Sampurna Kahaniyan : Mridula Garg
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Author:
Mridula GargPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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मृदुला गर्ग ने लगभग आधी सदी से अपनी निरंतर ऊर्जस्वित रचनात्मकता के कारण, हिन्दी कथा-साहित्य में अनोखा मुक़ाम हासिल किया है। जीवन के किसी एक पहलू तक ही सीमित रहने के बजाय उन्होंने कथ्य और शिल्प दोनों में लगातार नवोन्मेष किए हैं। ये नवोन्मेष सायास साधी गई और प्रदर्शनप्रिय चमत्कारिकता के रूप में नहीं हैं। ये तो सहज विकास के तौर उनके विषयों के चुनाव और निर्वाह में रच-बस गए हैं। आरंभिक दौर में लिखी गई कितनी क़ैदें और 2014 में लिखी गई सितम के फ़नकार को साथ-साथ पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।</p> <p>स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर केन्द्रित कहानियाँ हों या अन्य सम्बन्धों और सरोकारों पर केन्द्रित; मृदुला गर्ग की कहानियों में मन के भीतर और बाहर का संवाद निरंतर लक्ष्य किया जा सकता है। उनकी बहुचर्चित बोल्डनेस केवल स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की जटिलता के अनुसंधान तक सीमित नहीं, बल्कि “अपनी मौत के लिए वक़्त और जगह ख़ुद चुनने” तक व्याप्त है। उनकी कहानियों में जीवन का उत्सव है तो इसकी अनिवार्य परिणति का सहज स्वीकार भी। किसी एक पल में किए गए छोटे से काम के अप्रत्याशित रूप से विडंबनापूर्ण परिणामों की पुनर्रचना है तो बदलते सामाजिक पर्यावरण की परिणतियों का अनुसंधान भी।</p> <p>मृदुला गर्ग की कहानियों में भौगोलिक विस्तार, वर्गीय विविधता और तरह-तरह के पात्रों से मुखामुखम तो है ही कहानी के लिए चुने गए विषयों, पात्रों और स्थितियों और उन्हें कहने के ढंग में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नवोन्मेष भी हैं। ऐसे नवोन्मेष सघन संवेदना, सूक्ष्म विडम्बना बोध और प्रखर विचारशीलता के ही कारण सम्भव हो पाते हैं। अनोखी बात यह कि इन विशेषताओं का अहसास पाठक के मन में लगभग नामालूम सहजता के साथ उतरता चला जाता है।</p> <p>हिन्दी कथा-संसार को समृद्ध करने वाला यह अनोखापन ही मृदुला गर्ग के लेखन की विशिष्ट पहचान है।</p> <p>—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Read moreAbout the Book
मृदुला गर्ग ने लगभग आधी सदी से अपनी निरंतर ऊर्जस्वित रचनात्मकता के कारण, हिन्दी कथा-साहित्य में अनोखा मुक़ाम हासिल किया है। जीवन के किसी एक पहलू तक ही सीमित रहने के बजाय उन्होंने कथ्य और शिल्प दोनों में लगातार नवोन्मेष किए हैं। ये नवोन्मेष सायास साधी गई और प्रदर्शनप्रिय चमत्कारिकता के रूप में नहीं हैं। ये तो सहज विकास के तौर उनके विषयों के चुनाव और निर्वाह में रच-बस गए हैं। आरंभिक दौर में लिखी गई कितनी क़ैदें और 2014 में लिखी गई सितम के फ़नकार को साथ-साथ पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।</p>
<p>स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर केन्द्रित कहानियाँ हों या अन्य सम्बन्धों और सरोकारों पर केन्द्रित; मृदुला गर्ग की कहानियों में मन के भीतर और बाहर का संवाद निरंतर लक्ष्य किया जा सकता है। उनकी बहुचर्चित बोल्डनेस केवल स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की जटिलता के अनुसंधान तक सीमित नहीं, बल्कि “अपनी मौत के लिए वक़्त और जगह ख़ुद चुनने” तक व्याप्त है। उनकी कहानियों में जीवन का उत्सव है तो इसकी अनिवार्य परिणति का सहज स्वीकार भी। किसी एक पल में किए गए छोटे से काम के अप्रत्याशित रूप से विडंबनापूर्ण परिणामों की पुनर्रचना है तो बदलते सामाजिक पर्यावरण की परिणतियों का अनुसंधान भी।</p>
<p>मृदुला गर्ग की कहानियों में भौगोलिक विस्तार, वर्गीय विविधता और तरह-तरह के पात्रों से मुखामुखम तो है ही कहानी के लिए चुने गए विषयों, पात्रों और स्थितियों और उन्हें कहने के ढंग में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नवोन्मेष भी हैं। ऐसे नवोन्मेष सघन संवेदना, सूक्ष्म विडम्बना बोध और प्रखर विचारशीलता के ही कारण सम्भव हो पाते हैं। अनोखी बात यह कि इन विशेषताओं का अहसास पाठक के मन में लगभग नामालूम सहजता के साथ उतरता चला जाता है।</p>
<p>हिन्दी कथा-संसार को समृद्ध करने वाला यह अनोखापन ही मृदुला गर्ग के लेखन की विशिष्ट पहचान है।</p>
<p>—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Book Details
-
ISBN9789392757044
-
Pages720
-
Avg Reading Time24 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: पहले विश्वयुद्ध के बाद जब पूर्वी एशिया के अनेक देश स्वतंत्र होने के बावजूद प्रतिगामी रास्तों पर मुड़ गए, उस समय भी चेकोस्लोवाकिया ने अपनी लोकतांत्रिक और मानववादी मनोभूमि को सुरक्षित बनाए रखा। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग यहूदी विद्वानों, जर्मन लेखकों और रूसी क्रान्तिकारियों की शरण-स्थली बन गई थी। प्राग की अनूठी गरिमा और संवेदनशीलता ने वहाँ बसने वाले जर्मन और यहूदी लेखकों की मनीषा को एक बिरले रंग और लय में ढाला था। निर्मल वर्मा ने अपने युवा वर्ष प्राग में गुज़ारे थे। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज के निमन्त्रण पर वहाँ रहकर न केवल चेक भाषा सीखी, बल्कि तत्कालीन चेक साहित्य से हिन्दी जगत को सीधे परिचित करवाया। उन्हीं की पहल पर चेक साहित्य के मूर्धन्य लेखकों—कारेल चापेक, बोहुमिल हराबाल—के अलावा तब के युवा लेखकों, मिलान कुन्देरा और जोसेफ़ श्कवोरस्की की रचनाएँ हिन्दी में आईं, वह भी उस समय जब यूरोप में भी वे अभी अल्पज्ञात ही थे। यही इस संग्रह की ऐतिहासिक भूमिका है।
Jalti Jhadi
- Author Name:
Nirmal Verma
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Description:
नामवर सिंह के शब्दों में ‘...निर्मल ने यथार्थ की सीमा पार करने की कोशिश की है। उन्होंने तात्कालिक वर्तमान का अतिक्रमण करना चाहा है, कहानी-कला के दायरे से भी बाहर निकलने की कोशिश की है। यहाँ तक कि शब्द की अभेद्य दीवार को लाँघकर शब्द के पहले के ‘मौन जगत’ में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है।’
मनुष्य के भीतर अवस्थित इस मौन को पकड़ने का प्रयास बार-बार निर्मल जी की कहानियों में दिखाई देता है जिसे वे जीवन के बीचोबीच ही सम्भव करते हैं। जीवन के भावनात्मक जोख़िम से भरे इलाक़ों में मनुष्य की सघन और सूक्ष्म अनुभूतियों को प्रकाशित करनेवाली इस संग्रह की कहानियाँ अकेलेपन, अवसाद, अजनबीयत और आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं का अन्वेषण दुर्लभ चित्रात्मकता और प्रामाणिकता के साथ करती हैं।
सन् 1965 में पहली बार प्रकाशित इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ यूरोप की पृष्ठभूमि में लिखी गई हैं जिनमें ‘लन्दन की एक रात’, ‘अन्तर’ और ‘जलती झाड़ी’ जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ भी शामिल हैं।
इसी संग्रह में ‘माया दर्पण’ शीर्षक कहानी भी है जिस पर समानान्तर सिनेमा के चर्चित निर्देशक कुमार शाहनी ने इसी नाम से फ़िल्म बनाई थी जिसे 1973 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
Sandigdh
- Author Name:
Tejendra Sharma
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- Book Type:


- Description: पंद्रह बेहतरीन कहानियों का संग्रह।
Ka : Bhartiya Manas Aur Devataon Ki Kahaniyan
- Author Name:
Roberto Calasso
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Description:
एक अद्भुत, रोमांचक और रहस्यपूर्ण यात्रा से अभी-अभी लौटा हूँ। सिर घूम रहा है— कुछ भी स्थिर नहीं। मैं उस विचित्र विचार-यात्रा के अनुभव आप सबके साथ बाँटना चाहता हूँ। एक में अनेक मानस यात्राएँ, लेकिन ज़रा ठहरिए, अभी-अभी जान पाया हूँ कि जिस अद्भुत यात्रा की बात कर रहा हूँ, वह तो शुरू ही नहीं हुई अभी तक। बस मन में कामना जगी है। और मैं इसी को यात्रा का आरम्भ और अन्त मान बैठा। सब गड्ड-मड्ड हो रहा है। प्रस्थान बिन्दु ही गन्तव्य है, और जिसे मैं गन्तव्य कह रहा हूँ, वही तो आरम्भ था। कोई आरम्भ प्रथम नहीं, क्योंकि वह दूसरा है, अन्त में से निकला है। जो नया है वह पिछले अन्त के अवशेष-शेष पर टिका है और अन्त भी अन्तिम सलिए नहीं कि वही आरम्भ है। मैं हूँ लेकिन नहीं भी हूँ। मेरा होना मेरे न होने में समाया है।
कहते हैं बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। बोधिसत्व बुद्धत्व प्राप्त कर अन्तिम बार जीवन-मरण के चक्र से निकलकर परे चले गए थे। लेकिन हम तक तो बुद्ध अपने अवशेष-आनन्द पर आधारित रहकर ही पहुँचे थे। यदि आनन्द न होते तो क्या हम बुद्ध के विचारों से इस तरह परिचित हो पाते? यही बात मैं इटली के भारत प्रेमी विद्वान श्री रॉबर्तो कलासो के बारे में कहना चाहता हूँ। संक्षेप में कहूँ तो कलासो के माध्यम से ही मैंने जटिल पुरातन भारतीय विचार-दर्शन को कथारस की लपेटन में पहली बार स्पर्श किया है। उसे पूरी तरह समझकर ग्रहण करने की परम स्थिति अभी दूर है। निर्वाण से पहले अनेक बार बोधिसत्व बनना होगा। प्रायः ही मेरे जैसे सामान्यजनों की दृष्टि अपने अतीत में पुराणों तक ही पहुँच पाती है। प्रागैतिहासिक वैदिक काल पवित्र अज्ञान की तरह है जिसे दूर से ही प्रणाम किया जा सकता है। पहले मन था, फिर विचार आया, विचार में से दूसरा विचार। सागर में लहर पर लहर की तरह जो तब से आज तक लगातार उठती जा रही हैं। और यह क्रम थमने वाला नहीं, अनन्त काल तक चलता जाएगा, उन चक्रीय कथाओं की तरह जो अश्वमेध के घोड़े के बलिस्थल पर लौटने की प्रतीक्षा में दस दिन के अन्तराल पर अपने को दोहराती चली जाती थीं।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसी अनुभूति होती है मानो मैं एक चक्करदार झूले पर घूमता जा रहा हूँ। जो पहले था वही बार-बार दिखाई दे रहा है। आर्यों को ऐसा ही लगा था भारत-भूमि पर आगे बढ़ते हुए। न जाने क्यों ऐसा लगता था, जो नष्ट किया था, वही फिर से सामने प्रकट हो गया है और फिर ऐसा बार-बार होने लगा। वे चकित-चमत्कृत थे। फिर एक समय ऐसा आया, जब भारतीय विचार-दर्शन और जटिल कर्मकांडीय संयोजन की जटिलता ने मन को क्लान्त कर दिया। लोग चाहने लगे—गुनगुने सर्द मौसम में मद्धिम अलाव के चारों ओर बैठकर केवल रस-भरी कथाएँ सुनें और कुछ न करें। धीरे-धीरे यही क्रम चल निकला। जो कथाएँ संकोच से कर्मकांडीय अन्तराल के बीच चुपचाप सिमटकर आ बैठी थीं, वही प्रमुख हो गईं। अतीत के कर्मकांडीय सन्दर्भ कथा-विवरणों में ढल गए। इस पुस्तक के संयोजन में भी यही शैली अपनाई गई है। बात बिन्दु से उभरती है, विचार में ढलती है, विचार प्रक्रिया एक आवेशित, प्रचंड प्रवाह का रूप ले लेती है—लहरें इतनी ऊँची उठती हैं कि मन व्याकुल हो उठता है। और तभी कलासो कथा कहने लगते हैं। क़िस्सागोई का यह अन्दाज़ विचार-प्रवाह की गुरुता को कम नहीं करता उसे कहीं अधिक ग्राह्य बनाता है हम सभी के लिए।
श्री रॉबर्तो कलासो को बधाई। और उन जैसे भारत-प्रेमी विद्वान को जन्म देने के लिए इटली को धन्यवाद।—देवेन्द्र कुमार
Barik Baat
- Author Name:
Ramswarup Kisan +1
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- Description: बारीक बात पुरस्कृत राजस्थानी कहानी-संग्रह बारीक बात का हिन्दी अनुवाद है। इस संग्रह की कहानियाँ राजस्थानी साहित्य की विशिष्ट चेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए लोक संस्कृति और आधुनिकता के द्वन्द को चिह्नित करती है और नये साहित्यिक प्रतिमान स्थापित करने के लिए आगे बढ़ती है। लेखक ने प्रयोगात्मक, अपरंपरागत कहानी कहने की कला एवं मुहावरेदार भाषा के उत्कृष्ट उपयोग ने कहानियों को श्रेष्ठ बना दिया है।
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