Stree : Deh Ki Rajniti Se Desh Ki Rajniti Tak
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Author:
Mrinal PandePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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हमारे उपनिषदों–पुराणों के समय से स्त्रियों को लेकर जिन नियमों और मर्यादाओं की रचना हुई, उनकी स्वाधीनता और आत्म–निर्भरता के ख़िलाफ़ निहित स्वार्थों द्वारा जो महीन क़िस्म का सांस्कृतिक षड्यंत्र रचा गया और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक जीवन में स्त्रियों को जिन जटिल अन्तर्विरोधों से जूझना पड़ रहा है—पुस्तक में प्रस्तुत लेखों में एक स्त्री के नज़रिए से इस सबकी समसामयिक सन्दर्भों में पड़ताल की गई है। एक नागरिक और एक कामगार के रूप में स्त्रियाँ पाती हैं—कि स्त्रियों को कमज़ोर और पराधीन बनाने की कोशिशें पहले उनके ही घर–आँगनों से शुरू होती हैं। और दहलीज़ लाँघने के बाद कार्यक्षेत्र में वही कोशिशें उनके आगे ताक़तवर और सामूहिक पुरुष–एकाधिकार की शक्ल धारण करती चली जाती हैं। विडम्बना यह कि एक ओर तो स्त्री में ‘पराधीन’ और ‘सहनशील’ बनने की महत्ता का बीज बचपन से रोपा जाता है और दूसरी ओर उसकी पराधीनता और सहनशीलता की मार्फ़त उसकी शक्ति का पूरा दोहन और नियोजन ख़ुद उसी के और स्त्री–जाति के विरोध में किया जाता है। नतीजतन एक स्त्री हर क्षेत्र में दोयम दर्जे में बैठने को बाध्य की जाती है कि तुम्हारी नियति यही है।...यह भेदभाव सिर्फ़ निम्नवर्गीय स्त्रियों के साथ ही नहीं बरता जाता, इसकी चपेट में वे स्त्रियाँ भी हैं जो सरकारी–ग़ैर–सरकारी विभागों में ऊँचे–ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं।...दिहाड़ी पर काम करनेवाली तमाम कामगार स्त्रियों को आज भी पुरुषों के मुक़ाबले कम मज़दूरी मिलती है जबकि कार्य के समय व स्वभाव में कोई फ़र्क़ नहीं होता। जैविक, सांस्कृतिक और आर्थिक सन्दर्भों में स्त्री की शक्ति और शक्तिहीनता का विवेचन करनेवाली यह पुस्तक स्त्री–शोषण की करुण कथा नहीं, बल्कि उसके कारणों की जड़ में जाकर किया गया भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का ऐसा सटीक विश्लेषण है जो पाठकों को स्त्री के साथ–साथ हरिजनों, भूमिहीनों, दलितों जैसे समाज के हर क्षेत्र में छाए शक्ति–असन्तुलनों के शिकार वर्गों को समझने की नई दृष्टि देगा।
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हमारे उपनिषदों–पुराणों के समय से स्त्रियों को लेकर जिन नियमों और मर्यादाओं की रचना हुई, उनकी स्वाधीनता और आत्म–निर्भरता के ख़िलाफ़ निहित स्वार्थों द्वारा जो महीन क़िस्म का सांस्कृतिक षड्यंत्र रचा गया और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक जीवन में स्त्रियों को जिन जटिल अन्तर्विरोधों से जूझना पड़ रहा है—पुस्तक में प्रस्तुत लेखों में एक स्त्री के नज़रिए से इस सबकी समसामयिक सन्दर्भों में पड़ताल की गई है।
एक नागरिक और एक कामगार के रूप में स्त्रियाँ पाती हैं—कि स्त्रियों को कमज़ोर और पराधीन बनाने की कोशिशें पहले उनके ही घर–आँगनों से शुरू होती हैं। और दहलीज़ लाँघने के बाद कार्यक्षेत्र में वही कोशिशें उनके आगे ताक़तवर और सामूहिक पुरुष–एकाधिकार की शक्ल धारण करती चली जाती हैं। विडम्बना यह कि एक ओर तो स्त्री में ‘पराधीन’ और ‘सहनशील’ बनने की महत्ता का बीज बचपन से रोपा जाता है और दूसरी ओर उसकी पराधीनता और सहनशीलता की मार्फ़त उसकी शक्ति का पूरा दोहन और नियोजन ख़ुद उसी के और स्त्री–जाति के विरोध में किया जाता है। नतीजतन एक स्त्री हर क्षेत्र में दोयम दर्जे में बैठने को बाध्य की जाती है कि तुम्हारी नियति यही है।...यह भेदभाव सिर्फ़ निम्नवर्गीय स्त्रियों के साथ ही नहीं बरता जाता, इसकी चपेट में वे स्त्रियाँ भी हैं जो सरकारी–ग़ैर–सरकारी विभागों में ऊँचे–ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं।...दिहाड़ी पर काम करनेवाली तमाम कामगार स्त्रियों को आज भी पुरुषों के मुक़ाबले कम मज़दूरी मिलती है जबकि कार्य के समय व स्वभाव में कोई फ़र्क़ नहीं होता।
जैविक, सांस्कृतिक और आर्थिक सन्दर्भों में स्त्री की शक्ति और शक्तिहीनता का विवेचन करनेवाली यह पुस्तक स्त्री–शोषण की करुण कथा नहीं, बल्कि उसके कारणों की जड़ में जाकर किया गया भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का ऐसा सटीक विश्लेषण है जो पाठकों को स्त्री के साथ–साथ हरिजनों, भूमिहीनों, दलितों जैसे समाज के हर क्षेत्र में छाए शक्ति–असन्तुलनों के शिकार वर्गों को समझने की नई दृष्टि देगा।
Book Details
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ISBN9788171798063
-
Pages143
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Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
यह पुस्तक भारतीय राजनीति और समाज को पिछले दो दशकों से मथनेवाली साम्प्रदायिकता की परिघटना को समझने और उसके मुक़ाबले की प्रेरणा और सम्यक् समझ विकसित करने के उद्देश्य से लिखी गई है। चार खंडों—वाजपेयी (अटल बिहारी), संघ सम्प्रदाय, जॉर्ज फर्नांडीज, गुराज—में विभक्त इस पुस्तक में साम्प्रदायिकता के चलते पैदा होनेवाली कट्टरता, संकीर्णता और फासीवादी प्रवृत्तियों और उन्हें अंजाम देने में भूमिका निभानेवाले नेताओं, संगठनों, शक्तियों आदि का घटनात्मक ब्यौरों सहित विवेचन किया गया है। इसमें मुख्यतः साम्प्रदायिकता के राष्ट्रीय जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक-अकादमिक आयामों पर पड़नेवाले दुष्प्रभावों/दुष्परिणामों की भी शिनाख़्त और आकलन किया गया है। साम्प्रदायिकता की विचारधारा भूमंडलीकरण की विचारधारा के साथ मिलकर देश की आर्थिक और राजनैतिक सम्प्रभुता पर गहरी चोट कर रही है। पुस्तक में दोनों के गठजोड़ का उद्घाटन करते हुए, उसके चलते दरपेश नवसाम्राज्यवादी ख़तरे के प्रति आगाह किया गया है।
पुस्तक की विषयवस्तु साम्प्रदायिकता और उससे होनेवाले बिगाड़ को चिन्हित करने तक सीमित नहीं है। इसमें धर्मनिरपेक्षता, उदारता, लोकतंत्र और समाजवाद की विचारधारा के पक्ष में लगातार जिरह की गई है। इस रूप में यह सरोकारधर्मी और हस्तक्षेपकारी लेखन का सशक्त उदाहरण है।
भाषा की स्पष्टता और शैली की रोचकता पुस्तक को सामान्य पाठकों के लिए पठनीय बनाती है।
Hindu Paramparaon Ka Rashtriyakaran
- Author Name:
Vasudha Dalmiya
- Book Type:

- Description: अंग्रेज़ी में आज से उन्नीस साल पहले प्रकाशित यह पुस्तक एक ऐसे ढाँचे की प्रस्तावना करती है जो भारतेन्दु के पारम्परिक और परिवर्तनोन्मुख पहलुओं की एक साथ सुसंगत रूप में व्याख्या कर सके। इस ढाँचे में भारतेन्दु हिन्दुस्तान के उस उदीयमान मध्यवर्ग के नेतृत्वकारी प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं जो पहले से मौजूद दो मुहावरों के साथ अन्तरक्रिया करते हुए एक तीसरे आधुनिकतावादी मुहावरे को गढ़ रहा था। ये तीन मुहावरे क्या थे, इनकी अन्तरक्रियाओं की क्या पेचीदगियाँ थीं, साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद के सहविकास में आरम्भिक साम्प्रदायिकता और आरम्भिक राष्ट्रवाद को चिह्नित करनेवाला यह तीसरा मुहावरा किस तरह समावेशन-अपवर्जन की दोहरी प्रक्रिया के बीच हिन्दी भाषा और साहित्य को हिन्दुओं की भाषा और साहित्य के रूप में रच रहा था और इस तरह समेकित रूप से राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा धर्म की गढ़ंत का ऐतिहासिक किरदार निभा रहा था, किस तरह नई हिन्दू संस्कृति के निर्माण में एक-दूसरे के साथ जुड़ती-भिड़ती तमाम शक्तियों के आपसी सम्बन्धों को भारतेन्दु के विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व में सबसे मुखर अभिव्यक्ति मिल रही थी—यह किताब इन अन्तस्सम्बन्धित पहलुओं का एक समग्र आकलन है। यहाँ बल एकतरफ़ा फ़ैसले सुनाने के बजाय चीज़ों के ऐतिहासिक प्रकार्य और गतिशास्त्र को समझने पर है। ध्वस्त करने या महिमामंडित करने की जल्दबाज़ी वसुधा डालमिया के लेखन का स्वभाव नहीं है, मामला भारतेन्दु का हो या भारतेन्दु पर विचार करनेवाले विद्वानों का। हिन्दी में इस किताब का आना एकाधिक कारणों से ज़रूरी था। नई सूचनाओं और स्थापनाओं के लिए तो इसे पढ़ा ही जाना चाहिए, साथ ही हर तथ्य को साक्ष्य से पुष्ट करनेवाली शोध-प्रविधि, हर कोण से सवाल उठानेवाली विश्लेषण-विधि और खंडन-मंडन के जेहादी जोश से रहित निर्णय-पद्धति के नमूने के रूप में भी यह पठनीय है।
Jambudweepe Bharatkhande
- Author Name:
Dr. Mayank Murari
- Book Type:

- Description: भारतीय चिंतन में कल्प की अवधारणा का समय के साथ-साथ व्योम, यानी देश के हिसाब से भी विचार किया गया है। पृथ्वी के द्वारा सूर्य का परिभ्रमण करने से संवत्सर काल बनता है। इसी प्रकार जब सूर्य अपनी आकाशगंगा का चक्कर लगाता है तो उसका एक चक्र पूरा होने के समयखंड को मन्वंतर कहा जाता है। इस प्रकार आकाशगंगा भी इस ब्रह्मांड में किसी ध्रुवतारे या सप्तर्षि या अन्य तारे का चक्कर लगाती है, उसके एक चक्कर की गणना को ही कल्प कहा गया। हमारा सौरमंडल आकाशगंगा के बाहरी इलाके में स्थित है और उसके केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। —इसी पुस्तक से भारतीय जीवन में देश और काल है। काल के साथ गति है और गति के संग जीवनदर्शन जुड़ा है। यह बात ही भारत को विशिष्ट बनाती है। कालचक्र, युगचक्र, ऋतुचक्र, धर्मचक्र, भाग्यचक्र और कर्मचक्र के विधान भारतीय सांस्कृतिक चेतना में समाए हुए हैं। सनातन के माहात्म्य, भारतीय चिंतन की वैज्ञानिकता और भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना करती विचारोत्तेजक पठनीय कृति।
Miracles in Medicine
- Author Name:
Roopa Pai
- Rating:
- Book Type:

- Description: Can you imagine a world where surgeries and amputations were conducted without anaesthesia? OUCH! Or one in which disease was believed to be caused by 'stinky air'? WEIRD! Or a world where treating madness involved drilling a hole through the skull to release the supposed 'demons' inside your head? SAY WHAAAAA...?! Guess what? That was our world, just about 250 years ago! All of this began to change in the eighteenth century with the coming of modern medicine. This brave new science, full of brilliant breakthroughs, was built on the hard work, dedication and persistence of thousands of curious minds across the ages, from Arabia to China and India to Europe. Packed with fascinating stories, insights and illustrations, this book is a celebration of 2,500 years of human endeavour and innovation in the medical sciences. Read it, and raise a rousing cheer to the amazing people who gave their all to unravel the secrets of the natural world and the human body, so that we could live longer, healthier and happier lives.
Anubhootiyon Ka Ghanatva
- Author Name:
Yogendra Mohan
- Book Type:

- Description: जंगल-जंगल ढूँढ़ रहा है मृग अपनी कस्तूरी कितना मुश्किल है तय करना खुद से खुद की दूरी। भीतर शून्य बाहर शून्य शून्य चारों ओर है मैं नहीं हूँ मुझमें फिर भी मैं-मैं का शोर है। मौत का बेरहम इतिहास बदल सकते हो पाप का पुण्य में विश्वास बदल सकते हो अपनी बाँहों पे भरोसा अगर हो जाए तो धरा तो धरा है, आकाश बदल सकते हो। अब डूबने का भी क्या डर प्रभु! जब नाव भी तेरी नदी भी तेरी लहरें भी तेरी और मैं भी तेरा। समय को शान पर चढ़ बुद्धि कुंदन की भाँति चमक उठती है विवेक जाग्रतू होने लगता है विवेक-बुद्धि का संयोग और प्रयोग ही सफल जीवन का रहस्य है। सब भूल सहज भाव अपनाएँ साक्षी भाव में खो जाएँ प्रतिज्ञा करना छोड़ें आडंबरों से ऊपर उठ मन को कर्म से जोड़ें। जीवन स्वयं उत्सव बन जाएगा स्वर्ग बन जाएगा। --इसी संग्रह से
Tarkshastra
- Author Name:
Neelima Mishra
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Bharat Mein Bandhua Mazdoor
- Author Name:
Mahashweta Devi
- Book Type:

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देश की जिन गम्भीर समस्याओं पर मुख्यधारा का मीडिया ख़ामोश रहता है और सरकार उदासीन, उनमें बँधुआ मज़दूरों की समस्या भी एक है। सरकारी घोषणाओं में यह समस्या ख़त्म हो चुकी है और मीडिया के लिए इसमें सनसनी नहीं रही। लेकिन समस्या अभी जहाँ की तहाँ है। 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के ज़रिए औपचारिक तौर पर बँधुआ मज़दूरी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी यह प्रथा बिना किसी रोक-टोक के जारी है। बीच-बीच में सरकारें बँधुआ तौर पर काम कर रहे मज़दूरों की मुक्ति और पुनर्वास का स्वाँग भी रचती हैं, लेकिन मुक्त कराए गए मज़दूरों को पुन: एक नई तरह की बँधुआ मज़दूरी का शिकार होना पड़ा है। न तो उनकी जीविका के लिए पर्याप्त साधन मुहैया कराए गए और न ही शक्तिशाली भूमिपतियों से उनकी हिफ़ाज़त का कोई विश्वसनीय इन्तज़ाम हो पाया।
‘भारत में बँधुआ मज़दूर’ इस समस्या का सर्वांग अध्ययन प्रस्तुत करती है। प्रख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी यहाँ पूर्णतया एक शोधकर्मी के तौर पर प्रकट हुई हैं, ज़ाहिर है, उत्पीड़ितों-उपेक्षितों के लिए अपनी सर्वज्ञात संवेदना के साथ। शोधकर्म की निर्मम असंलग्नता से बचते हुए, विषय के साथ नितान्त मानवीय लगाव के साथ यह शोध किया गया है।
Vishwa Patal Par Hindi
- Author Name:
Dr. Surya Prasad Dixit
- Book Type:

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हिन्दी भारत की एक राष्ट्रीय भाषा है, संघ की राजभाषा है और एक विश्वभाषा भी है। समस्त संसार में वह आज करोड़ों लोगों द्वारा समझी जाती है। उसकी व्याप्ति लगभग डेढ़ सौ देशों में है। वह लगभग एक दर्जन देशों में जनभाषा के रूप में प्रचलित है। इन देशों को तीन कोटियों में विभाजित करना तर्कसंगत होगा—(1) भारत के पड़ोसी राष्ट्र, (2) भारतवंशी राष्ट्र, (3) आप्रवासी-बहुल राष्ट्र।
‘विश्व पटल पर हिन्दी’ का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है, विश्वबोध। हिन्दी का सम्बन्ध संस्कृत, पालि और भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अरबी, फ़ारसी, पस्तो, तुर्की, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, स्पेनिश, डच, पुर्तगाली, इटैलिक आदि कई भाषाओं से है। इस भाषा ने हज़ारों शब्दों का आदान-प्रदान किया है। हिन्दी-सेवियों ने सैकड़ों विश्वविख्यात ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं। दर्जनों विश्व विभूतियों पर ग्रन्थ लिखे हैं। कई यात्रा-संस्मरण लिखे हैं तथा विश्व की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। हिन्दी ने अनेक विश्वस्तरीय विचारधाराओं को आत्मसात् किया है तथा देश-देशान्तर तक अपनी ‘भारत विद्या’ का निर्यात भी किया है। हिन्दी की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण, शब्दकोश, पाठ्यक्रम, शोध, समीक्षा एवं सर्जनात्मक लेखन में सैकड़ों विदेशी विद्वानों की सहभागिता रही है।
इधर हिन्दी फ़िल्मों, धारावाहिकों, पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया कार्यक्रमों ने उसे विश्व के कोने-कोने में पहुँचाया है। कम्प्यूटर, इंटरनेट से उसका काफ़ी परिविस्तार हुआ है। लेखक ने दो दशक पूर्व इस ‘विश्व पटल पर हिन्दी’ की दिशा में पहल की थी। इसे अभी और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। इस प्रयोजन पूर्ति में इस पुस्तक की अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है।
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