Celebrate Indian Writers, Download "Rachnaye" App | Celebrate Indian Writers, Download "Rachnaye" App

Aalok Parv

(0)

₹ 795

636 (20% off)

Available

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ि‍याँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।

Read more

ISBN
N/A
Pages
N/A
Avg Reading Time
7 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Don’t Miss Out

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format:

Frequently bought together
Aalok Parv This book ₹636
Banbhatt Ki Aatmakatha Hazariprasad Dwivedi ₹399
Nath Sampraday Hazariprasad Dwivedi ₹299
3 books selected ₹1,334

Piracy Free

Express Delivery

Secure Payment

About the Book

आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ि‍याँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है।

Book Details

  • ISBN
    9788171786862
  • Pages
    221
  • Avg Reading Time
    7 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

Recommended For You

Customer Reviews

Be the first to write a review...

(0)

0 out of 5

Book

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp