Manushya Hone Ke Sansmaran
(0)
Author:
Devi Prasad MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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‘मनुष्य होने के संस्मरण’ की नवोन्मुख कथा प्रविधि जिसे देवी प्रसाद मिश्र अन्य कथा कहते हैं भारतीय ही नहीं विश्व साहित्य में आधुनिक फ़ेबल की वस्तु, संरचना और फैंटेसी को पाती दिखती है। यह समकालिक क़िस्सा है—संस्तरवान और तिर्यक। ये बहुत छोटी कहानियाँ हिन्दी की लघु कथा के सरलीकरण से बचकर अपनी ज़ेहनियत पाती रही हैं। खंड-खंड यातनाओं, प्रफुल्लताओं, और प्रतिरोध को अवाँगार्दीय अनुच्छेदों में कहने की अनिवार्यता, दबाव और ज़रूरत से इनकार किया जा सकता है क्या? इन छोटी कहानियों में कथात्मकता के पार जाता और फिर उनकी तरफ़ लौटता एक उड़ाउड़ापन है—कुछ काव्य, कुछ दार्शनिकता, कुछ मेटाफ़िज़िक्स जो काव्याख्यान-सा लगता है। कविता के साथ इन कथाओं के गहरे रिश्तों को झुठलाया नहीं जा सकता। ये कविता हैं तो कथा भी हैं और इसीलिए ये अन्य कथाएँ हैं। इन्हें एक ऐसे छोर से संगठित किया गया है जिसमें कथा कहने की स्वतन्त्रता हो लेकिन अन्तत: ग्रहण करें वे काव्याकार। ये कमतमता का उदाहरण हैं—मिनिमलिज़्म की मिसाल। अन्तर्वस्तु के बिखराव को खुलते हुए शिल्प में कह लेना इनकी उपलब्धि है। यह काव्योन्मुख फ़ेबलीय लोककथात्मक संरचना नयी वस्तु और विन्यास का आश्चर्यसंसार है जो प्रखर रूप से मौलिक और कृतिकारिता का अभूतपूर्व और उच्चतम है।
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‘मनुष्य होने के संस्मरण’ की नवोन्मुख कथा प्रविधि जिसे देवी प्रसाद मिश्र अन्य कथा कहते हैं भारतीय ही नहीं विश्व साहित्य में आधुनिक फ़ेबल की वस्तु, संरचना और फैंटेसी को पाती दिखती है। यह समकालिक क़िस्सा है—संस्तरवान और तिर्यक। ये बहुत छोटी कहानियाँ हिन्दी की लघु कथा के सरलीकरण से बचकर अपनी ज़ेहनियत पाती रही हैं। खंड-खंड यातनाओं, प्रफुल्लताओं, और प्रतिरोध को अवाँगार्दीय अनुच्छेदों में कहने की अनिवार्यता, दबाव और ज़रूरत से इनकार किया जा सकता है क्या? इन छोटी कहानियों में कथात्मकता के पार जाता और फिर उनकी तरफ़ लौटता एक उड़ाउड़ापन है—कुछ काव्य, कुछ दार्शनिकता, कुछ मेटाफ़िज़िक्स जो काव्याख्यान-सा लगता है। कविता के साथ इन कथाओं के गहरे रिश्तों को झुठलाया नहीं जा सकता। ये कविता हैं तो कथा भी हैं और इसीलिए ये अन्य कथाएँ हैं। इन्हें एक ऐसे छोर से संगठित किया गया है जिसमें कथा कहने की स्वतन्त्रता हो लेकिन अन्तत: ग्रहण करें वे काव्याकार। ये कमतमता का उदाहरण हैं—मिनिमलिज़्म की मिसाल। अन्तर्वस्तु के बिखराव को खुलते हुए शिल्प में कह लेना इनकी उपलब्धि है। यह काव्योन्मुख फ़ेबलीय लोककथात्मक संरचना नयी वस्तु और विन्यास का आश्चर्यसंसार है जो प्रखर रूप से मौलिक और कृतिकारिता का अभूतपूर्व और उच्चतम है।
Book Details
-
ISBN9789394902848
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
परम्पराएँ, किंवदन्तियाँ और भ्रामक प्रचलित विचारों से मुक्ति दिलाकर समाज को जागरूक, चेतनासम्पन्न और प्रगतिशील धारा से जोड़नेवाला कहानी-संकलन। इस संकलन की हर कहानी की विषयवस्तु का अपना एक धरातल है और हर कहानी अनुभव का एक नया संसार खोलती है। संकलन की कहानियाँ नई दृष्टि, नई सोच को ही प्रतिष्ठापित नहीं करती हैं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी देती हैं। कहानियों के पात्र आम जीवन से उठाए गए हैं जो साधारण जीवन जीते हैं और बहुत से मानदंडों और निषेधों से मुक्त भी
हैं।लेखक ने इनके साथ सदियों से हो रहे जुल्म और अन्याय को भी रेखांकित किया है जो वे सदियों से झेल रहे हैं और उनके लिए एक समतामूलक समाज की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। लेखक ने कहानियों को लोकभाषा से अलंकृत कर पात्रों को जीवन्त ही नहीं किया, बल्कि उनकी मर्मभेदी पीड़ा को संवेदनशील अभिव्यक्ति भी दी है। ये कहानियाँ सही और सच्चे अर्थों में साहित्य की उस सार्थक भूमिका का भी निर्वाह करती हैं जिसके तहत साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक माना जाता है। समाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराते हुए, वर्तमान समाज को बदलने का आह्वान करते हुए सघन संवेदना के धरातल पर सृजित की गई ये कहानियाँ कुरीतियों को पोषित करनेवाले रूढ़िवादी समाज के लिए एक संकेत भी हैं कि अब परिवर्तन आवश्यक नहीं अनिवार्य हो चला है। पाठकगण इन कहानियों के माध्यम से एक नया अर्थ-सन्दर्भ प्राप्त करेंगे।
Chhat Par Dastak
- Author Name:
Mridula Garg
- Book Type:

-
Description:
नई कहानी के दौर के बाद जिन कथाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई, उनमें मृदुला गर्ग एक अग्रणी नाम है। पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से मृदुला जी की कहानियाँ चर्चा में रही हैं। इसकी वजहें कई हैं, मसलन, शिल्प का चमत्कार, कथ्य में नयापन, किस्सागोई का जादू, विचारों की आँच आदि...
मृदुला जी के यहाँ सम्बन्धहीनता सम्बन्ध में, मृत्यु जीवन में और जीवन परम्परा में पर्यवसित होकर सातत्य और अमरत्व प्राप्त करता है। नारी-विमर्श में ‘विश्व भगिनीवाद’ की खुशबू बिखेरती मृदुला जी की अपनी ही पहचान है जो कल भी विशिष्ट थी, आज भी विशिष्ट हैं।
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