Shaikhchilli Ke Kisse
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जाने-अनजाने में मेरे किस्से तो तुमने जरूर सुने होंगे। किस्से सुनकर हँसते भी होंगे और सोचते होंगे कि अजीब इनसान था शेखचिल्ली। वैसी मेरी गिनती मूर्खों में की जाती थी, लेकिन ऐसा था नहीं। मैं हमेशा यही सोचता था कि लोग खुश रहें, मुसकराते रहें, भले ही मुझे मूर्खतापूर्ण बातें क्यों न करनी पड़ें। आज भी जब लोग मेरे किस्से सुनते और पढ़ते हैं तो स्वयं को हँसने से रोक नहीं पाते। इस भागती-दौड़ती दुनिया में आप भी कुछ देर मेरे किस्से पढि़ए और सारी चिंताएँ भूलकर हँसते-हँसाते रहिए।
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जाने-अनजाने में मेरे किस्से तो तुमने जरूर सुने होंगे। किस्से सुनकर हँसते भी होंगे और सोचते होंगे कि अजीब इनसान था शेखचिल्ली। वैसी मेरी गिनती मूर्खों में की जाती थी, लेकिन ऐसा था नहीं। मैं हमेशा यही सोचता था कि लोग खुश रहें, मुसकराते रहें, भले ही मुझे मूर्खतापूर्ण बातें क्यों न करनी पड़ें। आज भी जब लोग मेरे किस्से सुनते और पढ़ते हैं तो स्वयं को हँसने से रोक नहीं पाते। इस भागती-दौड़ती दुनिया में आप भी कुछ देर मेरे किस्से पढि़ए और सारी चिंताएँ भूलकर हँसते-हँसाते रहिए।
Book Details
-
ISBN9788177211160
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह रामविलास शर्मा रचनावली का दूसरा भाग है जिसमें उनके भाषा तथा भाषाविज्ञान सम्बन्धी लेखन को प्रस्तुत किया गया है। भाषा को लेकर भी रामविलास जी का अध्ययन व्यापक और विचारोत्तेजक रहा है जिसमें उन्होंने भावी अध्ययन तथा विचार-विमर्श के लिए कई नए प्रस्थान बिन्दु प्रस्तुत किए।
रचनावली के इस बीसवें खंड में रामविलास शर्मा के बहुचर्चित अध्ययन ‘भाषा और समाज’ को प्रस्तुत किया गया है। समाज के विकास के सन्दर्भ में भाषा का अध्ययन करते हुए उन्होंने इसमें भाषाविज्ञान और समाजविज्ञान की अनेक मान्यताओं का तर्क सहित खंडन-मंडन किया है। भाषा-सम्बन्धी अनेक व्यावहारिक समस्याएँ भी यहाँ उनके विवेचन का विषय बनी हैं।
रचनावली के इस इक्कीसवें खंड में रामविलास जी की बहुचर्चित कृति ‘भारत की भाषा-समस्या’ को प्रस्तुत किया जा रहा है। इस पुस्तक में भाषा-समस्या के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से विचार करते हुए वे अन्य बिन्दुओं के साथ यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिन्दी और उर्दू के मध्य एक बुनियादी एकता है और सभी जनपदीय बोलियाँ परस्पर सम्बद्ध हैं।
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