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the author is a respected social activist in Delhi belonging to RSS school of thought. In over six decades of his public life, he wrote on several subjects which are compiled in this book. He spent over four decades in Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad and was it’s top office bearer and ideologue. Several of his writings relate to that phase of his life. It’s a thought provoking collection of author’s writings on diverse subjects.
Read moreAbout the Book
the author is a respected social activist in Delhi belonging to RSS school of thought. In over six decades of his public life, he wrote on several subjects which are compiled in this book. He spent over four decades in Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad and was it’s top office bearer and ideologue. Several of his writings relate to that phase of his life. It’s a thought provoking collection of author’s writings on diverse subjects.
Book Details
-
ISBN9789355213099
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह प्रक्रिया, विनोबा के अनुसार, केवल लेखक तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि पाठक या ग्रहीता में भी घटित होती है। वह, इसलिए अर्थ की निश्चितता को उत्तम साहित्य का गुण नहीं मानते। कह सकते हैं कि उत्तर-आधुनिकतावादी साहित्य-चिन्तकों की तरह वह साहित्यिक रचनात्मकता को अर्थ की निरंकुशता से मुक्ति के पक्षधर हैं। विनोबा उन साहित्यिक सैद्धान्तिकों की पंक्ति में आ खड़े होते हैं जो अर्थ या तात्पर्य को पाठकाश्रित मानते हैं। वह मानते हैं कि किसी रचना के न केवल परस्पर विरोधी भाष्य लिखे जा सकते हैं, बल्कि ऐसा भी भाष्य लिखा जा सकता है, जो स्वयं लेखक के अपने मन्तव्य के विरोध में हो और सम्भव है कि न केवल अन्य लोग, बल्कि स्वयं लेखक भी उसे स्वीकार कर ले। साहित्य के सत्य की अनुभूत्यात्मक प्रक्रिया होने के कारण विनोबा अपनी अनुभूति के प्रति निष्ठा को साहित्यकार के लिए अनिवार्य मानते हैं—यही साहित्यकार की नैतिकता है।
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