Kavve Aur Kala Pani
(0)
Author:
Nirmal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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निर्मल वर्मा ने हिन्दी कहानी को एक अत्यन्त संवेदनशील, सक्षम और पारदर्शी भाषा दी, और उसमें मनुष्य की आन्तरिक रिक्तियों को दृश्यमान किया। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ सिर्फ़ पाठकीय अनुभव तक सीमित नहीं रहतीं, हमारे लिए वे एक समूचा मानवीय अनुभव हो जाती हैं—देर तक साथ रहनेवाला एक समूचा अनुभव।</p> <p>साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) से सम्मानित ‘कव्वे और काला पानी’ (1983) में उनकी सात कहानियाँ शामिल हैं। इनमें से कुछ कहानियों की पृष्ठभूमि भारतीय है तो कुछ कहानियाँ हमें यूरोपीय ज़मीन की उदासियों से परिचित कराती हैं। यह निर्मल जी की संवेदना का समूचापन ही है कि इससे पाठक की अनुभूति कहीं विभाजित नहीं होती। मानवीय पीड़ा का स्वर कहीं दो-फाँक नहीं होता।</p> <p>मानव-सम्बन्धों में आज जो एक ठहराव, ठंडापन, उदासी, बेचारगी और व्यर्थता बोध है, वह इन कहानियों के माध्यम से हमें गहरे तक झकझोरता है और हमें उन अनुभवों तक ले जाता है, जो एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। घटनाएँ इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि वह परिवेश जो इन कहानियों की पंक्तियों से उठकर हमारे भीतर चला आता है। हर कहानी एक गूँज की तरह कहीं भीतर ठहर जाती है।</p> <p>इस संग्रह में शामिल प्रत्येक कहानी ने अपने समय में व्यापक प्रतिक्रियाओं और अकसर बहसों को भी जन्म दिया। अपनी कलात्मकता में वे आज भी उतनी ही नई हैं।
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निर्मल वर्मा ने हिन्दी कहानी को एक अत्यन्त संवेदनशील, सक्षम और पारदर्शी भाषा दी, और उसमें मनुष्य की आन्तरिक रिक्तियों को दृश्यमान किया। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ सिर्फ़ पाठकीय अनुभव तक सीमित नहीं रहतीं, हमारे लिए वे एक समूचा मानवीय अनुभव हो जाती हैं—देर तक साथ रहनेवाला एक समूचा अनुभव।</p>
<p>साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) से सम्मानित ‘कव्वे और काला पानी’ (1983) में उनकी सात कहानियाँ शामिल हैं। इनमें से कुछ कहानियों की पृष्ठभूमि भारतीय है तो कुछ कहानियाँ हमें यूरोपीय ज़मीन की उदासियों से परिचित कराती हैं। यह निर्मल जी की संवेदना का समूचापन ही है कि इससे पाठक की अनुभूति कहीं विभाजित नहीं होती। मानवीय पीड़ा का स्वर कहीं दो-फाँक नहीं होता।</p>
<p>मानव-सम्बन्धों में आज जो एक ठहराव, ठंडापन, उदासी, बेचारगी और व्यर्थता बोध है, वह इन कहानियों के माध्यम से हमें गहरे तक झकझोरता है और हमें उन अनुभवों तक ले जाता है, जो एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। घटनाएँ इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि वह परिवेश जो इन कहानियों की पंक्तियों से उठकर हमारे भीतर चला आता है। हर कहानी एक गूँज की तरह कहीं भीतर ठहर जाती है।</p>
<p>इस संग्रह में शामिल प्रत्येक कहानी ने अपने समय में व्यापक प्रतिक्रियाओं और अकसर बहसों को भी जन्म दिया। अपनी कलात्मकता में वे आज भी उतनी ही नई हैं।
Book Details
-
ISBN9789360869090
-
Pages216
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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क्षमा शर्मा हिन्दी लेखकों की आम आदत के विपरीत अपेक्षया छोटी कहानियाँ लिखती हैं जो अपने आप में सुखद हैं। उनकी लगभग हर कहानी स्त्री-पात्र के आसपास घूमती ज़रूर है मगर क्षमा शर्मा उस किस्म के स्त्रीवाद का शिकार नहीं हैं जिसमें स्त्री की समस्याओं के सारे हल सरलतापूर्वक पुरुष को गाली देकर ढूँढ़ लिए जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वह पुरुषों या पुरुष वर्चस्ववाद को बख़्शती हैं, उसकी मलामत वे ज़रूर करती हैं और ख़ूब करती हैं, मगर उनकी तमाम कहानियों से यह स्पष्ट है कि उनके एजेंडे में स्त्री की तकलीफ़ें, उसके संघर्ष और हिम्मत से स्थितियों का मुक़ाबला करने की उसकी ताक़त को उभारना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है।
वह इस मिथ को तोड़ती हैं कि सौतेली माँ, असली माँ से हर हालत में कम होती है या एक विधुर बूढ़े के साथ एक युवा स्त्री के सम्बन्धों में वह प्यार और चिन्ता नहीं हो सकती, जो कि समान वय के पुरुष के साथ होती है। वह देह पर स्त्री के अधिकार की वकालत करती हैं और किसी विशेष परिस्थिति में उसे बेचकर कमाने के विरुद्ध कोई नैतिकतावादी रवैया नहीं अपनातीं। उनकी कहानियों में लड़कियाँ हैं तो बूढ़ी औरतें भी हैं, दमन की शिकार वे औरतें हैं जो एक दिन चुपचाप मर जाती हैं तो वे भी हैं जो कि लगातार संघर्ष करती हैं लेकिन स्त्री की दुनिया के अनेक रूपों को हमारे सामने रखनेवाली ये कहानियाँ किसी और दुनिया की कहानियाँ नहीं लगतीं, हमारी अपनी इसी दुनिया की लगती हैं बल्कि लगती ही नहीं, हैं
भी।इनके पात्र हमारे आसपास, हमारे अपने घरों में मिलते हैं। बस हमारी कठिनाई यह है कि हम उन्हें इस तरह देखना नहीं चाहते, देख नहीं पाते, जिस प्रकार क्षमा शर्मा हमें दिखाती हैं और एक बार जब हम उन्हें इस तरह देखना सीख जाते हैं तो फिर वे एक अलग व्यक्ति, एक अलग शख़्सियत नज़र आती हैं और हम स्त्री के बारे में सामान्य क़िस्म की उन सरल अवधारणाओं से जूझने लगते हैं जिन्हें हमने बचपन से अब तक प्रयत्नपूर्वक पाला है, संस्कारित किया है। क्षमा शर्मा की कहानियों की यह सबसे बड़ी ताक़त है, उनकी भाषा और शैली की पुख़्तगी के अलावा।
When Ravens Speak and Horses Fly
- Author Name:
Mona Lisa Jena
- Rating:
- Book Type:

- Description: When Ravens Speak and Horses Fly: Odia folktales in this book have been retold by Mona Lisa Jena, author, poet and translator. They have been chosen for their diverse cultural significance. Odisha is an ancient civilization. Oral literature flourished in the form of folk literature, by women, sowing the seeds of a literary tradition of individualism. Folk elements lived and continue to live in villages, which are yet to undergo urbanization. The more inaccessible and unaffected the land, the stronger its folk elements. Odia folktales revolved around seafarers, kings and princes, princesses and village idylls, and yet-to-be explored tribal tales. The tribals wove stories about the creation of the world, gods, and totems like how the sun and moon came into being, and how the tallest hill in the village was the tutelary deity with the most power. Rural tales included trees, animals and birds, with the addition of magic, witchcraft and ghosts. All these makes the folktales irresistible.
Gyangarh ki Ladai
- Author Name:
Balraj Pandey
- Book Type:

- Description: Collection of Short Stories
Saat Paise Tatha Anya Hugarian Kahaniyan
- Author Name:
Moriez Zsigmond
- Book Type:

-
Description:
विख्यात हंगेरियन कथाकार मोरित्स जिग्मोन्द ने भारतीय ग्रामीण जीवन पर केन्द्रित एक वृत्तचित्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने उपन्यास ‘रोजा शान्दोर अपने घोड़े को कुदाता है’ में लिखा था :
‘‘कल शाम को न्यूज़ सिनेमा में मैंने भारतीय लोगों का जीवन देखा। ऐसा लगा जैसे मैंने वही दृश्य देखा हो। घर में बनाए और सिले ढीले कपड़े पहनी औरतें, अधनंगे युवा और पूरी तरह नंगे बच्चे। ये सब बड़ी संख्या में साथ–साथ, धूप से बचने की कोशिश करते हुए, एक बड़े नारियल के पेड़ की छाया में लेटे थे। गंगा नदी में चलती नावों की छतें वैसी ही हैं जैसी हंगेरियन गाँवों की घोड़ा–गाड़ियों की छतें होती हैं। ये लोग उसी में जीवन बिता देते हैं। इसी तरह लगभग सौ साल पहले हंगेरियन दास रहते थे—नंगे पाँव; जैसे भारतीय अछूत। किसी के पाँव में चमड़े का जूता नहीं है। मुझे आश्चर्य हुआ कि ये लोग हंगेरियन जनता से कितने मिलते–जुलते हैं। इनके आचार–व्यवहार और भाव–भंगिमाएँ ऐसी थीं कि मुझे लगा कि मैं शायद बचपन के अपने भाइयों को देख रहा हूँ। मैंने अपनी माँ को भी पहचान लिया। अन्तर केवल इतना था कि हंगेरी में नाक की नथ कभी लोकप्रिय न थी।’’
भारतीय ग्रामीण जीवन के प्रति मोरित्स जिग्मोन्द की संवेदना दरअसल न केवल उनके साहित्य में व्यक्त हंगेरियन ग्रामीण जीवन का विस्तार है, बल्कि मोरित्स की सार्वभौमिकता की भी द्योतक है। मोरित्स की लगभग सभी कहानियाँ हंगेरियन जीवन पर आधारित हैं, लेकिन उनकी महान प्रतिभा ने बहुत व्यापक पाठक वर्ग का ध्यान आकर्षित किया है। संसार की सभी प्रमुख भाषाओं में अनूदित होकर उनकी रचनाएँ विश्व साहित्य की धरोहर बन चुकी हैं।
हिन्दी में मोरित्स की प्रसिद्ध कहानियों के इक्का–दुक्का अनुवाद मौजूद हैं। लेकिन ये सब अनुवाद अंग्रेज़ी के माध्यम से किए गए हैं। हंगेरियन और अंग्रेज़ी भाषा के बीच जो दूरी है, वैसी हिन्दी और हंगेरियन में नहीं है। इसका एक कारण हंगेरियन समाज और संस्कृति का ग्रामीणोन्मुखी होना है। हंगेरी के ग्रामीण जीवन की भाषा में ऐसे शब्दों की कमी नहीं है जिनके बहुत सटीक पर्याय हिन्दी में हैं। मोरित्स जिग्मोन्द की कहानियाँ पहली बार पुस्तकाकार हिन्दी में प्रकाशित कहानियाँ हैं जो पाठकों को अपनी तो लगेंगी ही, ताउम्र साथ भी रहेंगी।
Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

- Description: समकालीन कथा-परिवेश और यथार्थवादी कथा-लेखन के सन्दर्भ में टिप्पणी करते हुए एक जगह गोविन्द मिश्र ने लिखा है कि “यथार्थवादी लेखन के इस युग में लेखक को सामाजिक विसंगतियों की यंत्रणा चित्रित करने के आगे उन बातों और चरित्रों में भी जाना होगा, जिनकी वजह से विसंगतियाँ है”, ताकि न तो मानवीय यंत्रणा के अधूरेपन का अहसास हो और न क्रान्तिकारिता के खोखलेपन का। दरअसल हिन्दी-कहानी के विभिन्न दौरों से निरपेक्ष रहते हुए जिन कथाकारों ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है, गोविन्द मिश्र उनकी पहली क़तार में आते हैं। यह संकलन उनके कई प्रकाशित कहानी-संग्रहों से उनकी महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानियों का चयन है। इन कहानियों के माध्यम से हम वर्तमान भारतीय समाज के विभिन्न चरित्रों और स्तरों से परिचित होते हैं। अपने कथा-चरित्रों के प्रति लेखक का कोई पूर्वग्रह नहीं, बल्कि वह उन्हें जीवन-स्थितियों के बीच पहचानता है। यही कारण है कि ये कहानियाँ हमें जीवन की विविधता तक ले जाती हैं और हमारे भीतर एक इन्द्रधनुषी संसार सजीव हो उठता है।
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