Moortein : Mati Aur Sone Ki
(0)
Author:
Nandkishore NavalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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नवल जी कहते रहे हैं कि संस्मरण एक थकी हुई विधा है, यद्यपि वे युवा-काल में भी स्फुट संस्मरण लिखते रहे हैं। उदाहरण के लिए नागार्जुन पर लिखे गए उनके संस्मरण ‘लौट आ ओ फूल की पंखड़ी’ को देखा जा सकता है। अब जाकर उन्होंने उसका उत्तरार्ध इस पुस्तक में लिखा है।</p> <p>इस पुस्तक की भूमिका में उन्होंने संस्मरण लिखने की कठिनाइयों की ओर संकेत भी किया है। यह वस्तुतः साहित्य की सबसे नाजुक विधा है, जिसकी रचना में यह ख़तरा बराबर बना रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि ‘लिखत सुधाकर गा लिखि राहू’। संस्मरण के चरित्रों की स्मृतियाँ भले क्रमबद्ध रूप में सामने न आएँ, पर उनमें संजीदगी के साथ एक खुलापन तो होना ही चाहिए। दूसरे, कमल पूर्णतः प्रस्फुटित हो, पर उसकी पंखुरियों पर जल का दाग न लगे। वस्तुतः संस्मरण लिखना ‘तलवार की धार पर धावनो है’। पाठक देखेंगे कि नवल जी सत्य का अलाप न करते हुए भी इसमें सफल हुए हैं।</p> <p>संस्मरणों की इस पुस्तक के दो खंड हैं। पहले खंड में घर और गाँव के पाँच चरित्र हैं। ये सारे चरित्र अपने वैशिष्ट्य से युक्त हैं, जिन्हें लेखक ने विलक्षण कुशलता से चित्रित किया है। उनके चित्रण में यथास्थान बज्जिका के शब्दों के प्रयोग से माटी की ख़ुशबू उठती है और चतुर्दिक् फैल जाती है। दूसरे खंड में हिन्दी के पाँच महत्त्वपूर्ण लेखकों को विषय बनाया गया है। कितना अन्तर है इन दोनों प्रकार के संस्मरणों में! जैसे धरती के ऊपर आकाश का नक्षत्रों से जड़ित नीला तनोवा तना हो। इस पुस्तक की एक अतिरिक्त ख़ूबी यह है कि इससे आप जितना लेखक के विषय में जानेंगे, उतना ही विषय को भी, पर बिना किसी आत्मप्रक्षेपण के। अब आप पुस्तक को उठाएँ और उसकी माटी और सोने की धूलों से स्नात हो जाएँ।
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नवल जी कहते रहे हैं कि संस्मरण एक थकी हुई विधा है, यद्यपि वे युवा-काल में भी स्फुट संस्मरण लिखते रहे हैं। उदाहरण के लिए नागार्जुन पर लिखे गए उनके संस्मरण ‘लौट आ ओ फूल की पंखड़ी’ को देखा जा सकता है। अब जाकर उन्होंने उसका उत्तरार्ध इस पुस्तक में लिखा है।</p>
<p>इस पुस्तक की भूमिका में उन्होंने संस्मरण लिखने की कठिनाइयों की ओर संकेत भी किया है। यह वस्तुतः साहित्य की सबसे नाजुक विधा है, जिसकी रचना में यह ख़तरा बराबर बना रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि ‘लिखत सुधाकर गा लिखि राहू’। संस्मरण के चरित्रों की स्मृतियाँ भले क्रमबद्ध रूप में सामने न आएँ, पर उनमें संजीदगी के साथ एक खुलापन तो होना ही चाहिए। दूसरे, कमल पूर्णतः प्रस्फुटित हो, पर उसकी पंखुरियों पर जल का दाग न लगे। वस्तुतः संस्मरण लिखना ‘तलवार की धार पर धावनो है’। पाठक देखेंगे कि नवल जी सत्य का अलाप न करते हुए भी इसमें सफल हुए हैं।</p>
<p>संस्मरणों की इस पुस्तक के दो खंड हैं। पहले खंड में घर और गाँव के पाँच चरित्र हैं। ये सारे चरित्र अपने वैशिष्ट्य से युक्त हैं, जिन्हें लेखक ने विलक्षण कुशलता से चित्रित किया है। उनके चित्रण में यथास्थान बज्जिका के शब्दों के प्रयोग से माटी की ख़ुशबू उठती है और चतुर्दिक् फैल जाती है। दूसरे खंड में हिन्दी के पाँच महत्त्वपूर्ण लेखकों को विषय बनाया गया है। कितना अन्तर है इन दोनों प्रकार के संस्मरणों में! जैसे धरती के ऊपर आकाश का नक्षत्रों से जड़ित नीला तनोवा तना हो। इस पुस्तक की एक अतिरिक्त ख़ूबी यह है कि इससे आप जितना लेखक के विषय में जानेंगे, उतना ही विषय को भी, पर बिना किसी आत्मप्रक्षेपण के। अब आप पुस्तक को उठाएँ और उसकी माटी और सोने की धूलों से स्नात हो जाएँ।
Book Details
-
ISBN9788126730711
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नंगातलाई का गाँव’—इस ‘स्मृति-आख्यान’ में डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी अपने दो लेखकीय रूपों में उपस्थित हैं। पहला—अपनी जीवनी के क़िस्सागो अर्थात् नंगातलाई और दूसरा—इस आख्यान के सजग लेखक यानी बिसनाथ। इस विलक्षण जुगलबन्दी के कारनामे में ‘आत्म’ लेखक का है और ‘कथा’ बिस्कोहर के बहाने भारतीय ग्रामीण जीवन सभ्यता की। ‘आत्म-व्यंग्य’ के कठिन शिल्प में दु:ख को मज़े लेकर कहने का करिश्मा जिस निरायास ढंग से सम्भव हुआ है उससे निराला, परसाई और नागार्जुन का स्मरण हो आता है।
दस अध्यायों में बमुश्किल समाहित बिस्कोहर कथा में लेखक ने पं. जगदम्बा पांडे जगेश, लक्खाबुआ, बल्दी बनिया, जनक दुलारी, सुग्गनजान, नदवी साहब, कृष्ण मोहम्मद, नैपाले, माने, अम्मा-दादा से लेकर अनेक अविस्मरणीय पात्रों का जो यथार्थ पुनर्सृजन किया है और उसमें उपस्थित-जागृत आम कुँजड़ा, बेड़नी, बनिया, मौलवी, भंगी, ठाकुर, ब्राह्मण आदि वर्ग के जय-पराजय, दु:ख-सुख, हास-परिहास, प्रेम-घृणा, मान-अभिमान, क्रोध-प्रसन्नता, विनम्रता-अहंकार आदि का सजीव उद्घाटन जिस निर्वैयक्तिता में किया है, वह आत्मकथा के आभिजात्य से मुक्ति का ऐसा बिन्दु है जिसमें नंगातलाई की यह कथा महाकाव्यात्मक गाथा के क़रीब पहुँच जाती है।
इस कालजयी आख्यान में लोक-सौन्दर्य के स्वाभिमान से पगी ऐसी सजल भाषा है जो शोख़, तीखी, मीठी, चोट खाई, लचीली और विदग्ध है। शब्द यहाँ अनेक अदेखी अनूठी भंगिमाओं में अर्थों का नया संसार रचते हैं। शब्दों की विपन्नता के रुदन के बीच यह किताब एक ऐसे आधार ग्रन्थ की तरह है जिसमें पूरबी अवधी का अजाना समृद्ध भाषा-संसार है।
प्रस्तुत कृति चूँकि लेखक के दो रूपों (जीवनीकार, आत्मकथा-लेखक) से बने प्रयोगधर्मी शिल्प में अपना कथा-विन्यास पाती है, अतः उसमें अतीत से लेकर भूमंडलीकरण तक के प्रभावों का यथार्थ इन्दराज है।
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने स्मृति आख्यान की विधा के गौरव को जिस तरह पुनर्स्थापित किया है, वह हमारे समय की अनूठी और अप्रतिम साहित्यिक उपलब्धि मानी जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।
—लीलाधर मंडलोई
Stephen Hawking
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Mahesh Sharma
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- Description: स्टीफन हॉकिंग—महेश शर्माहॉकिंग का सहायक उनकी व्हीलचेयर धकेलते हुए स्टेज पर लाया। आवाज का सिंथेसाइजर लाउडस्पीकर से जोड़ा गया। व्हीलचेयर के साथ एक प्रकार का कंप्यूटर लगाया गया है। उसके माध्यम से वे स्थिर बैठे हुए व्याख्यान देने लगते हैं। व्याख्यान शुरू होने पर वे अपनी पलकें हिलाते हैं-चेहरे पर मिश्रित हास्य। दो नर्स़ें उनकी देखभाल के लिए हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे वहाँ आकर उनकी सहायता करती हैं। प्रार्थना की जाती है कि व्याख्यान के पश्चात् श्रोतागण प्रश्न एवं जिज्ञासाएँ पूछें। व्याख्यान के दौरान उनकी लार साफ करना, बाल पीछे करना आदि काम सहायक करते रहते हैं।व्याख्यान के दौरान कभी-कभी मजेदार प्रंग पैदा होते रहते हैं। एक बार फर्मोलैब में उनका व्याख्यान था। आमंत्रितों में एडवर्ड कोलबा नामक एक भीमकाय मजबूत आदमी भी था। हॉकिंग का व्याख्यान निचले तल के हॉल में था। वहाँ जाने के लिए लिफ्ट नहीं थी और न ही रैंप था। उसने आगे बढ़कर झट से हॉकिंग को सहज रूप से अपने दोनों हाथों पर उठाया और बिना किसी की परवाह किए उस हलके व्यक्ति को लेकर जल्दी-जल्दी चलने लगा।एक बार व्याख्यान के लिए वे देर से पहुँचे, क्योंकि निकट के हॉल में पॉप संगीत की महफिल जम रही थी और उसमें सम्मिलित होने का मोह वे रोक न सके।
Apna Najari Me
- Author Name:
Ed. Kedar Kanan
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- Description: Collection of Maithili Autobiographies
Shudrak
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Bhagwatilal Rajpurohit
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शूद्रक एक सफल और लोकप्रिय साहित्यकार तथा नाटककार थे। उनकी आम जनता की अभिरुचि और पहचान की पकड़ मज़बूत थी। इसीलिए वे संस्कृत हो या प्राकृत—उनकी लोकसमझ की आवश्यकता पर विशेष बल देते दिखते हैं।
शूद्रक के नाटकों में समाज को हू-ब-हू प्रस्तुत करने का सफल प्रयास है। उसके गुण-दोषों को उजागर किया गया है। चोर, जुआरी तथा निम्न वर्ग के लोग बुरे ही नहीं होते, उनमें अच्छाइयाँ भी होती हैं और अच्छा बनने की उनमें भी लालसा होती है। वे सब संगठित होकर सत्तापरिवर्तन तक कर सकते हैं, यदि उन्हें अच्छा मार्गदर्शन मिले तो अच्छाई का साथ देने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं।
शूद्रक के ‘मृच्छकटिक’ और ‘पद्मप्राभृतक’ दोनों नाटकों में विट है। विट गणिका-प्रिय और धूर्त होता है। ‘पद्मप्राभृतक’ में विट नायक ही है। परन्तु ‘मृच्छकटिक’ का विट शकार का पिछलग्गू है। वहाँ शकार की धूर्तता और चालबाजी के सामने विट काफी सीधा और फीका है। ‘पद्मप्राभृतक’ में विट समाज के हर वर्ग को आड़े हाथों लेता चलता है। परन्तु यहाँ भी उससे बढ़कर धूर्ताचार्य बताया गया है मूलदेव को, जिसका वह सहयोगी है। स्पष्ट ही शूद्रक के अनुसार विट धूर्त होने पर भी किसी बड़े धूर्ताचार्य का सहयोगी ही होता है। ये दोनों नाटक गणिका सम्बन्धी होने पर भी व्यापक सामाजिक सरोकार से परिपूर्ण हैं।
इस पुस्तक में ‘पद्मप्राभृतक’ का कुछ अंश, ‘मृच्छकटिक’ के दो अंक और ‘वीणावासदत्ता’ का एक अंक प्रस्तुत किया गया है।
Zamane Mein Hum
- Author Name:
Nirmala Jain
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- Description: सुपरिचित आलोचक निर्मला जैन ने दिल्ली : शहर-दर-शहर जैसे सुपठ संस्मरणात्मक कृति से यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि न तो उनका जीवन एकरेखीय है, न उनकी भाषा और रचनात्मकता का मिज़ाज केवल आलोचनात्मक है। ‘ज़माने में हम’ नामक उनकी यह आत्मकथात्मक कृति उन संकेतों को सच साबित करती है। ‘ज़माने में हम’ को निर्मला जी ने आत्मवृत्त कहा है। उन्होंने आठ दशक पीछे छूट गई ज़िन्दगी को पलटकर यों देखा है कि निजी यादें न केवल उनके रचनात्मक जीवन के इतिहास की निर्मिति का तत्त्व बन गई हैं, बल्कि हिन्दी के लोकवृत्त के निर्माण में भी सहायक साबित होनेवाली हैं। हालाँकि यह उनके लिए जोखिम-भरा कार्य ही रहा होगा। क्योंकि उनके जीवन में अनेक रेखाएँ एक-दूसरे के समानान्तर—परस्पर टकराती, एक-दूसरे को काटती, उलझती-सुलझती हुई हैं। उनकी संश्लिष्ट बुनावट को तरतीबवार दर्ज करना निःसन्देह दुरूह रहा होगा। शायद इसीलिए वे अपनी आत्मकथा को ‘आधे-अधूरे सत्य से ज़्यादा कुछ’ होने का दावा नहीं करतीं। उनके मुताबिक यह स्थितियों और घटनाओं के पारावार का उनका अपना पाठ है। वे खुले मन से मानती हैं कि “...जो व्यक्ति उनमें साझीदार रहे हैं, जिन्होंने बराबर से मित्र या शत्रु या तटस्थ भाव से उनमें साझीदारी की है, सत्य का दूसरा सिरा तो उनके हाथ में है।” और यह इस आत्मकथा की बहुत बड़ी विशेषता है कि इसमें लेखिका स्वयं को बिलकुल निष्कवच भाव से प्रस्तुत करती हैं। स्तब्धकारी साफ़गोई से लबरेज़ इस कृति में ऐसी लोकतांत्रिकता इस बात का सुबूत है कि इसमें जीवन-सत्य का उद्घाटन ही मूल उद्देश्य है। दरअसल जीवट और उम्मीद के अन्तर्गुम्फित सत्य से संचालित जीवन की यह अविस्मरणीय कथा जीवन की रणनीति का पाठ भी है। मनुष्य की अपराजेयता में विश्वास जगानेवाली एक प्रेरक कृति है ‘ज़माने में हम’।
Maran Sagar Pare
- Author Name:
Shivani
- Book Type:

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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।
कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।
इस पुस्तक में ‘वंकिम तोमार नाम’, ‘एक श्रद्धांजलि’, ‘केशव कहि न जाय’, ‘पेयेछी छूटी’, ‘दिशा प्रवर्त्तक’, ‘यात्री आमी ओरे’, ‘एक टी शिशिर बिन्दु!’, ‘लोक्खी टी’, ‘अब न आँखि तर’, ‘कहाँ गईलै हो…’, ‘मरण सागर पारे’, ‘डॉक्टर खजानचन्द्र’, ‘गंगा बाबू कौन’, ‘मेरा भाई’, ‘तुभ्यं श्री गुरुवे नम:’ शीर्षक संस्मरण और रेखाचित्रों को संकलित किया गया है। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
Baaten
- Author Name:
Madhu Arora
- Book Type:

- Description: This book has no description
Thaharti Sanson Ke Sirhane Se : Jab Zindagi Mauj Le Rahi Thi
- Author Name:
Ananya Mukherjee
- Book Type:

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अनन्या मुखर्जी के शब्दों में कहें तो ‘जब मुझे पता चला कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर है, मैं विश्वास नहीं कर सकी। इस ख़बर ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। लेकिन जल्द ही मैंने अपने आत्मविश्वास को समेटकर अपने को मज़बूत किया। मैं जानती थी कि सब कुछ ठीक हो जाएगा...!’
लेकिन पहली बार हुआ कि वो भविष्य के अँधेरों से जीत नहीं पाई।
18 नवम्बर, 2018 को अनन्या कैंसर से अपनी लड़ाई हार गईं। लेकिन अनन्या जीवित हैं, दोस्तों-परिवार की उन ख़ूबसूरत यादों में जिन्हें वे उनके लिए छोड़ गई हैं। साथ ही, डायरी के उन पन्नों में जो कैंसर की लड़ाई में उनके साथी रहे।
यह किताब कैंसर की अँधेरी लड़ाई में एक रोशनी की तरह है (कमरे की खिड़की पर बैठे गंदे कौवे की तुलना अपने एकदम साफ़, बिना बालों के सर से करना), एक कैंसर के मरीज़ के लिए कौन सा गिफ़्ट उपयोगी है ऐसी सलाह देना (जैसे रसदार मछली भात के साथ कुछ उतनी ही स्वादिष्ट कहानियाँ एक अच्छा उपहार हो सकती हैं), साथ ही एक कैंसर मरीज़ का मन कितनी दूर तक भटकता है (जैसलमेर रोड ट्रिप और गंडोला–एक तरह के पारम्परिक नाव–में बैठ इटली के ख़ूबसूरत, पानी में तैरते हुए, शहर वेनिस की सैर)।
‘ठहरती साँसों के सिरहाने से’ किताब उम्मीद है, हिम्मत है। यह किताब सुबह की चमकती, गुनगुनाती धूप की तरह ताज़गी से भरी हुई है जो न केवल कैंसर से लड़ते मरीज़ के लिए बल्कि हम सभी के लिए जो अपने-अपने हिस्से की लड़ाई लड़ते आए हैं, कभी न हार माननेवाली उम्मीद की किरण है।
‘शरीर के अन्दर बीमारी से लड़ना किसी अँधेरी गुफ़ा के भीतर घुसते जाना है, इस विश्वास के साथ कि इसका अन्तिम सिरा रौशनी से भरा होगा। काश, मैं अनन्या से मिलकर उन्हें बता सकता कि उन्होंने कितनी ख़ूबसूरती से कैंसर से लड़ाई की कहानी इस किताब में लिखी है ।’
—युवराज सिंह
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