Gram Sabha : Loktantra Ka Aadhar
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Author:
Sudhanshu GuptaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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Available
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ग्राम सभा, जिसे संविधान के अनुच्छेद 243(बी) में परिभाषित किया गया है, पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र का आधार है, जो स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करती है और उन्हें शासन में शामिल करती है
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ग्राम सभा, जिसे संविधान के अनुच्छेद 243(बी) में परिभाषित किया गया है, पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र का आधार है, जो स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करती है और उन्हें शासन में शामिल करती है
Book Details
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ISBN9788192435435
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Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: बीते कुछ दशकों के दौरान, भारत की छवि को बिगाड़ने में कुछ हद तक बॉलीवुड की फिल्मों का हाथ है जिनमें मंदिरों और पुजारियों की खिल्ली उड़ाई जाती है, दिखाया जाता है कि बड़े-बड़े संस्थानों के शिक्षकों को पढ़ाना नहीं आता, शिक्षकों को मूर्ख, राजनेताओं को दुष्ट, पुलिस को निर्दयी, अफसरों को संकीर्ण सोचवाला, जजों को अन्यायी, और हिंदी भाषा बोलनेवालों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि बॉलीवुड के फिल्मी गाने और डायलॉग उर्दू में ही क्यों लिखे जाते हैं जबकि बहुत कम ही लोग उर्दू को समझ पाते हैं? क्या आपको इस पर भी आश्चर्य नहीं होता कि हाल की बॉलीवुड की फिल्मों का हीरो कभी मंदिर क्यों नहीं जाता? आखिर क्यों बॉलीवुड की अधिकांश फिल्मों के हीरो अगर हिंदू हैं तो आम तौर पर धर्म का पालन नहीं करते जबकि सारे मुसलमानों को धर्मनिष्ठ दिखाया जाता है? आखिर क्यों कोर्ट-रूम वाली फिल्मों में भी अब भगवद्गीता पर हाथ रख कर किसी व्यक्ति के द्वारा कसम खाने वाले सीन गायब हो गए हैं? क्यों बॉलीवुड की फिल्मों की पृष्ठभूमि में भारतीय ध्वज भी नहीं दिखता? ये महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनकी तह तक जाने की आवश्यकता है। इस पुस्तक का प्रयास है कि इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए जाएँ। समाज की सोच बनाने में फिल्मों की एक बड़ी भूमिका होती है और इस कारण परदे पर जो कुछ भी दिखाया जाता है, उसे लेकर बॉलीवुड को कहीं-न-कहीं अपनी जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है।
1857 : Bihar Jharkhand Main Mahayuddh
- Author Name:
Prasanna Kumar Choudhari
- Book Type:

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Description:
सन् 1857 के विद्रोह का क्षेत्र विशाल और विविध था। आज़ादी की इस लड़ाई में विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदाय के लोगों ने जितने बड़े पैमाने पर अपनी आहुति दी, उसकी मिसाल तो विश्व इतिहास में भी कम ही मिलेगी। इस महाविद्रोह को विश्व के समक्ष, उसके सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का महत् कार्य कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स कर रहे थे। ‘1857 : बिहार-झारखंड में महायुद्ध’ पुस्तक बिहार और झारखंड क्षेत्र में इस महायुद्ध का दस्तावेज़ी अंकन करती है।
1857 की सौवीं वर्षगाँठ पर, 1957 में बिहार के कतिपय इतिहासकारों-काली किंकर दत्त, क़यामुद्दीन अहमद और जगदीश नारायण सरकार ने बिहार-झारखंड में चले आज़ादी के इस महासंग्राम की गाथा प्रस्तुत करने का कार्य किया था। लेकिन तब इनके अध्ययनों में कई महत्त्वपूर्ण प्रसंग छूट गए थे। कुछ आधे-अधूरे रह गए थे। वरिष्ठ और चर्चित लेखक-पत्रकारों प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत के श्रम-साध्य अध्ययन-लेखन के ज़रिए इस पुस्तक में पहले की सारी कमियों को दूर करने का सुफल प्रयास किया गया है। बिहार और झारखंड के कई अंचलों में इस संघर्ष ने व्यापक जन-विद्रोह का रूप ले लिया था। बाग़ी सिपाहियों और जागीरदारों के एक हिस्से के साथ-साथ ग़रीब, उत्पीड़ित दलित और जनजातीय समुदायों ने इस महायुद्ध में अपनी जुझारू भागीदारी से नया इतिहास रचा था। यह पुस्तक मूलतः प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है। बिहार-झारखंड में सन् सत्तावन से जुड़े तथ्यों और दस्तावेज़ों का महत्त्वपूर्ण संकलन है। आम पाठकों के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी पुस्तक।
Aadi Turk Kaleen Bharat (1206-1290)
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

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Description:
आदि तुर्क वंश के इस इतिहास में 1206 ई. से 1290 ई. तक समस्त प्रमुख फ़ारसी तथा अरबी इतिहास ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद है। इसमें मिनहाज सिराज की ‘तबक़ाते नासिरी’ तथा ज़ियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख़े फ़ीरोज़शाही’ को मुख्य आधार माना गया है।
दूसरे भाग में समकालीन इतिहासकारों की कृतियों का अनुवाद है। इनमें फ़ख़रे मुदब्बिर की ‘तारीख़े फ़ख़रुद्दीन मुबारकशाह’, ‘आदाबुल हर्ब वश्शुजाअत’, सद्रे निजशमी की ‘ताजशुल मआसिर’, अमीर ख़ुसरो के ‘दीवाने वस्तुल हयात’ एवं क़ेरानुस्सादैन के संक्षिप्त तथा परमावश्यक अंशों का अनुवाद भी सम्मिलित है। बाद के भी दो प्रमुख इतिहासकारों की रचनाओं के अनुवाद किए गए हैं—एसामी की ‘फ़ुतूहुस्सलातीन’ का और अरबी में लिखी हुई इब्ने बतूता की यात्रा के वर्णन का।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास पर प्रामाणिक रोशनी डालनेवाले इन ग्रन्थों का अनुवाद कुछ विद्वानों ने अंग्रेज़ी में भी किया था, लेकिन उनमें पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेज़ी अनुवादों में दोष रह गए हैं। इस कारण अनेक भ्रम-पूर्ण रूढ़ियों को आश्रय मिल गया है। इस प्रकार की त्रुटियों से बचने के उद्देश्य से प्रस्तुत ग्रन्थ में पारिभाषिक और मध्यकालीन वातावरण के परिचायक शब्दों को मूल रूप में ही ग्रहण किया गया है और उन शब्दों की व्याख्या पाद-टिप्पणियों में कर दी गई है।
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