञों और तथाकथित अकादमियों का योगदान न के बराबर रहा है। अगर पिछले कुछ वर्षों की लघु-पत्रिकाएँ उठाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट लगेगा कि युवा कवियों ने अपने समय की सांस्कृतिक जड़ता के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की रचनाशीलता में एक नई ताज़गी और ऊर्जा का अनुभव किया है, अपने समय की रचनात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए उनकी रचनाएँ एक योद्धा के रूप में उनके सामने उभरीं। ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ उनकी कविताओं का एक विशिष्ट संग्रह है, जिसमें उनकी सन् 1935 से 83 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएँ शामिल हैं। इतने लम्बे कालक्रम में बिखरी इन कविताओं में आप कवि के रचनात्मक विकास की अनेक मंज़िलों से साक्षात्कार करेंगे। वास्तव में त्रिलोचन की कविताएँ दु:खों और विपदाओं के अपार समुद्र में मानवीय सौन्दर्य, प्रेम, आशा और स्वप्न का एक ऐसा घनीभूत पुंज हैं जो हमारे भीतर जीवन के प्रति अगाध विश्वास जगाता है। छोटी-
बड़ी इक्यासी कविताओं का यह संग्रह कवि के व्यक्तित्व के कुछ ऐसे आयामों को भी सामने लाता है, जिनसे हिन्दी जगत प्राय: अपरिचित ही रहा है।
इस संग्रह के शान्ति पर्व वाले खंड में त्रिलोचन के चार काव्य रूपक भी शामिल किए गए हैं जो उन्होंने दूसरे महायुद्ध के नरसंहार की पृष्ठभूमि में लिखे थे। जीवन को विध्वंस की आग में झोंकनेवाली शक्तियों के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की कविताएँ किसी गुरिल्ला सैनिक की तरह हमारे भीतर प्रवेश करती हैं। यह उनकी कविताओं का ऐसा प्रतिनिधि संग्रह है जिसमें पूर्व संकलनों की कोई कविता भरसक नहीं आने पाई है।
Bagh Duhne Ka Kaushal
- Author Name:
Raman Kumar Singh
- Book Type:

- Description: हिन्दी की समकालीन कविता में कुछ समय से आए बदलाव अभी ठीक से परिभाषित नहीं किए गए हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि वह काव्य-पीढ़ियों से आगे की, जीवन के ज़्यादा विस्तारों को देखती-पहचानती हुई कविता है। अपने पूर्वज कवियों का विवेक उसके अनुभव-संसार में उपस्थित है लेकिन उसकी संवेदना बिलकुल नई और अपनी है। इस संवेदना में यह जानने की बेचैनी है कि समाज, मानव-सम्बन्ध और राजनीति में हमने क्या-क्या खोया है, कौन-सी दुनियाएँ हमसे छूट गई हैं और हमारी मूलभूमि का, हमारी स्थानीयता का क्या हाल है। आश्चर्य नहीं कि रमण कुमार सिंह अपने पहले कविता-संग्रह ‘बाघ दुहने का कौशल’ की ज़्यादातर कविताओं में बार-बार उस जीवन को जाँचते-परखते लौटते हैं जो हमारे पीछे रह गया है और जिसकी जर्जरता और उदासी हमारा पीछा करती रहती है। एक सहज, गँवई यथार्थ और उसका जादू जो अब हमारा अतीत है और हमारे सामने फैले शहरी निम्न-मध्यवर्गीय यथार्थ के आपसी तनाव भी इन कविताओं की अन्तर्वस्तु बनाते हैं और उस ‘लुटेरे समय’ की छवियाँ उभारते हैं जो ‘दादी की लोरियों’ और ‘बुजुर्गों की लाठी’ से लेकर ‘आकाश की नीलिमा’ तक को छीन रहा है और जिसके प्रति विरोध दर्ज करना जरूरी है, अन्यथा वह हमारी अभिव्यक्ति को भी नष्ट कर दे सकता है। रमण कुमार सिंह की कविताओं में हमारे लोकजीवन का जर्जरित होता स्वरूप बहुत शिद्दत से व्यक्त हुआ है। वे एक तरफ उस संसार की बची-खुची चीजों, परम्पराओं और सम्बन्धों को कविता की स्थायी स्मृति की तरह बचा लेना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उस युवक की बेचैनी के पास भी जाते हैं जो लोक में प्रवेश करते बाजार, टूटती चौपाल और डरावने हो रहे पनघट और राजनीति के सत्ता-समीकरणों का साक्षी है और इस यथार्थ को बदल पाने में असमर्थ है। ‘गुजरे हुए बाबा से संवाद’ इसी तरह की एक मार्मिक कविता है जिसमें आज की पीढ़ी का एक प्रतिनिधि अपने पूर्वज को ग्रामीण संस्कृति का मौजूदा हाल सुनाते हुए उस सपने के बारे में पूछता है जिसे देखते-देखते वे अन्ततः सो गए थे। गौरतलब यह है कि यथार्थ बदल रहा है लेकिन स्वप्न भी जीवित है। दरअसल रमण की कविता उम्मीद और नाउम्मीद के बीच कई तरह के रिश्तों की पहचान की दस्तावेज है और कई बार वे ‘देश-परदेस’ को भी इसी रूप में पहचानते हैं। ‘बाघ दुहने का कौशल’ की रचनाएँ हमें उस सरल और मासूम संसार में ले जाती हैं जो वास्तविकता में टूट रहा है, लेकिन हमारे स्वप्नों में साबुत है। भाषा की ताज़गी और शिल्प की लोक-लय के साथ गँवई-शहरी जीवन के विकल रूप रमण की कविताओं के केन्द्रीय बयान हैं जिनमें संवेदना की स्थानिकता का संगीत भी सुनाई देता है। मंगलेश डबराल
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