Tathagat Phir Nahi Aate
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सिद्धार्थ सोलह वर्ष की आयु में विवाह के पश्चात् तेरह वर्ष तक नाच-गाना देखते-सुनते हुए राजभवन में ही बैठे रहे। एक दिन जब राजमहल से बाहर निकले तो एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी और फिर एक शव को देख ऐसी विरक्ति मन में उत्पन्न हुई कि गृहत्याग कर परिव्रजित हो गये। यह कथा सामान्यतः प्रचलित अवश्य है परन्तु वस्तुतः गौतम बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्राचीनतम एवं विद्वानों के मतानुसार सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथों 'त्रिपिटक' के अनुसार इस कथा की सच्चाई में सन्देह करने के पर्याप्त कारण हैं। <br>तत्कालीन विश्व और भारतवर्ष के समाज तथा उनकी राजनीति को समझने का प्रयास करती हुई यह पुस्तक उन गुरुओं, जिनमें से कई स्वयं को 'बुद्ध घोषित कर चुके थे, के परस्पर तर्क- वितर्क की श्रोता तो बनती ही है; तक्षशिला विश्वविद्यालय में संसार भर से आये ज्ञानपिपासुओं की बौद्धिक चर्चा में सहभागी भी बनती है; और उस अद्भुत वैचारिक आन्दोलन की साझीदार भी जब जम्बूद्वीप के हर नगर, कसबे और गाँव में स्थापित कुतुहलशालाओं में जीवन और अस्तित्व के आधारभूत प्रश्नों पर वाद-विवाद अनवरत ही हो रहा था।</p> <p>साथ ही, कपिलवस्तु, वैशाली, राजगृह, कौशाम्बी, श्रावस्ती इत्यादि नगरों में पड़ाव करते हुए यह यात्रा उस काल के अभूतपूर्व वैभव और जनमानस में विभिन्न कारणों से पनपते विद्रोह की साक्षी बनती है व उस घटनाचक्र की भी जिसने मगध साम्राज्य के जन्म को अवश्यम्भावी कर दिया।
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सिद्धार्थ सोलह वर्ष की आयु में विवाह के पश्चात् तेरह वर्ष तक नाच-गाना देखते-सुनते हुए राजभवन में ही बैठे रहे। एक दिन जब राजमहल से बाहर निकले तो एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी और फिर एक शव को देख ऐसी विरक्ति मन में उत्पन्न हुई कि गृहत्याग कर परिव्रजित हो गये। यह कथा सामान्यतः प्रचलित अवश्य है परन्तु वस्तुतः गौतम बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्राचीनतम एवं विद्वानों के मतानुसार सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथों 'त्रिपिटक' के अनुसार इस कथा की सच्चाई में सन्देह करने के पर्याप्त कारण हैं। <br>तत्कालीन विश्व और भारतवर्ष के समाज तथा उनकी राजनीति को समझने का प्रयास करती हुई यह पुस्तक उन गुरुओं, जिनमें से कई स्वयं को 'बुद्ध घोषित कर चुके थे, के परस्पर तर्क- वितर्क की श्रोता तो बनती ही है; तक्षशिला विश्वविद्यालय में संसार भर से आये ज्ञानपिपासुओं की बौद्धिक चर्चा में सहभागी भी बनती है; और उस अद्भुत वैचारिक आन्दोलन की साझीदार भी जब जम्बूद्वीप के हर नगर, कसबे और गाँव में स्थापित कुतुहलशालाओं में जीवन और अस्तित्व के आधारभूत प्रश्नों पर वाद-विवाद अनवरत ही हो रहा था।</p>
<p>साथ ही, कपिलवस्तु, वैशाली, राजगृह, कौशाम्बी, श्रावस्ती इत्यादि नगरों में पड़ाव करते हुए यह यात्रा उस काल के अभूतपूर्व वैभव और जनमानस में विभिन्न कारणों से पनपते विद्रोह की साक्षी बनती है व उस घटनाचक्र की भी जिसने मगध साम्राज्य के जन्म को अवश्यम्भावी कर दिया।
Book Details
-
ISBN9789393603302
-
Pages408
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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...एक उपन्यास जो लगभग दिल्ली ही के बारे में है—पुरानी यानी सन् 47 से पहले की दिल्ली।
मेरी कहानी 15 अगस्त, 1947 तक घिसटती नहीं जाती, उससे पहले ही ख़त्म हो जाती है। हाँ, यक़ीनन जो कुछ भी उसमें होना होता है, वह इस तारीख़ से पहले ही हो-हुआ चुकता है।
एक व्यक्ति और उसके परिवार की कहानी जो एक ज़माने में हर जगह था। शायरी से लेकर सियासत यानी तुम्हारे शब्दों में हक़ीक़त से लेकर फ़साने तक, हर जगह। लेकिन आज जिसका उल्लेख न तो साहित्य में है, न इतिहास में। संजीदा सोज़ और बशारत मंज़िल की कहानी। बिल्लो और बिब्बो की कहानी। ग़ज़ल की कहानी। इन तीनों बहनों की माँ, अमीना बेगम की कहानी। सोज़ की दूसरी पत्नी, जो पहले तवायफ़ थी और उसके बेटे की कहानी। सारी कहानियों की जो एक कहानी होती है, वह कहानी। मेरी और तुम्हारी कहानी भी उससे बहुत हटकर या अलग नहीं हो सकती। न है।
चावड़ी बाज़ार? —मैंने कहना शुरू किया था—चलो, यहाँ से अन्दाज़न उलटे हाथ को मुड़कर क़ाज़ी के हौज़ से होते हुए सिरकीवालों से गुज़रकर लाल कुएँ तक पहुँचो। उसके आगे बड़ियों का कटरा हुआ करता था। वहाँ से आगे चलकर नए-बाँस आता था। वह सीधा रास्ता खारी बावली को निकल गया था। नुक्कड़ से ज़रा इधर ही दाएँ हाथ को एक गली मुड़ती थी। वह बताशोंवाली गली थी। एक ज़माने में वहाँ बताशे बनते आँखों से देखे जा सकते थे। बाद में वहाँ अचार-चटनी वालों का बड़ा मार्केट बन गया था। मार्केट के बीच से एक गली सीधे हाथ को मुड़ती थी। थोड़ी दूर जाकर बाईं तरफ़ एक पतली-सी गली उसमें से कट गई थी। इस गली में दूसरा मकान बशारत मंज़िल था : पुरानी तर्ज़ की लेकिन नई-जैसी एक छोटी हवेलीनुमा इमारत। एक ज़माने में वह मकान अपने-आप में एक पता हुआ करता था मगर फिर वीरान होता गया। कुछ लोग उसे आसेबज़दा समझने लगे, दूसरे मनहूस। आज तो यक़ीन के साथ यह भी नहीं कह सकते कि वह अपनी जगह मौजूद है या नहीं।
Vaijyanti : Vol. 1-2
- Author Name:
Chitra Chaturvedi ‘Kartika’
- Book Type:

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Description:
‘वैजयंती’ श्रीकृष्ण के जीवन, कर्म, आदर्शों, विचारों और अलौकिक प्रेम की रसभीगी अनुपम गाथा है। ग्रामीण परिवेश में पले कृष्ण का विकास विविध दिशाओं में होता है और वह शीघ्र ही एक अपूर्व रंग-बिरंगे बहुआयामी व्यक्तित्व से सम्पन्न हो जाता है। ‘वैजयंती’ में ब्रज की सोंधी सुवास और छाछ है, वेणुवादन, आनन्द और महारास है। किन्तु रह-रहकर श्रीकृष्ण के अन्तर में एक अजानी-सी पुकार उठती है, आह्वान करती है, चल पड़ने को। कुछ विशिष्ट करने को। और श्रीकृष्ण जननायक बन चल पड़ते हैं क्रान्ति का शंखनाद करके कंस के अधिनायक तंत्र का मूलोच्छेदन करने। राधा नहीं रोकती। वह बाधा नहीं, राधा है।
प्रथम खंड में स्वप्नलोकीय कोमलता और माधुरी है, गीत, प्रीति और लालित्य के मध्य शस्त्रों की झनझनाहट है। वहीं द्वितीय खंड में क्रूर यथार्थ है और टंकारों तथा हुंकारों के मध्य प्रेम की मृदुल फुहारें और प्रीति-विह्वल मन की गुहारें हैं।
चारों ओर फैली अराजकता, अनैतिकता और स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध कर्मयोगी का संघर्ष चलता है और उनकी वैजयंती पताका सदा फहराती रहती है। वैजयंती में पाठक पाएँगे राधा, गोप-गोपी, रुक्मिणी, सत्यभामा, जांबवती तथा सुभद्रा को एक अनूठे ही रंग में। पाठक यह भी पाएँगे अर्जुन, विदुर, भीष्म, कर्ण, संजय और उद्धव को अनूठे स्वरूप में। भीष्म और विदुर को कैसे ज्ञात हुआ था कि कर्ण कुन्ती का पुत्र है? अपने पौत्रवत् श्रीकृष्ण को देखते ही भीष्म का मुखमंडल खिल क्यों पड़ता है? अर्जुन में ऐसा क्या है जो श्रीकृष्ण उस पर मुग्ध हैं? उद्धव में क्या विशेषता है जो उन्हें ही कृष्ण अपनी थाती सौंपते हैं? संजय और धनंजय ही गीता सुनने के अधिकारी क्यों हुए?
और फिर....राधा का क्या हुआ?
‘वैजयंती’ में कुछ नवीन न हो तो भी कुछ अपने आप अलग और विशिष्ट अवश्य है।
Aatmadan
- Author Name:
Narendra Kohli
- Book Type:

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Description:
‘आत्मदान’ सुप्रसिद्ध उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली का ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित उपन्यास है। कथानायक राज्यवर्द्धन स्थाणीश्वर का राजकुमार है जो अपनी भावप्रवण संवेदनशीलता के कारण न तो युद्ध को सही मानता है और न ही राज्य के विस्तार में उसकी रुचि है। मगर पिता की निरन्तर प्रेरणा और प्रजा की रक्षा के लिए वह हूणों के संहार के लिए युद्धक्षेत्र की तरफ़ प्रयाण करता है और दो वर्षों तक निरन्तर अत्याचारी हूण शासकों का संहार करता है। तभी अचानक उसे पिता के निधन और माता के सती होने का शोक समाचार मिलता है। इस दुखद घटनाक्रम से वह काफ़ी व्यथित हो जाता है और उसे विरक्ति हो जाती है। वह संन्यास लेना चाहता है तथा राज्य व प्रजा का भार अपने अनुज हर्ष पर सौंप देना चाहता है। उसी समय उसे मालवा शासक देवगुप्त द्वारा उसके बहनोई की हत्या और बहन की पीड़ा का दुखद संवाद मिलता है। क्रोध के मारे वह संन्यास का विचार छोड़ देवगुप्त को मज़ा चखाने और अपनी बंदिनी बहन को आततायियों से मुक्त कराने निकल पड़ता है।
उपन्यासकार ने इस पूरे घटनाक्रम को इतनी जीवन्तता से चित्रित किया है कि पढ़ते हुए सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटित होते देखने का आभास होता है।
संवेदनशील भाषा और प्रवाहपूर्ण शिल्प के कारण यह उपन्यास बेहद पठनीय है और एक नैतिक आख्यान से पाठकों को रू-ब-रू कराता है।
Uttar Pradesh Ki Lokkathayen
- Author Name:
Vidya Vindu Singh
- Book Type:

- Description: भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत यहाँ के सभी प्रदेशों की आंचलिक लोककथाओं में सुरक्षित हैं। ये कथाएँ परंपराओं के मूर्त, अमूर्त अवशेष के रूप में संस्कृति की शिक्षा देती रही हैं। ये धार्मिक समन्वय और अखंड भारत के स्वरूप का अध्ययन भी प्रस्तुत करती हैं। इस पुस्तक में हिंदी की पोषक उत्तर प्रदेश की जनपदीय लोकभाषाओं की कथाएँ हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्य लोकभाषाएँ या हिंदी की बोलियाँ हैं— अवधी, आदिवासी, कौरवी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी आदि। वही कथाएँ प्रायः सभी लोकभाषाओं में पाठ भेद के साथ मिलती हैं। उत्तर प्रदेश की सभी बोलियों, उपभाषाओं का लोककथा साहित्य रोचक, प्रेरक और समृद्ध है। यह दावा नहीं किया जा सकता कि कौन सी कथा किस बोली-क्षेत्र की है। सब में एक ही मूल भाव, लोकमंगल उपस्थित है। कथा के अंत में कहा जाता है कि ‘सबके अच्छे दिन बहुरे...’अर्थात् किसी के साथ बुरा न हो। संकलन में जो लोककथाएँ हैं, उनमें धार्मिक-पौराणिक कथाएँ, हास्य कथाएँ, नीति संबंधी कथाएँ, प्रकृति से जुड़ी कथाएँ तो हैं ही, व्रत-पर्व, त्योहारों से जुड़ी ऐसी कथाएँ भी हैं, जिनमें देवी-देवताओं के कथानक, उनकी महिमा और कृपा, व्रत के फल, विधि-विधान तथा व्रत-पर्वों के महत्त्व का वर्णन है। उत्तर प्रदेश की लोक संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं का दिग्दर्शन करवाती पठनीय लोककथाओं का संकलन।
Mahasamrat : Pehla Khand—Jhanjhawaat
- Author Name:
Vishwash Patil
- Book Type:

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Description:
छत्रपति शिवाजी के बारे में कौन नहीं जानता! महाराष्ट्र में स्वाधीनता का अलख जगाने वाले और आगे चलकर सम्पूर्ण भारत के लिए आत्मसम्मान, संघर्ष और साहस का प्रतीक बन जाने वाले शिवाजी पर अनेक लेखकों ने कलम चलाई है। कई विदेशी इतिहासकारों और लेखकों ने भी उनकी जीवनियाँ और ऐतिहासिक वृत्तान्त लिखे हैं।
‘महासम्राट’ उन सबसे अलग है। मराठी के विख्यात उपन्यासकार विश्वास पाटील द्वारा लिखित यह महाआख्यान उनके सुदीर्घ शोध और अपने नायक के प्रति गहन प्रेम और श्रद्धा का परिणाम है। लेखक ने इस वृहत उपन्यास में उन तथ्यों पर भी प्रकाश डाला है जो अभी तक लेखकों की निगाह से छूट जा रहे थे। मसलन, शिवाजी के व्यक्तित्व और चरित्र के शिल्पकार, उनके पिता शाहजी राजे भोसले की उनके जीवन में भूमिका। इस उपन्यास में न सिर्फ उनके, बल्कि तत्कालीन इतिहास से प्राप्त अनेक पात्रों और घटनाओं को भी पर्याप्त जगह दी गई है ताकि आज का पाठक शिवाजी की सम्पूर्ण छवि को अपनी कल्पना में साकार कर सके।
विस्तृत शोध और शिवाजी से जुड़े अनेक स्थलों की यात्राओं के कारण ही यह सम्भव हो पाया है कि उपन्यासकार के रूप में लेखक ने जहाँ कल्पना का हाथ पकड़ा है, तो उसे भी वे इतिहास-सम्मत तथ्यों के रास्ते पर ही लेकर बढ़े हैं। लगातार शोध के चलते लेखक को शिवाजी से सम्बन्धित इतनी सामग्री मिली कि एक उपन्यास की बजाय उन्होंने एक उपन्यास-शृंखला की योजना बनाई है, जिसकी यह पहली कड़ी है—‘झंझावात’। शिवाजी के सम्पूर्ण जीवन को एक उपन्यास में समेटना यूँ भी सम्भव नहीं है।
मूल मराठी में इस उपन्यास को एक मील का पत्थर माना गया है। इसका एक कारण इसकी तथ्यात्मकता है, और दूसरा आख्यान के रूप में इसकी परिपक्वता, भाषा-सामर्थ्य और शैली-सौष्ठव जिसको मूल पाठ की तारतम्यता के साथ इस हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत किया गया है।
Bhoo-Devta
- Author Name:
Keshav Reddi
- Book Type:

- Description: तेलगू साहित्य में एक वाद के रूप में दलितवाद के स्थापित होने से पहले से ही केशव रेड्डी की कथा-रचनाओं में दलितों की समस्याओं का मार्मिक चित्रण अभिव्यक्त है। प्रस्तुत उपन्यास ‘भू-देवता’ एक किसान की मृत्यु और उसके पुनरुत्थान की गाथा है। उस किसान के प्रयत्न से लेकर उसकी विफलता तक की, असुरक्षा से उन्माद तक की और उन्माद से मृत्यु तक की यात्रा का यहाँ अंकन है। ‘भू-देवता’ का कथाकाल 1950 है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद जिस समय भारत नए सिरे से अपना स्वरूप गढ़ रहा था, उस समय की ये घटनाएँ हैं। लगभग 70 वर्ष पहले जिस प्रान्त में रोज़ ही अकाल तांडव करता रहता था, उस प्रान्त की दु:स्थिति का चित्रण केशव रेड्डी ने यहाँ बक्कि रेड्डी के माध्यम से किया है। ज़मीन और किसान का सम्बन्ध वही होता है जो मनुष्य और उसके प्राण का होता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि भूमिरहित किसान का जीवन कटी पतंग के समान होता है। भूमि को किसान से अलग करने पर हानि केवल किसान की ही नहीं होती, कृषि पर निर्भर बढ़ई, लोहार, राज-मज़दूर जैसे अनेक पेशों के लोगों की भी हानि होती है। यह समस्या भी केशव रेड्डी के इस उपन्यास में उभरकर आती है। राज्य खो गया, इस व्यथा से कोलंद रेड्डी और भूमि हाथ से छूट गई, इस व्यथा से बक्कि रेड्डी दोनों ही अन्तत: अपने प्राणत्याग करते हैं। निस्सन्देह किसानी जीवन की एक मार्मिक दास्तान है यह उपन्यास ‘भू-देवता’।
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