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Nasera SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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बकौल नासिरा शर्मा ‘बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के बाद एक नया हिन्दुस्तान उभरा है, जिसको अभी ठीक से समझा जाना बाक़ी है। पहले भारत ज़मीन के स्तर पर दो फाँक हुआ था, अब विचार और संवेदना के स्तर पर सियासत ने उसे चार फाँक कर दिया है।’ नासिरा शर्मा न सिर्फ़ भारत बल्कि ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोप की भी सामाजिक-सांस्कृतिक पेचीदगियों की जानकार हैं, और मनुष्यता की स्वाभाविक सकारात्मकता विशेषत: स्त्री सरोकार के प्रति अपनी पक्षधरता के लिए जानी जाती हैं। ‘अपने ख़्वाब की ताबीर चाहती हूँ’ उनके साक्षात्कारों का संकलन है। समकालीन पुरुष पत्रकारों-लेखकों-चिन्तकों, जिनमें देश से बाहर के भी कुछ नाम शामिल हैं, द्वारा लिए गए इन साक्षात्कारों को वे ‘आदम के सवाल हव्वा से’ कहती हैं। इन साक्षात्कारों में हम उनके लेखन से परिचित होते हैं, उनकी स्त्री से भी, और सबसे ज़्यादा उस सजग-चिन्तनशील व्यक्ति से जिसने भौगोलिक और राजनीतिक अर्थों में एक विराट और वैविध्यपूर्ण अनुभव को बहुत नज़दीक से देखा-जिया है। इसीलिए वे जिस विषय पर बात करती हैं, उसमें गहरा आत्मविश्वास और प्रामाणिकता स्पष्ट दिखाई देते हैं। मुस्लिम कठमुल्लावाद और हिन्दू कट्टरता से बराबर लोहा लेती आ रहीं नासिरा जी ने इन वार्ताओं में अनेक ऐसे सवाल उठाए हैं, और अनेक ऐसे सवालों के जवाब भी दिए हैं जिनका गहरा ताल्लुक़ हमारे आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल से भी है। मसलन हिन्दू-मुसलमान के बीच बढ़ाए जा रहे विद्वेष पर वे कहती हैं कि ‘इन सारे जालों को साफ़ करने का काम उतने प्रभावी ढंग से हमारी क़लम नहीं कर पाई जितना राजनेता समाज को काटने और दिलों को बाँटने में कामयाब हुए हैं।’ इस पुस्तक में कुछ सवालों के जवाब में उन्होंने ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की है, और अन्य सामयिक मुद्दों पर भी जिनमें हिन्दी कहानी, साहित्य, दुनियाभर की स्त्री का लेखन और जीवन, बँटवारा, दंगे, भारत में मुस्लिम जीवन आदि शामिल हैं। आज जब हम कई निर्णायक मोर्चों पर किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, एक बड़ी क़लम के ये विचार नि:सन्देह हमें कुछ रौशनी देंगे।
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बकौल नासिरा शर्मा ‘बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के बाद एक नया हिन्दुस्तान उभरा है, जिसको अभी ठीक से समझा जाना बाक़ी है। पहले भारत ज़मीन के स्तर पर दो फाँक हुआ था, अब विचार और संवेदना के स्तर पर सियासत ने उसे चार फाँक कर दिया है।’ नासिरा शर्मा न सिर्फ़ भारत बल्कि ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोप की भी सामाजिक-सांस्कृतिक पेचीदगियों की जानकार हैं, और मनुष्यता की स्वाभाविक सकारात्मकता विशेषत: स्त्री सरोकार के प्रति अपनी पक्षधरता के लिए जानी जाती हैं।
‘अपने ख़्वाब की ताबीर चाहती हूँ’ उनके साक्षात्कारों का संकलन है। समकालीन पुरुष पत्रकारों-लेखकों-चिन्तकों, जिनमें देश से बाहर के भी कुछ नाम शामिल हैं, द्वारा लिए गए इन साक्षात्कारों को वे ‘आदम के सवाल हव्वा से’ कहती हैं। इन साक्षात्कारों में हम उनके लेखन से परिचित होते हैं, उनकी स्त्री से भी, और सबसे ज़्यादा उस सजग-चिन्तनशील व्यक्ति से जिसने भौगोलिक और राजनीतिक अर्थों में एक विराट और वैविध्यपूर्ण अनुभव को बहुत नज़दीक से देखा-जिया है। इसीलिए वे जिस विषय पर बात करती हैं, उसमें गहरा आत्मविश्वास और प्रामाणिकता स्पष्ट दिखाई देते हैं।
मुस्लिम कठमुल्लावाद और हिन्दू कट्टरता से बराबर लोहा लेती आ रहीं नासिरा जी ने इन वार्ताओं में अनेक ऐसे सवाल उठाए हैं, और अनेक ऐसे सवालों के जवाब भी दिए हैं जिनका गहरा ताल्लुक़ हमारे आज के सामाजिक और राजनीतिक माहौल से भी है। मसलन हिन्दू-मुसलमान के बीच बढ़ाए जा रहे विद्वेष पर वे कहती हैं कि ‘इन सारे जालों को साफ़ करने का काम उतने प्रभावी ढंग से हमारी क़लम नहीं कर पाई जितना राजनेता समाज को काटने और दिलों को बाँटने में कामयाब हुए हैं।’
इस पुस्तक में कुछ सवालों के जवाब में उन्होंने ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा की है, और अन्य सामयिक मुद्दों पर भी जिनमें हिन्दी कहानी, साहित्य, दुनियाभर की स्त्री का लेखन और जीवन, बँटवारा, दंगे, भारत में मुस्लिम जीवन आदि शामिल हैं।
आज जब हम कई निर्णायक मोर्चों पर किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं, एक बड़ी क़लम के ये विचार नि:सन्देह हमें कुछ रौशनी देंगे।
Book Details
-
ISBN9788119133406
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ‘आँसू और रौशनी’ दरअस्ल दो कवियन की वार्ता है। यह रूखा-सूखा साक्षात्कार नहीं, वरन् दो संवेदनशील सृजनधर्मियों का संवाद है; जिसमें हम अपने प्रिय साथी कलाकार से वह सब बाँट लेना चाहते हैं, जो हमें रसज्ञ की तरह अभिभूत करता है। आलोकधन्वा जैसे ख़ामोश कवि को थोड़ा-बहुत खोलना भी धैर्य, धृति और साधना की माँग करता है। पंकज ने वे एकान्त क्षण पकड़े, जब आलोक संवाद की सृजन-चेतना में जाग्रत थे। उनकी वह भीगी भावप्रवण आवाज़ इस पुस्तक में सुनाई दे रही है, जो घास के एक तिनके का भी कम्पन पहचान लेती है। पंकज चतुर्वेदी आलोकधन्वा की विह्वलता, वाग्वैभव और तरलता को ज्यों-का-त्यों हम तक लेकर आए हैं इस अनूठी पुस्तक में। संवाद दो कवियों का परस्पर मिलना भी है और खुलना भी। वे जीवन-संग्राम से बच नहीं रहे, उसी में रहते हुए रच रहे हैं। पंकज चतुर्वेदी की युवा उत्कंठाओं को पहचानते हुए आलोकधन्वा उन्हें अपने सृजन-कक्ष की मेज़ तक ले जाकर दिखा देते हैं और कहते हैं, “अच्छे लोग वही हुए, जो अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े, उनसे ख़ूबसूरत कोई नहीं है।” एक ऐसे समय में, जब संवाद मन्थर पड़ रहा है, ‘आँसू और रौशनी’ के प्रकाशन का स्वागत है। —ममता कालिया, कथाकार
Puchho Parsai Se
- Author Name:
Harishankar Parsai
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पूछो परसाई से अपने ढंग की एक अनूठी पुस्तक है। हरिशंकर परसाई का रचनात्मक हस्तक्षेप स्थायी, परिवर्तनकारी और बहुआयामी रहा है। उन्होंने अपने साहित्य में समाज के अनेक पक्षों पर मौलिकता के साथ विचार किया है। वस्तुतः उनका समस्त लेखन भाषा, साहित्य और समाज की धरोहर है। यह पुस्तक हरिशंकर परसाई की मनीषा के कई विलक्षण आयाम रेखांकित करती है। प्रश्नोत्तर शैली की परम्परा अति प्राचीन है। पूछो परसाई से इसी परम्परा का आधुनिक संस्करण है। ‘देशबन्धु’ समाचार-पत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ अत्यन्त लोकप्रिय था। देश के कोने-कोने से जागरूक उत्सुक पाठक अपने प्रिय लेखक परसाई से भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते थे। इन प्रश्नों में दुनिया जहान की जाने कैसी-कैसी जिज्ञासाएँ भरी रहती थीं।...और परसाई प्रश्न की प्रकृति के अनुसार सूचनात्मक, विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक, व्यंग्यात्मक आदि शैलियों में उत्तर देते थे। यही कारण है कि प्रायः सर्वाधिक समय तक नियमित प्रकाशित होनेवाला यह स्तम्भ आज भी विषय-वैविध्य और ‘बहुआस्वादकता’ का उदाहरण बना हुआ है। पूछो परसाई से में हरिशंकर परसाई की प्रचलित छवि भी एक नया विस्तार पाती है। परसाई की विचारधारा और भावप्रवणता पुस्तक की प्राणशक्ति है। इसमें व्याप्त तार्किकता, सरलता, सहजता और आत्मीयता के दर्शन भी उत्तरों में होते हैं। जाने कितने उकसाने वाले प्रश्नों के उत्तर भी उन्होंने पूरी सहजता से दिए हैं। उदाहरणार्थ, एक प्रश्न है–‘आपके पास हर प्रश्न का जवाब है। क्या आप अक्ल के जहाज हैं?’ परसाई का उत्तर है–‘मेरे पास हर प्रश्न का जवाब नहीं है। जवाब सही हो, यह भी जरूरी नहीं है। मैं लगातार सीखता जाता हूँ। मामूली आदमी हूँ।’ समग्रतः इस पुस्तक में ज्ञान, प्रेरणा और रोचकता का एक भरा-पूरा संसार पाठकों के लिए सुरक्षित है।
Gapodi se Gapshap : Kashinath Singh se Samvad
- Author Name:
Pallav
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‘गपोड़ी से गपशप’ विख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह के साक्षात्कारों का संकलन है। विविध विधाओं में रचने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा है जो अनकहा रह जाता है। कई बार जब लेखक प्रश्नों से घिरता है अथवा जब प्रश्न-प्रतिप्रश्न की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है तब वह अनकहा व्यक्त होने लगता है। प्रस्तुत पुस्तक के सम्पादक पल्लव के अनुसार—कथाकार की बातें कैसी होती हैं? अलबत्ता इससे भी पहले यह पूछना चाहिए कि क्या है जो कहने से रह गया? काशीनाथ सिंह से की गई बातचीतों को सँजोते हुए इन सवालों का उभरना अस्वाभाविक तो नहीं है। कहना चाहिए कि ये बातचीतें बहुधा उनके पाठकों, प्रशंसकों या उनके साहित्य में दिलचस्पी रखनेवाले जिज्ञासुओं के कारण सम्भव हुई। इन बातचीतों का समय भी बहुत व्यापक है। लगभग तीस सालों का सफ़र पूरा करतीं ये मुलाक़ातें अपने स्वभाव में आत्मीय गपशप हैं। लेखक का संकोच और प्रश्नकर्ता की तमाम जिज्ञासाएँ मिलकर बातचीत को उत्तेजक नहीं बनातीं, न ही ये कथाकार के श्रीमुख से निकले आप्त-वचनों का सुसंकलन बन रही हैं। अपितु संशय, आत्मालोचना और जनतांत्रिकता इन संवादों को पठनीय बनाते हैं। लेखक इनमें औपचारिक होने से बचता है और जो कहा है सीधे-बेलाग। पाठक जानते हैं कि काशीनाथ सिंह विचारों को व्यक्त करते समय ‘भाषा को दरेरा’ देते रहते हैं। यही कारण है कि विभिन्न विषयों पर उनकी टिप्पणियाँ व्यापक विमर्शों का आधार बनती रही हैं। यह भी कि इन साक्षात्कारों से गुज़रने के बाद काशीनाथ सिंह के व्यक्तित्व-कृतित्व के प्रति पाठक का दृष्टिकोण संशोधित-परिष्कृत होता है।
Sahitya Ki Vyapak Chintayen
- Author Name:
Nand Chaturvedi
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इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कार, सामयिक विषयों पर गम्भीर चिन्ताएँ तो हैं ही, साथ ही नन्द चतुर्वेदी के साहित्यिक सोच की अभिव्यक्ति भी है। वे कविता की परम्परागत बुनावट के साथ-साथ उसकी सामाजिकता और उससे जुड़े सरोकारों को भी जानते-पहचानते थे। ये सम्पूर्ण रूप से नन्द चतुर्वेदी की साहित्यिक चिन्ताओं और उनके सफल-असफल होने की कथा भी हैं। शिक्षा, मीडिया, नया आर्थिक परिदृश्य, जिसमें निजीकरण और वैश्वीकरण शामिल हैं, उनकी व्यापक चिन्ताओं का हिस्सा थे। उनको एक दु:ख यह भी था कि राजस्थान के हिन्दी लेखकों को वह सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वे हक़दार थे। वे राजस्थान को उत्तर प्रदेश की मंडी बनाने के ख़िलाफ़ थे और बार-बार इस दु:ख का बयान इन साक्षात्कारों में करते हैं।
नौ दशकों के लम्बे जीवनकाल में नन्द जी ने कई सामाजिक कालखंडों में अपना जीवन जिया। झालावाड़-उदयपुर का सामन्ती-काल, आज़ादी की लड़ाई और देश-निर्माण के सपने। आज़ादी के बाद बराबरी का सपना भी टूटा और बहुत बाद के दिनों में उन्हें निजीकरण और वैश्वीकरण के सवालों के उत्तर भी खोजने पड़े। ये साक्षात्कार उनके हर अनुभव का आईना हैं। इस पुस्तक के कई साक्षात्कारकर्ता नन्द जी के साथी, सहयोगी कवि और प्रियजन रहे हैं। विदेश और देश के अन्य भागों से आए विद्वज्जनों ने भी उनसे बातचीत की है। इन लम्बे साक्षात्कारों में वे अपने पढ़ने-लिखने, स्मृतियों और बचपन के दिनों की चर्चा भी करते हैं। पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें शामिल सभी साक्षात्कारों को नन्द जी ने अपने जीवन के आख़िरी वर्षों में स्वयं सम्पादित और चयनित किया था। व्यवस्था के पुनर्निर्माण की आशा अब भी बची है, क्योंकि ये जो बहुत-से सपने हैं, वे काल्पनिक नहीं हैं। वे मनुष्य के अस्तित्व की बुनियादी शर्तें हैं—जैसे मनुष्य की स्वाधीनता, जैसे मनुष्य की समता। इनको छोड़ना सम्भव नहीं है। और तब मुझे यह प्रतीत होता है कि चाहे जितने दिन तक चीज़ें उथल-पुथल होती रहें लेकिन अन्त में समता और स्वाधीनता के प्राप्त हुए बिना मनुष्य बच नहीं पाएगा। —इसी पुस्तक से
Manusmriti
- Author Name:
Tikakar Dr. Ramchandra Verma Shastri
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मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Kirtishesh : Mohan Rakesh
- Author Name:
Jaidev Taneja
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मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
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कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
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