Jalianwala Bagh Ki Karahein : Pratibandhit Hindi Sahitya
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Author:
Rajwanti MannPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Historical-fiction₹
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ग़ुलामी के दौरान पंजाब पर अकल्पनीय अत्याचार के प्रतिवाद में रचित तथा ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबन्धित और ज़ब्त रचनाएँ ‘जलियाँवाला बाग़ की कराहें’ पुस्तक जलियाँवाला बाग़ के नरसंहार की अतिशय वेदना और अंग्रेज़ी जुल्मों की व्यथा-कथा है जिसे हिन्दुस्तानियों ने अपनी आत्मा पर झेला, अपनी आँखों से देखा और साहित्यकारों ने अपनी क़लम से उकेरा। यह जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए लिखा गया साहित्य है जो एक सदी तक अन्वेषकों की नज़रों से लगभग छिपा रहा। इन रचनाकारों ने अंग्रेज़ी राज की प्रताड़नाएँ सहते हुए औपनिवेशिक काल की त्रासद स्थितियों को कलमबद्ध किया। रचनाएँ मौखिक यात्रा करती हुईं जन-चेतना के उद्देश्य तक पहुँचती रहीं। पुस्तक में कुल नौ अध्याय हैं जिनमें जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बाद रचित वे नाटक, कविताएँ, दोहे, ठुमरी, लावणी, क़व्वाली, ग़ज़ल आदि सम्मिलित हैं जो अलग-अलग पुस्तिकाओं में प्रकाशित हुईं। लगभग सभी विधाओं में रचित यह साहित्य जलियाँवाला बाग़ की पृष्ठभूमि से लेकर हर छोटी-बड़ी घटना, अंग्रेज़ों की क्रूरता, जुल्म और यातनाओं, लोगों की बेबसी, लाचारी, सामाजिक दशा-दुर्दशा का निर्भीक और वास्तविक विवरण प्रस्तुत करता है तो दूसरी तरफ़ साहस से उठ खड़े होने का आह्वान भी करता है। इनमें नृशंस हत्याओं के साथ-साथ हरे-भरे पेड़-पौधों की उखड़ी-जली छालों, घास चरती हुईं गाय-भैंसों का चरते-चरते मारे जाना, तोते, कोयल और मैना आदि पक्षियों तक का भी गोलियों से डरकर मरने का मार्मिक चित्रण है। इन रचनाओं की सत्यता पर कोई सन्देह इसलिए नहीं किया जा सकता कि आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में भी किसी न किसी रूप में इनका ज़िक्र है और इतिहास की पुस्तकों में भी इन्हें प्राय: उसी रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
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ग़ुलामी के दौरान पंजाब पर अकल्पनीय अत्याचार के प्रतिवाद में रचित तथा ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबन्धित और ज़ब्त रचनाएँ
‘जलियाँवाला बाग़ की कराहें’ पुस्तक जलियाँवाला बाग़ के नरसंहार की अतिशय वेदना और अंग्रेज़ी जुल्मों की व्यथा-कथा है जिसे हिन्दुस्तानियों ने अपनी आत्मा पर झेला, अपनी आँखों से देखा और साहित्यकारों ने अपनी क़लम से उकेरा। यह जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए लिखा गया साहित्य है जो एक सदी तक अन्वेषकों की नज़रों से लगभग छिपा रहा। इन रचनाकारों ने अंग्रेज़ी राज की प्रताड़नाएँ सहते हुए औपनिवेशिक काल की त्रासद स्थितियों को कलमबद्ध किया। रचनाएँ मौखिक यात्रा करती हुईं जन-चेतना के उद्देश्य तक पहुँचती रहीं।
पुस्तक में कुल नौ अध्याय हैं जिनमें जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बाद रचित वे नाटक, कविताएँ, दोहे, ठुमरी, लावणी, क़व्वाली, ग़ज़ल आदि सम्मिलित हैं जो अलग-अलग पुस्तिकाओं में प्रकाशित हुईं। लगभग सभी विधाओं में रचित यह साहित्य जलियाँवाला बाग़ की पृष्ठभूमि से लेकर हर छोटी-बड़ी घटना, अंग्रेज़ों की क्रूरता, जुल्म और यातनाओं, लोगों की बेबसी, लाचारी, सामाजिक दशा-दुर्दशा का निर्भीक और वास्तविक विवरण प्रस्तुत करता है तो दूसरी तरफ़ साहस से उठ खड़े होने का आह्वान भी करता है। इनमें नृशंस हत्याओं के साथ-साथ हरे-भरे पेड़-पौधों की उखड़ी-जली छालों, घास चरती हुईं गाय-भैंसों का चरते-चरते मारे जाना, तोते, कोयल और मैना आदि पक्षियों तक का भी गोलियों से डरकर मरने का मार्मिक चित्रण है।
इन रचनाओं की सत्यता पर कोई सन्देह इसलिए नहीं किया जा सकता कि आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में भी किसी न किसी रूप में इनका ज़िक्र है और इतिहास की पुस्तकों में भी इन्हें प्राय: उसी रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
Book Details
-
ISBN9789360869120
-
Pages320
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ब्रिटिश उपनिवेश द्वारा भारत से बाहर ले जाए गए मज़दूरों को तत्कालीन कम्पनियाँ और उनके एजेंट दो नामों से पुकारते थे। दक्षिण भारत, बिहार और प. उत्तर प्रदेश के ग़ैर-आदिवासी मज़दूरों को 'कुली' और झारखंड के सदान और आदिवासियों को 'हिल कुली', 'धांगर' और 'कोल' कहा जाता था। ये और कोई नहीं ग्रेटर झारखंड की उरांव, मुंडा, संताल, खड़िया और सदान जातियाँ थीं। ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश उपनिवेशों में मौजूद दस्तावेज़ों में झारखंड के आदिवासियों के आप्रवासन के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं। कालान्तर में मॉरीशस, गयाना, फ़िजी, सूरीनाम, टुबैगो सहित अन्य कैरीबियन तथा लैटिन अमेरिकी और अफ़्रीकी देशों में लगभग डेढ़ सदी पहले ले जाए गए ग़ैर-आदिवासी गिरमिटिया मज़दूरों ने बेशक लम्बे संघर्ष के बाद इन देशों को भोजपुरी बना दिया है और वहाँ के नीति-नियन्ताओं में शामिल हो गए हैं। लेकिन सवाल है कि वे हज़ारों झारखंडी जो सबसे पहले वहाँ पहुँचे थे, कहाँ चले गए? कैसे और कब वे गिरमिटिया कुलियों की नवनिर्मित भोजपुरी दुनिया से ग़ायब हो गए? ऐसा क्यों हुआ कि गिरमिटिया कुली ख़ुद तो आज़ादी पा गए लेकिन उनकी आज़ादी हिल कुलियों को चुपचाप गड़प कर गई। एक कुली की आज़ादी कैसे दूसरे कुली के ख़ात्मे का सबब बनी? क्या थोड़े आर्थिक संसाधन जुटते ही उनमें बहुसंख्यक धार्मिक और नस्ली वर्चस्व का विषधर दोबारा जाग गया और वहाँ उस अनजान धरती पर फिर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार और वैश्य पैदा हो गए? सो भी इतनी समझदारी के साथ कि 'शूद्र' को नई सामाजिक संरचना में जन्मने ही नहीं दिया? इस उपन्यास का मूल प्रश्न यही है। कोन्ता और कुन्ती की इस कहानी को कहने के पीछे लेखक का उद्देश्य पूरब और पश्चिम दोनों के ग़ैर-आदिवासी समाजों में मौजूद नस्ली और ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर करना है जिसे विकसित सभ्यताओं की बौद्धिक दार्शनिकता के ज़रिए अनदेखा किया जाता रहा है।
Khanzada
- Author Name:
Bhagwandas Morwal
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‘काला पहाड़’ और ‘रेत’ जैसे उपन्यासों द्वारा भगवानदास मोरवाल ने हिंदी में एक ऐसे लेखक की छवि बनाई है जो अपनी कथा-वीथियाँ समाज, देश और संस्कृति के तथ्यात्मक भूगोल के बीच से निकालता है। आम तौर पर वे ऐसे विषयों को चुनते हैं जिन्हें सिर्फ कल्पना के सहारे कहानी नहीं बनाया जा सकता, उनका गारा-माटी श्रमसाध्य शोध और खोजबीन से तैयार होता है। मेवात उनके लेखकीय और नागरिक सरोकारों का केंद्र रहा है. अपनी इस मिट्टी की संस्कृति, इतिहास और उसके समाजार्थिक पक्षों पर उन्होंने बार-बार निगाह डाली है। ‘खानजादा’ उपन्यास इसकी अगली कड़ी है। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि यह उन अदृश्य तथ्यों की निर्ममता से पड़ताल करता है जो हमारी आज की राष्ट्रीय चिंताओं से सीधे जुड़े हुए हैं। भारत में तुगलक, सादात, लोदी और मुगलों द्वारा चौदहवीं सदी के मध्य से मेवातियों पर किए गए अत्याचारों और देहली के निकट मेवात में मची तबाही की दस्तावेजी प्रस्तुति करते हुए यह उपन्यास मेवातियों की उन शौर्य-गाथाओं को भी सामने लाता है जिनका इतिहास में बहुत उल्लेख नहीं हुआ है। प्रसंगवश इसमें हमें कुछ ऐसे उद्घाटनकारी सूत्र भी मिलते हैं जो इतिहास की तोड़-मरोड़ से त्रस्त हमारे वर्तमान को भी कुछ राहत दे सकते हैं। मसलन बाबर और उसका भारत आना। हिन्दू अस्मिता का उस वक्त के मुस्लिम आक्रान्ताओं से क्या रिश्ता बनता था, धर्म-परिवर्तन की प्रकृति और उद्देश्य क्या थे और इस प्रक्रिया से वह भारत कैसे बना जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कहा गया, इसके भी कुछ संकेत इस उपन्यास में मिलते हैं।
Uttarkatha : Vol. 1-2
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
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कालजयी उपन्यास यह ‘पथ बन्धु था’ के बाद भारतीय जीवन का सर्वांगीण परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास ‘उत्तरकथा’ आधुनिक कथा-साहित्य की न केवल निष्णात ही, बल्कि सम्पूर्ण सांस्कृतिक औपन्यासिक कृति है। स्वरूप का नहीं, प्रयोजन का नाम है महाकाव्य। आज उपन्यास ही महाकाव्य है, एतदर्थ ‘उत्तरकथा' महाकाव्य भी है। देश और काल के विशाल फलक पर चलते साधारण मनुष्य की बड़ी-छोटी परछाइयाँ ही यह संसार है। जब इसी मानवीय संसार की यथार्थता को प्रयोजन-दृष्टि प्राप्त हो जाती है तब मनुष्य सृष्टि मात्र, प्राणि मात्र का प्रतिनिधित्व करनेवाला 'पुरुष' हो जाता है। बड़ी रचनात्मकता कभी भी केवल यथार्थ को ही अन्तिम नहीं मान सकती, क्योंकि मनुष्य की रचना उदात्तता के लिए ही हुई है। इस प्रथम खंड के सारे साधारण एवं अनाम पात्र कोई बड़ा कार्य नहीं करते परन्तु रोज का तपता हुआ जीवन जीते हैं। यह साधारण उदात्तता प्रकारान्तर से हमें भी पूर्ण बनाती है। दूसरे खंड में जब परिवेश का दबाव और अधिक गहराएगा तब मानवीय विवशता तथा व्यवहार के जल का परिवृत्त और भी सुदूर के तटों तक लहराएगा। यह शती मनुष्य की परीक्षा की शती रही है जिसमें अनाम लोगों की साधारणता, विश्वास खंडित एवं क्षत-विक्षत हुए हैं। इस मानवीय जय-पराजय की गाथा से बड़ी कौन-सी भागवत है?
Pratyancha
- Author Name:
Sanjeev
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‘प्रत्यंचा’ एक युगप्रवर्तक राजा की जीवनगाथा है जिन्हें कोई लोकराजा कहता, कोई राजर्षि तो कोई सनकी। प्रारम्भ में उन्हें भी गुमान रहा कि वे छत्रपति हैं, क्षत्रिय कुलावतंस... लेकिन जिस दिन उन्हीं के अधीनस्थ एक पुरोहित ने उनका गर्व खर्व कर दिया कि तुम शूद्र हो, सिर्फ शूद्र, वे आसमान से सीधे जमीन पर आ गए। तुर्रा यह कि अधिसंख्य विप्र वर्ग भी उसी पतित पुरोहित के पक्ष में खड़ा था। फिर तो राजा ने उठा लिया अपना अमोघ अस्त्र! यह लड़ाई दूसरी लड़ाइयों से ज्यादा विकट और उलझी हुई थी। प्रकट युद्ध में शत्रु सामने होता है, लेकिन यहाँ वह घर-परिवार और सदियों-सहस्राब्दियों से व्यक्ति—व्यक्ति के मन-मस्तिष्क तक में समाया हुआ था। जब एक राजा के साथ वे ऐसा कर सकते हैं तो सामान्य जन की क्या बिसात! शाहूजी का जीवन खुद को और समाज को वर्गविहीन और जातिविहीन करने तथा सबको सामाजिक न्याय दिलाने के सतत संघर्ष का साक्ष्य है। उन्होंने अपनी त्रासदी को एक मुहूर्त और व्यक्तिमात्र में न देखकर पूरी शास्त्रीय और सांस्कृतिक परम्परा में देखा और इस सामूहिक त्रासदी की मर्मान्तक घुटन और पीड़ा को सामूहिक मुक्ति में बदलने की जिद के तहत उलटे नियमों को उलटकर जाति-उच्छेद और सामाजिक परिवर्तन का बीड़ा उठाया। प्रत्यंचा अर्थात दोतरफा तनावों के बीच लक्ष्य का सन्धान! प्रत्यंचा अर्थात पराक्रम और प्रहार की प्रदीप्त दास्तान! प्रत्यंचा अर्थात दुर्दम्य प्रत्याख्यान का अभिनव आख्यान!
Ramayan Mahan Bhartiya Sangharsh Gatha
- Author Name:
Hemant Dwivedi
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‘रामायण : महान भारतीय संघर्षगाथा’ राम के दण्डकवन भ्रमण की कहानी है। विश्व की सबसे सरल एवं सबसे विख्यात कहानी। यह अयोध्या के युवराज राम द्वारा महामानव राम के शोध का परावर्तन है। दलितों, वंचितों, वनवासियों के सुख-दुःख, राग-विराग, घृणा-प्रेम, दीनता, संकल्प के अनुसन्धान का प्रतिफल है जिसकी धड़कन में राम लगातार धड़कते हैं। तभी तो राम-जानकी सम्पूर्ण भारत के नर-नारियों, बूढ़े-बच्चों के हृदय में रहने लगे। राम का जन्म तो कहीं भी हो सकता है। लेकिन राम तब निखरता है जब लाखों वंचितों के हित में दण्डक के दुर्गम पठारों को अपनी युवावस्था समर्पित कर दे। तब चलती है भूर्जपत्र पर आदिकवि की लेखनी।
Charitani Rajgondanaam
- Author Name:
Shivkumar Tiwari
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इस पुस्तक में गोंड राजाओं के प्रेरणादायी जीवन-प्रसंगों को रेखांकित किया गया है जिन्होंने अपने समय की तमाम धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं को आत्मसात् करके, इतिहास के हाशिए से उठकर अपना एक अनूठा साम्राज्य क़ायम किया। यह पुस्तक हमें राजगोंडों की अद्वितीय जिजीविषा के बारे में विस्तार से बताती है। एक तरफ़ यहाँ अगर गढ़ा-कटंगा के राजा संग्रामशाह की दूरदृष्टि व कूटनीतिज्ञता की झलक मिलती है तो दूसरी तरफ़ शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य से लोहा लेनेवाली रानी दुर्गावती की धर्मपरायणता व साहसिकता भी हमें प्रेरित करती है। राजगोंड राजाओं के जीवट से देदीप्यमान कहानियों के साथ-साथ यह पुस्तक हमें उनकी मानवीय संवेदना, ज्ञानपिपासा, चारित्रिक दृढ़ता, धर्मनिरपेक्षता, विश्वास, रूढ़ियों और रुचियों के बारे में भी क्रमबद्ध ढंग से बताती है, कुछ इस तरह कि पाँच शताब्दी पूर्व के गोंडों का इतिहास हमारे सामने साकार हो उठता है। रोचक उतार-चढ़ावों से लबालब और सरल भाषा में सँजोयी गई यह पुस्तक ज्ञानपिपासुओं और इतिहास के गर्त में कुछ ढूँढ़ने का प्रयत्न करनेवाले शोधकर्ताओं के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
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