Parampara, Itihas Bodh Aur Sanskriti
(0)
Author:
Shyamacharan DubePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
495
396 (20% off)
Available
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समसामयिक संवाद में परम्परा एक केन्द्रीय बिन्दु बन गई है। संस्कृति की पुनर्रचना, राजनीतिकरण और सैनिकीकरण व्यवस्था के लिए गम्भीर प्रश्न और भविष्य के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। इतिहास-बोध का मिथकीकरण अनेक वैचारिक विकृतियाँ उत्पन्न कर रहा है। साहित्य और संचार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से परम्परा, संस्कृति और इतिहास-बोध से जुड़े हैं। इस पुस्तक में संकलित भाषण और लेख इन समस्याओं पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हैं।
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समसामयिक संवाद में परम्परा एक केन्द्रीय बिन्दु बन गई है। संस्कृति की पुनर्रचना, राजनीतिकरण और सैनिकीकरण व्यवस्था के लिए गम्भीर प्रश्न और भविष्य के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। इतिहास-बोध का मिथकीकरण अनेक वैचारिक विकृतियाँ उत्पन्न कर रहा है। साहित्य और संचार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से परम्परा, संस्कृति और इतिहास-बोध से जुड़े हैं। इस पुस्तक में संकलित भाषण और लेख इन समस्याओं पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हैं।
Book Details
-
ISBN9788171195466
-
Pages167
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
हिन्दी राष्ट्रवाद भारत की भाषाई राजनीति की एक चिंताकुल और सघन पड़ताल है, और यह पड़ताल होती है हिन्दी भाषा के मौजूदा स्वरूप तक आने के इतिहास के विश्लेषण के साथ।
जन की भाषा बनने की हिन्दी की तमाम क्षमताओं को स्वीकारते हुए किताब का ज़ोर यह समझने पर है कि वह हिन्दी जो अपनी अनेक बोलियों और उर्दू के साथ मिलकर इतनी रचनात्मक, सम्प्रेषणीय, गतिशीला और जनप्रिय होती थी, कैसे उच्च वर्ण हिन्दू समाज और सरकारी ठस्सपन के चलते इतनी औपचारिक और बनावटी हो गई कि तक़रीबन स्पन्दनहीन दिखाई पड़ती है! विशाल हिन्दीभाषी समुदाय की सृजनात्मक कल्पनाओं की वाहक बनने के बजाय वह संकीर्णताओं से क्यों घिर गयी! हिन्दुत्व की सवर्ण राजनीति की इसमें क्या भूमिका रही है, और स्वयं हिन्दीवालों ने अपनी कूपमंडूकता से उसमें क्या सहयोग किया है!
आज जब राष्ट्रवादी आग्रहों के और भी संकुचित और आक्रामक रूप हमारे सामने हैं, जिनमें भाषा के शुद्धिकरण की माँग भी बीच-बीच में सुनाई पड़ती है, इस विमर्श को पढ़ना, और हिन्दी के इतिहास की इस व्याख्या से गुज़रना ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।
मूलत: अंग्रेज़ी में लिखित और बड़े पैमाने पर चर्चित इस किताब का यह अनुवाद स्वयं लेखक ने किया है, इसलिए स्वभावत: यह सिर्फ़ अनुवाद नहीं, मूल की पुनर्रचना है।
साथ ही पुस्तक में प्रस्तावित विमर्श की अहमियत को रेखांकित करने और उसे आज के संदर्भों से जोड़ने के मक़सद से समकालीन हिन्दी विद्वानों के दो आलेख भी शामिल किए गए है और लेखक से दो साक्षात्कार भी हैं जो इसके पाठकीय मूल्य को द्विगुणित कर देते हैं।
Gita Sabhi Ke Liye
- Author Name:
Vinay Patrale
- Book Type:

- Description: गीता भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। इसमें अत्यंत प्रभावशाली ढंग से दैनंदिन जीवन से जुड़े बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है। यह संपूर्ण मानव जाति के उद्धार के लिए है। इसका अध्ययन करने से हम अपने जीवन के किसी भी प्रकार के कष्ट और समस्याओं का समाधान ढूँढ़ सकते हैं। यह चरित्र-निर्माण का सबसे व्यावहारिक और उत्तम शास्त्र है। गीता जीवन की यात्रा पर निकलते समय साथ रखने का कलेवा है। बच्चे की उँगली पकड़कर उसे स्कूल में ले जानेवाली माता गीता है। यह पुस्तक जनसाधारण को गीता क्या बताती है, इसे समझाने के लिए लिखी गई है। गीतावाचन पुण्य प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु इसके संदेश को जीवन में उतारने का माध्यम है। श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान-सागर में से कुछ सूत्ररत्न चुनकर उन्हें सरल-सुबोध भाषा में प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है यह पुस्तक। बच्चे-बड़े-स्त्री-पुरुष—सबके लिए समान रूप से उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है भगवद्गीता। इसका नियमित अध्ययन आपको जीवन के पथ पर मर्यादित ढंग से सफलतापूर्वक चलने के सूत्र बताएगी।
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