Rashtrabhasha Hindi Samasyaye Aur Samadhan
(0)
Author:
Aacharya Devendranath SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
400
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Available
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हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी पा गई, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ अन्दरूनी भी हैं और बाह्य भी। अन्दरूनी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है, किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा की राह में रोड़े आना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु जागरूक राष्ट्र के लिए उन्हें हल कर लेना भी कठिन नहीं है।</p> <p>प्रस्तुत पुस्तक के विद्वान् लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सभी समस्याओं पर बड़ी गहराई से अध्ययन करके उनका समाधान खोजने का स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने समस्याओं पर चिन्तन करने के पूर्व भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अन्तर्सम्बन्ध पर गहन विचार करने के पश्चात् हिन्दी के महत्त्व का गहराई से विवेचन किया है, जिससे इस भाषा के राष्ट्रभाषा का स्वरूप और उसकी अनिवार्यता पूरी तरह स्थापित हो जाती है। इसी सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने हिन्दी भाषा की सरलता का विवेचन किया है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है। इस सम्बन्ध में विचार करते समय हिन्दी के और अधिक सरलीकरण पर भी विचार किया गया है।
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हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी पा गई, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ अन्दरूनी भी हैं और बाह्य भी। अन्दरूनी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है, किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा की राह में रोड़े आना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु जागरूक राष्ट्र के लिए उन्हें हल कर लेना भी कठिन नहीं है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक के विद्वान् लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सभी समस्याओं पर बड़ी गहराई से अध्ययन करके उनका समाधान खोजने का स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने समस्याओं पर चिन्तन करने के पूर्व भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अन्तर्सम्बन्ध पर गहन विचार करने के पश्चात् हिन्दी के महत्त्व का गहराई से विवेचन किया है, जिससे इस भाषा के राष्ट्रभाषा का स्वरूप और उसकी अनिवार्यता पूरी तरह स्थापित हो जाती है। इसी सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने हिन्दी भाषा की सरलता का विवेचन किया है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है। इस सम्बन्ध में विचार करते समय हिन्दी के और अधिक सरलीकरण पर भी विचार किया गया है।
Book Details
-
ISBN9788180312885
-
Pages210
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मुक्तिबोध प्रथमत: और अन्तत: कवि थे। जिस तरह उन्होंने अपने विचार को कविता में लाने के लिए आन्तरिक संघर्ष किया, उसी तरह अपने जीवनानुभूतियों को भी अपनी कला में रूपान्तरित किया। उनका व्यक्तित्व जिन तत्त्वों से निर्मित हुआ है, उनके सरलीकृत, वर्गीकृत और सुविधावादी विश्लेषण से हम सही निष्कर्षों तक नहीं पहुँच सकते हैं।
इस पुस्तक का उद्देश्य मुक्तिबोध के लगभग मिथक बन चुके जीवन और व्यक्तित्व को खोलना नहीं, बल्कि समझना है। उनका काव्य और चिन्तन उनके व्यक्तित्व और जीवन से दूर-दूर तक प्रभावित है, लेकिन इस प्रभाव को किसी यांत्रिक रिश्ते के आधार पर रेखांकित करना न तो सम्भव है, और न उचित ही। उन्होंने अपने दु:ख को निजी मर्सिया की शक्ल में कहीं भी नहीं लिखा है, उनके जीवन में झाँककर उनकी कष्टपूर्ण स्थितियों को मानवीय पीड़ा के व्यापक रूप में कविताओं में देखना एक रोमांचक अनुभव है। यह पुस्तक मुक्तिबोध के जीवन और व्यक्तित्व की रेखाओं को उनके अन्तर्विरोधों सहित पहचानने का प्रयत्न करती है।
कवि चन्द्रकान्त देवताले मुक्तिबोध के जीवन और उनकी कविता में लम्बे समय से दिलचस्पी लेते रहे हैं; यह पुस्तक इसी का नतीजा है। अपनी भूमिका में वे कहते हैं : “मैं समझता हूँ मुक्तिबोध जैसे कवि और बेहद सचेत मनुष्य की कविताओं और उनके विचारों का आकलन एक और अन्तिम बार का कार्य नहीं है। कवि के प्रति अपने आत्मीय लगाव के साथ ही मैंने उन्हें समझने की कोशिश की। पर यह आत्मीय लगाव इस अर्थ में कहीं बन्धनकारी नहीं रहा कि मैं जो महसूस कर रहा हूँ, उसे कहने में संकोच करूँ।”
Kabeer (Radha)
- Author Name:
Vijendra Snatak
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- Description: Awating description for this book
Shatabdi Ke Dhalte Varshon Mein
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Nirmal Verma
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निबन्ध को निर्मल वर्मा ऐसी विधा मानते हैं जिसका मिज़ाज भले थोड़ा मनमौजी हो लेकिन उसमें विचारों और अनुभवों की एक बड़ी राशि की भूमि बनने की क्षमता होती है। इसके खुलेपन की वजह से वे उसे एक ग़ैर-अभिजात विधा मानते हैं।
‘शताब्दी के ढलते वर्षों में’ उनका बहुत पढ़ा जाने वाला संग्रह है। यहाँ शामिल निबन्धों में स्वयं अपने बारे में और साथ ही सांस्कृतिक अस्मिता के बारे में रचनाकार के आत्ममंथन की प्रक्रिया ने रूपाकार ग्रहण किया है। एक ऐसी पीड़ित किन्तु अपरिहार्य प्रक्रिया जो ‘अन्य’ के सम्पर्क में आने पर ही शुरू होती है।
निर्मल वर्मा के इन निबन्धों में यूरोप और पश्चिमी संस्कृति की उस ‘अन्यता’ की ऐसी पहचान दिखाई पड़ती है जो उनके लेखन के आरम्भिक वर्षों में उसी रूप में नहीं मिलती, जैसी वह उन्हें बाद के वर्षों में यूरोप प्रवास के दौरान प्रतीत हुई। इस ‘अन्य’ में साम्यवाद की यूरोपीय विचारधारा भी शामिल है, जिसके भीतर विघटन और विनाश के बीजों को निर्मल वर्मा ने पहली बार अपने निबन्धों में निरूपित किया था।
समाज, संस्कृति और धर्म के अलावा शुद्ध साहित्यिक प्रश्नों को तो इनकी विचार-परिधि में समेटा ही गया है, इसके अलावा कुछ विशिष्ट रचनाकारों के सृजन-कर्म पर भी निर्मल वर्मा ने दृष्टि केन्द्रित की है जिनमें प्रेमचंद, अज्ञेय, मलयज और चेख़व प्रमुख हैं। जीवन-जगत के इतने कगारों को उनकी व्यापकता में छूते हुए ये निबन्ध अपने पाट की चौड़ाई से ही नहीं, मोती निकाल लाने की लालसा में गहरे डूबने के प्रयास से भी पाठक को आकर्षित और प्रभावित करते हैं।
बीसवीं शताब्दी के वैचारिक उतार-चढ़ावों को पारदर्शी दृष्टि से अंकित करनेवाले ये निबन्ध स्वयं निर्मल वर्मा की लम्बी चिन्तन-यात्रा के विभिन्न पड़ावों को एक जगह प्रस्तुत करते हैं।
Poorva-Rang
- Author Name:
Namvar Singh
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“ऐसे युग में जहाँ मान्यताएँ विवादग्रस्त और अनिश्चित हों, ऐन्द्रिय विषय ही निश्चित हैं और उन्हीं का यथातथ्य चित्रण सम्भव भी है। यही वजह है कि आज के अधिकांश किशोर तथा किशोर-मति कवि प्राकृतिक चित्रों की खोज में विकल हैं। झंझटों से बाहर निकलने का यह आसान तरीक़ा है। समाज से कम झंझट प्रकृति में है और प्रकृति में भी इन्द्रियग्राह्य प्रभावों के चित्रण में सबसे कम झंझट है।” नामवर जी ने यह टिप्पणी 1957 में 'कवि' पत्रिका के 'विशिष्ट कवि' शीर्षक स्तम्भ में मुक्तिबोध से अन्य कवियों की तुलना करते हुए की थी। उल्लेखनीय है कि इस काल-खंड में उन्होंने श्री विष्णुचन्द्र शर्मा द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘कवि' के लिए ‘कविमित्र' नाम से काफ़ी समय तक एक स्तम्भ लिखा था जिसमें वे समकालीन कविता और कवियों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ करते थे। इस संकलन में उनमें से ज़्यादातर को ले लिया गया है।
पुस्तक में शामिल अन्य आलेख भी ज़्यादातर पाँचवें दशक में लिखे गए थे जिनमें से कुछ प्रकाशित हैं और कुछ अप्रकाशित। ऐसे अधूरे आलेख भी यहाँ जुटाए गए हैं जो किसी कारण से पूरे नहीं लिखे जा सके और जिन्हें काशीनाथ जी ने अपने पास सहेजकर रखा था। कहना न होगा कि इस पुस्तक में उस दौर के नामवर जी से हमारा परिचय होगा जब वे अपनी स्थापनाओं को आकार दे रहे थे और जिन्हें हमने बाद में आई उनकी पुस्तकों में देखा।
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