Media Aur Bazarvad
(0)
₹
695
556 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
बाज़ार नाम की संस्था आदिम समाज के लिए भी रही है, और आज के समाज के लिए भी है। इसलिए बाज़ार से बैर करके आप अपना समाज और अपना जीवन चला सकें, इसकी सम्भावना नहीं है। लेकिन जब बाज़ार मनुष्य की नियति तय करे तो इसका मतलब यह है कि अब तक जो मनुष्य का सेवक रहा है, वह मनुष्य का मालिक होना चाहिए। बाज़ार मनुष्य का बहुत अच्छा सेवक है। कोई पाँच हज़ार साल से उसकी सेवा कर रहा है। शायद उससे भी ज़्यादा वर्षों से कर रहा हो। अगर वो मनुष्य की नियति तय करेगा तो उसमें एक मूल खोट आनेवाला है, क्योंकि बाज़ार भाव से चलता है, बाज़ार मूल्य से नहीं चलता और मूल्यों के बिना किसी भी मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव समाज भाव से नहीं चल सकता, मूल्य से ही चल सकता है। मानव समाज को मूल्य से चलना है। अब जो बाज़ार की शक्तियाँ दुनिया में इकट्ठा हुई हैं उनसे आप कैसे निपटेंगे? मुझे कई लोगों ने कहा कि यह तो हिन्दुस्तान है जो जाजम की तरह बिछने के लिए तैयार है, नहीं तो जहाँ-जहाँ बाज़ार गया है, वह उस देश के समाज की शर्तों पर गया है। पर हमने एक कमज़ोर देश की तरह से अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार को स्वीकारा है। इसलिए अब हमारे यहाँ जाजम की तरह बिछ जाने का लगभग कुचक्र चल रहा है!
Read moreAbout the Book
बाज़ार नाम की संस्था आदिम समाज के लिए भी रही है, और आज के समाज के लिए भी है। इसलिए बाज़ार से बैर करके आप अपना समाज और अपना जीवन चला सकें, इसकी सम्भावना नहीं है। लेकिन जब बाज़ार मनुष्य की नियति तय करे तो इसका मतलब यह है कि अब तक जो मनुष्य का सेवक रहा है, वह मनुष्य का मालिक होना चाहिए। बाज़ार मनुष्य का बहुत अच्छा सेवक है। कोई पाँच हज़ार साल से उसकी सेवा कर रहा है। शायद उससे भी ज़्यादा वर्षों से कर रहा हो। अगर वो मनुष्य की नियति तय करेगा तो उसमें एक मूल खोट आनेवाला है, क्योंकि बाज़ार भाव से चलता है, बाज़ार मूल्य से नहीं चलता और मूल्यों के बिना किसी भी मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव समाज भाव से नहीं चल सकता, मूल्य से ही चल सकता है। मानव समाज को मूल्य से चलना है। अब जो बाज़ार की शक्तियाँ दुनिया में इकट्ठा हुई हैं उनसे आप कैसे निपटेंगे? मुझे कई लोगों ने कहा कि यह तो हिन्दुस्तान है जो जाजम की तरह बिछने के लिए तैयार है, नहीं तो जहाँ-जहाँ बाज़ार गया है, वह उस देश के समाज की शर्तों पर गया है। पर हमने एक कमज़ोर देश की तरह से अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार को स्वीकारा है। इसलिए अब हमारे यहाँ जाजम की तरह बिछ जाने का लगभग कुचक्र चल रहा है!
Book Details
-
ISBN9788171197569
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Videsh Reporting : Siddhant Aur Vyavhar
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description:
दैनिक पत्रकारिता के विविध रूपी रिपोर्टिंग क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है विदेशी घटना एवं विशिष्ट व्यक्ति की विदेश यात्रा रिपोर्टिंग। विदेश मामलों और राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे अति विशिष्ट व्यक्तियों की राजकीय विदेश यात्राओं का दैनिक समाचार संकलन (रिपोर्टिंग) जितना आकर्षक है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। सक्रिय पत्रकारिता क्षेत्र से सम्बद्ध औसत पत्रकार की इच्छा रहती है कि वह विदेश रिपोर्टिंग की बीट (क्षेत्र) से जुड़े। वह कूटनीतिक संवाददाता (डिप्लोमेटिक कॉरसपोंडेंट) बने। विशिष्ट व्यक्तियों की राजकीय यात्राओं का कवरेज करे। क्योंकि इससे एक विश्व उद्घाटित (वर्ल्ड एक्सपोजर) होता है। संवाददाता का अद्भुत अनुभवों और विश्व विभूतियों से साक्षात्कार होता है। विश्व स्तरीय घटनाओं (संयुक्त राष्ट्र महासभा अधिवेशन, गुटनिरपेक्ष आनन्द, राष्ट्र मंडलीय सम्मेलन आदि) के दैनिक कवरेज का उसे अवसर प्राप्त होता है। राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में रहकर भी कूटनीतिक संवाददाता के रूप में उसे प्रतिदिन भारत सरकार के विदेश मंत्रालय, विदेशी दूतावासों तथा अन्य विदेशी संस्थानों की गतिविधियों की रिपोर्टिंग करनी होती है। सतह पर यह बीट जितनी आसान दिखाई देती है, वास्तव में उतनी है नहीं।
विदेश मामलों और वी.वी.आई.पी. यात्राओं की रिपोर्टिंग के लिए विशेष दक्षता की आवश्यक्ता होती है। क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय मामलों, विदेशों के साथ भारत के बहुपक्षीय दौत्य सम्बन्धों और वैश्विक संगठनों की पर्याप्त जानकारी के बिना कूटनीतिक संवाददाता की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाना मुश्किल होता है। संक्षेप में, इस बीट का चरित्र काफ़ी संवेदनशील होता है। अन्तरराष्ट्रीय घटनाक्रम की रिपोर्टिंग में तथ्यात्मक त्रुटियों का बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, भारत-पाक सम्बन्ध, भारत-अमेरिका सम्बन्ध, परमाणु निःशस्त्रीकरण प्रक्रिया जैसे मामलों की रिपोर्टिंग में व्यावसायिक दक्षता के साथ-साथ अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित है। प्रस्तुत पुस्तक में विदेश रिपोर्टिंग और विशिष्ट व्यक्तियों की राजकीय विदेश यात्राओं की कवरेज प्रक्रिया पर व्यावहारिक व तकनीकी दृष्टि से फोकस डाला गया है। विभिन्न उदाहरणों व घटनाओं के माध्यम से यह बतलाया गया है कि एक कूटनीतिक पत्रकार के लिए कौन-सी बातें आवश्यक हैं? वह किस प्रकार अपनी भूमिका को सफलतापूर्वक निभा सकता है? किस प्रकार अन्तराष्ट्रीय विषयों में व्यावसायिक दक्षता अर्जित की जा सकती है? समाचार संकलन की प्रक्रिया के दौरान क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए—लेखक ने पत्रकारिता के विद्यार्थियों की दृष्टि से इस विधि पर विस्तार से प्रामाणिक प्रकाश डाला है।
लेखक प्रो. रामशरण जोशी स्वयं एक वरिष्ठ पत्रकार व समाजविज्ञानी हैं। अपने दो दशकीय सक्रिय पत्रकारिता जीवन (1980-99) के दौरान उन्होंने देश के श्रेष्ठतम अख़बारों में से एक ‘नई दुनिया’ (इन्दौर) के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख के रूप में राष्ट्रीय राजधानी में निरन्तर विदेश रिपोर्टिंग की है। उन्होंने गुटनिरपेक्ष आनन्द, राष्ट्रमंडलीय सम्मेलन, दक्षेस सम्मेलन तथा कई शिखर-वार्ताओं को कवर किया है। इसके अतिरिक्त देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (डॉ. शंकरदयाल शर्मा, राजीव गांधी, इन्द्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी आदि) जैसे अति विशिष्ट व्यक्तियों की सरकारी विदेश यात्राओं की भी व्यापक रिपोर्टिंग की है। लेखक ने नामीबिया को एक ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ के रूप में जन्म लेते हुए देखा है। इसके साथ ही लेखक ने अख़बार की ओर से पाकिस्तान, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान जैसे संवेदनशील राष्ट्रों की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का भी कवरेज किया है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रो. जोशी ने अपने प्रामाणिक अनुभवों के आधार पर विदेश रिपोर्टिंग विधि को व्यवहार से जोड़कर अपनी बात कही है। चूँकि लेखक पत्रकारिता अध्यापन (माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर व कार्यपालक निदेशक—1999-2004) से भी सम्बद्ध रहे हैं, अतः उन्होंने इस पुस्तक में विद्यार्थियों की शैक्षणिक अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है।
Bhartiya Diaspora : Vividh Aayam
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description:
‘डायस्पोरा’ शब्द का मुख्य अर्थ है—अपने देश की धरती से दूर विदेश में बसना, अर्थात् ‘प्रवासन’। इसका लक्षण है विदेश में रहते हुए भी अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं को निभाते रहना। आज दुनिया में अनेक तरह के डायस्पोरा समुदाय हैं और भारत को दुनिया के दूसरे सबसे बड़े डायस्पोरा समुदायों में गिना जाता है।
यह पुस्तक ‘भारतीय डायस्पोरा : विविध आयाम’ प्रवासन के अर्थ, विकास और प्रभाव पर महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है। इसके अनुसार, ‘आज का डायस्पोरा उन्नीसवीं सदी की अभिशप्त, प्रताड़ित और शोषित मानवता नहीं है। आधुनिक डायस्पोरा उत्तर-औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी काल में राष्ट्र-राज्य (नेशन-स्टेट) के निर्माण और संचालन में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि आज इस शब्द का प्रयोग विभिन्न देशों के मानव समूहों के विस्थापन, प्रवासन और पुनर्वसन के संसार को रेखांकित करने के लिए किया जाता है।’
पुस्तक में बारह लेख हैं जो भारतीय डायस्पोरा के बारे में मूल्यवान जानकारियाँ देते हैं। अन्त में दी गई पारिभाषिक शब्दावली से विषय के विविध आयाम सूत्रबद्ध होते हैं। आज जब भारतवंशी विश्व के विभिन्न देशों में रहते हुए उन देशों की समृद्धि व गतिशीलता में उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं, तब उनके ‘अस्मिता-विमर्श’ पर अध्ययन सामग्री की बहुत ज़रूरत है। यह पुस्तक इस अभाव को काफ़ह हद तक कम करती है। विशेषज्ञ लेखकों ने अपने अध्ययन व अनुसन्धान से प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत की है।
Main Bonsai Apane Samay Ka : Ek Katha Aatambhanjan Ki
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description:
रामशरण जोशी व्यक्ति नहीं, संस्था हैं। बहुआयामी शख़्स हैं; पेपर हॉकर से सफल पत्रकार; श्रमिक यूनियनकर्मी से पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रशासक; यायावर विद्यार्थी से प्रोफ़ेसर; बॉलीवुड के चक्कर; नाटकों में अभिनय और बाल मज़दूर से राष्ट्रीय बाल भवन, दिल्ली के अध्यक्ष पद तक का सफ़र स्वयं में चुनौतीपूर्ण उपलब्धि है।
अलवर में जन्मे, दौसा ज़िले (राजस्थान) के मामूली गाँव बसवा की टाटपट्टी से उठकर देश-विदेश की अहम घटनाओं का कवरेज, एशिया, अफ़्रीका, यूरोप, अमेरिका आदि देशों की यात्राएँ उनके व्यक्तित्व को बहुरंगी अनुभवों से समृद्ध करती हैं। कालाहांडी, बस्तर, सरगुजा, कोटड़ा जैसे वंचन-विपन्नता के सागर से लेकर दौलत के रोम-पेरिस-न्यूयॉर्क टापुओं को खँगाला है जोशी जी ने। राजधानी दिल्ली की सड़कों को नापते हुए राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों जैसे अतिविशिष्टजनों के साथ देश-विदेश को नापा है। पत्रकार जोशी ने ख़ुद को संसद-विधानसभाओं की प्रेस दीर्घाओं तक ही सीमित नहीं रखा, वरन् मैदान में उतरकर जोख़िमों से मुठभेड़ भी की; 1971 के भारत-पाक युद्ध का कवरेज; श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान जैसे देशों के संकटों पर घटनास्थल से लेखन; साम्प्रदायिक व जातीय हिंसाग्रस्त मानवता की त्रासदियों के मार्मिक चित्रण में जोशी जी के सरोकारों की अनुगूँज सुनाई देती है।
यक़ीनन यह यात्रा सपाट नहीं रही है। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव आए हैं। उड़ानों पर ही सवार नहीं रहा है लेखक। वह गिरा है, फिसला भी है, आत्मग्लानि का शिकार हुआ है, स्वयं से विश्वासघात किया है उसने। फिर भी वह राख के ढेर से उठा है। वर्ष 2004 में प्रकाशित मासिक ‘हंस’ में उनके दो आलेख—‘मेरे विश्वासघात’ व ‘मेरी आत्मस्वीकृतियाँ’—किसी मील के पत्थर से कम नहीं रहे हैं। बेहद चर्चित-विवादास्पद। हिन्दी जगत में भूचाल आ गया था। पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले। इस आत्मकथा में रामशरण जोशी ने ख़ुद के परखचे उड़ाने की फिर से हिमाकत की है। नहीं बख़्शा ख़ुद को, शुरू से अन्त तक। तभी सम्पादक-कथाकार राजेन्द्र यादव जी ने एक बार लेखक के बारे में लिखा था—‘‘इधर उनकी संवेदनाएँ रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कसमसाने लगी हैं और वे अपने अनुभवों को कथा-कहानी या आत्म-स्वीकृतियों का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि लम्बी बीहड़ भौतिक और बौद्धिक यात्राओं के बाद वे उस मोड़ पर आ गए हैं जिसे नरेश मेहता ने ‘अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर’ कहकर पहचाना था। आख़िर रामशरण जोशी ने भी अपनी शुरुआत ‘आदमी, बैल और सपने’ जैसी कथा-पत्रकारिता से ही तो की।’’
सतह से सवाल उठेगा ही, आख़िर क्यों पढ़ें इस बोनसाई को? सच! ड्राइंग रूम की शोभा ही तो है यह जापानी फूल। कहाँ महकता-दमकता है? इसका आकार न बढ़ता है, न ही घटता है। बस! यथावत् रहता है बरसों तक अपने ही वृत्त में यानी स्टेटस को! कितना आत्म-सन्तप्त रहता होगा अपनी इस स्थिति पर, यह कौन जानता है? यही नियति है बोनसाई की उर्फ़ उस मानुष की जो अपने वर्ग की शोभा तो होता है लेकिन अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाता। वर्गीय मायाजाल-मुग्धता में जीता रहता है, और उन लोगों का दुर्ग सुरक्षित-मज़बूत रहता है। व्यवस्थानुमा ड्राइंग रूम में निहत्था सजा बोनसाई टुकुर-टुकुर देखता रहता है।
यह आत्मकथा रामशरण जोशी जी की ज़रूर है लेकिन इसमें समय-समाज और लोग मौजूद हैं। दूसरे शब्दों में, ख़ुद के बहाने, ख़ुद को चीरते हुए व्यवस्था को परत-दर-परत सामने रखा है। सो, कथा हम सब की है।
Main Bonsai Apane Samay Ka : Ek Katha Aatambhanjan Ki
Ramsharan Joshi
20% off₹ 399
₹ 319.2
Available
Yadon Ka Laal Galiyara : Dantewara
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description:
रामशरण जोशी की यह पुस्तक ज़िन्दा यादों की एक विरल गाथा है। उन ज़िन्दा यादों की जिनमें हरे-भरे कैनवस पर ख़ून के छींटे दूर-दूर तक सवालों की तरह दिखाई देते हैं। ऐसे सवालों की तरह एक देश के पूरे नक़्शे पर, जिन्हें राजसत्ता ने अपने आन्तरिक साम्राज्यवाद प्रेरित विकास और विस्तार के लिए कभी सुलझाने का न्यायोचित प्रयास नहीं किया, बल्कि ‘ग्रीन हंट’ और ‘सलवा जुडूम’ के नाम पर राह में आड़े आनेवाले 'लोग और लोक' दोनों को ही अपराधी बना दिया। और यातनाओं को ऐसे दु:स्वप्न में बदला कि दुनिया-भर के इतिहासों के साक्ष्य के बावजूद छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िसा, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि के वनांचलों का भविष्य अपने आगमन से पहले लहकता रहा, 'लाल गलियारा' बनता रहा।
यह पुस्तक राजसत्ता और वैश्विक नव-उपनिवेशवादी चरित्र से न सिर्फ़ नक़ाब हटाती है बल्कि आदिवासियों यानी हाशिए के संघर्ष का वैज्ञानिक विश्लेषण भी करती है। रेखांकित करती है कि ‘हाशिए के जन का अपराध केवल यही रहा है कि प्रकृति ने उन्हें सोना, चाँदी, लोहा, मैगनीज, ताँबा, एलुमिनियम, कोयला, तेल, हीरे-जवाहरात, अनन्त जल-जंगल-ज़मीन का स्वाभाविक स्वामी बना दिया; समता, स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और न्यायपूर्ण जीवन की संरचना से समृद्ध किया। इसलिए इस जन ने अन्य की व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं किया। यदि अन्यों ने किया तो इस जन ने उसका प्रतिरोध भी ज़रूर किया। इस आत्म-रक्षात्मक प्रतिरोध का मूल्य इस जन को पलायन, परतंत्रता, शोषण और उत्पीड़न के रूप में चुकाना पड़ा।
अपने काल-परिप्रेक्ष्य में ‘यादों का लाल गलियारा : दंतेवाड़ा' पुस्तक बस्तर, जसपुर, पलामू, चन्द्रपुर, गढ़चिरौली, कालाहांडी, उदयपुर, बैलाडीला, अबूझमाड़, दंतेवाड़ा सहित कई वनांचलों के ज़मीनी अध्ययन और अनुभवों के विस्फोटक अन्तर्विरोध की इबारत लिखती है। लेखक ने इन क्षेत्रों में अपने पड़ावों की ज़िन्दा यादों की ज़मीन पर अवलोकन-पुनरवलोकन से जिस विवेक और दृष्टि का परिचय दिया है, उससे नई राह को एक नई दिशा की प्रतीति होती है। यह पुस्तक हाशिए का विमर्श ही नहीं, हाशिए का विकल्प-पाठ भी प्रस्तुत करती है।
21vin Sadi Ke Sankat
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

- Description:
'आदमी, बैल और सपने' की ज़मीनी संघर्ष-कथाओं से चलकर सामाजिक बदलावों के चौकन्ने दर्शक रामशरण जोशी आज हिन्दी के उन विरल पत्रकारों में हैं जो 'विकसित' होकर 'एक्टिविस्ट-समाजशास्त्री' के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। उनकी 'समाज-समीक्षा' किताबी अध्ययन और कमराबन्द शास्त्रीय चिन्तन से नहीं, परिवर्तनकामी सामाजिक हलचलों के बीच परवान चढ़ी है। इसीलिए एक ओर वे 'आदिवासी समाज और शिक्षा' पर बात करते हैं तो दूसरी ओर आधुनिक 'मीडिया विमर्श' व 'मीडिया और बाज़ारवाद' के जंगलों में रास्ते तलाश करते हैं। उन्हें न देश की राजनीति को बनाने-बिगाड़ने वाले दिग्गज नेताओं को कठघरे में खड़ा करने में हिचकिचाहट होती है और न चुनावी उठा-पटक के बीच अगला प्रधानमंत्री खोज निकालने में। पिछले कार्यक्षेत्र की तरह उनका समाज-विश्लेषण भी जितना हॉरिजेंटल है, उतना ही वर्टिकल भी—वे समस्या के विस्तार में ही नहीं जाते, गहराई में भी उतरते हैं। उनके सरोकार और सम्बद्धता हर जगह वर्तमान और भविष्य से है-अतीत को उन्होंने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के लिए छोड़ दिया है, इसलिए हर समस्या और उपलब्धि को वेदों के खाते में डाल देने की आसान और उतावली विद्वत्ता से बचे रहे हैं।
'इक्कीसवीं सदी के संकट राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सामान्य जन के संघर्षों और भारत जैसे विकासशील देश पर मँडराते ख़तरों का निर्भीक विश्लेषण है। वे चाहे आधुनिकता के अर्धसत्यों के बहाने, अमेरिकी माफ़िया षड्यंत्रों की बात करें या बाज़ारवाद के साम्राज्यवादी मनसूबों की, निशाने पर चाहे सांस्कृतिक उत्पीड़न और देशी-विदेशी आतंकवाद हो या मानव, मशीन और राज्य की द्वन्द्वात्मकता—हर कहीं उनकी चिन्ता का केन्द्र अपना समाज और अपने देश की स्थितियाँ हैं। इसीलिए वे समझते हैं कि 'भारत में समाज, राष्ट्र और टेक्नोलॉजी के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं रहा।' नतीजे में 'लोकतंत्र का लोकतांत्रीकरण नहीं हो पाया।'
विराट अनुभवों, विशाल अध्ययन और बौद्धिक भूलभुलैयों (लिबरिंथ) के बीच रामशरण जोशी की शक्ति है तार्किक दृष्टि, वैज्ञानिक विश्लेषण, विवेकवादी विमर्श और जनपक्षधर राजनीति। यहाँ उनकी मार्क्सवादी पृष्ठभूमि उनका सबसे विश्वस्त कुतुबनुमा है। इधर उनकी संवेदनाएँ रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कसमसाने लगी हैं और वे अपने अनुभवों को कथा-कहानी या आत्म-स्वीकृतियों का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि लम्बी बीहड़ भौतिक और बौद्धिक यात्राओं के बाद वे उस मोड़ पर आ गए हैं जिसे नरेश मेहता ने 'अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर तीर' कहकर पहचाना था। डिकेन्स से लेकर हैमिंग्वे, शाह ग्रीन, ज्याफ़्री आर्चर, भारत में अरुण साधु या भवानी सेन गुप्ता (चाणक्य सेन) और हिन्दी में मनोहर श्याम जोशी जैसे उपन्यासकार पहले सक्रिय पत्रकार ही तो थे। आख़िर रामशरण ने भी अपनी शुरुआत 'आदमी, बैल और सपने' जैसी कथा-पत्रकारिता से ही तो की थी।
—राजेन्द्र यादव, सम्पादक—'हंस'
Kahne Ko Bahut Kuchh Tha
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

- Description:
प्रभाष जोशी की इस पुस्तक में उनके सम्पूर्ण लेखन से चुनकर प्रतिनिधि लेखों का संग्रह किया गया है। वे एक समाजधर्मी पत्रकार थे जिन्होंने अपने समय के बनते इतिहास का दो टूक विश्लेषण किया। उसके साथ ही अपने सक्रिय वैचारिक पहल से समकालीन इतिहास को बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज के समय में ऐसे पत्रकार और समाज चिन्तक की कमी एक गतिरोध और यथास्थिति का माहौल बना रही है। ऐसे में प्रभाष जोशी के ये लेख एक नई पहल के लिए प्रेरित करते हैं। पुस्तक में इन अध्यायों के अन्तर्गत लेख रखे गए हैं, उनके शीर्षक हैं : ‘पत्रकारिता है सदाचारिता’, ‘अपनी हिन्दी का हाल’, ‘शिखरों के आसपास’, ‘राजमंच का नेपथ्य’, ‘खेल का सौन्दर्यशास्त्र’ तथा ‘बार-बार लौटकर जाता हूँ नर्मदा’। ये शीर्षक ही पुस्तक में संकलित लेखों के कथ्य बयान कर देते हैं। एक बार फिर से प्रभाष जोशी को पढ़ना आपको इस मुश्किल समय से नए सिरे से परिचित कराएगा। सामाजिक बदलाव की पहल के लिए प्रेरित करेगा।
Un Social Network
- Author Name:
Geeta Yadav +1
- Book Type:

- Description:
‘अनसोशल नेटवर्क’ किताब भारत के विशिष्ट सन्दर्भों में सोशल मीडिया का सम्यक् आकलन प्रस्तुत करती है। जनसंचार का नया माध्यम होने के बावजूद, सोशल मीडिया ने इस क्षेत्र के अन्य माध्यमों को पहुँच और प्रभाव के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है और यह दुनिया को अप्रत्याशित ढंग से बदल रहा है। इसने जितनी सम्भावनाएँ दिखाई हैं, उससे कहीं अधिक आशंकाओं को जन्म दिया है। वास्तव में राजनीति और लोकतंत्र से लेकर पारिवारिक और व्यक्तिगत सम्बन्धों तथा उत्पादों और सेवाओं की खरीद-बिक्री तक शायद ही कोई क्षेत्र होगा, जो सोशल मीडिया के असर से अछूता हो। यह एक ओर जनसंचार के क्षेत्र को अधिक लोकतांत्रिक बनानेवाला नजर आया तो दूसरी ओर इस क्षेत्र को प्रभुत्वशाली शक्तियों के हित में नियंत्रित करने का साधन भी बना है। ऐसे ही अनेक पहलुओं का विश्लेषण करते हुए यह किताब सोशल मीडिया की बनावट के उन अहम बिन्दुओं की शिनाख्त करती है जो इसे ‘अनसोशल’ बनाती हैं। यह किताब सोशल मीडिया के अध्येताओं के साथ-साथ इसके यूजरों के लिए भी खासी उपयोगी है।
Itna To Yaad Hai Mujhe
- Author Name:
Bobby Sing
- Book Type:

- Description:
क्या आप हिंदी सिनेमा और हिंदी फिल्म संगीत से दीवानगी की हद तक प्रेम करते हैं? यदि हाँ, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है। इस पुस्तक के 51 अध्याय तीन भागों में विभाजित किए गए हैं। पहले भाग में नब्बे के दशक से पहले की हिंदी फिल्मों के तथ्यों के बारे में विवरण दिया गया है अर्थात् भारत में केबल टीवी क्रांति से पहले। दूसरा भाग दोनों काल के मध्य की कड़ी/लिंक पर आधारित है और तीसरा नब्बे के दशक के बाद की फिल्मों और हमारे वर्तमान सिनेमा पर। पुस्तक के कुछ खास विषय हैं— ** चिरकालिक ‘गाइड’ और इसका अंग्रेजी संस्करण ** ‘डिस्को डांसर’ की अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बारे में कुछ अनकहे तथ्य ** 1989 में म्यूजिक एलबम ‘लाल दुपट्टा मलमल का’ से लिपटा रहस्य ** उत्पल दत्त—जो सिर्फ एक कॉमेडियन नहीं थे ** ‘सिलसिला’ और ‘रब ने बना दी जोड़ी’ को जोड़नेवाला तथ्य ** हिंदी फिल्म संगीत से पहेली-आधारित गीतों की गुम हो चुकी कला।
Idea Se Parde Tak : Kaise Sochta Hai Film Ka Lekhak?
- Author Name:
Ramkumar Singh +1
- Book Type:

- Description:
यह किताब सिनेमा के एक सहयोगी पेशेवर के रूप में फ़िल्म-लेखक के कामकाज का सिलसिलेवार वृत्तान्त प्रस्तुत करती है। फ़िल्म का अपना तौर-तरीक़ा है, जिसके दायरे में रहकर ही फ़िल्म-लेखक को काम करना पड़ता है। इसलिए एक हद तक अपनी स्वायत भूमिका रखने के बावजूद उसको अपना काम करते हुए निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, कैमरा-निर्देशक आदि अनेक सहयोगी पेशेवरों के साथ संगति का ख़याल रखना पड़ता है। ज़ाहिर है, फ़िल्म-लेखन जिस हद तक कला है, उसी हद तक शिल्प और तकनीक भी। एक सफल फ़िल्म लेखक बनने के लिए जितनी ज़रूरत प्रतिभा की है, उतनी ही परिश्रम, कौशल, अनुशासन और समन्वय की। सबसे लोकप्रिय कला के रूप में अपनी जगह बना चुका सिनेमा आज एक महत्त्वपूर्ण इंडस्ट्री भी है जो लाखों-लाख युवाओं के सपनों का केन्द्र बन चुकी है। ऐसे में फ़िल्म-लेखन की दिशा में कदम बढ़ाने वालों के लिए यह किताब एक अपरिहार्य हैण्डबुक की तरह है।
Samachar Patra Prabandhan
- Author Name:
Gulab Kothari
- Book Type:

- Description:
आज आम शिकायत यह है कि सम्पादक नाम की संस्था का लोप हो रहा है। जहाँ वह मौजूद है, वहाँ या तो प्रतीकात्मक है या उसके कार्य-अधिकार, विवेक और निर्णय का दायरा घटता जा रहा है। वैश्वीकरण की अदम्य आँधी ने समाचार-पत्रों को भी एक बाज़ार की वस्तु का रूप ग्रहण करने के लिए बाध्य कर दिया है। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों में प्रबन्धन की महत्ता और महिमा निरन्तर बढ़ती जा रही है।
समाचार-पत्र का एक व्यावसायिक वस्तु बनकर रह जाना दर्दनाक हादसा है। बाज़ारजनित दृष्टिकोण के कारण समाज में समाचार-पत्र के स्थान, सम्मान और विश्वसनीयता में परिवर्तन की प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है।
इस माहौल में समाचार-पत्र प्रबन्धन के सम्बन्ध में एक ऐसी परिपक्व दृष्टि की ज़रूरत है जो बाज़ार की बढ़ती हुई ताक़त की व्यावहारिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए उन बुनियादी मूल्यों पर अडिग रहने की कला, दृष्टि और शक्ति दे, जिसके कारण समाचार-पत्रों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्जा पाया है। पत्रकारिता के पुरोधा गुलाब कोठारी की इस पुस्तक से यह सब मिल सकेगा, ऐसा विश्वास है।
Dhann Narbada Maiya Ho
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

- Description:
‘धन्न नरबदा मइया हो’ पुस्तक में प्रभाष जोशी के ज़्यादातर लेख व्यक्तिगत हैं। हालाँकि इस संकलन में परम्परा और संस्कृति, यात्राओं तथा पर्यावरण से सम्बन्धित आलेख भी संकलित हैं, लेकिन इन सबका रुझान व्यक्तिगत ही है।
प्रभाष जोशी अपनी भूमिका में लिखते हैं :
“इस पुस्तक का शीर्षक—‘धन्न नरबदा मइया हो’—दरअसल अपनी किशोर वय में जबलपुर के एक गीतकार से एक कवि सम्मेलन में सुने मछुआरों के एक गीत से लिया है—‘हैया हो हो हैया हो, धन्न नरबदा मइया हो’। पहले का दिया शीर्षक था—‘बार-बार लौटकर जाता हूँ नर्मदा’। इस शीर्षक की आत्मा को ज्यों-का-त्यों रखते हुए इन निबन्धों को पढ़ने के बाद मैंने शीर्षक ‘धन्न नरबदा मइया हो’ कर दिया। ये निबन्ध खड़ी बोली के औपचारिक गद्य में नहीं लिखे गए हैं। इनमें बोली की अनगढ़ता लेकिन अनुभूति की सघनता, आत्मीयता और भावुकता है। ये मेरी कोठरी के भीतर की कोठरी की ऐसी खिड़की है जो घर के आँगन और उस पर छाए आकाश में खुलती है। ये निहायत निजी कहे जानेवाले निबन्ध हैं लेकिन ऐसी निजता के जो बाहर के ब्रह्मांड से तदाकार हो गई है। सच, इनमें निजी कुछ नहीं है। हजारीप्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय को पढ़ते हुए मैंने जो अपना मालव मानव-संसार बनाया है, ये निबन्ध उनमें आपको बुलाने के बुलव्वे हैं।
इनमें पर्यावरण और संस्कृति के मेरे सरोकार हैं और कुछ यात्रा विवरण हैं, जो यात्रा-वृत्तान्त की तरह नहीं, अपनी अन्तर्यात्रा में अपनी तलाश के क़िस्से हैं।”
ISIS Ka Aatank
- Author Name:
Patrick Cockburn
- Book Type:

- Description:
"सीरिया और इराक लगभग विखंडन के कगार पर पहुँच गए, क्योंकि उनके विभिन्न समुदायों—शिया, सुन्नी, कुर्द, अलावाइट और ईसाई—को यह लगा कि वे अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। इसलाम धर्म के कट्टरपंथी अनुपालन के लिए निष्ठुर इसलामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया (ISIS) ने उन सभी को अपना निशाना बनाया, जिन्होंने इसके नियमों का विरोध भर किया। उन्हें या तो मार दिया या भाग जाने के लिए विवश कर दिया गया। 10 जून, 2014 इतिहास का एक काला दिन था, जब ISIS ने चार दिन की लड़ाई के बाद इराक की उत्तरी राजधानी मोसुल पर कब्जा कर लिया। भयाक्रांत करने में ISIS कुख्यात है। इसके द्वारा तैयार वीडियो क्लिपों में इसके लड़ाकों द्वारा शिया सैनिकों और ट्रक ड्राइवरों को फाँसी देते हुए दिखाया गया है, ऐसी कुत्सित घटनाओं ने मोसुल और टिकरित पर कब्जे के दौरान शिया सैनिकों को आतंकित करने और उनका मनोबल तोड़ने में प्रमुख भूमिका निभाई। मोसुल और इराक के अधिकांश उत्तरी भाग पर कब्जा करने के बाद ISIS नेता अबू बर्क अल-बगदादी को नई खिलाफत का मुखिया घोषित कर दिया गया, जो सभी मुसलमानों से अंधानुसरण की अपेक्षा करता है। मानवता के शत्रु और जेहादियों के जत्थे पैदा करनेवाली ISIS की काली करतूतों का सजीव लेखा-जोखा देती है यह पुस्तक, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी प्रभावी छाप छोड़नेवाले पैट्रिक कॉकबर्न ने अपनी जान जोखिम में डालकर तैयार की है।
Television Ki Kahani : Part-1
- Author Name:
Shyam Kashyap +1
- Book Type:

- Description:
टेलीविज़न की कहानी वर्तमान समय सूचना-समाचारों के विस्फोट का है। हर घर-आँगन में चौबीस घंटे की टेलीविज़न-उपस्थिति है। चकमक करती रौशनियाँ हैं, दमक-हुमक-भरे चेहरे हैं। हर्ष, विषाद, रुदन की आक्रामकता है। कहीं समाचार, कहीं फ़िल्म और घर-घर की कहानी बयान करते रंग-बिरंगे धारावाहिक। लेकिन क्या आप जानते हैं, इस चमक-दमक के आविष्कारक कौन थे? टेलीविज़न का कब और कैसे आविष्कार हुआ? टेलीविज़न के अतीत-वर्तमान को ही जानने-समझने का सार्थक प्रयत्न करती है यह पुस्तक। वरिष्ठ लेखक-पत्रकार डॉ. श्याम कश्यप और चर्चित युवा टीवी पत्रकार मुकेश कुमार की क़लम-जुगलबन्दी ने टेलीविज़न की कहानी को आप तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया है।
टेलीविज़न के विभिन्न आयामों का समावेश करती इस पुस्तक में कुल बारह अध्याय हैं, जिनमें टेलीविज़न की ईजाद और उसके क्रमिक विकास की कहानी के साथ उनके विशिष्ट आन्तरिक संरचना, चरित्र और सामाजिक प्रभावों की भी प्रभावी पड़ताल की गई है। इसमें प्रसंगवश उन तमाम समकालीन प्रश्नों से भी मुठभेड़ करने का प्रयास किया गया है, जिनका सामना टीवी पत्रकार को अक्सर करना पड़ता है।
पुस्तक में टीवी पत्रकारिता से जुड़ी उन तमाम बातों का ज़िक्र है, जिसकी ज़रूरत इस क्षेत्र के छात्रों और पत्रकारों को पड़ती है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी। न सिर्फ़ छात्रों और पत्रकारों के लिए बल्कि आम पाठक, जो टेलीविज़न के इतिहास और उसके संसार को जानना और समझना चाहते हैं, उनके लिए भी उपयोगी और रुचिकर पुस्तक।
Patrakarita Ka Mahanayak : Surendra Pratap Singh
- Author Name:
Surendra Pratap
- Book Type:

- Description:
“तो ये थीं ख़बरें आज तक, इन्तज़ार कीजिए कल तक।” एसपी यानी सुरेन्द्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था। दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम ‘आज तक’ के सम्पादक रहते हुए एसपी सिंह सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी सम्पादक ने टीवी के परदे पर नहीं बताया।
एसपी ‘आज तक’ के सम्पादक ही नहीं थे। अपने दमखम के लिए याद की जानेवाली ‘रविवार’ पत्रिका के पीछे सम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह की ही दृष्टि थी। ‘दिनमान’ की ‘विचार’ पत्रकारिता को ‘रविवार’ ने खोजी पत्रकारिता और स्पॉट रिपोर्टिंग से नया विस्तार दिया। राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अन्दाज़ा लगाना और सरल, समझ में आनेवाली भाषा में साफ़गोई से उसका खुलासा करके सामने रख देना, उनकी पत्रकारिता का स्टाइल था। एक पूरे दौर में पाखंड और आडम्बर से आगे की पत्रकारिता एसपी के नेतृत्व में ही साकार हो रही थी।
शायद इसी वजह से उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और कहा जा सकता है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के पहले और आख़िरी सुपरस्टार थे। यह बात दावे के साथ इसलिए कही जा सकती है क्योंकि अब का दौर महानायकों का नहीं, बौने नायकों और तथाकथित नायकों का है। एसपी जब-जब सम्पादक रहे, उन्होंने कम लिखा। वैसे समय में पूरी पत्रिका, पूरा समाचार-पत्र, पूरा टीवी कार्यक्रम, उनकी ज़ुबान बोलता था। लेकिन उन्होंने जब लिखा तो ख़ूब लिखा, समाज और राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए लिखा।
जन-पक्षधरता एसपी सिंह के लेखन की केन्द्रीय विषयवस्तु है, जिससे वे न कभी बाएँ हटे, न दाएँ। इस मामले में उनके लेखन में ज़बर्दस्त निरन्तरता है। एसपी सिंह अपने लेखन से साम्प्रदायिक, पोंगापंथी, जातिवादी और अभिजन शक्तियों को लगातार असहज करते रहे। बारीक राजनीतिक समझ और आगे की सोच रखनेवाले इस खाँटी पत्रकार का लेखन आज भी सामयिक है।
यह सुरेन्द्र प्रताप सिंह की रचनाओं का पहला संचयन है।
Jeene Ke Bahaane
- Author Name:
Prabhash Joshi
- Book Type:

- Description:
प्रभाष जोशी ने ‘जीने के बहाने’ में अपने समय के चर्चित व्यक्तित्वों के चरित्र और विचार का दो टूक विश्लेषण किया है। जिन व्यक्तित्वों ने इतिहास की धारा को सही दिशा में ले जाने की कोशिश की है, प्रभाष जोशी ने ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के अवदान का रेखांकन किया है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी वैचारिक विसंगतियों से इतिहास के प्रवाह में गतिरोध पैदा करने का प्रयास किया है, प्रभाष जी ने उनकी ख़बर ली है।
प्रभाष जोशी लिखते हैं : “ये व्यक्तिचित्र नहीं हैं। जीवनियाँ भी नहीं हैं, और तो और, संस्मरण भी नहीं हैं। जैसे गांधी के साथ मेरे क्या संस्मरण हो सकते हैं। दिल्ली में जब नाथूराम गोडसे ने उनको गोली मारी तो मैं इन्दौर में दस बरस का था। माताराम कहती हैं कि उन्होंने मुझे गांधी जी को दिखाया था। तब वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने इन्दौर आए थे। लेकिन तब मैं साल-भर का था और कहना कि उन्हें मैंने देखा, गप्प लगाना होगा। लेकिन इस पुस्तक की शुरुआत ही गांधी पर लिखे लेख से होती है। और तीन निबन्ध हैं जिन पर लिखा है, वे सार्वजनिक जीवन के लोग हैं।...जिन-जिन रूपों और तरीक़ों से कोई हमारे जीवन में जा सकता है, उन्हीं रूपों और तरीक़ों, में मैंने उनको जिया और याद रखा है। ये बहाने हैं जिनके कारण मैं जीता हूँ।”
पुस्तक में जिन व्यक्तित्वों पर प्रभाष जी ने लिखा है, वे जीवन और समाज के विविध क्षेत्रों के लोग हैं। उनमें कुछ अन्य प्रमुख नाम हैं : विनोबा, जेपी, ज्ञानी जैलसिंह, के.आर. नारायणन, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, सोनिया गांधी, रामनाथ गोयनका, राहुल बारपुते, एस. मुलगावकर, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन, गिरिजा कुमार माथुर, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, वी.एस. नॉयपाल, अरुंधती राय, सत्यजित राय, लता मंगेशकर, जे.आर.डी. टाटा, राधाकृष्ण, सिद्धराज ढड्ढा, सी.के. नायडू, गावसकर, तेंदुलकर, नवरातिलोवा आदि।
Corporate Media : Dalal Street
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

- Description:
राडिया कांड मीडिया की ताक़त और उसकी ख़ामी, दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताक़त इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और ख़ामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता। मीडिया को पैसेवाले पैसा कमाने के लिए और ताक़त के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की आशंका इसकी संरचना और स्वामित्व के ढाँचे में ही दर्ज है।
राडिया कांड से यह ज़गज़ाहिर हो गया कि ख़ासकर ऊँचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज़ हुई है। कुछ सम्पादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करनेवाले पत्रकारों तक को कम्पनी के शेयर दिए जाते हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो, उस कम्पनी या उस व्यवसाय के विरुद्ध काम क्यों करेगा जिसमें उसके शेयर हों? इस तरह पत्रकारों की प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसन्द का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्ज़ी से ईमानदार नहीं रह सकता। यह बात कई लोगों को तकलीफ़देह लग सकती है। राडिया कांड ने मीडिया को सचमुच गहरे ज़ख़्म दिए हैं।
—इसी पुस्तक से
Media Ka Underworld
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

- Description:
पेड न्यूज़ वर्तमान मीडिया विमर्श का सबसे चर्चित विषय है। ख़बरें पहले भी बिकती थीं। सरकारों और नेताओं से लेकर कम्पनियाँ और फ़िल्में बनानेवाले तक ख़बरें ख़रीदते रहे हैं। न्यूज़ के स्पेस में विज्ञापन की घुसपैठ नई नहीं है। बदलाव सिर्फ़ इतना है कि पहले खेल पर्दे के पीछे था, अब मीडिया अपना माल दुकान खोलकर और रेट कार्ड लगाकर बेचने लगा है। विलेन के रूप में किसी ख़ास मीडिया हाउस को चिह्नित करना काफ़ी नहीं है। सारा कॉरपोरेट मीडिया ही बाज़ार में बिकने के लिए खड़ा है। समाचार को लेकर जिस पवित्रता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी की शास्त्रीय कल्पना है, उसका विखंडन हम सब अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। मीडिया छवि बनाता और बिगाड़ता है। इस ताक़त के बावजूद भारतीय मीडिया अपनी ही छवि का नाश होना नहीं रोक सका। देखते–ही–देखते पत्रकार आदरणीय नहीं रहे। लोकतंत्र का चैथा खम्भा आज धूल–धूसरित गिरा पड़ा है। मीडिया की बन्द मुट्ठी क्या खुली, एक मूर्ति टूटकर बिखर गई। यह पुस्तक इसी विखंडन को दर्ज करने की कोशिश है।
देश–काल की बड़ी समस्याओं पर लिखी गई पुस्तकों में आम तौर पर समाधान की भी बात होती है। समस्या का विश्लेषण करने के साथ ही अक्सर यह भी बताया जाता है कि समाधान का रास्ता किस ओर है। इस मायने में यह पुस्तक आपको निराश करेगी। हाल के वर्षों में जनसंचार के क्षेत्र के सबसे विवादित और चर्चित विषय पेड न्यूज़ को केन्द्र में रखकर लिखी गई यह पुस्तक समस्या का कोई समान नहीं सुझाती ।
पुस्तक यह समझने की कोशिश भर है कि पेड न्यूज़ ख़ुद एक बीमारी है, या फिर किसी बड़ी और गम्भीर बीमारी का लक्षण मात्र। पुस्तक में मीडिया अर्थशास्त्र और व्यवसाय की समीक्षा के ज़रिए यह बताने की कोशिश की गई है कि अपनी वर्तमान संरचना की वजह से मीडिया के लिए ख़बरें बेचना अस्वाभाविक नहीं है। मीडिया के लिए कमाई के मुक़ाबले छवि की क़ुर्बानी कोई बड़ी क़ीमत नहीं है।
Ruktapur
- Author Name:
Pushyamitra
- Book Type:

- Description:
यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के सामने रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े और चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ़ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की ज़रूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।
TRP : Media Mandi Ka Mahamantra
- Author Name:
Mukesh Kumar
- Book Type:

- Description:
पिछले ढाई दशकों में टेलीविज़न की सामग्री बड़े पैमाने पर बदली है। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनलों का चरित्र बुनियादी रूप से बदल गया है। मीडिया संस्थानों के स्वामित्व में आया बदलाव, बड़े कार्पोरेट घरानों का बढ़ता नियंत्रण और हस्तक्षेप, बाज़ार का प्रभाव इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक उदारवाद के दौर में सत्ता के चरित्र में आए परिवर्तनों का भी इसमें योगदान रहा है। सत्ता के निरंकुशतावादी स्वरूप ने एक आतंक भी पैदा किया है, जिसके सामने मीडिया को नतमस्तक होना पड़ा है।
कार्पोरेट तथा सत्ता के अपने गणित भी हैं और मीडिया को उनसे तालमेल बैठाने के लिए भी बाध्य होना पड़ा है। मगर जहाँ तक बाज़ार का सवाल है तो उसका सबसे बड़ा हथियार है विज्ञापन। वह विज्ञापनों पर भारतीय मीडिया की निर्भरता का लाभ उठाता है। इसके लिए उसके पास एक बहुत ही कारगर हथियार है–टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट।
टीआरपी दरअसल क्या है, वह क्यों है और न्यूज़ चैनलों की सामग्री को कैसे नियंत्रित और संचालित करती है, इस बारे में ठोस जानकारियाँ कम ही उपलब्ध हैं। यही नहीं, अत्यधिक चर्चाओं में रहने के बावजूद टीआरपी मापने की प्रणाली में क्या ख़ामियाँ हैं, उसमें कैसे धाँधली की जाती है और वह कितनी विश्वसनीय है, है भी या नहीं, इस बारे में सामग्री का अभाव रहता है, जबकि इन सब पहलुओं के बारे में जाने बगैर न टीआरपी को समझा जा सकता है और न ही बाज़ार के ऑपरेट करने के तरीक़े को। यह किताब टीआरपी के इन तमाम रहस्यों से परदा उठाती है।
यह सवाल भी बड़ी अहमियत रखता है कि टीवी न्यूज़ या न्यूज़ चैनल टीआरपी के दुष्चक्र से निकल सकते हैं या नहीं? इस पुस्तक में इन प्रश्नों पर विचार करके कुछ रास्ते सुझाने की कोशिश भी की गई है।
शैक्षणिक, अकादमिक और पत्रकारिता तीनों ही क्षेत्रों में सक्रिय लोगों के लिए तो पुस्तक उपयोगी है ही, वे पाठक भी इससे लाभ उठा सकेंगे जिनकी दिलचस्पी मीडिया में आई विसंगतियों या नई प्रवृत्तियों को जानने-समझने में रहती है।
Chautha Khambha (Private) Limited
- Author Name:
Dilip Mandal
- Book Type:

- Description:
जनविरोधी होना मीडिया का षड्यंत्र नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक मजबूरी है। एक समय था जब मास मीडिया पर यह आरोप लगता था कि वह कॉरपोरेट हित में काम करता है। 21वीं सदी में मीडिया ख़ुद कॉरपोरेट है और अपने हित में काम करता करता है। कॉरपोरेट मीडिया यानी अख़बार, पत्रिकाएँ, चैनल और अब बड़े वेबसाइट भी प्रकारान्तर में पूँजी की विचारधारा, दक्षिणपन्थ, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और तमाम जनविरोधी नीतियों के पक्ष में वैचारिक गोलबन्दी करने की कोशिश करते नज़र आते हैं। पश्चिमी देशों के मीडिया तंत्र को समझने के लिए नोम चोम्स्की और एडवर्ड एस. हरमन ने एक प्रोपेगंडा मॉडल दिया था। इसके मुताबिक़, मीडिया को परखने के लिए उसके मालिकाना स्वरूप, उसके कमाई के तरीक़े और ख़बरों के उसके स्रोत का अध्ययन किया जाना चाहिए। इस मॉडल के आधार पर चोम्स्की और हरमन इस नतीजे पर पहुँचे कि अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया का पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ा होना और दुनिया-भर के तमाम हिस्सों में साम्राज्यवादी हमलों का समर्थन करना किसी षड्यंत्र के तहत नहीं है। मीडिया अपनी आन्तरिक संरचना के कारण यही कर सकता है। साम्राज्यवाद को टिकाए रखने में मीडिया कॉरपोरेशंस का अपना हित है। उसी तरह, पूँजीवादी विचार को मज़बूत बनाए रखने में मीडिया का अपना स्वार्थ है।
भारत के सन्दर्भ में चोम्स्की और हरमन के प्रोपेगंडा मॉडल में एक तत्त्व और जुड़ता है। वह है भारत की सामाजिक संरचना। इस नए आयाम की वजह से भारतीय मुख्यधारा का मीडिया पूँजीवादी के साथ-साथ जातिवादी भी बन जाता है। उच्च और मध्यवर्ग में, ऊपर की जातियों की दख़ल ज़्यादा होने के कारण मीडिया के लिए आर्थिक रूप से भी ज़रूरी है कि वह उन जातियों के हितों की रक्षा करे। आख़िर इन्हीं वर्गों से ऐसे लोग ज़्यादा आते हैं, जो महत्त्वपूर्ण ख़रीदार हैं और इनकी वजह से विज्ञापनदाताओं को मीडिया में इनकी उपस्थिति चाहिए। यह एक ऐसा दुश्चक्र है, जिसकी वजह से भारतीय मीडिया न सिर्फ़ गरीबों, किसानों, ग्रामीणों और मज़दूरों बल्कि पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों की भी अनदेखी करता है। मीडिया के इस स्वरूप के पीछे किसी की बदमाशी या किसी का षड्यंत्र नहीं है। यह मीडिया और समाज की संरचनात्मक बनावट और इन दोनों के अन्तर्सम्बन्धों का परिणाम है। प्रस्तुत किताब इन्हीं अन्तर्सम्बन्धों को समझने की कोशिश है। इसे जानना मीडिया के विद्यार्थियों के साथ ही तमाम भारतीय नागरिकों के लिए आवश्यक है, क्योंकि जाने-अनजाने हम सब मीडिया से प्रभावित हो रहे हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book