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Author:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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महर्षि अरविंद एक महान् दार्शनिक, महान् स्वाधीनता सेनानी, प्रकांड विद्वान्, अद्भुत कवि, राजनेता व लेखक थे। उन्होंने सुप्त भारतीय जनमानस को जगाने का सफलतम प्रयास किया और उनके भीतर एक नए आत्मविश्वास का संचार करने में सफलता पाई। वे भारतीय राजनीति यानी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में 1905 से 1910 तक केवल पाँच वर्ष रहे और इतनी अल्पावधि में देश के जनमानस को राजनीतिक रूप से इतना समर्थ बना दिया कि वह अपनी वास्तविक हस्ती को पहचान सके और अपने अतीत की खोई गरिमा और महिमा को पुनः अर्जित करने के लिए समर्पित हो। महर्षि अरविंद पहले एक राजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी नेता थे लेकिन दैवीय विधान के चलते वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए, क्योंकि उन्होंने यह जाना कि आध्यात्मिक उत्थान के बगैर भारत की स्वतंत्रता अर्थहीन है। इसीलिए उन्होंने भारत को आध्यात्मिक रूप से एक करने के लिए वेद, उपनिषद् व भारतीय ज्ञान-परंपरा की पताका विश्वभर में फैलाई ताकि भारतीयों में अपने ज्ञान के प्रति गौरव-महसूस हो सके। जनसांख्यकीय लाभांश के चलते भारत युवा देश है। आज के परिदृश्य में भारत को उसका पुराना वैभव दिलाने और देश को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाने हेतु श्रीअरविंद के विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। नवभारत के निर्माण की जिम्मेदारी हमारी युवाशक्ति पर है। देश के शिक्षा मंत्री द्वारा इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।
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महर्षि अरविंद एक महान् दार्शनिक, महान् स्वाधीनता सेनानी, प्रकांड विद्वान्, अद्भुत कवि, राजनेता व लेखक थे। उन्होंने सुप्त भारतीय जनमानस को जगाने का सफलतम प्रयास किया और उनके भीतर एक नए आत्मविश्वास का संचार करने में सफलता पाई। वे भारतीय राजनीति यानी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में 1905 से 1910 तक केवल पाँच वर्ष रहे और इतनी अल्पावधि में देश के जनमानस को राजनीतिक रूप से इतना समर्थ बना दिया कि वह अपनी वास्तविक हस्ती को पहचान सके और अपने अतीत की खोई गरिमा और महिमा को पुनः अर्जित करने के लिए समर्पित हो।
महर्षि अरविंद पहले एक राजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी नेता थे लेकिन दैवीय विधान के चलते वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए, क्योंकि उन्होंने यह जाना कि आध्यात्मिक उत्थान के बगैर भारत की स्वतंत्रता अर्थहीन है। इसीलिए उन्होंने भारत को आध्यात्मिक रूप से एक करने के लिए वेद, उपनिषद् व भारतीय ज्ञान-परंपरा की पताका विश्वभर में फैलाई ताकि भारतीयों में अपने ज्ञान के प्रति गौरव-महसूस हो सके।
जनसांख्यकीय लाभांश के चलते भारत युवा देश है। आज के परिदृश्य में भारत को उसका पुराना वैभव दिलाने और देश को ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनाने हेतु श्रीअरविंद के विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। नवभारत के निर्माण की जिम्मेदारी हमारी युवाशक्ति पर है।
देश के शिक्षा मंत्री द्वारा इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर यह पुस्तक लिखी गई है।
Book Details
-
ISBN9789390366644
-
Pages208
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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लीडिया एविलोव चेख़व से चार वर्ष छोटी थीं। उनका जन्म 1864 में मॉस्को में हुआ और पहली बार जब वे चेख़व से मिलीं तो केवल पच्चीस की थीं। चेख़व के साथ अपने सम्बन्ध के ब्यौरे में—जो 1942 में, 78 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के कई वर्ष बाद ‘चेख़व इन माई लाइफ़’ शीर्षक से छपा—उन्होंने 1889 और 1899 के बीच चेख़व के साथ अपनी केवल आठ मुलाक़ातों का वर्णन किया है, मगर साफ़ मालूम होता है कि वे अक्सर ही मिलते रहे होंगे। संस्मरण में काफ़ी कुछ दिलचस्प सामग्री है मगर उसमें भी ख़ास महत्त्व चेख़व के जीवन की उन घटनाओं का है जो उनके सबसे कल्पना-प्रणव नाटक ‘द सी गल’ की पृष्ठभूमि में थीं। इस नाटक ने उनके कई आलोचकों की बुद्धि की आज़माइश की और नाटक के कई पात्रों के विषय में उनके अनुमान अब सर्वथा निराधार मालूम देते हैं।
इस पुस्तक में लीडिया ने अपने और चेख़व के, दस वर्ष तक चले दुखद प्रेम-प्रसंग का वर्णन किया है। यही समय चेख़व के लेखकीय जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय भी था। चेख़व के जीवन के अब तक अनजाने इस अध्याय से उनकी कहानियों और नाटकों में उपस्थित उस वेदना और विषाद को समझने में अन्य किसी भी बात से ज़्यादा मदद मिलती है जो ‘चेरी ऑर्चर्ड’ में वायलिन के तार टूटने की मातमी आवाज़ की तरह ही उनकी सृजन-प्रतिभा और लेखनी से निकली हर प्रेमकथा की विशेषता है।
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