Aatmadan
(0)
Author:
Narendra KohliPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘आत्मदान’ सुप्रसिद्ध उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली का ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित उपन्यास है। कथानायक राज्यवर्द्धन स्थाणीश्वर का राजकुमार है जो अपनी भावप्रवण संवेदनशीलता के कारण न तो युद्ध को सही मानता है और न ही राज्य के विस्तार में उसकी रुचि है। मगर पिता की निरन्तर प्रेरणा और प्रजा की रक्षा के लिए वह हूणों के संहार के लिए युद्धक्षेत्र की तरफ़ प्रयाण करता है और दो वर्षों तक निरन्तर अत्याचारी हूण शासकों का संहार करता है। तभी अचानक उसे पिता के निधन और माता के सती होने का शोक समाचार मिलता है। इस दुखद घटनाक्रम से वह काफ़ी व्यथित हो जाता है और उसे विरक्ति हो जाती है। वह संन्यास लेना चाहता है तथा राज्य व प्रजा का भार अपने अनुज हर्ष पर सौंप देना चाहता है। उसी समय उसे मालवा शासक देवगुप्त द्वारा उसके बहनोई की हत्या और बहन की पीड़ा का दुखद संवाद मिलता है। क्रोध के मारे वह संन्यास का विचार छोड़ देवगुप्त को मज़ा चखाने और अपनी बंदिनी बहन को आततायियों से मुक्त कराने निकल पड़ता है।</p> <p>उपन्यासकार ने इस पूरे घटनाक्रम को इतनी जीवन्तता से चित्रित किया है कि पढ़ते हुए सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटित होते देखने का आभास होता है।</p> <p>संवेदनशील भाषा और प्रवाहपूर्ण शिल्प के कारण यह उपन्यास बेहद पठनीय है और एक नैतिक आख्यान से पाठकों को रू-ब-रू कराता है।
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‘आत्मदान’ सुप्रसिद्ध उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली का ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित उपन्यास है। कथानायक राज्यवर्द्धन स्थाणीश्वर का राजकुमार है जो अपनी भावप्रवण संवेदनशीलता के कारण न तो युद्ध को सही मानता है और न ही राज्य के विस्तार में उसकी रुचि है। मगर पिता की निरन्तर प्रेरणा और प्रजा की रक्षा के लिए वह हूणों के संहार के लिए युद्धक्षेत्र की तरफ़ प्रयाण करता है और दो वर्षों तक निरन्तर अत्याचारी हूण शासकों का संहार करता है। तभी अचानक उसे पिता के निधन और माता के सती होने का शोक समाचार मिलता है। इस दुखद घटनाक्रम से वह काफ़ी व्यथित हो जाता है और उसे विरक्ति हो जाती है। वह संन्यास लेना चाहता है तथा राज्य व प्रजा का भार अपने अनुज हर्ष पर सौंप देना चाहता है। उसी समय उसे मालवा शासक देवगुप्त द्वारा उसके बहनोई की हत्या और बहन की पीड़ा का दुखद संवाद मिलता है। क्रोध के मारे वह संन्यास का विचार छोड़ देवगुप्त को मज़ा चखाने और अपनी बंदिनी बहन को आततायियों से मुक्त कराने निकल पड़ता है।</p>
<p>उपन्यासकार ने इस पूरे घटनाक्रम को इतनी जीवन्तता से चित्रित किया है कि पढ़ते हुए सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटित होते देखने का आभास होता है।</p>
<p>संवेदनशील भाषा और प्रवाहपूर्ण शिल्प के कारण यह उपन्यास बेहद पठनीय है और एक नैतिक आख्यान से पाठकों को रू-ब-रू कराता है।
Book Details
-
ISBN9788180311581
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: प्रोफ़ेसर शंकू कौन है? बस, इतना ही पता चलता है कि वे एक वैज्ञानिक हैं, विश्वविख्यात वैज्ञानिक। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद किसी भीषण प्रयोग में अपने प्राण गँवा दिए हैं। इधर यह भी सुनने में आया है कि वे किसी अपरिचित अंचल में छुपकर अपने काम में लगे हुए हैं, समय आने पर प्रकट हो जाएँगे। प्रोफ़ेसर शंकू की प्रत्येक डायरी में कुछ-न-कुछ ऐसी विचित्र जानकारियाँ अंकित हैं जो हमें रोमांचित करती हैं। ये कहानियाँ सच्ची हैं या झूठी, सम्भव हैं या असम्भव—इसका निर्णय आप स्वयं पढ़कर कर लें। रोचक शैली में लिखा गया सत्यजित राय का बहुचर्चित-बहुप्रशंसित उपन्यास है—‘प्रोफ़ेसर शंकू के कारनामे’।
Kabuliwale Ki Bangali Biwi
- Author Name:
Sushmita Bandyopadhyay
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Description:
“चाहत! चाहत का मतलब समझते हैं आप लोग? एक इनसान को दो वक़्त का खाना देने से ही क्या चाहत होती है? सिर छुपाने के लिए थोड़ी-सी जगह दे देने से ही क्या कर्तव्य ख़त्म हो जाता है? ब्याह कर भाइयों के पास बीवी को छोड़ जाने से ही क्या शौहर के सब दायित्वों का निर्वाह हो जाता है?...दिन-पर-दिन उसके भाई मुझ पर हाथ उठाते हैं...अशोभनीय भाषा में गाली-गलौच करते हैं...माता-पिता तक को गालियाँ देते हैं...”
सुष्मिता बंद्योपाध्याय का दिल दहला देनेवाला आत्मकथात्मक उपन्यास है—‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’।
बंगाली ब्राह्मण परिवार की लड़की का एक अफ़ग़ानी लड़के से प्रेम, फिर विवाह और फिर आठ साल तक अफ़ग़ानिस्तान में यातनाओं का कुचक्र—यही कथाभूमि है इसकी।
इस आत्मकथ्य में जहाँ तालिबानी पृष्ठभूमि की, निरंकुश धार्मिक कट्टरताओं को बेनक़ाब किया गया है, वहीं निरपेक्ष रूप से एक स्त्री की, छोटे बच्चे की तरह अपने घर वापस आने की छटपटाहट को भी मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है।
भीतर तक हौला देनेवाला उपन्यास है—‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’।
Sone Ka Quila
- Author Name:
Satyajit Ray
- Book Type:

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Description:
सत्यजित राय ने इस उपन्यास में अपने किशोर पाठकों को बंगाल से राजस्थान तक की यात्रा कराई है—कलकत्ता से जैसलमेर तक की यात्रा। यह उपन्यास एक ऐसे किशोर बालक मुकुल की कथा है जिसे पूर्व जन्म की बातें याद रहती हैं। साथ ही यह एक ऐसे जासूस की कथा है जिसे इस प्रकार के सारे रहस्य खोज निकालने का शौक़ है। अपनी इस विद्या में वह पूरी तरह निपुण है। ये जासूस फेलूदा हैं जिनका पूरा नाम है प्रदोष मित्तिर।
मुकुल के पूर्व जन्म की बातों की खोज करने निकले फेलूदा। मुकुल के पूर्व जन्म में एक सोने का क़िला था, एक जगह कहीं गड़ा ख़ज़ाना और उसके घर के पास ही कहीं लड़ाई चल रही थी। फेलूदा यह सब खोजते-खोजते कलकत्ता से जैसलमेर पहुँच गए। सोने का क़िला व गड़ा ख़ज़ाना कइयों को ललचा गया था। गड़ा ख़ज़ाना कौन खोज निकाले और कौन उस पर क़ब्ज़ा करे, इस पर दूसरी दौड़ भी शुरू हो गई थी। फेलूदा जानते थे कि लोग उनका पीछा करेंगे। वे सतर्क थे। पीछा करनेवाले बदमाशों ने बड़ा जाल रचा, मगर फेलूदा मात खानेवाले नहीं थे। पक्के जासूस थे।
सत्यजित राय का यह किशोर उपन्यास पाठकों को ख़ूब मज़े से राजस्थान के कई शहर किसनगढ़, बीकानेर, जोधपुर, पोखरण, रामदेवरा और फिर जैसलमेर दिखाता है।
‘सोने का क़िला’ सत्यजित राय के चार किशोर उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास के चित्र भी उन्होंने स्वयं बनाए हैं।
Kashi Ka Assi
- Author Name:
Kashinath Singh
- Book Type:

- Description: ज़िन्दगी और ज़िन्दादिली से भरा एक अलग क़िस्म का उपन्यास। उपन्यास के परम्परित मान्य ढाँचों के आगे प्रश्नचिह्न। ‘अस्सी’ काशीनाथ की भी पहचान रहा है और बनारस की भी। जब इस उपन्यास के कुछ अंश ‘कथा रिपोर्ताज’ के नाम से पत्रिकाओं में छपे थे तो पाठकों और लेखकों में हलचल-सी हुई थी। छोटे शहरों और क़स्बों में उन अंक विशेषों के लिए जैसे लूट-सी मची थी, फ़ोटोस्टेट तक हुए थे, स्वयं पात्रों ने बावेला मचाया था और मारपीट से लेकर कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ तक दी थीं। अब यह मुकम्मल उपन्यास आपके सामने है जिसमें पाँच कथाएँ हैं और उन सभी कथाओं का केन्द्र भी अस्सी है। हर कथा में स्थान भी वही, पात्र भी वे ही—अपने असली और वास्तविक नामों के साथ, अपनी बोली-बानी और लहज़ों के साथ। हर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दे पर इन पात्रों की बेमुरव्वत और लट्ठमार टिप्पणियाँ काशी की उस देशज और लोकपरम्परा की याद दिलाती हैं जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे। उपन्यास की भाषा उसकी जान है—भदेसपन और व्यंग्य-विनोद में सराबोर। साहित्य की ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर’ वाणी शायद कहीं दिख जाए!
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