Kuchchi Ka Kanoon
(0)
Author:
ShivmurtiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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शिवमूर्ति की कहानियों का जितना साहित्यिक महत्त्व है, उतना ही समाजशास्त्रीय भी। आप उन्हें गाँव के ‘रियलिटी चेक’ के रूप में पढ़ सकते हैं। उनमें गाँव का वह सकारात्मक पक्ष भी है जिसे हम गाँव की थाती कहते हैं और वह नकारात्मक भी जो गाँव ने पुराना होते जाने के क्रम में धीरे-धीरे अर्जित किया। यथार्थ की इस समृद्धि की ओर ध्यान तब जाता है जब हम देखते हैं कि शिवमूर्ति गाँव और उनमें बसे मनुष्यों को गहन आत्मीयता देने के बावजूद इस परिवेश में व्याप्त संकट, दुख, विषमता और विसंगति को दृष्टि-ओझल नहीं होने देते। वे वहाँ व्याप्त आत्मविनाशी प्रवृत्तियों और लोकाचार के कारकों की शिनाख़्त करते हुए उन पर प्रहार करते हैं। इस तरह शिवमूर्ति की कहानियाँ ग्रामीण समाज के जातिवाद, राजनीतिक क्षरण, धर्मभीरुता, स्त्री-दमन और ताक़त की हिंसा का प्रतिपक्ष बनती हैं।</p> <p>‘बनाना रिपब्लिक’ कहानी की उपलब्धि यह है कि वह दलित चेतना को उनकी मुक्ति की राह के रूप में सामने लाती है और पंचायत चुनाव की परिणति कैरेबियन देशों के ‘बनाना रिपब्लिक’ में रिड्यूस हो जाने की आशंका को निर्मूल कर देती है। मतदान प्रक्रिया का जैसा उत्खनन यह कहानी करती है वह देर तक स्तब्ध किए रहता है। ‘कुच्ची का क़ानून’ गाँव के गहरे कुएँ से बाहर जाते रास्ते की कहानी है जिसे कुच्ची नाम की एक युवा विधवा अपनी कोख पर अपने अधिकार की अभूतपूर्व घोषणा के साथ प्रशस्त करती है। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों में, “एक भी ऐसा समकालीन रचनाकार नहीं है जिसके पास कुच्ची जैसा सशक्त चरित्र हो। यह चरित्र निर्माण क्षमता शिवमूर्ति को बड़ा कथाकार बनाती है।’’</p> <p>‘ख़्वाजा ओ मेरे पीर!’ एक विरल-कथा है जिसमें स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के एक दारुणपक्ष को रेखांकित करते हुए उस करुणा के अविस्मरणीय बिम्ब रचे गए हैं जो नागर सभ्यता में शायद ही कहीं देखने को मिलें। संग्रह की अन्तिम कहानी ‘जुल्मी’ 1970 के आसपास लिखी गई शुरुआती रचना है। इसे इस आग्रह के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है कि पाठक देखें, उनका प्रिय कथाकार अपनी रचना-यात्रा में कहाँ से कहाँ तक पहुँचा है?</p> <p>निश्चय ही ‘कुच्ची का क़ानून’ की कहानियों से गुज़रकर आप शिवमूर्ति को सूचित करना चाहेंगे कि वे एक जन्मजात कथाकार हैं जिनके होने पर कोई भी भाषा गर्व कर सकती है।
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शिवमूर्ति की कहानियों का जितना साहित्यिक महत्त्व है, उतना ही समाजशास्त्रीय भी। आप उन्हें गाँव के ‘रियलिटी चेक’ के रूप में पढ़ सकते हैं। उनमें गाँव का वह सकारात्मक पक्ष भी है जिसे हम गाँव की थाती कहते हैं और वह नकारात्मक भी जो गाँव ने पुराना होते जाने के क्रम में धीरे-धीरे अर्जित किया। यथार्थ की इस समृद्धि की ओर ध्यान तब जाता है जब हम देखते हैं कि शिवमूर्ति गाँव और उनमें बसे मनुष्यों को गहन आत्मीयता देने के बावजूद इस परिवेश में व्याप्त संकट, दुख, विषमता और विसंगति को दृष्टि-ओझल नहीं होने देते। वे वहाँ व्याप्त आत्मविनाशी प्रवृत्तियों और लोकाचार के कारकों की शिनाख़्त करते हुए उन पर प्रहार करते हैं। इस तरह शिवमूर्ति की कहानियाँ ग्रामीण समाज के जातिवाद, राजनीतिक क्षरण, धर्मभीरुता, स्त्री-दमन और ताक़त की हिंसा का प्रतिपक्ष बनती हैं।</p>
<p>‘बनाना रिपब्लिक’ कहानी की उपलब्धि यह है कि वह दलित चेतना को उनकी मुक्ति की राह के रूप में सामने लाती है और पंचायत चुनाव की परिणति कैरेबियन देशों के ‘बनाना रिपब्लिक’ में रिड्यूस हो जाने की आशंका को निर्मूल कर देती है। मतदान प्रक्रिया का जैसा उत्खनन यह कहानी करती है वह देर तक स्तब्ध किए रहता है। ‘कुच्ची का क़ानून’ गाँव के गहरे कुएँ से बाहर जाते रास्ते की कहानी है जिसे कुच्ची नाम की एक युवा विधवा अपनी कोख पर अपने अधिकार की अभूतपूर्व घोषणा के साथ प्रशस्त करती है। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों में, “एक भी ऐसा समकालीन रचनाकार नहीं है जिसके पास कुच्ची जैसा सशक्त चरित्र हो। यह चरित्र निर्माण क्षमता शिवमूर्ति को बड़ा कथाकार बनाती है।’’</p>
<p>‘ख़्वाजा ओ मेरे पीर!’ एक विरल-कथा है जिसमें स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के एक दारुणपक्ष को रेखांकित करते हुए उस करुणा के अविस्मरणीय बिम्ब रचे गए हैं जो नागर सभ्यता में शायद ही कहीं देखने को मिलें। संग्रह की अन्तिम कहानी ‘जुल्मी’ 1970 के आसपास लिखी गई शुरुआती रचना है। इसे इस आग्रह के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है कि पाठक देखें, उनका प्रिय कथाकार अपनी रचना-यात्रा में कहाँ से कहाँ तक पहुँचा है?</p>
<p>निश्चय ही ‘कुच्ची का क़ानून’ की कहानियों से गुज़रकर आप शिवमूर्ति को सूचित करना चाहेंगे कि वे एक जन्मजात कथाकार हैं जिनके होने पर कोई भी भाषा गर्व कर सकती है।
Book Details
-
ISBN9788126729647
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में, ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है, उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर खरा जीवन—ये कुछ ऐसे मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी
है।‘उत्तमी की माँ’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘उत्तमी की माँ’, ‘नमक हराम’, ‘पतिव्रता’, ‘आत्म-अभियोग’, ‘करुणा’, ‘भगवान् के पिता के दर्शन’, ‘न कहने की बात’, ‘भगवान का खेल’, ‘करवा का व्रत’, ‘नक़ली माल’ और ‘पाप का कीचड़’।
Dharohar Kahaniyaan : Rahul Sankrityayan
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
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- Description: कौन ऐसा पाठक है जिसने एक बार प्रेमचन्द की कहानियों को पढ़ा हो और उन्हें भूल पाया हो! यह इसलिए कि हम उनकी रचनाओं को उनके देदीप्यमान, प्रखर व्यक्तित्व की लौ में देखने, ग्रहण करने लगते हैं। जहाँ उनकी रचनाएँ हमारे सामने जीवन का प्रामाणिक, जीवन्त चित्र प्रस्तुत करती हैं, सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के प्रति हमें सचेत करती हैं, वहीं वे हमारे दिल में सद्भाव जगाती हैं, हमारे मस्तिष्क को झकझोरती हैं, हमें जिन्दगी को देखने समझने का नजरिया देती हैं। —भीष्म साहनी
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