Hindi Sahitya : Udbhav Aur Vikas
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Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
995
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्यिक इतिहास-लेखन को पहली बार ‘पूर्ववर्ती व्यक्तिवादी इतिहास-प्रणाली के स्थान पर सामाजिक अथवा जाती ऐतिहासिक प्रणाली’ का दृढ़ वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनका प्रस्तुत ग्रन्थ इसी दृष्टि से हिन्दी का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साहित्येतिहास है। यह कृति मूलतः विद्यार्थियों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है। प्रयत्न किया गया है कि यथासम्भव सुबोध भाषा में साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों और उसके महत्त्वपूर्ण बाह्य रूपों के मूल और वास्तविक स्वरूप का स्पष्ट परिचय दे दिया जाए। परन्तु पुस्तक के संक्षिप्त कलेवर के समय ध्यान रखा गया है कि मुख्य प्रवृत्तियों का विवेचन छूटने न पाए और विद्यार्थी अद्यावधिक शोध-कार्यों के परिणाम से अपरिचित न रह जाएँ। उन अनावश्यक अटकलबाजियों और अप्रासंगिक विवेचनाओं को समझाने का प्रयत्न तो किया गया है, पर बहुत अधिक नाम गिनाने की मनोवृत्ति से बचने का भी प्रयास है। इससे बहुत से लेखकों के नाम छूट गए हैं, पर साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ नहीं छूटी हैं।</p> <p>साहित्य के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए एक अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्यिक इतिहास-लेखन को पहली बार ‘पूर्ववर्ती व्यक्तिवादी इतिहास-प्रणाली के स्थान पर सामाजिक अथवा जाती ऐतिहासिक प्रणाली’ का दृढ़ वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनका प्रस्तुत ग्रन्थ इसी दृष्टि से हिन्दी का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साहित्येतिहास है। यह कृति मूलतः विद्यार्थियों को दृष्टि में रखकर लिखी गई है। प्रयत्न किया गया है कि यथासम्भव सुबोध भाषा में साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों और उसके महत्त्वपूर्ण बाह्य रूपों के मूल और वास्तविक स्वरूप का स्पष्ट परिचय दे दिया जाए। परन्तु पुस्तक के संक्षिप्त कलेवर के समय ध्यान रखा गया है कि मुख्य प्रवृत्तियों का विवेचन छूटने न पाए और विद्यार्थी अद्यावधिक शोध-कार्यों के परिणाम से अपरिचित न रह जाएँ। उन अनावश्यक अटकलबाजियों और अप्रासंगिक विवेचनाओं को समझाने का प्रयत्न तो किया गया है, पर बहुत अधिक नाम गिनाने की मनोवृत्ति से बचने का भी प्रयास है। इससे बहुत से लेखकों के नाम छूट गए हैं, पर साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ नहीं छूटी हैं।</p>
<p>साहित्य के विद्यार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए एक अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
Book Details
-
ISBN9788126700356
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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श्रीलाल शुक्ल-कृत ‘राग दरबारी’ एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत करता है। निसंग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिन्दी का शायद यह पहला उपन्यास है। फिर भी ‘राग दरबारी’ व्यंग्य कथा नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँवों की ज़िन्दगी से है, जो वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है।
1968 में पहली बार प्रकाशित ‘राग दरबारी’ के विचार और मूल्यांकन की वस्तुपरकता के साथ देखना और परखना आवश्यक है। इस उपन्यास को पूरी तरह समझने के लिए पुस्तक के सभी पक्षों पर लेख बटोरे गए हैं। जिनके माध्यम से ‘राग दरबारी’ समूचे परिवेश में अधिक पूर्णता के साथ समझा जा सकेगा।
Urdu Ka Arambhik Yug
- Author Name:
Shamsurrahman Farooqui
- Book Type:

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उर्दू भाषा की उत्पत्ति दिल्ली के आसपास हुई, लेकिन आरम्भ में इसमें साहित्य की पैदावार गुजरात और दकन में हुई। ऐसा क्यों हुआ, इस पर इस पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। फिर गुजरात और दकन में सैद्धान्तिक आलोचना और काव्यशास्त्र के उदय तथा इस सिलसिले में अमीर खुसरो और संस्कृत की केन्द्रीय भूमिका को भी इसमें रेखांकित किया गया है। इसके अलावा इस पुस्तक में जिन विषयों की जाँच-पड़ताल की गई है, वे हैं : दिल्ली का साहित्यिक परिप्रेक्ष्य पर देर से प्रकट होना, दिल्ली के साहित्यिक साम्राज्यवादी स्वभाव के कारण ग़ैर दिल्ली और बाहरी साहित्यकारों का उर्दू की प्रामाणिक सूची से बाहर रहना और अठारहवीं सदी की दिल्ली में नई साहित्यिक संस्कृति और काव्यशास्त्र का उदय।
दिल्ली में भाषा की शुद्धता की मुहिम और अन्योक्ति (ईहाम) के आन्दोलनों की वास्तविकता क्या है, उस्तादी/शागिर्दी का इदारा दिल्ली के अलावा कहीं और क्यों न वजूद में आया? इन प्रश्नों के अलावा ‘दिल्ली स्कूल’ और ‘लखनऊ स्कूल’ पर भी इसमें विचार किया गया है। इसका संक्षिप्त रूप शेलडन पॉलक की सम्पादित पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। हमें उम्मीद है कि हिन्दी के पाठकों को यह पुस्तक बेहद उपयोगी और सूचनापरक लगेगी।
Sahitya Sahchar
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: साहित्यिक पुस्तकें हमें सुख-दुःख की व्यक्तिगत संकीर्णता और दुनियावी झगड़ों से ऊपर ले जाती हैं और सम्पूर्ण मनुष्य जाति के और भी आगे बढ़कर प्राणिमात्र के दुःख-शोक, राग-विराग, आह्लाद-आमोद को समझने की सहानुभूतिमय दृष्टि देती हैं। वे पाठक के हृदय को इस प्रकार कोमल और संवेदनशील बनाती हैं कि वह अपने क्षुद्र स्वार्थ को भूलकर अशिवों के सुख-दुःख को अपना समझने लगता है। सारी दुनिया के साथ आह्लाद का अनुभव करने लगता है। एक शब्द में इस प्रकार के साहित्य को ‘रचनात्मक साहित्य’ कहा जा सकता है। क्योंकि ऐसी पुस्तकें हमारे ही अनुभव के ताने-बाने से एक नए रस-लोक, की रचना करती हैं। इस प्रकार की पुस्तकों को ही, संक्षेप में ‘साहित्य’ कहते हैं। साहित्य शब्द का विशिष्ट अर्थ यही है। प्रस्तुत पुस्तक में इस श्रेणी की पुस्तकों के अध्ययन करने का तरीक़ा बताना ही आचार्य द्विवेदी जी का संकल्प है।
Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

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Description:
साहित्य की आलोचना केवल अन्तर्लक्ष्यी (Intrinsic) अथवा पाठ-केन्द्रित (Text Centered) आलोचना नहीं होती, अपितु वैसी बहिर्लक्ष्यी (Extrinsic) आलोचना भी होती है, जो पाठ से बाहर-पाठ के सम्यक् अवबोध के लिए रचनाकार के जीवनवृत्त, उसके जीवन-दृष्टिकोण, उसके युग, उसके सामाजिक यथार्थ, उसकी परम्परा, उसकी संस्कृति आदि को सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखती-परखती और साहित्य का मूल्यांकन करती है। ऐसी आलोचना शब्दों के जोड़-मात्र से बनी वैसी हर रचना को, जिसके पीछे ठोस वास्तविकता नहीं होती, वायवीय मानती है—‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:’ (योगसूत्र)।
हिन्दी में अब तक इसके सिद्धान्त पर तात्त्विक विवेचन और सार्थक बहस प्रस्तुत करनेवाली एक भी पुस्तक नहीं है। ऐसे में पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के प्रति डॉ. शीतांशु के वर्षों के गहरे लगाव, सम्यक् अध्ययन और अनवरत चिन्तन से परिणामित उनकी यह पुस्तक हिन्दी में पहली बार बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों का तथ्यपूर्ण, प्रामाणिक उप-स्थापन करती क्रमश: मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय, साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक और ऐतिहासिक आलोचना की स्वरूपगत मान्यताओं का समीचीन विवेचन प्रस्तुत करती है। पूर्वग्रहहीन सैद्धान्तिक निरूपण के साथ-साथ प्रतिमानों और निदर्शनों की बोध-व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है, जिससे बहुमुख अनुप्रयोग की दिशा भी सहज ही उजागर हो उठी है।
प्रस्तुत पुस्तक यदि एक ओर मार्क्सवादी आलोचनात्मक चिन्तन को रूढ़िवादी विवेचन-सीमा से आगे लाकर उसके उत्तरपक्षीय सैद्धान्तिक स्वरूप तक को निरूपित-व्यवस्थित करती है, तो दूसरी ओर समाज में साहित्य की स्थितिगत पहचानवाली चकाचौंध से निकलकर समाजशास्त्रीय आलोचना के बतौर साहित्य मे निरूपित समाज की पहचान-प्रक्रिया की भी गम्भीर विवेचना करती है; यदि एक ओर साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक आलोचना की प्रकृति, सैद्धान्तिकी और प्रकार्य-प्रक्रिया को आलोचित-प्रत्यालोचित करती है, तो दूसरी ओर उस ऐतिहासिक आलोचना को भी सावयव और सप्रमाण उपस्थापित करती है, जिसे कभी हिन्दी के एक वरिष्ठ आलोचक ने फतवा देते हुए आलोचना के क्षेत्र से ही ख़ारिज कर दिया था। तथ्यत: ‘बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों को जानने, पहचानने और मापने; साथ ही साहित्य को समझने और समझाने की दृष्टि से डॉ. शीतांशु की यह पुस्तक एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक है, जिससे हिन्दी के एक बड़े अभाव की महत्त्वपूर्ण पूर्ति हो जाती है।
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