21vin Sadi Ke Sankat
(0)
Author:
Ramsharan JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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'आदमी, बैल और सपने' की ज़मीनी संघर्ष-कथाओं से चलकर सामाजिक बदलावों के चौकन्ने दर्शक रामशरण जोशी आज हिन्दी के उन विरल पत्रकारों में हैं जो 'विकसित' होकर 'एक्टिविस्ट-समाजशास्त्री' के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। उनकी 'समाज-समीक्षा' किताबी अध्ययन और कमराबन्द शास्त्रीय चिन्तन से नहीं, परिवर्तनकामी सामाजिक हलचलों के बीच परवान चढ़ी है। इसीलिए एक ओर वे 'आदिवासी समाज और शिक्षा' पर बात करते हैं तो दूसरी ओर आधुनिक 'मीडिया विमर्श' व 'मीडिया और बाज़ारवाद' के जंगलों में रास्ते तलाश करते हैं। उन्हें न देश की राजनीति को बनाने-बिगाड़ने वाले दिग्गज नेताओं को कठघरे में खड़ा करने में हिचकिचाहट होती है और न चुनावी उठा-पटक के बीच अगला प्रधानमंत्री खोज निकालने में। पिछले कार्यक्षेत्र की तरह उनका समाज-विश्लेषण भी जितना हॉरिजेंटल है, उतना ही वर्टिकल भी—वे समस्या के विस्तार में ही नहीं जाते, गहराई में भी उतरते हैं। उनके सरोकार और सम्बद्धता हर जगह वर्तमान और भविष्य से है-अतीत को उन्होंने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के लिए छोड़ दिया है, इसलिए हर समस्या और उपलब्धि को वेदों के खाते में डाल देने की आसान और उतावली विद्वत्ता से बचे रहे हैं।</p> <p>'इक्कीसवीं सदी के संकट राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सामान्य जन के संघर्षों और भारत जैसे विकासशील देश पर मँडराते ख़तरों का निर्भीक विश्लेषण है। वे चाहे आधुनिकता के अर्धसत्यों के बहाने, अमेरिकी माफ़िया षड्यंत्रों की बात करें या बाज़ारवाद के साम्राज्यवादी मनसूबों की, निशाने पर चाहे सांस्कृतिक उत्पीड़न और देशी-विदेशी आतंकवाद हो या मानव, मशीन और राज्य की द्वन्द्वात्मकता—हर कहीं उनकी चिन्ता का केन्द्र अपना समाज और अपने देश की स्थितियाँ हैं। इसीलिए वे समझते हैं कि 'भारत में समाज, राष्ट्र और टेक्नोलॉजी के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं रहा।' नतीजे में 'लोकतंत्र का लोकतांत्रीकरण नहीं हो पाया।'</p> <p>विराट अनुभवों, विशाल अध्ययन और बौद्धिक भूलभुलैयों (लिबरिंथ) के बीच रामशरण जोशी की शक्ति है तार्किक दृष्टि, वैज्ञानिक विश्लेषण, विवेकवादी विमर्श और जनपक्षधर राजनीति। यहाँ उनकी मार्क्सवादी पृष्ठभूमि उनका सबसे विश्वस्त कुतुबनुमा है। इधर उनकी संवेदनाएँ रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कसमसाने लगी हैं और वे अपने अनुभवों को कथा-कहानी या आत्म-स्वीकृतियों का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि लम्बी बीहड़ भौतिक और बौद्धिक यात्राओं के बाद वे उस मोड़ पर आ गए हैं जिसे नरेश मेहता ने 'अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर तीर' कहकर पहचाना था। डिकेन्स से लेकर हैमिंग्वे, शाह ग्रीन, ज्याफ़्री आर्चर, भारत में अरुण साधु या भवानी सेन गुप्ता (चाणक्य सेन) और हिन्दी में मनोहर श्याम जोशी जैसे उपन्यासकार पहले सक्रिय पत्रकार ही तो थे। आख़िर रामशरण ने भी अपनी शुरुआत 'आदमी, बैल और सपने' जैसी कथा-पत्रकारिता से ही तो की थी।</p> <p>—राजेन्द्र यादव, सम्पादक—'हंस'
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'आदमी, बैल और सपने' की ज़मीनी संघर्ष-कथाओं से चलकर सामाजिक बदलावों के चौकन्ने दर्शक रामशरण जोशी आज हिन्दी के उन विरल पत्रकारों में हैं जो 'विकसित' होकर 'एक्टिविस्ट-समाजशास्त्री' के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। उनकी 'समाज-समीक्षा' किताबी अध्ययन और कमराबन्द शास्त्रीय चिन्तन से नहीं, परिवर्तनकामी सामाजिक हलचलों के बीच परवान चढ़ी है। इसीलिए एक ओर वे 'आदिवासी समाज और शिक्षा' पर बात करते हैं तो दूसरी ओर आधुनिक 'मीडिया विमर्श' व 'मीडिया और बाज़ारवाद' के जंगलों में रास्ते तलाश करते हैं। उन्हें न देश की राजनीति को बनाने-बिगाड़ने वाले दिग्गज नेताओं को कठघरे में खड़ा करने में हिचकिचाहट होती है और न चुनावी उठा-पटक के बीच अगला प्रधानमंत्री खोज निकालने में। पिछले कार्यक्षेत्र की तरह उनका समाज-विश्लेषण भी जितना हॉरिजेंटल है, उतना ही वर्टिकल भी—वे समस्या के विस्तार में ही नहीं जाते, गहराई में भी उतरते हैं। उनके सरोकार और सम्बद्धता हर जगह वर्तमान और भविष्य से है-अतीत को उन्होंने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के लिए छोड़ दिया है, इसलिए हर समस्या और उपलब्धि को वेदों के खाते में डाल देने की आसान और उतावली विद्वत्ता से बचे रहे हैं।</p>
<p>'इक्कीसवीं सदी के संकट राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सामान्य जन के संघर्षों और भारत जैसे विकासशील देश पर मँडराते ख़तरों का निर्भीक विश्लेषण है। वे चाहे आधुनिकता के अर्धसत्यों के बहाने, अमेरिकी माफ़िया षड्यंत्रों की बात करें या बाज़ारवाद के साम्राज्यवादी मनसूबों की, निशाने पर चाहे सांस्कृतिक उत्पीड़न और देशी-विदेशी आतंकवाद हो या मानव, मशीन और राज्य की द्वन्द्वात्मकता—हर कहीं उनकी चिन्ता का केन्द्र अपना समाज और अपने देश की स्थितियाँ हैं। इसीलिए वे समझते हैं कि 'भारत में समाज, राष्ट्र और टेक्नोलॉजी के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं रहा।' नतीजे में 'लोकतंत्र का लोकतांत्रीकरण नहीं हो पाया।'</p>
<p>विराट अनुभवों, विशाल अध्ययन और बौद्धिक भूलभुलैयों (लिबरिंथ) के बीच रामशरण जोशी की शक्ति है तार्किक दृष्टि, वैज्ञानिक विश्लेषण, विवेकवादी विमर्श और जनपक्षधर राजनीति। यहाँ उनकी मार्क्सवादी पृष्ठभूमि उनका सबसे विश्वस्त कुतुबनुमा है। इधर उनकी संवेदनाएँ रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कसमसाने लगी हैं और वे अपने अनुभवों को कथा-कहानी या आत्म-स्वीकृतियों का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि लम्बी बीहड़ भौतिक और बौद्धिक यात्राओं के बाद वे उस मोड़ पर आ गए हैं जिसे नरेश मेहता ने 'अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर तीर' कहकर पहचाना था। डिकेन्स से लेकर हैमिंग्वे, शाह ग्रीन, ज्याफ़्री आर्चर, भारत में अरुण साधु या भवानी सेन गुप्ता (चाणक्य सेन) और हिन्दी में मनोहर श्याम जोशी जैसे उपन्यासकार पहले सक्रिय पत्रकार ही तो थे। आख़िर रामशरण ने भी अपनी शुरुआत 'आदमी, बैल और सपने' जैसी कथा-पत्रकारिता से ही तो की थी।</p>
<p>—राजेन्द्र यादव, सम्पादक—'हंस'
Book Details
-
ISBN9788126707089
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
दर्शनशास्त्र समस्त शास्त्रों का सार, मूल, तत्त्व या संग्राहक है। उसमें ब्रह्मविद्या, आत्मविद्या या पराविद्या, अध्यात्मविद्या, चित्तविद्या या अन्त:करणशास्त्र, तर्क या न्याय आचारशास्त्र या धर्म-मीमांसा, सौन्दर्यशास्त्र या कलाशास्त्र आदि सभी विषयों का परिपूर्ण शिक्षण-परीक्षण प्रस्तुत किया गया है।
दर्शनशास्त्र आत्मविद्या, अध्यात्मविद्या, आन्वीक्षिकी, सब शास्त्रों का शास्त्र, सब विद्याओं का प्रदीप, सब व्यावहारिक सत्कर्मों का उपाय, दुष्कर्मों का उपाय और नैष्कर्म्य, अर्थात् अफलप्रेप्सु कर्म का साधक और इसी कारण से सब सद्-धर्मों का आश्रय और अन्तत: समूल दु:ख से मोक्ष देनेवाला है; क्योंकि सब पदार्थों के मूल हेतु को, आत्मा के स्वभाव को, पुरुष की प्रकृति को बताता है; और आत्मा, जीवात्मा तथा दोनों की एकता का, तौहीद का दर्शन कराता है।
दर्शनशास्त्र का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। ‘जीवन’ और ‘दर्शन’ एक ही उद्देश्य के दो परिणाम हैं। दोनों का चरम लक्ष्य एक ही है; परम श्रेय (नि:श्रेयस) की खोज करना। उसी का सैद्धान्तिक रूप दर्शन है और व्यावहारिक रूप जीवन। जीवन की सर्वांगीणता के निर्माणक जो सूत्र, तन्तु या तत्त्व हैं, उन्हीं की व्याख्या करना दर्शन का अभिप्रेय है। दार्शनिक दृष्टि से जीवन पर विचार करने की एक निजी पद्धति है, अपने विशेष नियम हैं। इन नियमों और पद्धतियों के माध्यम से जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करना ही दर्शन का ध्येय है।
सम्प्रति मुख्यत: छह आस्तिक दर्शनों—न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त तथा तीन नास्तिक दर्शनों—चार्वाक, बौद्ध और जैन को ही लिया जाता है। भारतीय दर्शन का जिन विभिन्न शाखाओं या सम्प्रदायों में विकास हुआ, यदि उनके आधार पर यह निश्चित किया जाए कि वे संख्या में कितने हैं तो इसका एक निश्चित उत्तर नहीं मिलेगा। प्राय: खंड दर्शन के आधार पर दर्शनों की संख्या छह मानी जाती है। भारतीय दर्शन की विभिन्न ज्ञान धाराओं का एक ही उद्गम और एक ही पर्यवसन है। उनकी अनेकता में एकता और उनकी विभिन्न दृष्टियाँ एक ही लक्ष्य का अनुसन्धान करती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में वेद दर्शन, उपनिषद दर्शन, गीता दर्शन, चार्वाक दर्शन, जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन, न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, सांख्य दर्शन, योग दर्शन, मीमांसा दर्शन, अद्वैत दर्शन तथा रामानुज दर्शन का विस्तृत विवेचन किया गया है।
आशा है, पुस्तक दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पाठकों का मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी।
Badalata Bharat - Paratantryatun mahasattekade
- Author Name:
Datta Desai
- Book Type:

- Description: बदलता भारत : पारतंत्र्यातून महासत्तेकडे... संपादन - दत्ता देसाई भारताचे बहुरूपदर्शक आणि समग्र चित्र रेखाटणारा संदर्भग्रंथ ! आपल्या देशाच्या स्वातंत्र्याची पंचाहत्तर वर्षे. असे स्वातंत्र्य आहे की जे जगात सर्वाधिक वर्चस्वशाली असणार्या ब्रिटिश सत्तेविरुध्द इथल्या कोट्यवधी जनतेने अथक संघर्ष करून मिळवले. जगाच्या इतिहासातील एक महान मुक्तिपर्व. एक असा गौरवशाली स्वातंत्र्यसंग्राम की ज्याने आधुनिक भारताला जन्म दिला आणि जगाच्या इतिहासावर आपली छाप उमटवली. असा इतिहास की ज्याने प्रत्येक देशप्रेमी व्यक्तीची मान आजही उंचावते. असे स्त्रीपुरुष 'नायक', नेते, समाजधुरीण, क्रान्तिकारक आणि महामानव की त्यांच्याविषयी आजही देशभर अपार आदर, प्रेम आणि अद्भुत आकर्षणही आहे. दोन शतकांचे विविध जनसमुदायांचे असे संघर्ष की ज्यांना अभिवादन केल्याशिवाय कोणीही भारतीय आजही पुढे जाऊ शकत नाही. या साऱ्याला मनोविकास प्रकाशन अभिवादन करत आहे 'बदलता भारत : पारतंत्र्यातून महासत्तेकडे... ' या आपल्या महाग्रंथाद्वारे! असा ग्रंथ की जो स्वातंत्र्य संग्रामाचा व स्वातंत्र्योत्तर देश उभारणीचा अनोख्या पद्धतीने अगदी मुळापासून वेध घेतो. ज्यात ‘रामायाण-महाभारत आणि भारतीय राष्ट्रवाद’, ‘छत्रपती शिवाजी, मराठेशाही आणि स्वातंत्र्याची वाटचाल’, ‘जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प’, ‘विवेकानंदांचा धर्म आणि त्यांची भारताची कल्पना’, ‘सावरकर-जीना आणि द्विराष्ट्रवाद’, ‘डावी कॉंग्रेस, उजवे राजकारण आणि सुभाषचंद्र बोस’, ‘चित्रपटांतून घडणारं भारतीयतेचं दर्शन’, ‘भारतीयता आणि बहुसांस्कृतिकता’ अशा विविध विषयांची सखोल मांडणी आहे. एक असा ग्रंथ की ज्याच्या दोन खंडातील आठ विभागात गुंफलेले साठ लेख आपल्याशी बोलतात - या सार्या गुंतागुंतीच्या आणि रोमांचकारी इतिहासावर. ते उकलतात या देशाचे असे अंतरंग की जे जितके विलोभनीय आहे तितकेच विषण्ण करणारेही आहे. विविध नामवंत लेखकांनी स्वतंत्र दृष्टिकोनांमधून आणि आपापल्या परिप्रेक्ष्यांतून भारतीय जीवनाच्या विविध क्षेत्रांचे आणि पैलूंचे केलेले परखड विश्लेषण! ज्यातून आपल्या समोर येतो भारताच्या भविष्याची निश्चित अशी दिशा उलगडणारा महाग्रंथ!! अनुक्रमणिका खंड : १ विभाग १ : आधुनिक भारताची जडणघडण : वाटा आणि वळणे १. बहुभाषिक राष्ट्र : इतिहास आणि भविष्य - अविनाश पांडे, रेणुका ओझरकर २. आर्यवादाचे औचित्य आणि भारतीय राष्ट्रवाद - हेमंत राजोपाध्ये ३. रामायण-महाभारताचे ‘लोकप्रिय’ राजकारण - श्रद्धा कुंभोजकर ४. प्रतिमांच्या कोंदणात अडकलेला मराठा इतिहास - प्राची देशपांडे ५. १८५७ : उठाव की स्वातंत्र्ययुद्ध? - अरविंद गणाचारी ६. इतिहासलेखन : दुहीचे की एकतेचे साधन? - जास्वंदी वांबुरकर विभाग २ : राजकीय इतिहास : विरोधाभास आणि वास्तव ७. राष्ट्रउभारणी : मुस्लिमांचे योगदान आणि भारतीयत्व - बशारत अहमद ८. भेदभावाच्या कोंडीत सापडलेला मुस्लीम राष्ट्रवाद - सरफराज अहमद ९. फाळणीआणि जीना-सावरकर - श्याम पाखरे १०. नेताजींचे‘गूढ’, कॉंग्रेस आणि उजवे राजकारण - रवी आमले ११. लोकशाही समाजवादाची वेगळी वाट - संजय मं गो १२. कम्युनिस्ट पक्ष : चढउताराचा आलेख - अशोक चौसाळकर १३. जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प : विरोधाभासी भारत - एस पी शुक्ला विभाग ३ : साहित्य-कला : भारतीय स्वातंत्र्याचे दर्शन १४. शोध सांगितिक भारतीयतेचा - नीला भागवत १५. मराठी कविता :स्वातंत्र्याचे उद्गार - रणधीर शिंदे १६. रंगभूमी : ‘राष्ट्रीय करमणूक’ की सामाजिक कल्लोळाचा वेध? - मकरंद साठे १७. भारतीयतेच्या शोधात हिंदी कादंबरी - सूर्यनारायण रणसुभे १८. संग्रहालये-स्मारकातील संस्कृती - दीपक घारे १९. दृश्यकला आणि बदलती भारतीय अभिव्यक्ती - नूपुर देसाई २०. लोकप्रिय भारतीय आरसा : हिंदी चित्रपट! - अशोक राणे विभाग ४ : लोकशाही, राजकीय बहुलता आणि राष्ट्रीय सुरक्षा २१. नागरिकत्व, राष्ट्र आणि लोकशाही : नवी आव्हाने - गणेश देवी २२. भारतीय लोकशाहीचे वेगळेपण ! - सुहास पळशीकर २३. राज्य कायद्याचे, पण न्याय किती? - उद्धव कांबळे २४. उपखंडातील भळभळती जखम : काश्मीर - प्रताप आसबे २५. पूर्वोत्तर भारत : सप्तभगिनी आणि सापत्नभाव - गायत्री लेले २६. शक्तिमान शेजारी आणि राष्ट्रवादांमधील तणाव - परिमल माया सुधाकर २७. भारतीय लष्कर आणि राष्ट्रीय सुरक्षा - विजय खरे २८. गुप्तचर यंत्रणा : सुशासन की सत्तेचे केंद्रीकरण? - अनंत बागाईतकर २९. संघराज्य,स्वायत्तता आणि अर्थपूर्ण लोकशाही - जयंत लेले ३०. स्वातंत्र्य - गोपाळ गुरु अनुक्रम खंड : २ विभाग १ : धर्म आणि संस्कृती : एकवचनी की बहुवचनी? १. विवेकानंद : वेष भगवा, स्वप्न समाजवादी भारताचे! - दत्तप्रसाद दाभोळकर २. धम्मक्रांतीचे सांस्कृतिक राजकारण - रावसाहेब कसबे ३. जमातवाद, दंगली आणि एकात्मता - इरफान इंजिनीयर ४. बदनाम धर्मनिरपेक्षता : एकात्म भारत घडणार कसा? - किशोर बेडकीहाळ ५. भारतीयता आणि सांस्कृतिक विविधता? - शांता गोखले ६. लोकसंस्कृतीचे सामर्थ्य आणि स्वातंत्र्य! - तारा भवाळकर ७. वेध विद्रोही जनसंस्कृतीचा - सचिन गरुड विभाग २ : राष्ट्रीयतेची साधने आणि स्वातंत्र्याची माध्यमे ८. हंटर ते नवे शैक्षणिक धोरण : विद्यार्थीकेंद्री शिक्षणाचा अभाव - डॉ.हेमचंद्र प्रधान ९. उच्चशिक्षण : सामाजिककडून आर्थिक मक्तेदारीकडे! - मिलिंद वाघ १०. राष्ट्रीय संस्था : देशाचा गौरवास्पद आधार - श्रीरंजन आवटे ११. विज्ञान-तंत्रज्ञान : भारत मागे पडतोय? - डी रघुनंदन १२. जनतेचे आरोग्य आणि राष्ट्राचे ‘स्वास्थ्य' - अनंत फडके १३. मैदान : क्रीडासंस्कृतीचे आणि राष्ट्रवादाचे? - पराग फाटक, ओंकार डंके १४. प्रसारमाध्यमांचे स्वातंत्र्य आणि राष्ट्रवादाचे कंपनीकरण - अभिषेक भोसले विभाग ३ : भारतीय विकासाचे पेच आणि पर्याय १५. वसाहत ते ‘अच्छे दिन' : विकासाचा पेच कायमचाच - शमा दलवाई १६. टाटा-बिर्ला ते अंबानी-अदानी : स्वातंत्र्योत्तर साटेलोटे-राज्य! - सचिन रोहेकर १७. शेतीची कोंडी आणि ‘इंडिया विरुद्ध भारत' - जयदीप हर्डीकर १८. ‘माता', ‘मंदिरे' आणि भारतीय जल-सिंचन! - प्रदीप पुरंदरे १९. सहकार : मार्ग जुना, दृष्टी नवी - गजानन खातू २०. सार्वजनिक क्षेत्र आणि खासगीकरणाचे ग्रहण - संजीव चांदोरकर २१. ‘विकासा'पलीकडचा गांधीमार्ग - पराग चोळकर २२. पर्यावरणीय संकट आणि विकासाचा शाश्वत पर्याय - के जे जॉय विभाग ४ : नवा भारत घडवणाऱ्या शक्ती २३. आदिवासींचा न संपलेला स्वातंत्र्यलढा! - देवकुमार आहिरे २४. भटक्या-विमुक्तांचे राष्ट्र कोणते? - नारायण भोसले २५. जातीचे द्वैत आणि राष्ट्रवादातील दुभंग - दिलीप चव्हाण, देवेंद्र इंगळे २६. बदलते जातवास्तव आणि अस्मितांचे राजकारण - शैलेंद्र खरात २७. अनिवासी भारतीय : ‘काळे पाणी' ते ‘गोरे' पाणी? - आनंद करंदीकर २८. कामगार चळवळीचे बदलते स्वरूप आणि नवी दिशा - अजित अभ्यंकर २९. सती ते पद्मावती : जोहार स्त्रियांचाच! - माया पंडित ३०. महिलांचे राजकीय नेतृत्व : बदल घडवेल? - संध्या नरे-पवार
Ishwar, Swatantrata Aur Amaratva
- Author Name:
Neelima Mishra +1
- Book Type:

- Description: ‘ज्ञान दर्शन’ व ‘तर्कशास्त्र : एक आधुनिक परिचय’ के बाद लेखकद्वय की यह तीसरी पुस्तक है। इसकी विषय-वस्तु तत्त्वदर्शन या तत्त्वमीमांसा की कुछ पारम्परिक समस्याएँ हैं, जिनकी विशद विवेचना दर्शन के विद्यार्थियों तथा साधारण जन, दोनों के लिए रुचिकर हो सकती है। लेखकद्वय की यह चेष्टा रही है कि दुरूह व गूढ़ दार्शनिक चिन्तन को सहज-सरल ढंग से प्रस्तुत किया जाए। इसीलिए उन्होंने अपनी सभी पुस्तकों का लेखन ऐसी हिन्दी भाषा में किया है। आशा है, यह पुस्तक तत्त्वदार्शनिक विचारों की सूचना देने के साथ ही मौलिक विचारों को भी प्रोत्साहित करेगी। इस पुस्तक की विषय-सामग्री दर्शन के विद्यार्थी के साथ-साथ आमजन के लिए भी रोचक हो सकती है और इसके अध्ययन से सम्भवत: उनको अपनी कुछ समस्याओं के प्रति एक अन्तर्दृष्टि प्राप्त हो सकेगी।
DHARMADVANDVA
- Author Name:
Shabnam Gupta
- Book Type:

- Description: धर्मद्वद्वं एक रोचक काल्पनिक कथानक है। जिस समय में भारतवर्ष पांडवों और कौरवों के दो पालों में बँटता दिख रहा था, उस समय में एक ऐसा आचार्य था जो किसी राजवंश के नहीं, देश के सर्वोपरि होने की बात करता था। जब धर्म अपने नियत खूटे में बँधा हुआ था, तब वो उसकी सीमा रेखा के आगे जाकर, एक नई परिभाषा लिखता था जहाँ धर्म और विवेक का संगम होता है । जिस परिवेश में स्त्री को वस्तु की तरह पाँच भाइयों में बाँट दिया गया था, उसी परिवेश में वह स्त्री शिक्षा और सशक्तिकरण का पाठ पढ़ाता था। जब समाज, वर्ण और वर्ग में बँटा हुआ था, तब वो जन्म नहीं, कर्म से मनुष्य की पहचान बनाने में क्रियार्थ था। ये उस काल्पनिक आचार्य की कहानी है, जिसका नाम वासू था। भारतीय पौराणिक आख्यान पर केंद्रित मर्मस्पर्शी तथा पठनीय कृति, जो आपको जीवन के आदर्श और मानवमूल्यों से परिचय कराएगी
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