Pravasi Ki Kalam Se
(0)
Author:
Badal SarkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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भारतीय रंगमंच के दिशा-प्रवर्तकों में से एक बादल सरकार के पत्रों, डायरियों आदि का यह संग्रह उनके निर्माणकारी दिनों का लेखा-जोखा है, जिससे हम उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके संवेदनशील रंगकर्मी की संरचना को समझने की शुरुआत भी कर सकते हैं।</p> <p>मूल रूप से बांग्ला में ‘प्रबासेर हिजिबिजी’ शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक में सितम्बर, 1957 से सितम्बर, 1959 तक के उनके लन्दन प्रवास (दो साल), जुलाई 1963 से मार्च 1964 तक के उनके फ्रांस प्रवास (नौ महीने) और जुलाई 1964 से जून 1967 तक (तीन साल) के नाइजीरिया प्रवास का रचनात्मक साक्ष्य है। यह उनके संघर्षमय जीवन के एक कालखंड का अत्यन्त मार्मिक एवं प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।</p> <p>ग्रन्थ में एक जगह उन्होंने लिखा है कि जो बातें दूसरों से कही जा सकती थीं, वे पत्रों के माध्यम से कही गई हैं। जिन्हें अपने तईं ही रखना चाहता था, वे डायरी के पृष्ठों में ग्रथित हैं और जो डायरी में भी नहीं कही जा सकीं, वे कविताओं का बाना पहनकर व्यक्त हुई हैं।</p> <p>क़रीब डेढ़ सौ पृष्ठों की इस सामग्री को काल-क्रमानुसार सँजोया गया है जिससे एक ख़ूबसूरत चित्र बना है जिसकी नाना रेखाएँ, नाना रंग, नाना आकार-प्रकार अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ आवश्यकता एवं प्रसंगानुसार उकेरे गए हैं।
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भारतीय रंगमंच के दिशा-प्रवर्तकों में से एक बादल सरकार के पत्रों, डायरियों आदि का यह संग्रह उनके निर्माणकारी दिनों का लेखा-जोखा है, जिससे हम उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके संवेदनशील रंगकर्मी की संरचना को समझने की शुरुआत भी कर सकते हैं।</p>
<p>मूल रूप से बांग्ला में ‘प्रबासेर हिजिबिजी’ शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक में सितम्बर, 1957 से सितम्बर, 1959 तक के उनके लन्दन प्रवास (दो साल), जुलाई 1963 से मार्च 1964 तक के उनके फ्रांस प्रवास (नौ महीने) और जुलाई 1964 से जून 1967 तक (तीन साल) के नाइजीरिया प्रवास का रचनात्मक साक्ष्य है। यह उनके संघर्षमय जीवन के एक कालखंड का अत्यन्त मार्मिक एवं प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।</p>
<p>ग्रन्थ में एक जगह उन्होंने लिखा है कि जो बातें दूसरों से कही जा सकती थीं, वे पत्रों के माध्यम से कही गई हैं। जिन्हें अपने तईं ही रखना चाहता था, वे डायरी के पृष्ठों में ग्रथित हैं और जो डायरी में भी नहीं कही जा सकीं, वे कविताओं का बाना पहनकर व्यक्त हुई हैं।</p>
<p>क़रीब डेढ़ सौ पृष्ठों की इस सामग्री को काल-क्रमानुसार सँजोया गया है जिससे एक ख़ूबसूरत चित्र बना है जिसकी नाना रेखाएँ, नाना रंग, नाना आकार-प्रकार अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ आवश्यकता एवं प्रसंगानुसार उकेरे गए हैं।
Book Details
-
ISBN9788181970251
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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'यह एक मारक क्षण है। इस बार अधिक सख़्त और बेधक निगाहों के साथ। मैं इसके सामने हूँ। इसके निशाने पर। यह क्षण एक निर्णायक फ़ैसला चाहता है। यह एक अपराजेय क्षण है। मेरे भीतर से ही निकला हुआ। शक्तिशाली और अबोधता से भरा। यह किसी उलझन में नहीं है। यह मैं हूँ जो इसे उलझन में डालने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह भुलावे में नहीं आ रहा है। 'जैसा मैं हूँ और जो मुझे होना चाहिए' को यह तेज़ धार से काटकर, दो टूक और दो भागों में कर देना चाहता है। यह क्रूर होते हुए भी आकर्षक है और अकाट्य भी। यह ख़ुद एक तर्क है, अपने आपमें एक औचित्य। एक स्वयंसिद्ध काया और विचार। इसका सम्मोहन ज़बर्दस्त है। जानता हूँ यह अवसाद नहीं है। निराशा नहीं है। खिन्नता तो क़तई नहीं। यह एक आदिम आकांक्षा है जो अब अपना आधिपत्य चाहती है। यह हरेक सर्जक में प्रसुप्त रहती है। जब वह जागती है तो पूरा जीवन माँगती है। अपना ही रक्त चाहती है।
रचनाकार एक तरह की अस्वस्थता में, बुख़ार में और अपने रक्त में कैंसर की कोशिकाएँ लिए ही, सक्रिय और व्यथित रहने के लिए अभिशप्त है। जैसे वह तेज़ गति से मृत्यु की तरफ़ यात्रा कर रहा है लेकिन उसकी चाल में एक उफान है और शमित न हो सकनेवाला उद्वेग। अपने भीतर टाइम-बम को छिपाए हुए, जिसमें लगी घड़ी की टिक-टिक आवाज़ उसे सुनाई देती है लेकिन नहीं पता कि उसके पास कितना समय है। वह बस इतना जानता है कि उसका अन्त एक विस्फोट में होगा। इससे अधिक सांघातिक और क्या हो सकता है। यह पल मुझे साथ लेकर जीवन की किसी नई यात्रा पर ले जाने की ज़िद पर अड़ गया है। इसका बढ़ा हुआ हाथ मेरे सामने है।
—इसी संग्रह से
Asha Aur Vishwas : Ek Yatra
- Author Name:
Dr. C.P. Thakur
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- Description: डॉ.सी.पी. ठाकुर की ‘आशा और विश्वास : एक यात्रा’ उत्तर बिहार के एक गाँव में, एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए व्यक्ति की कहानी है। बचपन में वह अकसर बीमार रहते; हाई स्कूल में जाकर उन्हें ज्ञात हुआ कि वे कालाजार नामक रोग से पीडि़त हैं। बावजूद इसके, उन्होंने डॉक्टरी की शिक्षा प्राप्त की और लंदन और एडिनबरा, दोनों ही जगहों से एम.आर.सी.पी. परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। भारत आकर बतौर डॉक्टर एवं वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अपार ख्याति प्राप्त की। कालाजार के क्षेत्र में उनके अग्रणी शोध ने उन्हें विश्वभर में पहचान दिलाई। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया। 1984 में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा और पटना से लोकसभा सांसद चुने गए। पूरी श्रद्धा और इमानदारी से वह जनसेवा में जुडे़ रहे।
Uchakka
- Author Name:
Laxman Gaikwad
- Book Type:

- Description: यह आत्मकथा बिना आत्मदया या किसी क़िस्म की आत्मश्लाघा के हमारे सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है। दलित लेखकों की परम्परागत कथा से अलग, यह ऐसा आत्म–वृत्तान्त है जो समाज के छोटे–छोटे अपराधों पर परवरिश पाते एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है ‘‘मैं तब मराठी की पहली कक्षा में ही पढ़ रहा था। तब जिस किसी पुस्तक का पहला पृष्ठ खोलता उस पर लिखा होता, ‘भारत मेरा देश है। सारे भारतीय मेरे बन्धु हैं। मुझे इस देश की परम्परा का अभिमान है।’ मुझे लगता है कि अगर यह सब कुछ सही–सही है तो फिर हमें बिना अपराध के पीटा क्यों जाता है? माँ को पुलिस क्यों पीटती है? उसकी साड़ी खींचकर यह क्यों कहती है ‘चल साड़ी खोल के दिखा, तूने चोरी की है न!’ मुझे लगता है अगर भारत मेरा देश है, तो फिर हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जाता है? अगर सभी भारतीय भाई–भाई हैं, तो फिर हम जैसे भाइयों को काम क्यों नहीं दिया जाता? हमें खेती के लिए ज़मीन क्यों नहीं दी जाती? रहने के लिए हमें अच्छा मकान क्यों नहीं मिलता? अगर हम सब भाई हैं, तो मेरे भाइयों को, घर का खर्चा चलाने के लिए या पुलिस को रिश्वत देने के लिए, चोरी क्यों करनी पड़ती है?’ ऐसे कई प्रश्न हैं, जिन्हें यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। बिना किसी दुराव–छिपाव के लेखक सहजतापूर्वक बारी–बारी से कई सवालों से जूझता है। बेबाक और अहम साहित्यिक कृति होने के साथ–साथ यह एक महत्त्वपूर्ण व संग्रहणीय दस्तावेज़ है।
Maharishi Dayanand
- Author Name:
Yaduvansh Sahay
- Book Type:

-
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महर्षि दयानन्द के सामने बड़ा सवाल था कि भारतीय संस्कृति के परस्पर-विरोधी तत्त्वों का समाधान किस प्रकार हो। उन्होंने देखा कि एक ओर जहाँ इस संस्कृति में मानव-जीवन और समाज के उच्चतम मूल्यों की रचनाशीलता परिलक्षित होती है, वहीं दूसरी ओर उसमें मानवता-विरोधी, समाज के शोषण को समर्थन देनेवाले, अन्धविश्वासों का पोषण करनेवाले विचार भी पाए जाते हैं। अतः उनके मन को उद्वेलित करनेवाली बात यह थी कि हमारी सांस्कृतिक मूल्य-दृष्टि की प्रामाणिकता क्या है? सत्य के लिए, मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए प्रामाणिकता की आवश्यकता क्या है?
गांधी को अपने सत्य के लिए किसी धर्म-विशेष के ग्रन्थ की प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं हुई। लेकिन दयानन्द के युग में पश्चिमी संस्कृति की बड़ी आक्रामक चुनौती थी। स्वतः यूरोप में 19वीं शती से विज्ञान और नए मानववाद के प्रभाव से मध्ययुगीन धर्म की उपेक्षा की जा रही थी, और मध्ययुगीन आस्था के स्थान पर बुद्धि और तर्क का आग्रह बढ़ा था; परन्तु भारत में यूरोप के मध्ययुगीन धर्म को विज्ञान और मानववाद के साथ आधुनिक कहकर रखा जा रहा था। धर्म को अपने प्रभाव को बढ़ाने और सत्ता को स्थायी बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा था। अतः भारतीय संस्कृति की ओर से इस चुनौती को स्वीकार करने में भारतीय अध्यात्म के वैज्ञानिक तथा मानवतावादी स्वरूप की स्थापना आवश्यक थी। फिर भारतीय अध्यात्म को इस रूप में विवेचित करने के लिए आधार-रूप प्रामाणिकता की अपेक्षा थी और इस दिशा में महर्षि दयानन्द ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह पुस्तक हमें उसकी पूरी विचार-यात्रा से परिचित कराती है और उनके प्रेरणादायी जीवन के अहम पहलुओं से भी अवगत कराती है।
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