Nari Prasna
(0)
Author:
Sarla MaheshwariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
695
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Available
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नारी प्रश्न के असंख्य आयाम हैं। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जो काल और स्थान की सीमाओं से बँधे हुए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो काल के दीर्घ प्रवाह के बीच से चिरन्तन प्रश्नों के रूप में सामने आए हैं। काल और स्थान-निरपेक्ष ये प्रश्न हर देश के नारी समाज की मानवीय अस्मिता से जुड़े हुए हैं। एक वृहत्तर मानव समाज में ऐसे प्रश्नों की अपनी नारी-पहचान के बावजूद ये प्रश्न किसी संकीर्णता के द्योतक नहीं हैं, बल्कि वास्तविक अर्थों में मानव समाज को ही और अधिक मानवीय बनाने की निरन्तर जारी प्रक्रिया के अंग हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नारीवाद के अन्दर की अनेक परस्पर विरोधी धाराओं के बावजूद, नारी-मुक्ति और उससे जुड़े हुए मानव-मुक्ति के बहुत से महत्त्वपूर्ण प्रश्न इस संघर्ष के बीच से उभरकर सामने आए हैं। भारत का नारी आन्दोलन भी ऐसे तमाम प्रश्नों की अवहेलना नहीं कर सकता। सरला माहेश्वरी की यह पुस्तक हिन्दी में अपने क़िस्म की पहली पुस्तक है, जिसमें बहुत व्यापक और गहन अध्ययन के ज़रिए नारी आन्दोलन की अन्तरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि और उसके आधार पर निर्मित दृष्टि की रोशनी में नारी जीवन से जुड़े कई ज़रूरी सामाजिक प्रश्नों पर गम्भीरता से रोशनी डाली गई है।
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About the Book
नारी प्रश्न के असंख्य आयाम हैं। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जो काल और स्थान की सीमाओं से बँधे हुए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो काल के दीर्घ प्रवाह के बीच से चिरन्तन प्रश्नों के रूप में सामने आए हैं। काल और स्थान-निरपेक्ष ये प्रश्न हर देश के नारी समाज की मानवीय अस्मिता से जुड़े हुए हैं। एक वृहत्तर मानव समाज में ऐसे प्रश्नों की अपनी नारी-पहचान के बावजूद ये प्रश्न किसी संकीर्णता के द्योतक नहीं हैं, बल्कि वास्तविक अर्थों में मानव समाज को ही और अधिक मानवीय बनाने की निरन्तर जारी प्रक्रिया के अंग हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नारीवाद के अन्दर की अनेक परस्पर विरोधी धाराओं के बावजूद, नारी-मुक्ति और उससे जुड़े हुए मानव-मुक्ति के बहुत से महत्त्वपूर्ण प्रश्न इस संघर्ष के बीच से उभरकर सामने आए हैं। भारत का नारी आन्दोलन भी ऐसे तमाम प्रश्नों की अवहेलना नहीं कर सकता।
सरला माहेश्वरी की यह पुस्तक हिन्दी में अपने क़िस्म की पहली पुस्तक है, जिसमें बहुत व्यापक और गहन अध्ययन के ज़रिए नारी आन्दोलन की अन्तरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि और उसके आधार पर निर्मित दृष्टि की रोशनी में नारी जीवन से जुड़े कई ज़रूरी सामाजिक प्रश्नों पर गम्भीरता से रोशनी डाली गई है।
Book Details
-
ISBN9788119989805
-
Pages196
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत में बारह में से ग्यारह गर्भपात ग़ैरक़ानूनी होते हैं, सन् 2001 की जनगणना के अनुसार देश के सबसे शिक्षित और सम्पन्न राज्यों में, प्रति हज़ार पुरुषों के मुक़ाबले स्त्रियों की संख्या में, ख़ासकर 0–5 के आयु वर्ग में, काफ़ी गिरावट आई है; और, भारतीय परम्पराएँ जहाँ प्रजनन और मातृत्व को पवित्र करार देती हैं, वहीं भारत सरकार की नीतियाँ और स्वास्थ्य सेवाओं का ज़ोर प्रजनन को नियंत्रित करने पर है। ये विरोधाभास वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका मृणाल पाण्डे के सामने तब आए जब वे भारतीय स्त्री के स्वास्थ्य के बारे में जानने के लिए अपनी यात्रा पर निकलीं। अपने सफ़र में जल्द ही उन्हें मालूम हो गया कि यह सिर्फ़ भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और प्रजनन स्वास्थ्य के इतिहास का दस्तावेज़ीकरण भर नहीं है, बल्कि एक व्यापक यथार्थ का सामना करना है। स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत करने के लिए आर्इं महिलाओं से उनके अपने जीवन और शरीर के बारे में सुनकर उन्हें कुछ बड़ी वास्तविकताओं का बोध हुआ। नतीजा है स्त्रियों के जीवन के विवरणों से रची हुई यह कृति, जो हमें बताती है कि स्त्रियाँ अपने वातावरण से कैसे प्रभावित होती हैं, औरत और मर्द की सेक्सुअलिटी को लेकर उनकी धारणाएँ क्या हैं; इसके अलावा गर्भधारण के रहस्य, जन्म देने के सुख, बाँझपन के भय, ग़ैरक़ानूनी गर्भपात और किशोरियों की सूनी दुनिया—इन सबके ब्यौरों से यह पुस्तक बुनी गई है। मृणाल पाण्डे ने इस पुस्तक में जनसंख्या नीति और जनकल्याण में राज्य की भूमिका जैसे मुद्दों पर भी विमर्श किया है। और इस सबके बीच वे उन स्वयंसेवी संगठनों में अपना गहन विश्वास भी व्यक्त करती हैं, जिनकी कोशिशों के चलते स्त्रियाँ अपने जीवन की अँधेरी गलियों और ख़ामोशियों से बाहर आ रही हैं।
Mahila Lekhan Ke Sau Varsh
- Author Name:
Mamta Kaliya
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लेखन में बीसवीं सदी से आज तक का समय यदि एक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में लिया जाए तो यह स्पष्ट है कि इन सौ वर्षों में स्त्रियों की लेखनी में सबसे अधिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखी। पुरुष-लेखन में मात्र एक पात्र होने की भूमिका से निकलकर स्त्री-लेखक ने स्वयं अपनी क़लम से अस्तित्व, व्यक्तित्व और विचार को अभिव्यक्ति देना अभीष्ट समझा। प्रस्तुत संकलन में स्त्री-रचनाकारों के कोमल संवेगों के साथ-साथ आत्मसजग सृजन और विकास-प्रक्रिया का परिचय मिलता है। राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) से लेकर अलका सरावगी तक एक लम्बी परम्परा तैयार हुई है जहाँ क़लम की साँकलें कहीं अनायास तो कहीं सायास खुली हैं। हर्ष और गर्व का विषय है कि महिला-लेखन अब हिन्दी साहित्य में एक सशक्त सचेत और संवेदनायुक्त धारा है। आनेवाला समय यह याद रखे कि अपने इर्द-गिर्द खड़े किए समस्त चौखटे और कोष्ठक तोड़कर इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने पूरे तेवर के साथ हर क्षेत्र में उठ खड़ी हुई है। प्रस्तुत संकलन में हमें कहानी और निबन्ध, जीवनी और संस्मरण, आलोचना और विमर्श, गोया हर विधा और विषय पर स्त्री की तेजस्विता का परिचय मिलेगा। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर गीतांजलि श्री, मधु कांकरिया, सारा राय और अलका सरावगी तक अपने पूरे तेवर के साथ यहाँ मौजूद हैं। पृष्ठ सीमा के चलते कई विधाओं का मात्र उल्लेख ही कर पाये हैं। यहीं से अगले खंड की सम्भावना नज़र आती है।
Stri Alakshit
- Author Name:
Shrikant Yadav
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भारतीय समाज में स्त्री-विमर्श किन जटिल रास्तों और मोड़ों से होकर मौजूद मुक़ाम तक पहुँचा है, यह किताब उसकी एक दिलचस्प झलक पेश करती है। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध, जो एक तरफ़ औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए भारतीय समाज की तड़प का साक्षी बना था, वहीं दूसरी तरफ़ वर्णव्यवस्था की बेड़ियों में जकड़े दलितों और पितृसत्ता से आक्रान्त स्त्रियों के बीच जारी मन्थन और उत्पीड़न का भी सहयात्री बना था। इस दौर के अब लगभग भूले-बिसरे दो दर्जन स्त्री विषयक लेखों को संकलित करके युवा लेखक और शोधार्थी श्रीकान्त यादव ने भारतीय इतिहास के उस महत्त्वपूर्ण कालखंड के एक लगभग अदृश्य पक्ष पर रोशनी डाली है। समकालीन समाज में स्त्री-चिन्तन परम्परा और समकालीनता के किन दबावों को आकार दे रहा था, ‘स्त्री अलक्षित’ में संकलित लेखों से गुज़रते हुए उनकी भी शिनाख़्त होती है। विश्वास है कि स्त्री-विमर्श में रुचि रखनेवाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विद्वानों के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय और संग्रहणीय सिद्ध होगी। —कृष्णमोहन
Choori Bazar Mein Ladki
- Author Name:
Krishna Kumar
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यह पुस्तक लड़कियों के मानस पर डाली जानेवाली सामाजिक छाप की जाँच करती है। वैसे तो छोटी लड़की को बच्ची कहने का चलन है, पर उसके दैनंदिन जीवन की छानबीन ही यह बता सकती है कि लड़कियों के सन्दर्भ में 'बचपन' शब्द की व्यंजनाएँ क्या हैं। कृष्ण कुमार ने इन व्यंजनाओं की टोह लेने के लिए दो परिधियाँ चुनी हैं। पहली परिधि है घर के सन्दर्भ में परिवार और बिरादरी द्वारा किए जानेवाले समाजीकरण की। इस परिधि की जाँच संस्कृति के उन कठोर और पैने औज़ारों पर केन्द्रित है जिनके इस्तेमाल से लड़की को समाज द्वारा स्वीकृत औरत के साँचे में ढाला जाता है। दूसरी परिधि है शिक्षा की जहाँ स्कूल और राज्य अपने सीमित दृष्टिकोण और संकोची इरादे के भीतर रहकर लड़की को एक शिक्षित नागरिक बनाते हैं। लड़कियों का संघर्ष इन दो परिधियों के भीतर और इनके बीच बची जगहों पर बचपन भर जारी रहता है। यह पुस्तक इसी संघर्ष की वैचारिक चित्रमाला है।
Striyan : Parde Se Prajatantra Tak
- Author Name:
Dushyant
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समाज और वैचारिक दुनिया में औरत की जगह को लेकर चिन्ता और अध्ययन कोई नया विषय नहीं है। जॉन स्टुअर्ट मिल, मेरी वॉलस्टनक्राफ़्ट से होते हुए सीमोन द बोउवा तक होती हुई यह परम्परा भारत में प्रभा खेतान जैसी चिन्तकों तक आती है। स्त्री-विमर्श विचार के विविध अनुशासनों में अलग-अलग रूप में होता रहा है और हो रहा है, पर अन्तर्धारा एक ही है। यह पुस्तक स्त्री के विरोधाभासी जीवन की सामाजिक समस्याओं का समग्रता से मूल्यांकन करती है, पारम्परिक स्रोतों के साथ-साथ समाचार-पत्रों एवं साहित्य का प्रचुर मात्रा में उपयोग करते हुए इस पुस्तक की अध्ययन-परिधि को राजस्थान के तीन रजवाड़ों—जोधपुर, जैसलमेर एवं बीकानेर के विशेष सन्दर्भ में बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक विस्तार दिया गया है। इस पुस्तक की ख़ासियत यह है कि इसमें सायास रजवाड़ों, ठिकानों से इतर सामान्य महिलाओं की स्थिति पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के साक्षी रचनात्मक साहित्य और समाचार-पत्रों को बड़े पैमाने पर इतिहास-लेखन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जिस भौगोलिक क्षेत्र को यह कृति सम्बोधित है, उसके लिए ऐसी पुस्तक की बेहद ज़रूरत थी जिसे इस पुस्तक ने निस्सन्देह सफलतापूर्वक पूरा किया है। अनेक विधाओं में और विभिन्न माध्यमों के लिए समान अधिकार से लिखनेवाले दुष्यंत की विषयानुरूप सहज, सम्मोहक और प्रांजल भाषा ने इस पुस्तक को बहुत रोचक और पठनीय बना दिया है। रेखांकित किया जाना ज़रूरी है कि ‘स्त्रियाँ : पर्दे से प्रजातंत्र तक’ हिन्दी में मौलिक और रचनात्मक शोध की बानगी भी पेश करती है। विश्वास किया जा सकता है कि संजीदा और सघन वैचारिक बुनियाद पर गहन शोध के आधार पर लिखित इस पुस्तक को भारत में स्त्री इतिहास-लेखन के लिहाज से महत्त्वपूर्ण माना जाएगा।
Mahila Adhikar
- Author Name:
Mamta Mehrotra
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यह समय ‘अस्मिता विमर्श’ का है। विमर्श सचेत करते हैं अधिकारों और दायित्वों के प्रति। विभिन्न स्तरों पर जारी ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्रियों से जुड़े अनेक सवालों को मुखर और प्रखर किया है। स्त्रियाँ स्वतंत्रता, सम्मान, समता और सहभागिता के लिए निरन्तर संघर्ष कर रही हैं। इस सन्दर्भ में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि भारत के संविधान ने महिलाओं को कौन-कौन से अधिकार दिए हैं। 'महिला सशक्तिकरण' को सच करते हुए क़ानून ने महिलाओं को क्या-क्या शक्तियाँ प्रदान की हैं। ज़ाहिर है कि इस लोकतंत्र में महिलाएँ यदि अपने अधिकारों को भली प्रकार जान जाएँ तो उनके 'अस्तित्व' का संघर्ष सरल और सकारात्मक हो जाएगा। ‘महिला अधिकार’ पुस्तक में ममता मेहरोत्रा ने मानवाधिकार को विश्व पटल पर रखकर स्त्री-प्रश्नों का विवेचन किया है। बीजिंग घोषणा-पत्र, वियना सम्मेलन—1993, भारतीय विधि आयोग की इक्कीसवीं रिपोर्ट के ज़रिए महिला अधिकारों के प्रति सामाजिक-वैधानिक सतर्कता का जायजा लिया गया है। सती प्रथा, डायन, विज्ञापन, मातृत्व, द्विविवाह, दहेज आदि पक्षों पर तर्कपूर्ण विचार करते हुए लेखिका ने इनके अनेक पक्षों का वर्णन किया है, विशेषत: क़ानूनी पक्ष का। पुस्तक की भाषा प्रवाहपूर्ण है, इसलिए पठनीयता भरपूर है। सचेत और सशक्त करती एक ज़रूरी किताब।
Mahila Sashaktikaran : Dasha Aur Disha
- Author Name:
Yogendra Sharma
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महिलाओँ की संख्या विश्व की जनसंख्या से लगभग आधी है। उनके उन्नयन के बिना परिवार, समाज व राष्ट्र की प्रगति सम्भव नहीं है। आज वे विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं को उजागर कर रही हैं, जागरूकता एवं आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख हैं। पहले की अपेक्षा उनकी स्थिति में सुधार हुआ है, अधिकारों एवं सुरक्षा में बढ़ोतरी भी हुई है। अब भी वे मंज़िल से दूर हैं, उन्हें यह सब कुछ प्राप्त नहीं हो सका है जो उनका अभीष्ट है। उनके विरुद्ध होनेवाले अपराधों में विगत की तुलना में वृद्धि हुई है। यद्यपि नए और कठोर क़ानून भी बने हैं लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन तथा सामाजिक चेतना के अभाव में सशक्तीकरण कर लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सका है। महिलाओं की उपेक्षा करने की प्रवृत्ति को त्यागकर कुकृत्यों के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी तथा विधिक कार्यवाही के प्रति तत्पर होना होगा। तभी उन्हें प्रताड़ना, अत्याचार एवं शोषण से मुक्ति सम्भव होगी।
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