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जितनी बड़ी दुनिया बाहर है, उतनी ही बड़ी एक दुनिया हमारे अन्दर भी है, अपने ऋषियों-मुनियों की कहानियाँ सुनकर लगता है कि वे सिर्फ़ भीतर ही चले होंगे। यह किताब इन दोनों दुनियाओं को जोड़ती हुई चलती है। यह महसूस कराते हुए कि भीतर की मंज़िलों को हम बाहर चलते हुए भी छू सकते हैं, बशर्ते अपने आप को लादकर न चले हों। उतना ही एकान्त साथ लेकर निकले हों जितना एकान्त ऋषि अपने भीतर की यात्रा पर लेकर निकला होगा। अनुराधा बेनीवाल की इस एकाकी यात्रा में आप ज्ञान से भारी नहीं होते, सफ़र से हलके होते हैं। न उसने कहीं ज्ञान जुटाने की ज़्यादा कोशिश की, और न पाठक को वह थाती सौंपकर अमर होने की। इसीलिए शायद यह पुस्तक यात्रा-वृत्तान्त नहीं, ख़ुद एक यात्रा हो गई है। एक सामाजिक, सांस्कृतिक यात्रा, और एक प्रश्न-यात्रा जो शुरू ही इस सवाल से होती है कि आख़िर कोई भारतीय लड़की ‘अच्छी भारतीय लड़की’ के खाँचों-साँचों की पवित्र कुंठाओं के जाल को क्यों नहीं तोड़ सकती? सुदूर बाहर की इस यात्रा में वह भीतर के कई दुर्लभ पड़ावों से गुज़रती है, और अपनी संस्कृति, समाज और आध्यात्मिकता को लेकर कुछ इस अन्दाज़ में प्रश्नवाचक होती है कि अपनी हिप्पोक्रेसी को देखना हमारे लिए यकायक आसान हो जाता है। ज़िन्दगी के अनेक ख़ुशनुमा चेहरे इस सफ़र में अनुराधा ने पकड़े हैं, और उत्सव की तरह जिया है। इनमें सबसे बड़ा उत्सव है निजता का। निजी स्पेस के सम्मान का जो उसे भारत में नहीं दिखा। अपने मन का कुछ कर सकने लायक़ थोड़ी-सी खुली जगह, जो इतने बड़े इस देश में कहीं उपलब्ध नहीं है। औरतों के लिए तो बिलकुल नहीं।
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जितनी बड़ी दुनिया बाहर है, उतनी ही बड़ी एक दुनिया हमारे अन्दर भी है, अपने ऋषियों-मुनियों की कहानियाँ सुनकर लगता है कि वे सिर्फ़ भीतर ही चले होंगे। यह किताब इन दोनों दुनियाओं को जोड़ती हुई चलती है। यह महसूस कराते हुए कि भीतर की मंज़िलों को हम बाहर चलते हुए भी छू सकते हैं, बशर्ते अपने आप को लादकर न चले हों। उतना ही एकान्त साथ लेकर निकले हों जितना एकान्त ऋषि अपने भीतर की यात्रा पर लेकर निकला होगा।
अनुराधा बेनीवाल की इस एकाकी यात्रा में आप ज्ञान से भारी नहीं होते, सफ़र से हलके होते हैं। न उसने कहीं ज्ञान जुटाने की ज़्यादा कोशिश की, और न पाठक को वह थाती सौंपकर अमर होने की। इसीलिए शायद यह पुस्तक यात्रा-वृत्तान्त नहीं, ख़ुद एक यात्रा हो गई है। एक सामाजिक, सांस्कृतिक यात्रा, और एक प्रश्न-यात्रा जो शुरू ही इस सवाल से होती है कि आख़िर कोई भारतीय लड़की ‘अच्छी भारतीय लड़की’ के खाँचों-साँचों की पवित्र कुंठाओं के जाल को क्यों नहीं तोड़ सकती? सुदूर बाहर की इस यात्रा में वह भीतर के कई दुर्लभ पड़ावों से गुज़रती है, और अपनी संस्कृति, समाज और आध्यात्मिकता को लेकर कुछ इस अन्दाज़ में प्रश्नवाचक होती है कि अपनी हिप्पोक्रेसी को देखना हमारे लिए यकायक आसान हो जाता है।
ज़िन्दगी के अनेक ख़ुशनुमा चेहरे इस सफ़र में अनुराधा ने पकड़े हैं, और उत्सव की तरह जिया है। इनमें सबसे बड़ा उत्सव है निजता का। निजी स्पेस के सम्मान का जो उसे भारत में नहीं दिखा। अपने मन का कुछ कर सकने लायक़ थोड़ी-सी खुली जगह, जो इतने बड़े इस देश में कहीं उपलब्ध नहीं है। औरतों के लिए तो बिलकुल नहीं।
Book Details
-
ISBN9788126728367
-
Pages188
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘कच्छ कथा’ बीते दो सौ वर्षों में दो भीषण भूकम्प झेल चुके कच्छ की वास्तविक झलक सामने लाती है। यह किताब घुमन्तू स्वभाव के पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की पिछले ग्यारह साल के दौरान कच्छ क्षेत्र में बार-बार की गई यात्राओं से हासिल उनकी जानकारियों और समझ का कुलजमा है। इस रोमांचक यात्रा-आख्यान में वह सब तो है ही जो कच्छ के भूगोल में आँखों से सहज दिखाई देता है, बल्कि वह भी है जिसे देखने के लिए सिर्फ़ आँखों की नहीं, नज़र की ज़रूरत पड़ती है। इसमें समाज और संस्कृति की जितनी शिनाख़्त है, उतनी ही सियासत की पड़ताल भी; अतीत और इतिहास का जितना उत्खनन है, उतना ही मिथकों-मान्यताओं का विश्लेषण भी; जितनी चिन्ता विरासत की है, उतना बहस विकास को लेकर भी है; गुज़रे समय के निशानों की रौशनी में आने वाले समय की सूरत का अनुमान भी इस पुस्तक में है।
हज़ारों साल पुरानी सभ्यता का पालना रहे धोलावीरा से लेकर लखपत तक, नाथपन्थी गुरु धोरमनाथ से लेकर आकबानी तक, शासक महारावों से लेकर नमक की खेती में लगे मज़दूरों तक; अनगिनत जगहों, स्मारकों और लोगों का वृत्तान्त समेटे यह किताब जितना कच्छ के बारे में है, उतना ही गुजरात और हिन्दुस्तान के बारे में भी।
वास्तव में यह किताब एक ऐसी टाइममशीन की तरह सामने आई है जो पूर्णिमा की रात में चमकते नमक के अछोर मैदान के रूप में मशहूर कच्छ के हवाले से हमें हमारे सुदूर अतीत के साथ-साथ आने वाले दौर की भी यात्रा कराती है।
सरस, प्रवाहपूर्ण भाषा और दिलचस्प अन्दाज़ में एक अविस्मरणीय कृति।
Darakte Himalaya Par Dar-Ba-Dar
- Author Name:
Ajoy Sodani
- Book Type:

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अजय सोडानी की किताब 'दरकते हिमालय पर दर-ब-दर’ इस अर्थ में अनूठी है कि यह दुर्गम हिमालय का सिर्फ़ एक यात्रा-वृत्तान्त भर नहीं है, बल्कि यह जीवन-मृत्यु के बड़े सवालों से जूझते हुए वाचिक और पौराणिक इतिहास की भी एक यात्रा है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार लेखक और उनकी सहधर्मिणी अपर्णा के जीवट और साहस पर आश्चर्य होता है। अव्वल तो मानसून के मौसम में कोई सामान्य पर्यटक इस दुर्गम इलाक़े की यात्रा करता नहीं, करता भी है तो उसके बचने की सम्भावना कम ही होती है। ऐसे मौसम में ख़ुद पहाड़ी लोग भी इन स्थानों को प्रायः छोड़ देते हैं। लेकिन किसी ठेठ यायावर की वह यात्रा भी क्या जिसमें जोखिम न हो। इस लिहाज़ से देखें तो यह यात्रा-वृत्तान्त दाँतों तले उँगली दबाने पर मजबूर करनेवाला है। यात्रा में संकट कम नहीं है। भूकम्प आता है, ग्लेशियर दरक उठते हैं। कई बार तो स्थानीय सहयोगी भी हताश हो जाते हैं और इसके लिए लेखक की नास्तिकता को दोष देते हैं। फिर भी यह यात्रा न केवल स्थानीय जन-जीवन के कई दुर्लभ चित्र सामने लाती है, बल्कि हज़ारों फीट ऊँचाई पर खिलनेवाले ब्रह्मकमल, नीलकमल और फेनकमल जैसे दुर्लभ फूलों के भी साक्षात् दर्शन करा देती है। लेखक बार-बार पौराणिक इतिहास में जाता है और पांडवों के स्वर्गारोहण के मार्ग के चिह्न खोजता फिरता है। श्रुति-इतिहास से मेल बिठाते हुए पांडवों का ही नहीं, कौरवों का भी इतिहास जोड़ता चलता है। इस बारे में लेखक का अपना अलग ही दृष्टिकोण है। वह ‘महाभारत’ को इतिहास नहीं मानता, लेकिन यह भी नहीं मान पाता कि उसमें सब कुछ कपोल कल्पना है। इस अर्थ में देखें तो यह किताब इतिहास का भी यात्रा-वृत्तान्त है। आश्चर्य नहीं कि रवानी और मौज सिर्फ़ लेखक के योजना-निर्माण में ही नहीं, बल्कि इस वृत्तान्त की भाषा में भी है जिसे पढ़ने का सुख किसी औपन्यासिक रोमांच से भर देता है।
Awaak : Kailash - Mansarovar : Ek Antaryatra
- Author Name:
Gagan Gill
- Book Type:

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किसी भी यात्रा में भूगोल कुछ-न-कुछ बदलता है। जगहें, चेहरे, घटनाएँ, दृश्य आदि बदलते हैं पर हर यात्रा ज़रूरी नहीं कि अन्तर्यात्रा हो। जब होती है तो हम भी साथ-साथ बदलते हैं, हमारी आन्तरिकता का भूगोल भी बदल जाता है। ऐसी यात्राओं के वृत्तान्त बिरले हैं। कवयित्री गगन गिल का यह अन्तर्यात्रा-वृत्तान्त हिन्दी में एक अनोखा दस्तावेज़ है जिसमें वृत्तान्त का टीसपन, कथा का प्रवाह और कविता की सघन आत्मीयता सब एक साथ है। उसमें स्मृतियों, संस्कारों, अन्तर्ध्वनियों, जीवन की लयों आदि सबका एक वृन्दवादन लगातार सुनाई देता है। कुछ इस तरह का भाव कि सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, प्रतिकृत और झंकृत है।
इस अन्तर्यात्रा में अनेक व्यक्ति आते-जाते हैं, उनकी छवियाँ, उक्तियाँ, संवाद, भंगिमाएँ और क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ बेहद संवेदनशीलता से अपनी समूची चित्रमयता में उकेरी गई हैं। कैलाश-मानसरोवर जाते और वहाँ से लौटते मानो एक तरह की कथायात्रा भी चलती रहती है। प्रकृति, मनुष्य, हिमालय, ठंड, झीलें, नदियाँ, जल, वायु आदि सब एक निरन्तर प्रवाह में हैं, कभी आकस्मिक, कभी अप्रत्याशित, कभी रहस्यमय, कभी कुतूहल उपजाते, कभी नीरव, कभी घोर विस्मय में डालते लोग, घटनाएँ, दृश्य आदि हमें चुपचाप अनुभव और भावनाओं के एक ऐसे भौतिक देश और अन्तर्देश में ले जाते हैं जिनमें हममें से अधिकतर, शायद ही पहले कभी गये हों।
यह अनूठा गद्य है जिसमें गद्य और कविता, वृत्तान्त और चिन्तन के पारम्परिक द्वैत झर गये हैं और जिसमें होने की, मनुष्य होने के रहस्य और विस्मय का निर्मल आलोक, अपनी कई मोहक रंगतों में आर-पार फैला हुआ है।
—अशोक वाजपेयी
Ek Baar Ayowa
- Author Name:
Manglesh Dabral
- Book Type:

- Description: हमारे समय के प्रमुख कवि मंगलेश डबराल की यह यात्रा-पुस्तक केवल यात्रा-वृतान्त नहीं है; यह एक कैनवस की तरह है जिसमें हमें अमेरिका दीखता है, उस चीरफाड़ के साथ जिसे यात्रा करते हुए कवि ने अपने ढंग से, अंजाम दिया—शायद अमेरिका को कुछ ज़्यादा अच्छे ढंग से समझने के लिए ही। इसमें वह आतंक नहीं है जो वर्तमान अमेरिका जैसे लगभग मिथक बन चुके देश में भारत के एक संवेदी मन को हो सकता था, नएपन का अहसास जरूर है; जिस पर लेखक ने कई जगह ख़ास जोर भी दिया है। एक अच्छे गद्य के अलावा यह पुस्तक हमें अमेरिका के बारे में, उसके दैनिक जीवन, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण के बारे में कुछ प्रामाणिक सूचनाएँ भी देती है।
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