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Author:
Vinay Nalwa, Arun AnandPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
300
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रामजन्मभूमि' का अर्थ है, भगवान् राम का जन्मस्थान, जो भगवान् विष्णु के अवतार हैं। भगवान् राम का जन्मस्थान उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित है, और हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। 1528 में बाबर ने अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त करवाकर वहाँ एक मसजिद जैसे एक ढाँचे का निर्माण करवा दिया। तब से हिंदू इस स्थान को वापस पाने और इस पर राम मंदिर बनाने के लिए निरंतर संघर्षरत रहे हैं। इसके लिए अनेक हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। 1980 के दशक के मध्य में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन पुनः प्रारंभ किया गया था। इसने भारत में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी और भारतीय राजनीति में भी एक परिणामकारी परिवर्तन का काल प्रारंभ हुआ । रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के मामले को दुनिया के इतिहास में सबसे लंबी चलनेवाली कानूनी लड़ाई होने का गौरव भी प्राप्त है। इस मामले पर आखिरकार 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय और रामजन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यह पुस्तक 'रामजन्मभूमि' के इन सभी पहलुओं की पड़ताल करती हुई भव्य, उथल-पुथल भरी ऐतिहासिक गाथा के सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को एक स्थान पर लाती है। 'रामजन्मभूमि' विषय पर ऐतिहासिक दस्तावेजों, धर्मग्रंथों, उपाख्यानों और दस्तावेजी बहसों से समर्थित यह पुस्तक आपको हजारों वर्षों से अधिक की यात्रा पर ले जाएगी और रामजन्मभूमि की ऐतिहासिकता के साथ-साथ इसके माहात्म्य और गौरव को समझने की दृष्टि भी विकसित करेगी।
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रामजन्मभूमि' का अर्थ है, भगवान् राम का जन्मस्थान, जो भगवान् विष्णु के अवतार हैं। भगवान् राम का जन्मस्थान उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या में स्थित है, और हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है।
1528 में बाबर ने अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त करवाकर वहाँ एक मसजिद जैसे एक ढाँचे का निर्माण करवा दिया। तब से हिंदू इस स्थान को वापस पाने और इस पर राम मंदिर बनाने के लिए निरंतर संघर्षरत रहे हैं। इसके लिए अनेक हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। 1980 के दशक के मध्य में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन पुनः प्रारंभ किया गया था। इसने भारत में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी और भारतीय राजनीति में भी एक परिणामकारी परिवर्तन का काल प्रारंभ हुआ ।
रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के मामले को दुनिया के इतिहास में सबसे लंबी चलनेवाली कानूनी लड़ाई होने का गौरव भी प्राप्त है। इस मामले पर आखिरकार 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय और रामजन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यह पुस्तक 'रामजन्मभूमि' के इन सभी पहलुओं की पड़ताल करती हुई भव्य, उथल-पुथल भरी ऐतिहासिक गाथा के सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को एक स्थान पर लाती है।
'रामजन्मभूमि' विषय पर ऐतिहासिक दस्तावेजों, धर्मग्रंथों, उपाख्यानों और दस्तावेजी बहसों से समर्थित यह पुस्तक आपको हजारों वर्षों से अधिक की यात्रा पर ले जाएगी और रामजन्मभूमि की ऐतिहासिकता के साथ-साथ इसके माहात्म्य और गौरव को समझने की दृष्टि भी विकसित करेगी।
Book Details
-
ISBN9789355215918
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘काठ का उल्लू’ को ‘दोआबा’ पत्रिका में प्रकाशित करते हुए, सम्पादकीय के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की गई थी कि यह उपन्यास अपनी थीम के कारण पाठकों के बीच लोकप्रिय होगा। प्रश्न उठता है कि इस उपन्यास की ‘थीम’ है क्या? निःसन्देह इसका उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता है। ‘काठ के उल्लू’ की थीम के कई स्तर हैं जो प्याज के छिलके की भाँति परत दर परत खुलते चले जाते हैं। सपनों में पलती नौकरशाही, अभिजात्य वर्ग की ढँकी-छुपी सच्चाई, स्याह-सफेद के बीच खिलवाड़ करती राजनीति... और एक सामान्य-सी लड़की को ‘दलित इकाई’ के रूप में बदल देने की चतुराई। अर्थात इस उपन्यास में हमारे समाज के इतने रंग हैं कि उन सबको मिला कर यदि ‘रंगामेज़ी’ शैली में कोई चित्र बनाया जाए तो वह बदरंग ही होगा, आकर्षक भले हो। जाहिर है कि यह एक जटिल यथार्थ है, जिसे एक छोटे से उपन्यास में व्यक्त कर देना आसान काम नहीं था। मगर, पल्लवी प्रसाद ने उसे बखूबी कर दिखाया है। इस उपन्यास में कई अन्य यथार्थ भी दर्ज हैं। जैसे गाँवों का ‘आधुनिक’ हो जाना, हर व्यक्ति का लगभग ‘आम आदमी’ हो जाना और अन्ततः कृष्णकान्त जैसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति का ‘काठ का उल्लू’ बन जाना। उल्लू का पसन्दीदा समय ‘अँधेरा’ पूरे उपन्यास में आदि से अन्त तक छाया हुआ है। मगर लेखिका ने उसमें भी रोशनी की एक ‘झिरी’ देख ली है। वह है एक बूढ़ी स्त्री जो गाँव में रहती है और जो किसी की माँ है, किसी की दादी तो किसी की परदादी। वास्तव में इस ‘झिरी’ ने ही इस उपन्यास को वह सार्थकता बख्शी है, जो उसका मूल उदेश्य प्रतीत होती है। पल्लवी प्रसाद का यह उपन्यास ऐसे समय में आया है जबकि अभिजात्य वर्ग में ही नहीं बल्कि सामान्य जीवन में भी पारिवारिक सम्बन्धों की दीवारें दरक रही हैं। इसलिए इस उपन्यास का अपना अलग ही महत्त्व है। —अब्दुल बिस्मिल्लाह
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