Appa Deepo Bhava
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अप्पो दीपो भव' पुस्तक शिक्षा की भारतीय संस्कृति के केंद्र में समसामयिक संदर्भो से जुड़ी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें राजस्थान के राज्यपाल और विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति, संविधान और संस्कृति-मर्मज्ञ श्री कलराज मिश्र के समय- समय पर दिए गए चिंतनपरक भाषण संकलित हैं। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति से जुड़ी हमारी संस्कृति के आलोक में यह पुस्तक शिक्षा में सीखे गए और शिक्षण संस्थाओं में प्राप्त किए गए ज्ञान से समाज को आलोकित करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण विचार-सामग्री लिये हुए है। पुस्तक की बड़ी विशेषता यह भी है कि इसमें प्रवाहपूर्ण भाषा में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ शिक्षा से जुड़े हमारे प्राचीन चिंतन और शोध की संस्कृति पर महत्त्वपूर्ण विचार हैं। नई शिक्षा नीति और उससे जुड़े विभिन्न सरोकारों के साथ ही इसमें आत्मनिर्भर भारत की सोच के अंतर्गत विश्वविद्यालयों में रोजगारोन्मुखी शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से जुड़े अध्ययन-अध्यापन के भी बहुत से आयामों, सुझावों के साथ मौलिक स्थापनाएँ हैं । पुस्तक में शिक्षा को ज्ञान-हस्तांतरण की सर्वोत्कृष्ट प्रक्रिया बताते हुए लेखक ने भारतीय संविधान में समाहित उदात्त भारतीय जीवन-मूल्यों, वैश्वीकरण में स्थानीय विकास की चुनौतियों और प्रजातंत्र में मतदान के जरिए व्यवहार में जनभागीदारी, सर्वश्रेष्ठ के लिए संकल्पबद्ध होकर युवाओं को कार्य करने, युवाओं में उद्यमिता विकास आदि विषयों पर मौलिक चिंतन है।
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अप्पो दीपो भव' पुस्तक शिक्षा की भारतीय संस्कृति के केंद्र में समसामयिक संदर्भो से जुड़ी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें राजस्थान के राज्यपाल और विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति, संविधान और संस्कृति-मर्मज्ञ श्री कलराज मिश्र के समय- समय पर दिए गए चिंतनपरक भाषण संकलित हैं। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति से जुड़ी हमारी संस्कृति के आलोक में यह पुस्तक शिक्षा में सीखे गए और शिक्षण संस्थाओं में प्राप्त किए गए ज्ञान से समाज को आलोकित करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण विचार-सामग्री लिये हुए है।
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Book Details
-
ISBN9789355211453
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बीते कुछ दशकों के दौरान, भारत की छवि को बिगाड़ने में कुछ हद तक बॉलीवुड की फिल्मों का हाथ है जिनमें मंदिरों और पुजारियों की खिल्ली उड़ाई जाती है, दिखाया जाता है कि बड़े-बड़े संस्थानों के शिक्षकों को पढ़ाना नहीं आता, शिक्षकों को मूर्ख, राजनेताओं को दुष्ट, पुलिस को निर्दयी, अफसरों को संकीर्ण सोचवाला, जजों को अन्यायी, और हिंदी भाषा बोलनेवालों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि बॉलीवुड के फिल्मी गाने और डायलॉग उर्दू में ही क्यों लिखे जाते हैं जबकि बहुत कम ही लोग उर्दू को समझ पाते हैं? क्या आपको इस पर भी आश्चर्य नहीं होता कि हाल की बॉलीवुड की फिल्मों का हीरो कभी मंदिर क्यों नहीं जाता? आखिर क्यों बॉलीवुड की अधिकांश फिल्मों के हीरो अगर हिंदू हैं तो आम तौर पर धर्म का पालन नहीं करते जबकि सारे मुसलमानों को धर्मनिष्ठ दिखाया जाता है? आखिर क्यों कोर्ट-रूम वाली फिल्मों में भी अब भगवद्गीता पर हाथ रख कर किसी व्यक्ति के द्वारा कसम खाने वाले सीन गायब हो गए हैं? क्यों बॉलीवुड की फिल्मों की पृष्ठभूमि में भारतीय ध्वज भी नहीं दिखता? ये महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनकी तह तक जाने की आवश्यकता है। इस पुस्तक का प्रयास है कि इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए जाएँ। समाज की सोच बनाने में फिल्मों की एक बड़ी भूमिका होती है और इस कारण परदे पर जो कुछ भी दिखाया जाता है, उसे लेकर बॉलीवुड को कहीं-न-कहीं अपनी जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है।
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