Chasing The Monk's Shadow
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An Indian woman with a China craze retraces the footsteps of a Chinese monk with an Indian obsessionIn the seventh century AD, the Chinese monk Xuanzang (earlier spelt as Hiuen Tsang or Hsuan Tsang) set off on an epic journey to India to study Buddhist philosophy from the Indian masters. Travelling along the Silk Road, through the desolate wastes of the Gobi desert and the icy passes of Central Asia, braving brigands and blizzards, Xuanzang finally reached India, where his spiritual quest took him to Buddhist holy places and monasteries throughout the subcontinent. By the time he returned to China eighteen years later, carrying with him nearly 600 scriptures which he translated from Sanskrit into Chinese, Xuanzang had covered an astonishing 10,000 miles. He also left a detailed record of his journey, which remains a valuable source of historical information on the regions he traversed. Fourteen hundred years later, Mishi Saran follows in Xuanzang's footsteps to the fabled oasis cities of China and Central Asia, and the Buddhist sites and now-vanished kingdoms in India, Pakistan and Afghanistan that Xuanzang wrote about. Travelling seamlessly back and forth in time between the seventh century and the twenty-first, Saran uncovers the past with consummate skill even as she brings alive the present through her vivid and engaging descriptions of people and places. Her gripping chronicle includes an extraordinary eyewitness account of Kabul under the Taliban regime, just one month before 9/11. Running parallel to the account of her travels is the moving story of the author's inner journey towards a new understanding of her roots and her identity. With its riveting mix of lively reportage, high adventure, historical inquiry and personal memoir, this delightfully written book is a path-breaking travelogue.
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An Indian woman with a China craze retraces the footsteps of a Chinese monk with an Indian obsessionIn the seventh century AD, the Chinese monk Xuanzang (earlier spelt as Hiuen Tsang or Hsuan Tsang) set off on an epic journey to India to study Buddhist philosophy from the Indian masters. Travelling along the Silk Road, through the desolate wastes of the Gobi desert and the icy passes of Central Asia, braving brigands and blizzards, Xuanzang finally reached India, where his spiritual quest took him to Buddhist holy places and monasteries throughout the subcontinent. By the time he returned to China eighteen years later, carrying with him nearly 600 scriptures which he translated from Sanskrit into Chinese, Xuanzang had covered an astonishing 10,000 miles. He also left a detailed record of his journey, which remains a valuable source of historical information on the regions he traversed. Fourteen hundred years later, Mishi Saran follows in Xuanzang's footsteps to the fabled oasis cities of China and Central Asia, and the Buddhist sites and now-vanished kingdoms in India, Pakistan and Afghanistan that Xuanzang wrote about. Travelling seamlessly back and forth in time between the seventh century and the twenty-first, Saran uncovers the past with consummate skill even as she brings alive the present through her vivid and engaging descriptions of people and places. Her gripping chronicle includes an extraordinary eyewitness account of Kabul under the Taliban regime, just one month before 9/11. Running parallel to the account of her travels is the moving story of the author's inner journey towards a new understanding of her roots and her identity. With its riveting mix of lively reportage, high adventure, historical inquiry and personal memoir, this delightfully written book is a path-breaking travelogue.
Book Details
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ISBN9780143064398
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Pages456
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Avg Reading Time15 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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...इधर मैं आपके लन्दन और वेल्ज़ वाले यात्रा-वृत्तान्त शौक़ से पढ़ता रहा हूँ। आप हर स्थिति और दृश्य को कितनी उत्सुकता से देखते हैं और कितनी गहराई से ग्रहण करते हैं...
—कृष्ण बलदेव वैद
...आपका यात्रा-वृत्तान्त मुझे बहुत अच्छा लगा। इसका एक बहुत नकारात्मक कारण यह है कि मैंने सोचा था, इसमें औपन्यासिकता का रस नहीं होगा और बोझिल होगा। मगर इसमें आनन्द और रस भरपूर है, बोझिल बिलकुल भी नहीं। श्रद्धेय वात्स्यायनजी और निर्मल वर्मा के यात्रा-वृत्तान्तों से एकदम भिन्न रस का यात्रा-वृत्तान्त है।...
—अशोक सेकसरिया
...पिछले सप्ताह से मैं रह-रह कर आपके साथ आयरलैंड के वन्य स्थलों के सन्नाटे, झीलों पर उड़ते हंसों, डब्लिन की सड़कों-पबों का मूक—ईर्ष्यालु पाठक—साक्षी रहा हूँ। मैंने मुद्दत पुरानी येट्स की कविताओं की पुस्तक भी पास रख ली थी और जब आप अपने संस्मरण में किसी कविता का अंश उद्धृत करते तो तुरन्त मैं एक उत्सुक-उत्तेजित पाठक-पर्यटक के उत्साह की रौ में उसे पुस्तक में पूरा का पूरा पढ़ने का आनन्द लेता। आपने ‘इनिस्क्री के द्वीप’ की अखंड निःस्तब्धता और कूल पार्क के सात वनों की जो छवि आँकी है, वह अपने आपमें बेजोड़ है। हमारे दार्शनिक मित्र दयाजी को जब कोई चीज़ या कोई कही हुई बात अच्छी लगती थी तो वह बच्चों की तरह ताली बजाते थे। आपके आयरलैंड के संस्मरणों को पढ़ते हुए हर दूसरे पृष्ठ पर ताली बजाने को मन करता है। इस बीच अन्य पत्रिकाओं में भी आपके यात्रा-वृत्त पढ़ता रहा हूँ। पर आपने आयरलैंड और येट्स के बारे में जो डूबकर लिखा है, वह अद्वितीय है।...
—निर्मल वर्मा
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