The Book Of English Grammar Tenses
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Author:
Mamta MehrotraPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Language-linguistics₹
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English grammar can be challenging, but it is essential to effective communication. Whether you are writing an essay, sending an email, or engaging in a conversation, using correct grammar can make all the difference in how your message is received. This comprehensive grammar book of tenses for students is designed to help them master the English language. This book is intended to help students improve their grammar and communication skills. In this book, you will find clear explanations of grammar rules and numerous examples and practice exercises to help you reinforce your understanding. The book is organized in a logical and easy-to-follow manner, so you can learn at your own pace and track your progress. Hopefully, this book will be a valuable resource for you as you work to improve your grammar skills.
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English grammar can be challenging, but it is essential to effective communication. Whether you are writing an essay, sending an email, or engaging in a conversation, using correct grammar can make all the difference in how your message is received. This comprehensive grammar book of tenses for students is designed to help them master the English language. This book is intended to help students improve their grammar and communication skills. In this book, you will find clear explanations of grammar rules and numerous examples and practice exercises to help you reinforce your understanding. The book is organized in a logical and easy-to-follow manner, so you can learn at your own pace and track your progress. Hopefully, this book will be a valuable resource for you as you work to improve your grammar skills.
Book Details
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ISBN9788196159047
-
Pages88
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: प्रगतिशील आलोचना-परम्परा के प्रतिनिधि आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की यह पुस्तक‘विधाओं की विरासत’न केवल उनकी सूक्ष्म आलोचकीय दृष्टि के कारण बल्कि उनके गद्य की सरस सर्जनात्मकता के कारण भी ध्यान आकृष्ट करती है। साहित्य उनके लिए मानवीयता का विस्तार करने वाली नैतिकता का माध्यम है, रचना सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा और आलोचना महत्त्वपूर्ण सामाजिक दायित्व। इस दायित्व का निर्वाह करते हुए वे रचनाओं की और उनमें वर्णित पात्रों की पृष्ठभूमि और जीवन की खोज करते हैं और उसके सामने अपने जीवनानुभव एवं दृष्टिकोण को रखते हुए पाठक के भाव-बोध को समृद्ध करते हैं। वे भाषा एवं चित्रण-कला के विश्लेषण के माध्यम से भी मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करते हैं। वे रचनाओं की संरचना को अपने विश्लेषण द्वारा सामाजिकता तथा राजनीति की धार प्रदान करते हैं। राजनीति और रचना बराबर सामाजिकता या सामाजिकता और रचना बराबर राजनीति का सूत्र इस पुस्तक के लेखों, टिप्पणियों आदि में मिलता है। सामाजिकता को वे बोध और संवेदना दोनों मानते हैं। जीवन की विषमता को पाटने की छटपटाहट से रहित रचना उनके लिए साहित्य नहीं हो सकती। उनके मुताबिक, संवेदना जीवन-आचरण और रचना-आचरण के द्वारा संस्कृति में ढलती है और साहित्य की महत्ता अनुभूति की तीव्रता को लेकर नहीं, बल्कि उसे शब्द के माध्यम से असीमित कर देने में है। वे किसी भी रचना की परख ऐसी ही कसौटियों से करते हैं और सांस्कृतिक चेतना के विकास को पहचानने वाली अन्तर्दृष्टि पाठक को प्रदान करते हैं। वस्तुतः यह ऐसी आलोचना है जो स्वयं एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसकी आज कहीं अधिक आवश्यकता है।
Arya-Dravid Bhashaon Ki Moolbhoot Ekta
- Author Name:
Bhagwan Singh
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Description:
आमतौर पर माना जाता है कि आर्य और द्रविड़ भाषाओं का सम्बन्ध दो अलग-अलग भाषा परिवारों से है। ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ पुस्तक इसी धारणा का खंडन करती है और यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि आर्य और भारोपीय भाषाओं का स्रोत वही है जो द्रविड़ भाषाओं का।
जिन तथ्यों को आधार मानकर यह प्रबन्ध अपनी इस धारणा को स्पष्ट करता है, उनमें सबसे प्रमुख यह है कि भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में तात्विक विभेद नहीं है और यह कि इन भाषाओं का विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ था।
विभिन्न भाषाओं की शब्दावली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह पुस्तक भाषा की आदिम अवस्था और विकास क्रम का विश्लेषण भी करती है तथा वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन बोलियों के स्वरूप को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन्हें अलग मानकर चलेंगे।
लेखक के अपने शब्दों में इस ‘कृति का गम्भीरता से अध्ययन करने के बाद इतना तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य कुतूहल उत्पन्न करना नहीं है।’ यह एक बेहद उलझी हुई समस्या को समझने और उसका कोई समाधान ढूँढ़ने का एक जिम्मेदार प्रयास है।
भाषा के गम्भीर अध्येताओं के लिए एक विचारोत्तेजक कृति।
Bhasha Vigyan Ki Bhumika
- Author Name:
Aacharya Devendranath Sharma
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक की उपादेयता, लोकप्रियता एवं सामयिकता का प्रमाण यह है कि गत चैंतीस वर्षों में इसके चार संस्करण और बीस से अधिक पुनर्मुद्रण हो चुके हैं। नवीन संस्करण में ग्रन्थ की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए संशोधन एवं परिवर्धन का प्रयास किया गया है।
‘भाषाविज्ञान का इतिहास’ नामक अध्याय में बीसवीं शताब्दी में भाषाविज्ञान के विकास का प्रकरण ग्रन्थ को समसामयिक बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त भाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, व्यतिरेकी भाषाविज्ञान और संगणक भाषाविज्ञान का परिचय इस नवीन संस्करण की अन्यतम विशेषता है। इससे पाठकों को न केवल इन विषयों की जानकारी मिलेगी, अपितु भाषाविज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति को दिशा–चयन में भी सहायता मिलेगी।
Soordas 'Harbans Lal Sharma'
- Author Name:
Harbans Lal Sharma
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Description:
यदि युग-सापेक्ष दृष्टि से तात्कालिक समाज को केन्द्र-बिन्दु बनाकर सूर-साहित्य का आकलन किया जाए तो स्पष्ट लक्षित होगा कि सूर ने बाह्य प्रपंच से मुक्त होकर अन्तर्लीन दशा में काव्य-सृष्टि की थी, किन्तु इसका यह अर्थ न समझ लिया जाए कि युग की सापेक्षता से सूर और उनका साहित्य सर्वथा बचा रहा। सूर ने भक्ति को माधुर्य-मंडित करके प्रस्तुत करने का ध्येय बनाया हुआ था। यही उस युग की सबसे बड़ी माँग थी।
चैतन्य के शिष्य रूप और सनातन गोस्वामी ने शास्त्रीय मर्यादा में देववाणी द्वारा भक्ति का माधुर्य पक्ष स्थिर किया था; किन्तु जनमानस से उसका सीधा लगाव न उस युग में हुआ और न बाद में ही वह सम्भव हो सका।
हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और आचार्यों ने समय-समय पर सूरदास के साहित्य और उनके साहित्येतर पहलुओं पर जो चिन्तन-मनन किया है, उसका एक प्रतिनिधि संकलन यहाँ पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। सूर-साहित्य के जिज्ञासुओं, पाठकों और हिन्दी साहित्य के सभी छात्रों के लिए विचार-कोश की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली पुस्तक।
Vichar Ka Ananta
- Author Name:
Purushottam Agarwal
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Description:
वर्तमान समय के केन्द्रीय किन्तु अवरुद्ध प्रश्नों के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल के टकराव और आत्ममन्थन की फलश्रुति है—‘विचार का अनंत’। एकेश्वरवाद को स्वयंसिद्ध और इतिहास का लक्ष्य मानने की सर्वस्वीकृत मान्यता का तर्कसंगत विरोध करते हुए इस पुस्तक में एकेश्वरवादी आस्था-तन्त्र और ज्ञान-मीमांसा की गहरी पड़ताल की गई है। इन निबन्धों में सर्जनात्मकता के आत्मसंघर्ष और समाज के साथ उसके सम्बन्ध को समझने की अकुलाहट है।
‘विचार का अनंत’ एक ऐसी पुस्तक भी है जिसमें सर्जनात्मकता मात्र की अपनी विशिष्ट ज्ञान-मीमांसा को अत्यन्त विचारोत्तेजक ढंग से रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक भक्ति-संवेदना को ‘शास्त्रोक्त’ और ‘काव्योक्त’ की परस्पर संबद्ध किन्तु भिन्न कोटियों में देखने का आग्रह करती है। ‘विचार का अनंत’ इस अर्थ में विशिष्ट है कि यह सभ्यताओं, संस्कृतियों, परम्पराओं के साथ संवाद करती है और यह भी स्पष्ट करती है कि उन दिनों अत्यन्त प्रचलित अस्मिता-विमर्श की नैतिक परिणतियाँ किस हद तक अनर्थकारी हैं या हो सकती हैं। संवेदनशील मनुष्य के मन में सहज रूप से विद्यमान, साझे मानवीय चैतन्य की सम्भावना को सशक्त स्वर देने के कारण ‘विचार का अनंत’ की उपस्थिति अपनी विशिष्टता के साथ सदैव बनी रहेगी।
Prabandh Pratima
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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Description:
निराला कवि होने के साथ-साथ विचारक भी थे, अपने देश-काल के प्रति सजग विचारक। यही कारण है कि उनका रचना-कर्म केवल कविता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना, निबन्ध आदि भी लिखे और इन विधाओं में भी अपना विशिष्ट स्थान बनाया।
‘प्रबंध प्रतिमा’ निराला जी के लेखों का दूसरा संकलन है। इसमें अधिकांश विचार-प्रधान लेख हैं, कुछ संस्मरणात्मक भी हैं, जैसे : ‘गांधी जी से बातचीत’, ‘नेहरू जी से दो बातें’, ‘प्रान्तीय साहित्य सम्मेलन’। विचार-प्रधान लेखों में पाँच लेख सामाजिक समस्याओं पर हैं तथा ‘महर्षि दयानन्द सरस्वती और युगान्तर’ एवं ‘साहित्यिक सन्निपात या वर्तमान धर्म’ शीर्षक लेखों में निराला के धर्मविषयक चिन्तन को अभिव्यक्ति मिली है। बाक़ी सब लेख साहित्यिक विषयों पर हैं, लेकिन यहाँ भी उन्होंने एक तरफ़ विद्यापति और चंडीदास सरीखे प्राचीन कवियों पर विचार किया है, तो दूसरी तरफ़ अपने समकालीन साहित्यकारों तथा प्रवृत्तियों पर टिप्पणियाँ की हैं। ‘प्रबंध प्रतिमा’ साहित्यिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों पर निराला के विचारोत्तेजक लेखों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
Mahakavi Soordas
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
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- Description: भक्तिकाल के इस अप्रतिम कवि के जीवन और साहित्य पर जितना कुछ उल्लेखनीय अध्ययन अब तक हुआ है, उसमें आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की यह पुस्तक विशिष्ट स्थान रखती है। उपलब्ध स्रोत-सामग्री का तुलनात्मक अध्ययन करके आचार्य वाजपेयी ने महाकवि के जीवन-तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में दी है, और साथ ही उनके कृतित्व और भक्ति के सिद्धान्त-पक्ष का विवेचन भी किया है। आकार में लघु होते हुए भी सूर-साहित्य का इतना समग्र अनुशीलन इस पुस्तक में है कि निस्संकोच भाव से इसे 'गागर में सागर' की संज्ञा दी जा सकती है।
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