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Author:
Nandkishore NavalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
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तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
Book Details
-
ISBN9788126723959
-
Pages103
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Naya Sahitya, Nai Sambhavanayein
- Author Name:
Radhavallabh Tripathi
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‘अज्ञेय अपनी विलक्षण मेधा के साथ पारम्परिक प्रज्ञा से संवाद और विसंवाद दोनों का सिलसिला रचते हैं। इसके द्वारा पुरानी अवधारणाएँ पुनरीक्षित और पुनःपरिभाषित भी हो जाती हैं।’ और, ‘शमशेर अमूर्त उपमा के जितने प्रकार अपनी कविता में रचते हैं, उतने अन्यत्र कम मिलते हैं। वे अमूर्त से मूर्त को उपमित करते हैं, मूर्त से अमूर्त को उपमित करते हैं, तो अमूर्त से अमूर्त को भी उपमित करते हैं।’ हिन्दी के दो विशिष्ट कवियों के विषय में ये टिप्पणियाँ हैं वरिष्ठ साहित्य-चिन्तक एवं संस्कृति-चेता राधावल्लभ त्रिपाठी की, जो ‘नया साहित्य, नई सम्भावनाएँ’ पुस्तक में संकलित आलेखों का हिस्सा हैं। इनके अलावा इस पुस्तक में धर्मवीर भारती, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह, अष्टभुजा शुक्ल, अनामिका और गगन गिल की पुस्तकों और उनके रचनात्मक आयामों पर विवेचनात्मक आलेख भी शामिल हैं। कुछ वे निबन्ध भी इस पुस्तक में संकलित हैं जिनमें वे विमर्श के ऐसे सैद्धान्तिक आधारों की तलाश करते हैं जो समकालीन रचनात्मकता के अनुशीलन के लिए आलोचना की भूमि बन सकें। राधावल्लभ त्रिपाठी हिन्दी के वर्तमान परिदृश्य में उपस्थित ऐसे कुछ आलोचक-चिन्तकों में से एक हैं जिनकी विवेचना हमें सोचने और बरतने के लिए एक समृद्ध भाषा देती है और भारतीय चिन्तन के लम्बे इतिहास में गढ़े गए सैद्धान्तिक उपकरणों से परिचित कराती है। उनके इधर के चिन्तन से उपजे इन निबन्धों से साहित्य के अध्येता और सर्जक, दोनों ही निस्सन्देह लाभान्वित होंगे।
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
- Author Name:
Garima Shrivastava
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Literary Criticism on Feminism ‘चुप्पियाँ और दरारें’ भारत की अनेक भाषाओं में लिखी गई स्त्री आत्मकथाओं की न सिर्फ शिनाख्त करती है बल्कि इन आत्मकथाओं में विन्यस्त वैचारिकी का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि किसी भी भारतीय भाषा में अभूतपूर्व कही जाएगी। एक सर्वथा अनूठी पुस्तक। - अशोक वाजपेयी ध्वनि प्रदूषण पर तो आज बहुत चर्चा होती है, लेकिन चुप्पी के प्रदूषण पर नहीं। सच यह है कि जाति, लिंग और धर्म की बंदिशों से घिरे अवर्ण समाज और स्त्रियों की आत्माभिव्यक्ति बहुत कम सामने आती है। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में गरिमा श्रीवास्तव ने यह तथ्य पहचाना है और चुप्पी की कारा तोड़ते हुए लिखी गई विभिन्न वर्गों और जातियों से निकली औरतों की आपबीती के मर्म को एक गम्भीर अन्तर्दृष्टि से परखा है। पठनीय और सरस। —मृणाल पांडेय गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब ‘चुप्पियाँ और दरारें’ हमारा ध्यान स्त्री आत्मकथाओं की ओर ले जाती है, जहाँ मनुष्य जाति के स्त्री पक्ष के तनिक भिन्न अनुभव से हमारा साक्षात्कार होता है। यह स्त्रियों की अपनी अनुभूति है, उनकी अपनी आत्मस्वीकृतियाँ, पीड़ा और उल्लास है। कभी सिमोन द बोउआर ने ‘द सेकंड सेक्स’ के माध्यम से जेंडर का हाल सुनाया था, कुछ उसी अन्दाज में गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब हमें भारतीय स्त्रियों की अनसुनी कहानी बताती है। निःसंदेह पठनीय और संग्रहणीय। —प्रेमकुमार मणि >गरिमा श्रीवास्तव की निगाह हिन्दी पर तो है ही, वे इस बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसामुदायिक महादेश में हिन्दू, मुसलमान, दलित, सवर्ण, बांग्ला, मलयालम और कन्नड़ दायरों में स्त्री आत्मकथाओं के एक ऐसे बहुलतावादी संसार में प्रवेश करती हैं जिसका संधान अभी तक एक साथ एक जगह नहीं किया गया है। अश्वेत स्त्री-आत्मकथाओं पर उनका काम इस बृहद कृति में पाठकों को बोनस की तरह उपलब्ध है। —अभय कुमार दुबे
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
Garima Shrivastava
20% off₹ 599
₹ 479.2
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Aurat Ki Duniya
- Author Name:
Nasera Sharma
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औरतों, अल्पसंख्यकों और देश-दुनिया के दमित-उत्पीड़ितों के पक्ष में हमेशा अपनी आवाज़ बुलन्द रखनेवाली कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने सरोकारों और चिन्ताओं को अपनी कहानियों, उपन्यासों, निबन्धों और साक्षात्कारों में लगातार स्वर दिया है। यह उनके स्तम्भों का संकलन है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर लिखे। स्त्री और उसकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति तो उनके चिन्तन में प्राथमिक रही ही है, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सौहार्द, नए पुरुष और स्त्री के आपसी सम्बन्ध, पारिवारिक रिश्ते और हमारे आसपास का तेज़ी से बदलता हुआ परिवेश भी उनकी संवेदना के दायरे में रहा है। इस पुस्तक में संकलित स्तम्भ-लेखन में उन्होंने सम-सामयिक घटनाओं के हवाले से अनेक उन समस्याओं पर अपनी क़लम चलाई है जो समाज और इनसान के वर्तमान और भविष्य से, उसकी नियति से गहरे जुड़े हैं। उल्लेखनीय यह कि वे जो देखती हैं, जो लिखती हैं, उसमें अपनी स्त्री-दृष्टि को पहले रखती हैं। स्त्री, जिसका न सिर्फ़ दुनिया को देखने का तरीक़ा अलग है, बल्कि उसे बरतने और समझने का सलीका भी पुरुष के मुक़ाबले ज़्यादा मानवीय और करुणार्द्र है। इन आलेखों में उनकी यह विस्तृत और संवेदनशील दृष्टि साफ़ दिखाई देती है।
Kavita Mein Jantantra
- Author Name:
Apoorvanand
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कविता स्वभावतः ही लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार होती है, वह उनकी तरफ़ हमारा ध्यान भी खींचती है, उनकी कमी को रेखांकित भी करती है, और कई बार नए मूल्यों, नई समझदारी, एक ज़्यादा महीन संवेदना की ओर भी लेकर जाती है। कविता उन परिस्थितियों की गहरी आलोचना भी करती है, जो व्यक्ति की, मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं, और इस तरह लोकतंत्र के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा करती है। ‘कविता में जनतंत्र’ पुस्तक में कुछ कविताओं के पाठ के साथ भारतीय जनतंत्र की वर्तमान दशा और दिशा पर चिन्तन किया गया है, यह समझने की कोशिश की गई है कि एक देश और एक समाज के रूप में बहैसियत एक जनतंत्र हमने क्या खोया और क्या पाया है, और इस समय हम कहाँ हैं? ग़ौरतलब है कि इन टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में 2024 का लोकसभा चुनाव है, यह वह समय था जब हम जनतंत्र और बहुमत को आमने-सामने खड़ा पा रहे थे; स्वतंत्रता और सर्वसमावेशी उदारता के पक्षधर आशंकित थे, और अल्पसंख्यक भयभीत। जिन कविताओं के बहाने यह गहन जनतंत्र-चर्चा संभव हुई है उनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, जैसे वरिष्ठों से लेकर अनुज लुगुन, अदनान कफ़ील दरवेश और जसिंता केरकेट्टा तक कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। अत्यन्त समीचीन यह पुस्तक कविता को पढ़ने की एक नई पद्धति तो हमें देती ही है, एक विचार, एक शासन-पद्धति और एक सम्भावना के रूप में जनतंत्र की परिभाषा, उसकी आधारभूत शर्तों, चुनौतियों और प्रतिबद्धताओं पर सोचना भी सिखाती है।
Baton Mein Beete Din
- Author Name:
Namvar Singh
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‘बातों में बीते दिन’ पुस्तक नामवर सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। इस किताब में शामिल साक्षात्कारों का विषय क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। पेरेस्त्रोइका-ग्लासनोस्त और आधुनिकतावाद से लेकर कविता, कहानी, उपन्यास और निजी जीवन तक। साहित्य और देश-दुनिया की नामवर जी की समझ का एक स्पष्ट प्रतिबिम्ब यहाँ मिलता है। उनकी विश्व-दृष्टि का रूपायन इन साक्षात्कारों में हुआ है। पुस्तक तीन खंडों में बँटी हुई है। मध्यम आकार के और विषय केन्द्रित साक्षात्कार पहले खंड में हैं। दूसरे खंड में रचनाकारों और रचनाओं पर केन्द्रित बातचीत है। प्रेमचन्द, सुमित्रानन्दन पंत, त्रिलोचन और अमृतराय तथा सुमित्रानन्दन पंत की कृति ‘गुंजन’ और कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’—इन साक्षात्कारों के केन्द्र में है। तीसरे खंड में महावीर अग्रवाल द्वारा लिये गए नौ साक्षात्कार हैं जो उनके निजी जीवन से लेकर आलोचना और विविध विषयों से सम्बन्धित हैं। आलोचना लिखित हो या वाचिक—उसके पीछे बुनियादी प्रक्रिया है—पढ़ना, विवेचना, विचारना। तर्क और संवाद। नामवर जी के इन साक्षात्कारों में इसका व्यापक समावेश है। इनसे गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि वह किसी रचना को हमेशा नई और अपनी तरह से पढ़ने की कोशिश करते हैं और इस तरह ‘पढ़ते’ हुए वे लगातार नई तरह से ‘सोचते’ और ‘विचारते’ हुए सामने आते हैं। उनकी वाचिक आलोचना मूल्यांकन की ऊपरी सीढ़ी तक पहुँचती है। निकष बनाती है। प्रतिमानों पर बहस करती है। उसमें ‘लिखित’ की तरह की ‘कौंध’ मौजूद होती है। नहीं होता तो बस पूरापन।
Aatmkatha Ke Elake Mein
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Bharat Singh +1
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बनारसीदास जैन ने 'अर्धकथा' (1641) में लिखा कि 'गर्भित कथा कहाँ हिय खोल।' छिपाए जानेवाले या कहें कि गोपन प्रसंगों को भी दिल खोलकर अथवा खुलकर बताना आत्मकथा को प्रसिद्धि दिलाता है, निवैयक्तिक बनाता है। आत्मकथा चर्चित विधा है और आत्मकथा- लेखन की एक समृद्ध परम्परा है, लेकिन यह आलोचना से परे विधा हो, ऐसा भी नहीं है। बाबू बनारसीदास चतुर्वेदी ने आत्मकथा लेखक की पात्रता का सवाल उठाया था। चतुर्वेदी जी ने 'जागरण' में यह सवाल उठाया था कि आत्मकथा किसे लिखनी चाहिए। भाव यह था कि आत्मकथा किसे नहीं लिखनी चाहिए। हालाँकि उनके द्वारा तय की गई शर्तों पर आगे लोगों ने आत्मकथा लिखी, ऐसा भी नहीं है। जब प्रेमचन्द ने 'हंस' का आत्मकथांक (1932) निकाला तो नन्ददुलारे वाजपेयी ने यह कहकर विरोध किया था कि इससे आत्म-विज्ञापन का भाव बढ़ेगा जो कि हिन्दी के हित में नहीं होगा।
लेखिकाओं की आत्मकथा में स्त्री-वेदना के विविध स्वर सुनाई पड़ते हैं। इनकी वेदना समस्त स्त्रियों को शोषण के खिलाफ विरोध की ताकत देती है। इन्होंने अपने आत्मकथा-साहित्य के द्वारा जहाँ स्त्री करुणा, शोक, वेदना, विवशता को व्यक्त किया वहीं उसे हिंसा, शोषण, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की शक्ति भी प्रदान की। इन्होंने स्त्री स्वतन्त्रता, समानता, सम्मान, सहभागिता इत्यादि जैसे प्रश्नों पर विचार करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्था से स्त्री-मुक्ति की भी वकालत की।
आत्मकथाओं में अपने भीतर की यात्रा के जरिये बाहर का जो सफ़र तय होता है उसमें केवल अपनी दुनिया की ही बात नहीं होती है पूरा सामयिक सन्दर्भ आ जाना स्वाभाविक है। दलित आत्मकथाओं को आत्मकथात्मक उपन्यास यूँ ही नहीं कहा जाता है। जीवन का पूरा विस्तार है यथार्थ को देखने की एक नई दृष्टि के साथ ये आत्मकथाएँ हिन्दी साहित्य के मुख्य धारा के साहित्य की चेतना को झकझोरती हैं और उसकी चली आ रही परम्परा में एक तरह की वैचारिक हलचल पैदा करती हैं, दलित आत्मकथाएँ, साहित्य की दुनिया में निर्मित 'औदात्य' की धारणा को बदलकर रख देती हैं और जीवन के नए-नए मुहावरों के बीच अपने पाठकों को ले जाकर खड़ा करती हैं।
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