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Author:
Doodhnath SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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यह पूरी किताब एक आदिम<strong>, </strong>दीप्त स्मरण के विस्फोटक क्षणों में लिखी गई। फिर भी यह सम्पूर्ण संस्मरण या आत्म-स्मरण नहीं है। उस धुन में जो ‘विच्छुरित’ हुआ<strong>, </strong>उसी के कुछ रंग-बिरंगे<strong>,</strong> जलते हुए ‘ब्रश-स्ट्रोक्स’ हैं—कभी आगे-पीछे<strong>, </strong>कभी पीछे-आगे आते-जाते<strong>,</strong> अक्रमबद्धता के निजी ढाँचे में बँधे हुए। इसीलिए इसका शिल्प आवर्तों में बँधा हुआ है। इसको कुछ भी कह सकते हैं। यह डायरी है। संस्करण है। आत्मवाची गद्य है। टिप्पणी है। आलोचना है। कथा-वृतान्त है। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारम्भिक वर्षों की दुखती धड़कन से छेड़छाड़ है। और सबसे अधिक अनेक लोगों की धुँधली और चमकती छवियों से मेरा आत्म-संवाद है। यह एक रंगीन मोज़ैक है। विधाओं में एक तोड़-फोड़ है। गद्य का आन्तरिक अवकाश है।</p> <p>—दूधनाथ सिंह।
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About the Book
यह पूरी किताब एक आदिम<strong>, </strong>दीप्त स्मरण के विस्फोटक क्षणों में लिखी गई। फिर भी यह सम्पूर्ण संस्मरण या आत्म-स्मरण नहीं है। उस धुन में जो ‘विच्छुरित’ हुआ<strong>, </strong>उसी के कुछ रंग-बिरंगे<strong>,</strong> जलते हुए ‘ब्रश-स्ट्रोक्स’ हैं—कभी आगे-पीछे<strong>, </strong>कभी पीछे-आगे आते-जाते<strong>,</strong> अक्रमबद्धता के निजी ढाँचे में बँधे हुए। इसीलिए इसका शिल्प आवर्तों में बँधा हुआ है। इसको कुछ भी कह सकते हैं। यह डायरी है। संस्करण है। आत्मवाची गद्य है। टिप्पणी है। आलोचना है। कथा-वृतान्त है। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारम्भिक वर्षों की दुखती धड़कन से छेड़छाड़ है। और सबसे अधिक अनेक लोगों की धुँधली और चमकती छवियों से मेरा आत्म-संवाद है। यह एक रंगीन मोज़ैक है। विधाओं में एक तोड़-फोड़ है। गद्य का आन्तरिक अवकाश है।</p>
<p>—दूधनाथ सिंह।
Book Details
-
ISBN9788171192427
-
Pages159
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
Irfan
- Author Name:
Ajay Brahmatmaj
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इरफान की बातों और यादों को समेटती ' ... और कुछ पन्ने कोरे रह गए : इरफान' सभी फिल्म और इरफान प्रेमियों के लिए एक जरूरी पुस्तक है। यह उनकी जीवनी नहीं है। इसमें उनके साक्षात्कार और उन पर लिखे संस्मरण हैं। यह पुस्तक इरफान के अनोखे व्यक्तित्व को उन्हीं के शब्दों में उभारती है। उनके मित्रों-परिचितों के संस्मरण उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को व्यक्त करते हैं। इरफान को जानने-समझने के लिए यह एक अंतरंग पुस्तक है।
Meri Jindagi Mein Chekhov
- Author Name:
Lydia Evilov
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लीडिया एविलोव चेख़व से चार वर्ष छोटी थीं। उनका जन्म 1864 में मॉस्को में हुआ और पहली बार जब वे चेख़व से मिलीं तो केवल पच्चीस की थीं। चेख़व के साथ अपने सम्बन्ध के ब्यौरे में—जो 1942 में, 78 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के कई वर्ष बाद ‘चेख़व इन माई लाइफ़’ शीर्षक से छपा—उन्होंने 1889 और 1899 के बीच चेख़व के साथ अपनी केवल आठ मुलाक़ातों का वर्णन किया है, मगर साफ़ मालूम होता है कि वे अक्सर ही मिलते रहे होंगे। संस्मरण में काफ़ी कुछ दिलचस्प सामग्री है मगर उसमें भी ख़ास महत्त्व चेख़व के जीवन की उन घटनाओं का है जो उनके सबसे कल्पना-प्रणव नाटक ‘द सी गल’ की पृष्ठभूमि में थीं। इस नाटक ने उनके कई आलोचकों की बुद्धि की आज़माइश की और नाटक के कई पात्रों के विषय में उनके अनुमान अब सर्वथा निराधार मालूम देते हैं।
इस पुस्तक में लीडिया ने अपने और चेख़व के, दस वर्ष तक चले दुखद प्रेम-प्रसंग का वर्णन किया है। यही समय चेख़व के लेखकीय जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय भी था। चेख़व के जीवन के अब तक अनजाने इस अध्याय से उनकी कहानियों और नाटकों में उपस्थित उस वेदना और विषाद को समझने में अन्य किसी भी बात से ज़्यादा मदद मिलती है जो ‘चेरी ऑर्चर्ड’ में वायलिन के तार टूटने की मातमी आवाज़ की तरह ही उनकी सृजन-प्रतिभा और लेखनी से निकली हर प्रेमकथा की विशेषता है।
Do Gaz Zameen
- Author Name:
Hari Bhatnagar
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यह उपन्यास छोटे काम-काजी लोगों की दिक्कतों, प्रशासनिक प्रताड़नाओं और निजी मुश्किलों पर तो रौशनी सालता ही है, साथ ही बदलते वक्त में रिश्तों के बनने-बिगड़ने,दरकने की बात भी बहुत शिद्दत से करता है। जिन लोगों को कथित तौर पर छोटा समझा जाता है उपन्यास उनके भीतरी "बड़ेपन" को सामने लाता है। कथानायक लाला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, वह महामानव या अतिमानव नहीं बल्कि आम लोगों की तरह साधारण इंसान है। लेकिन, अपने दैनिक जीवन में कुछ ख़ास तरह के मानवीय मूल्यों का निर्वाह उसे अपने साधारणत्व में भी अलग या विशिष्ट बना देता है। ये मूल्य ओढ़े हुए या दिखावटी भी नहीं बल्कि उसके व्यक्तिव का स्वाभाविक हिस्सा है। बेटे का व्यवहार उसे भावनात्मक रूप से तोड़ देता है लेकिन वह इसकी शिकायत नहीं करता। जीवंत भाषा और सादगी के शिल्प से समृद्ध यह उपन्यास हरि भटनागर की अभी तक की कथायात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
Sangharsh Ki Virasat Aung San Suu Kyi
- Author Name:
Shashidhar Khan
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"म्याँमार में लोकतंत्र बहाली के लिए अथक संघर्ष करनेवाली आंग सान सू की म्याँमार में ही नहीं बल्कि विश्व भर में लोकप्रिय व चर्चित हैं। वर्ष 1991 में जेल में रहते हुए ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ समेत विश्व के लगभग सभी प्रमुख पुरस्कार प्राप्त कर चुकी सू की ने बचपन से लेकर 66 वर्ष की उम्र प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए गुजारी है। आज उन्होंने म्याँमार को इस स्थिति में ला दिया है कि सैनिक शासक लोकतंत्र बहाली के उपाय धीरे-धीरे अपनाने को विवश है। म्याँमार के राष्ट्रपिता आंग सान का नाम लोग आज सू की के माध्यम से जानते हैं; लेकिन सू की ने सही मायने में राष्ट्रपुत्री बनकर गौरव प्राप्त किया है। सू की के पिता देश को आजाद कराने और आजादी मिलने के बाद हुए आंतरिक संघर्ष से जूझे, जिनमें उन्हें अपनी जान तक गँवानी पड़ी। लेकिन सू की ने घृणा का जवाब प्रेम से और गोली का जवाब बोली से देकर सैनिक शासकों को इस स्थिति में ला दिया कि वे इस अद्भुत जीवटवाली आदर्श महिला के जज्बे के आगे झुकने को विवश हो गए। सन् 1980 के दशक से सू की ने लोकतंत्र बहाली हेतु किए जा रहे संघर्ष की कमान थाम रखी है। आज दुनिया भर के देशों के लिए वे शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतंत्र समर्थकों की प्रेरणास्रोत बन गई हैं। "
Bhagini Nivedita
- Author Name:
Rachna Bhola 'Yamini'
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Main Hoon Bharatiya
- Author Name:
K.K. Muhammed
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"यह पुस्तक एक पुरातत्त्वविद् की आत्मकथा है, जिन्हें अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण में कार्य करने का अवसर मिला। यह पुस्तक एक प्रेरणादायी सामग्री के रूप में सामने आती है, जिसमें यह वर्णन है कि किस प्रकार उन्होंने मार्क्सवादी इतिहासकारों की संगठित ताकत का मुकाबला उनके ही गढ़ में किया, कैसे एक अकेले व्यक्ति ने साम्राज्य से भिड़ंत की। भारतीय पुरातत्त्व विभाग किस प्रकार अपने आपको प्रस्तुत करे, इस संबंध में उनके सुझाव सामान्य जन में नई सोच पैदा करते हैं और भविष्य में इस विभाग की योजना बनानेवालों को दिशा-निर्देश देते हैं। वे इस बात पर बल देते हैं कि इस विभाग की अपार संभावनाओं को एक के बाद एक आनेवाली सरकारों ने भयंकर रूप से अनदेखा किया है। किसी सक्रिय पुरातत्त्वविद् की पहली प्रकाशित डायरी होने के कारण यह इस विषय की बारीकियों पर रोचक अंतर्दृष्टि देती है और स्पष्ट रूप से बताती है कि एक पुरातत्त्वविद् को किस प्रकार धार्मिक तथा क्षेत्रीय पक्षपातों से ऊपर उठना चाहिए। भारतीयता और राष्ट्रवाद का बोध जाग्रत् करनेवाली पठनीय कृति। "
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