Deradangar
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Author:
Dadasahab MorePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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विगत कुछ वर्षों में मराठी से हिन्दी में अनेक श्रेष्ठ आत्मकथाएँ अनूदित होकर आई हैं। ख़ासकर ये आत्मकथाएँ जिन्होंने दलित साहित्यान्दोलन में अपने अलग तेवर के ज़रिए न सिर्फ़ मराठी साहित्य को बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को एक नई सोच<strong>, </strong>दिशा और समझ तथा ऊर्जा प्रदान की।</p> <p><strong>‘</strong>डेराडंगर<strong>’ </strong>उनमें से अधिकांश आत्मकथाओं से इस अर्थ में अलग है कि इसमें नायक गौण है<strong>, </strong>और उसका परिवेश<strong>, </strong>उसकी परिस्थितियाँ प्रधान हैं। इसमें नायक को केन्द्र में स्थापित करने के बजाय उस व्यवस्था को केन्द्र में रखा गया है जिसमें नायक के सम्पूर्ण समाज के लोग अपना पीड़ित<strong>, </strong>यातनामय और नारकीय जीवन जी रहे हैं। आत्मकथाकार का प्रयोजन अपने गुणों का बखान करना है<strong>, </strong>ऐसा इस पूरी पुस्तक में कहीं नज़र नहीं आता।</p> <p>तटस्थता<strong>, </strong>वस्तुनिष्ठता और विश्वसनीयता इस आत्मकथा के अन्य गुण हैं। अच्छी आत्मकथा के इन्हीं आधारभूत औज़ारों के आधार पर इसमें एक व्यक्ति का<strong>, </strong>उसके ज़रिए एक पूरे समाज का<strong>, </strong>उसकी जीवन-प्रणाली और संस्कृति का<strong>, </strong>उसकी प्रश्नपीड़ित ज़िन्दगी की व्यथा और वेदना का<strong>, </strong>उसके हारने<strong>, </strong>गिरने और उभरने<strong>, </strong>तथा मर नहीं सकते इसलिए जीने की विवशताओं का बोध कराया गया है।
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विगत कुछ वर्षों में मराठी से हिन्दी में अनेक श्रेष्ठ आत्मकथाएँ अनूदित होकर आई हैं। ख़ासकर ये आत्मकथाएँ जिन्होंने दलित साहित्यान्दोलन में अपने अलग तेवर के ज़रिए न सिर्फ़ मराठी साहित्य को बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को एक नई सोच<strong>, </strong>दिशा और समझ तथा ऊर्जा प्रदान की।</p>
<p><strong>‘</strong>डेराडंगर<strong>’ </strong>उनमें से अधिकांश आत्मकथाओं से इस अर्थ में अलग है कि इसमें नायक गौण है<strong>, </strong>और उसका परिवेश<strong>, </strong>उसकी परिस्थितियाँ प्रधान हैं। इसमें नायक को केन्द्र में स्थापित करने के बजाय उस व्यवस्था को केन्द्र में रखा गया है जिसमें नायक के सम्पूर्ण समाज के लोग अपना पीड़ित<strong>, </strong>यातनामय और नारकीय जीवन जी रहे हैं। आत्मकथाकार का प्रयोजन अपने गुणों का बखान करना है<strong>, </strong>ऐसा इस पूरी पुस्तक में कहीं नज़र नहीं आता।</p>
<p>तटस्थता<strong>, </strong>वस्तुनिष्ठता और विश्वसनीयता इस आत्मकथा के अन्य गुण हैं। अच्छी आत्मकथा के इन्हीं आधारभूत औज़ारों के आधार पर इसमें एक व्यक्ति का<strong>, </strong>उसके ज़रिए एक पूरे समाज का<strong>, </strong>उसकी जीवन-प्रणाली और संस्कृति का<strong>, </strong>उसकी प्रश्नपीड़ित ज़िन्दगी की व्यथा और वेदना का<strong>, </strong>उसके हारने<strong>, </strong>गिरने और उभरने<strong>, </strong>तथा मर नहीं सकते इसलिए जीने की विवशताओं का बोध कराया गया है।
Book Details
-
ISBN9788171197170
-
Pages196
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई जमीन बनाई थी जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं। कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन कियाक। अपने संपर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने करीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भूरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया। इस पुस्तक में कोयलिया मत कर पुकार, बांधीश ना आर मायार डोरे, ताजमहल, अमरूद या भाभी ललिता, काल के हस्ताक्षर, सीमन्तेर सिन्दूर, एक अनाघ्रात पुष्प, आपबीती, कीर्ति-स्तम्भ, बिन्नू, आमि जे बनलता, भूली कहाँ हूँ, शुचि स्मिता, अरुंधती सुशीला, वह जीवन-भर कविता ही तो लिखती रही आदि रचनाएँ शामिल हैं। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों की उनकी ये रचनाएँ भी पसंद आएँगी।
Lokraja Shahu Chhatrapati
- Author Name:
Ramesh Jadhav
- Book Type:

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Description:
राजर्षि शाहू छत्रपति (1874-1922) कोल्हापुर रियासत के अधिपति थे। अपने अल्पकाल के राज्यशासन में प्रगतिशील सुधारों से आप ‘लोकराजा’ बने। मराठा इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. रमेश जाधव ने अपने अनुसन्धान को आधार बनाकर इन्हीं लोकराजा का चरित्र लिखा।
‘लोकराजा शाहू छत्रपति’ ग्रन्थ राजर्षि शाहू छत्रपति के जीवन, कार्य एवं विचारों की जीवन्त व प्रामाणिक कथा अभिव्यक्त करता है। महाराष्ट्र में बीसवीं सदी के प्रारम्भ में अछूतोद्धार, नारी शिक्षा, निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, अन्तरजातीय विवाह, कृषि सुधार, सहकारिता, छात्रावासों की निर्मिति से विभिन्न समुदायों के मध्य समन्वय, कला-क्रीड़ा-संस्कृति उपक्रमों को बढ़ावा इत्यादि प्रजाहितैषी कार्यों से राजर्षि शाहू छत्रपति भारतवर्ष के लिए अनुकरणीय बने। उत्तर प्रदेश में उनकी स्मृति में ज़िला एवं विश्वविद्यालय का निर्माण, संसद भवन में उनकी प्रतिमा की स्थापना उनके सामाजिक कार्यों की महत्ता को रेखांकित करते हैं।
सामाजिक न्याय को सर्वोच्च जीवनमूल्य माननेवाले ‘लोकराजा शाहू छत्रपति’ के इस जीवन चरित को जीवनी लेखन के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। मराठी से हिन्दी में अनुवाद करते हुए प्रो. शरद कणबरकर ने संवेदना और भाषिक संरचना का विशेष ध्यान रखा है। इस जीवनी को पढ़ना व्यापक सामाजिकता में प्रवेश करना है।
Akela Aadmi (Kahani Nitish Kumar Ki)
- Author Name:
Sankarshan Thakur
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- Description: नीतीश कुमार सन् 1974 में विश्वविद्यालय में पढ़नेवाले एक युवा ही थे, तभी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ पटना की सड़कों पर जनांदोलन शुरू हो गया। आंदोलन बढ़ता गया और देश भर में फैल गया। छात्र, राजनेता, मजदूर और पुराने राजामहाराजा—सब आंदोलन में शामिल हो गए। इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर भारत के लोकतंत्र पर बड़ा आघात किया। युवा संकर्षण ठाकुर तब स्कूल में ही पढ़ते थे और इन घटनाओं को चुपचाप देखा करते थे। वह समय, जब जनता आदर्शवाद के सपने देखने लगी थी, गुजर गया, उसके बाद दशक गुजर गए और सारे सपने राख हो गए। हालाँकि उस राख से एक ऐसा नेता निकला, जिसने बिहार का स्वरूप बदल दिया और उसे देश की सबसे संपन्न अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करा दिया। बिहार में लालूप्रसाद यादव के अंधकारमय, नैराश्यपूर्ण और अराजक शासन के बाद बिहार को नीतीश कुमार के रूप में सभ्य, आधुनिक और काम करनेवाला मुख्यमंत्री मिला। उनके नेतृत्व में बिहार ने हर क्षेत्र में जबरदस्त कामयाबी हासिल की। हालाँकि, उनकी इस यात्रा में कई कमियाँ भी हैं। क्या नीतीश कुमार सफल होंगे या असफल हो जाएँगे? नीतीश कुमार आज जो हैं, वो कैसे बने? वे हैं कौन? इस पुस्तक में समकालीन राजनीति के छलकपट, रिपोर्ताज, किस्सागो और विश्लेषण दिए गए हैं; जिनके बीच नीतीश कुमार देश के एक अँधेरे कोने से उभरे और पुंज बनकर चमके। संकर्षण ठाकुर ने नीतीश कुमार के जटिल व्यक्तित्व की परतें निपुणतापूर्वक और आकर्षक रूप से खोली हैं।
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