Kohbar Ki Shart
(0)
Author:
Keshav Prasad MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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‘कोहबर की शर्त’ एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो गाँवों—बलिहार और चौबे छपरा—का जनजीवन गहन संवेदना और आत्मीयता के साथ चित्रित हुआ है—एक रेखांकन की तरह, यथार्थ की आड़ी-तिरछी रेखाओं के बीच झाँकती-सी कोई छवि या आकृति। यह आकृति एक स्वप्न है। इसे दो युवा हृदयों ने सिरजा था। लेकिन एक पिछड़े हुए समाज और मूल्य-विरोधी व्यवस्था में ऐसा स्वप्न कैसे साकार हो? चन्दन के सामने ही उसके स्वप्न के चार टुकड़े—कुँवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा, विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा—हो जाते हैं। इतना सब झेलकर भी चन्दन यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढ़ता और विश्वास से खड़ा रहता है।</p> <p>‘कोहबर की शर्त’ एक तरह से निराश और बरबाद ज़िन्दगी में एक नई प्रेरणा, नई स्फूर्त और नया उत्साह फूँकने की ही शर्त है, जिसका विस्तार इस मर्मस्पर्शी उपन्यास में सहज ही देखा जा सकता है।</p> <p>उल्लेखनीय है कि यह उपन्यास हिन्दी सिनेमा की दो चर्चित फ़िल्मों का आधार बना है : 1982 में हिरेन नाग द्वारा निर्देशित ‘नदिया के पार’ तथा हाल के वर्षों में बेहद लोकप्रिय रही ‘हम आपके हैं कौन।’
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‘कोहबर की शर्त’ एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो गाँवों—बलिहार और चौबे छपरा—का जनजीवन गहन संवेदना और आत्मीयता के साथ चित्रित हुआ है—एक रेखांकन की तरह, यथार्थ की आड़ी-तिरछी रेखाओं के बीच झाँकती-सी कोई छवि या आकृति। यह आकृति एक स्वप्न है। इसे दो युवा हृदयों ने सिरजा था। लेकिन एक पिछड़े हुए समाज और मूल्य-विरोधी व्यवस्था में ऐसा स्वप्न कैसे साकार हो? चन्दन के सामने ही उसके स्वप्न के चार टुकड़े—कुँवारी गुंजा, सुहागिन गुंजा, विधवा गुंजा और कफ़न ओढ़े गुंजा—हो जाते हैं। इतना सब झेलकर भी चन्दन यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढ़ता और विश्वास से खड़ा रहता है।</p>
<p>‘कोहबर की शर्त’ एक तरह से निराश और बरबाद ज़िन्दगी में एक नई प्रेरणा, नई स्फूर्त और नया उत्साह फूँकने की ही शर्त है, जिसका विस्तार इस मर्मस्पर्शी उपन्यास में सहज ही देखा जा सकता है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि यह उपन्यास हिन्दी सिनेमा की दो चर्चित फ़िल्मों का आधार बना है : 1982 में हिरेन नाग द्वारा निर्देशित ‘नदिया के पार’ तथा हाल के वर्षों में बेहद लोकप्रिय रही ‘हम आपके हैं कौन।’
Book Details
-
ISBN9788126714223
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कुसुम खेमानी के उपन्यास ‘लावण्यदेवी’ का कथा-फ़लक इतना विस्तृत है कि इसमें एक कुटुम्ब की पाँच पीढ़ियों की गाथा समाहित है। गाथा इसलिए कि इसमें केवल प्रभावती, ज्योतिर्मयीदेवी, लावण्यदेवी और उनकी सन्तति तथा नाती-पोतों की दास्तान ही नहीं है; बल्कि इनके बहाने जैसे एक पूरे युग और काल के प्रवाह को भाषा में बाँधने की कोशिश की गई है। ऐसी कथा-वस्तु में बिखराव की आशंका बराबर बनी रहती है, लेकिन कुसुम खेमानी ने अपने रचनात्मक कौशल से जैसा कथा-संयोजन किया है, वह देखते ही बनता है। यह हिन्दी का उपन्यास तो है ही, लेकिन इसकी भाषा में बांग्ला और राजस्थानी के शब्दों को इतनी ख़ूबसूरती से पिरोया गया है कि वे कहीं सायास टाँके गए प्रतीत नहीं होते। सामान्यतः हिन्दी के उपन्यासों में एक लोकभाषा या एक प्रान्तीय भाषा के शब्द ही देखने को मिलते हैं। शमशेर ने जो कहीं लिखा है—‘कवि घँघोल देता है व्यक्तियों के चित्र...’ उसी तरह कहा जा सकता है कि कथाकार ने एक भाषा के जल में दो और भाषाओं के रंगों को ‘घँघोल’ दिया है। फिर जो कथा-भाषा तैयार हुई है; उसे एक शब्द में ‘बतरस’ ही कहा जा सकता है। इस दृष्टि से यह हिन्दी का विलक्षण उपन्यास बन पड़ा है।
उपन्यास की कथा में अनेक मोड़ आते हैं। भाषा का प्रवाह तीव्र है और इस कथा-यात्रा में अनुभव के नए और लगभग अछूते प्रदेश उद्घाटित होते चलते हैं। इन कारणों से उपन्यास में ग़ज़ब की पठनीयता आ गई है और ऐसा करना एक समर्थ क़िस्सागो के लिए ही सम्भव था। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में लावण्यदेवी जिस प्रश्न से टकराती हैं, वह मुक्ति का प्रश्न है, किन्तु यह मुक्ति स्वयं तक या अपने प्रियजनों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आगे चलकर मानव मात्र की मुक्ति में बदलती दिखाई देती है। संसार की भौतिकता से घिरी हुई एक आधुनिक कथा नायिका लावण्यदेवी के भीतर भी कहीं गहरे एक देशज अध्यात्म बचा हुआ है, जो उन्हें संन्यास और वैराग्य के लिए विवश करता है, लेकिन यह संन्यास भी कर्म का स्वीकार ही है जिसका प्रमाण लावण्यदेवी का उत्तर जीवन है। दरअसल लावण्यदेवी का व्यक्तित्व कर्म और संघर्ष की धातुओं से ही बना है, किन्तु ये धातुएँ ठोस और जड़ न होकर उच्चतम मूल्यों के ताप में पिघलती भी दिखाई देती हैं। वे अपनी सन्तति को भी निरन्तर संघर्ष और कर्म का ही सन्देश देती हैं। यह कर्म का ‘स्वीकार’ ही है जिसके चलते लावण्यदेवी प्रारब्ध को ख़ारिज करती हैं और जहाँ ख़ारिज नहीं कर पातीं, वहाँ उसके सामने घुटने भी नहीं टेकतीं। लावण्यदेवी का कर्मशील जीवन और उनके सारे फ़ैसले जनहित में किए जाते हैं। इसमें सन्देह नहीं, उच्चवर्ग की पृष्ठभूमि होने के बावजूद यह उपन्यास, इन्हीं मूल्यों के कारण व्यापक पाठक समाज में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रहेगा।
—एकान्त श्रीवास्तव
Ek Akshar Bhi Jhootha Nahin
- Author Name:
Sushmita Bandyopadhyay
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एक नन्ही बच्ची अपने ख़्वाबों की दुनिया में अपनी ख़्वाहिशें लेकर बड़ी होना चाहती है, जैसे हर शिशु चाहता है। परन्तु सामाजिक, पारिवारिक अनुशासन और परिवेश के दबाव, अपने ख़्वाबों और ख़्वाहिशों के अनुसार बड़ी होने के मार्ग में बाधक बनते हैं और परिणामस्वरूप मन में ज़िद पनपती है।
अन्य दो-चार लड़कियों की भाँति सपनों, तर्कों, समाज, परिवार, परिवेश की आहुति दे वह बड़ी हो सकती थी, लेकिन वह सिर्फ़ लड़की नहीं, इनसान है, इसलिए तर्कों और विवेक के साथ अपनी इच्छानुसार बड़ी होना चाहती थी।
इसीलिए, समाज, परिवार और अनुशासन को अँगूठा दिखा एक ‘विधर्मी’, अफ़ग़ान युवक से शादी रचा सपनों के रथ पर सवार हो रवीन्द्रनाथ के काबुलीवाले के देश में क़दम रखा। अफ़ग़ानिस्तान की धरती पर क़दम रखते ही उसके सारे सपने चूर-चूर हो गए। यह तो रवीन्द्रनाथ के रहमत का देश नहीं है। यह तो मानो मध्ययुगीन, अशिक्षाग्रस्त, जर्जर, दासप्रथावाला अन्धकारमय असांस्कृतिक देश है।
विवेक और मानवता उसे जेहाद छेड़ने के लिए प्रेरित करते। आख़िर शिक्षा, नारी-स्वाधीनता के नाम पर, मानवता के पक्ष में अपना सिर उठाकर उसने मनुष्यता के शत्रु ‘इस्लामी’ गुरु और उनके शिष्य तालिबानियों के विरुद्ध संग्राम छेड़ ही दिया।
तालिबानों के अत्याचारों, दम-घोंटू रीति-रिवाजों, पल-पल मौत के साए में जीवन बसर करनेवाले मज़लूमों, बेक़सूरों के ख़ौफ़ की सच्ची दास्तान है सुष्मिता बंद्योपाध्याय का यह तीसरा आत्मकथात्मक उपन्यास—‘एक अक्षर भी झूठा नहीं’।
Honi Anhoni
- Author Name:
Balwant Singh
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प्रस्तुत पुस्तक में हिन्दी जगत के मूर्धन्य उपन्यासकार बलवन्त सिंह ने मानवीय मनोविज्ञान से युक्त आधुनिक परिवेश में रची-बसी कहानी प्रस्तुत किया है, जो युवा हृदय में हलचल पैदा करने में सक्षम है।
इस उपन्यास में आधुनिक मनोभूमि का विराट चित्र प्रस्तुत किया गया है। जनजीवन के सामाजिक यथार्थ की ऐसी विश्वसनीयता विरल है। इस रचना में संवेदना का सरल प्रवाह विद्यमान है, यह उपन्यास बेजोड़ ही नहीं क्लासिक है जिसे पाठक जब पढ़ना शुरू करेंगे तो अन्त तक पढ़ने को विवश हो जाएँगे।
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