60 Ke Bad Ki Kahaniyan
(0)
Author:
Vijay Mohan SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
695
556 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
सन् 1965 के सितम्बर महीने में जब यह संकलन पहली बार छपकर आया, तब तक इसमें सम्मिलित 14 कहानीकारों में से किसी का भी कोई कहानी-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। सबकी तीन, चार, पाँच कहानियाँ इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में छपी थीं। इस 'यूथ ब्रिगेड' की संरचना का आइडिया श्री (स्व.) विजयमोहन सिंह के दिमाग़ की उपज था। इसे साकार करने का सारा श्रेय उन्हीं को जाता है! मोटा-मोटी 15 से 20 बिल्कुल नए और लगभग अनछपे कहानीकारों से पत्र-व्यवहार और अनुमति लेकर (और कुछ की अनुमति न मिलने के कारण) उन्होंने हर कहानीकार की दो-दो कहानियों के साथ इस संग्रह की योजना को रूप दिया। आश्चर्यजनक रूप से इन कथाकारों में उन्होंने कुछ ऐसे प्वाइंट्स ढूँढ़ निकाले, जो पूर्ववर्ती कथा-रचना से इन्हें अलग करते थे। वह मुख्य प्वाइंट है—'सम्बन्धों से मोहभंग'। माँ-बाप, भाई-बहन, प्रकृति और मनुष्य-जीवन की आत्मीयता का परिचय और परम्परित संसार इन कहानीकारों की कथा-रचनाओं से लगभग ग़ायब दिखता है। इस संकलन के सभी कथाकारों के वास्तविक जीवन में सबकी माँएँ हैं, पिता हैं, भाई-बहनें हैं, पड़ोस है, सम्पूर्ण जीवन का एक भरा-पूरा संसार है, लेकिन कहानियों में आए पात्रों के जीवन और व्यवहार से उनका रिश्ता एक दार्शनिक खिन्नता का है। प्रेमल रोमांस जैसे ग़ायब है और जीवन की विचित्र-सी हबड़-दबड में एक नीरस-निरर्थक अवाजाही है। क्या यह एक दार्शनिक उपक्रम है जो सामाजिक-पारवारिक-राजनीतिक विच्छिन्नता से उत्पन्न हुआ है या एक विराग और अवसाद की स्थिति है जो आज़ादी के बाद पैदा हुई है? जीवन विराटता का एक समूहीकरण नहीं, बल्कि एक विचित्र-सा बिखराव का संकेत देता है। चुनौतियों का अभाव है और विरासत में मिली और आगे आनेवाली एक घिसट का संकेत है। आज़ादी के बाद उसकी विचित्र क़िस्म की निरर्थकता ही इन कथाकारों को एक नई दुनिया में ला खड़ा करती है। वह दुनिया आज भी जस-की-तस है।
Read moreAbout the Book
सन् 1965 के सितम्बर महीने में जब यह संकलन पहली बार छपकर आया, तब तक इसमें सम्मिलित 14 कहानीकारों में से किसी का भी कोई कहानी-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। सबकी तीन, चार, पाँच कहानियाँ इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में छपी थीं। इस 'यूथ ब्रिगेड' की संरचना का आइडिया श्री (स्व.) विजयमोहन सिंह के दिमाग़ की उपज था। इसे साकार करने का सारा श्रेय उन्हीं को जाता है! मोटा-मोटी 15 से 20 बिल्कुल नए और लगभग अनछपे कहानीकारों से पत्र-व्यवहार और अनुमति लेकर (और कुछ की अनुमति न मिलने के कारण) उन्होंने हर कहानीकार की दो-दो कहानियों के साथ इस संग्रह की योजना को रूप दिया। आश्चर्यजनक रूप से इन कथाकारों में उन्होंने कुछ ऐसे प्वाइंट्स ढूँढ़ निकाले, जो पूर्ववर्ती कथा-रचना से इन्हें अलग करते थे। वह मुख्य प्वाइंट है—'सम्बन्धों से मोहभंग'। माँ-बाप, भाई-बहन, प्रकृति और मनुष्य-जीवन की आत्मीयता का परिचय और परम्परित संसार इन कहानीकारों की कथा-रचनाओं से लगभग ग़ायब दिखता है। इस संकलन के सभी कथाकारों के वास्तविक जीवन में सबकी माँएँ हैं, पिता हैं, भाई-बहनें हैं, पड़ोस है, सम्पूर्ण जीवन का एक भरा-पूरा संसार है, लेकिन कहानियों में आए पात्रों के जीवन और व्यवहार से उनका रिश्ता एक दार्शनिक खिन्नता का है। प्रेमल रोमांस जैसे ग़ायब है और जीवन की विचित्र-सी हबड़-दबड में एक नीरस-निरर्थक अवाजाही है। क्या यह एक दार्शनिक उपक्रम है जो सामाजिक-पारवारिक-राजनीतिक विच्छिन्नता से उत्पन्न हुआ है या एक विराग और अवसाद की स्थिति है जो आज़ादी के बाद पैदा हुई है? जीवन विराटता का एक समूहीकरण नहीं, बल्कि एक विचित्र-सा बिखराव का संकेत देता है। चुनौतियों का अभाव है और विरासत में मिली और आगे आनेवाली एक घिसट का संकेत है। आज़ादी के बाद उसकी विचित्र क़िस्म की निरर्थकता ही इन कथाकारों को एक नई दुनिया में ला खड़ा करती है। वह दुनिया आज भी जस-की-तस है।
Book Details
-
ISBN9789352211036
-
Pages287
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Biyaban Me
- Author Name:
Sara Rai
- Book Type:

-
Description:
सारा राय की कहानियाँ अनेक स्तरों पर सजग चेतना द्वारा रचित संसार हैं। उनके यहाँ भीतर की सम्पन्नता और भीतर का ख़ालीपन, बाहर की सम्पन्नता और बाहर का उजाड़ एक-दूसरे के आमने-सामने होते रहते हैं, बल्कि एक-दूसरे के बरक्स रखे आईनों की तरह वे परस्पर को कई गुना करते चलते हैं। व्यक्त और अव्यक्त यथार्थ एक-दूसरे के साथ नाज़ुक सन्तुलन साधते हुए एक सम्पूर्ण अनुभव की रचना करते हैं।
दृश्य, परिवेश, पात्र और अनुभव का ही नहीं, समय का भी एक पूरेपन के क़रीब ले जाता हुआ बोध, यानी एक साथ भंगुरता और अन्तहीनता का बोध उनकी कहानियों में आपको कभी भी हो सकता है। इसी तरह किसी सीमित घटना या क्रिया का अन्तहीनता में फिसल जाना उसे एक दूसरे ही आयाम में ले जाता है और सीमित जीवन-काल के आर-पार फैला अनन्त समय बड़ी सहजता से आपके समय-बोध का हिस्सा बन जाता है। एक साथ समय की रवानी और ठहराव का चित्र उनके यहाँ कुछ यों उभरता है—‘समय के बड़े-बड़े चकत्ते तैरते हुए निकल जाते हैं, जैसे वे कुछ हों ही ना। ऐसा लगता है जैसे दिन एक-एक करके नहीं, कई-कई के झुंड में बीत रहे हों, कभी-कभी पूरा एक मौसम एक अकेले दिन की तरह निकल जाता है।’
सारा राय की ताक़त उनके बहुत बारीक, बहुत मामूली मगर उन चुने हुए ब्यौरों में है, जिन्हें वे भीतरी और बाहरी दुनिया के तानों-बानों से कुछ इस तरह बुनती हैं कि एक रहस्य-सा उनके गिर्द घिर आता है। यह रहस्य उनकी कहानियों को हर बार पढ़ने पर नए सिरे से खुलता है। उनके बिम्ब, उनकी उपमाएँ हम सबकी जानी-पहचानी चीज़ों को एकदम अछूता-सा कोई सन्दर्भ देकर ऐसा एक मायालोक खड़ा कर देती हैं जिसमें—सेमल की फलियों से उड़ती रुई बर्फ़ के तूफ़ान में बदल जा सकती है, आसमान कुएँ में पड़े रूमाल में, लाल स्वेटर पहने स्कूल के फाटक से लुढ़कते-पुढ़कते बच्चे बीर-बहूटियों में और ‘आह सारा! द होल वर्ल्ड!’ कहते हुए पकड़ाई गई पनीर पूरी एक दुनिया में तब्दील हो जा सकती है।
किसी भी सम्बन्ध को परिणति तक पहुँचाने की हड़बड़ी उनके यहाँ नहीं है। सम्बन्धों के महीन रेशों को वे हल्के इशारों से कहे-अनकहे शब्दों में, बिम्बों में थामती हैं। वे ‘बियाबान में’ कहानी की नायिका का अपने लेखन के साथ का रिश्ता हो या रश्मि किरण के साथ का, ‘परिदृश्य’ कहानी की सीमी का अनामिका और उसके भाई के साथ धीरे-धीरे अस्तित्व में आया सम्बन्ध हो, मकड़ी के जाले की सुन्दर संरचना के निमित्त, बाबू देवीदीन सहाय का अपनी रूह के साथ पहली बार स्थापित हुआ सम्बन्ध हो या अनामिका का गंगा के कछार के साथ शेष दूसरे फ़्लैप पर...का तादात्म्य हो—ये सम्बन्ध जितनी देर के लिए, जितने भी, जैसे भी होते हैं, अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ होते हैं। गंगा का कछार अलग मौसम में, किसी दूसरे समय पर, किसी अलग मनःस्थितियों में अलग ही रूप धर ले सकता है।
‘भूलभुलैयाँ’ जैसी कहानी में वे भव्य अतीत के कोनों-अँतरों को तलाशती हैं। इस प्रक्रिया में अतीत के साथ-साथ सम्भावित का भी एक लोक खुलता चला जाता है। बनारस की साकिन नूर मंज़िल हवेली के उस प्राचीन वैभव—जब ‘हर कमरे में लोग अंगूर के गुच्छों की तरह’ होते थे—के बरक्स बची थीं किले की दीवार जैसे कन्धोंवाले सैयद हैदर की बड़ी बेटी कुलसूम बानो, जिन्हें नूर मंज़िल जैसी विशाल हवेली में बन्द रहने के बावजूद नाचने और नाचते-नाचते लट्टू की तरह एक जगह सिमट आने के तथा छत की काई लगी काली मुँडेर से डैनों की तरह बाजुओं को फैलाकर उड़ने के एहसास से कोई वंचित नहीं कर पाया था।
दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिससे सारा को परहेज़ हो। आज की कहानी की तरह सिर्फ़ लोगों को ही नहीं, सब कुछ को उनकी कहानियों में आने की छूट है। लोगों के अलावा ‘बियाबान में’ का लुटा-पिटा पुराना खँडहर बस हो, कहीं नहीं से कहीं नहीं तक जाता पुल हो, मेक्वायरी का चार एकड़ का बीहड़ हो, गंगा के किनारे तम्बुओं, लाइटों का उग आया नया नगर हो, हरी आग की तरह सारे में फैल जानेवाली लम्बी-लम्बी घास हो, पूरी सृष्टि ही चली आती है जीवन की सी सहजता के साथ। रामबाँस पर तीस सालों में सिर्फ़ एक बार आनेवाला फूल भी नहीं बचता उनकी आँख से। सुनहरी कलियों का वह नज़ारा मालती को एक उपलब्धि की तरह लगता है और दो दीवारों के बीच तथा मकड़ी का जाला बाबू देवीदीन सहाय के साथ हमें भी एक करिश्मे की तरह लगता है। इन छोटी-छोटी चीज़ों की एक करिश्मे की शक्ल में पहचान और जीवन में इनकी जादुई उपस्थिति में सारा की गहरी आस्था है।
उनके यहाँ हिन्दी के पूर्ववर्ती कथाकारों की अनुगूँज के साथ ख़ुद उनके रोयों की तरह संवेदनशील और उड़ानक्षम भाषा का विरल संयोजन है। चीज़ों को देखने का, उसे भाषा में सहेजने का सारा का ढंग अनोखा है। चीज़ें और उनके आस-पास वही है जिसे हम सब रोज़ देखते हैं या नहीं देखते। उन्हें सारा के साथ उनकी आँख से देखना आज की हिन्दी कहानी के परिदृश्य में एक अलग तरह का देखना है। ‘ऊपर का आकाश डालों से घटाटोप हो उठा और ज़मीन पर बरगद ने जड़ों के महल खड़े किए, कई-कई महल, एक-दूसरे की अनुगूँज की तरह।’
—ज्योत्स्ना मिलन
Raat mein Sagar
- Author Name:
Chandrakanta
- Book Type:

-
Description:
चन्द्रकान्ता उन विरल लेखिकाओं में हैं जिन्होंने कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद से उत्पन्न करुण मानवीय स्थितियों को रचना का केन्द्र बनाया है। वैसे भी कश्मीर हिन्दी साहित्य में उतना नहीं आया जितना आना चाहिए था। भूमंडलीकरण के इस दौर में, वैज्ञानिक अभिज्ञानों के आलोक में टूटते-चरमराते स्त्री-पुरुष यौन-सम्बन्ध और इतर द्वन्द्वात्मकताएँ इनके लेखन के उपजीव्य रहे हैं।
लेखिका की कहानियों का अनुभव-वृत्त अत्यन्त विस्तृत है। ये कहानियाँ उस चौहद्दी का अतिक्रमण करती हैं जिसे केवल ‘महिला लेखन’ के सीमित दायरे में समेटा जाता है। इन कहानियों में काल तथा संस्कृतियों के द्वन्द्व भी सामने आए हैं।
चन्द्रकान्ता का आत्मकथन बिलकुल सही लगता है कि मनुष्य विरोधी व्यवस्था के प्रतिपक्ष में खड़ी ये कहानियाँ दोतरफा खुलने वाली खिड़कियाँ हैं...
Mati Ki Mooraten
- Author Name:
Shriramvriksh Benipuri
- Book Type:

- Description: "जब कभी आप गाँव की ओर निकले होंगे, आपने देखा होगा, किसी बड़ या पीपल के पेड़ के नीचे, चबूतरे पर कुछ मूरतें रखी हैं—माटी की मूरतें! ये मूरतें—न इनमें कोई खूबसूरती है, न रंगीनी। किंतु इन कुरूप, बदशक्ल मूरतों में भी एक चीज है, शायद उस ओर हमारा ध्यान नहीं गया, वह है जिंदगी! ये माटी की बनी हैं, माटी पर धरी हैं; इसीलिए जिंदगी के नजदीक हैं, जिंदगी से सराबोर हैं। ये देखती हैं, सुनती हैं, खुश होती हैं; शाप देती हैं, आशीर्वाद देती हैं। खुश हुईं—संतान मिली, अच्छी फसल मिली, यात्रा में सुख मिला, मुकदमे में जीत मिली। इनकी नाराजगी—बीमार पड़ गए, महामारी फैली, फसल पर ओले गिरे, घर में आग लग गई। ये मूरतें जिंदगी के नजदीक ही नहीं, जिंदगी में समाई हुई हैं। इसलिए जिंदगी के हर पुजारी का सिर इनके नजदीक आप-ही-आप झुक जाता है। ये कहानियाँ नहीं, जीवनियाँ हैं! ये चलते-फिरते आदमियों के शब्दचित्र हैं। सुप्रसिद्ध लेखक श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी कहते हैं—‘मानता हूँ, कला ने उन पर पच्चीकारी की है; किंतु मैंने ऐसा नहीं होने दिया कि रंग-रंग में मूल रेखाएँ ही गायब हो जाएँ। मैं उसे अच्छा रसोइया नहीं समझता, जो इतना मसाला रख दे कि सब्जी का मूल स्वाद ही नष्ट हो जाए।’ जिंदगी के विविध रंगों को रेखांकित करतीं बेनीपुरीजी की सशक्त लेखनी से निकली रोचक, मार्मिक व संवेदनशील रेखाचित्र। "
Pratinidhi Kahaniyan : Shivani
- Author Name:
Shivani
- Book Type:

-
Description:
शिवानी कुशल कथाशिल्पी भी थीं, और रूढ़िभंजक भी। उनकी कहानियों में एक दुचित्ते रूढ़िवादी और पिता केन्द्रित समाज की कई विडम्बनाएँ हम साफ पढ़ सकते हैं। बेटों की उत्कट कामना, लड़की को दूसरे दर्जे का जीव मानकर उस पर तमाम तरह के अंकुश, शादी-ब्याह तय करने के चतुर छल-कपटमय दाँव-पेंच, और युवा लड़कियों के विद्रोही तेवर सबको उन्होंने भरपूर जिया भी और दर्ज भी किया है।
उनमें हमको 60 से 90 तक के युग के निरन्तर बदल रहे पर पितृसत्ताक मूल्यों के पक्षधर भारतीय राज समाज की घरेलू तथा कामकाजी औरतों के जीवन की कई अनकही सचाइयों का बेबाक दर्शन होता है, जो सामान्यत: पुरुष लेखकों ने बहुत कम पकड़ा है। पकड़ा भी है तो सेक्स या मातृत्व के भावुक चित्रण तक ही सीमित होकर।
विचार और संशय, श्रद्धा और बुद्धि के बीच पाठक को निरन्तर चलायमान रखती शिवानी की इन कहानियों में हम आज भी कथा की चौखट लाँघकर मानव जीवन की सनातनता को छू सकते हैं।
Jeena Seekha Dengi
- Author Name:
Dr.Abrar Multani +1
- Book Type:

- Description: This Books doesn’t have a description
Naach Gaan
- Author Name:
Dr. Urmila Shirish
- Book Type:

- Description: Book
Kitna Bada Jhooth
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

-
Description:
पाँचवें दशक में हिन्दी के जिन कथाकारों ने पाठकों और समीक्षकों का ध्यान सबसे ज़्यादा आकर्षित किया उनमें उषा प्रियम्वदा का नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। पिछले कई दशकों से ये निरन्तर सृजनरत हैं और इस अवधि में इन्होंने जो कुछ लिखा है वह परिमाण में कम होते हुए भी विशिष्ट है, जिसका प्रमाण है ‘कितना बड़ा झूठ’ की ये कहानियाँ।
प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश कहानियाँ अमेरिकी अथवा यूरोपीय परिवेश में लिखी गई हैं। और जिन कहानियों का परिवेश भारतीय है उनमें भी प्रमुख पात्र, जो प्रायः नारी है, का सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में यूरोप अथवा अमेरिका से रहता है। इस एक तथ्य के कारण ही इन कहानियों को, बहुचर्चित मुहावरे की भाषा में, भोगे हुए यथार्थ की संज्ञा भी दी जा सकती है और इसी तथ्य के कारण इन कहानियों में आधुनिकता का स्वर भी अधिक प्रबल है।
डॉ. इन्द्रनाथ मदान के शब्दों में : ‘उषा प्रियम्वदा की कहानी-कला से रूढ़ियों, मृत परम्पराओं, जड़ मान्यताओं पर मीठी-मीठी चोटों की ध्वनि निकलती है, घिरे हुए जीवन की उबासी एवं उदासी उभरती है, आत्मीयता और करुणा के स्वर फूटते हैं। सूक्ष्म व्यंग्य कहानीकार के बौद्धिक विकास और कलात्मक संयम का परिचय देता है, जो तटस्थ दृष्टि और गहन चिन्तन का परिणाम है।’
अपने पहले संग्रह ‘ज़िन्दगी और गुलाब’ के फूल से लेकर अब तक विषय-वस्तु और शिल्प की दृष्टि से लेखिका ने विकास की जो मंज़िलें तय की हैं, उनका जीवन्त परिचय पाठकों को ‘कितना बड़ा झूठ’ की कहानियों से मिलेगा।
Khachchar Aur Admi
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

-
Description:
यशपाल के लेखकीय सरोकारों का उत्स सामाजिक परिवर्तन की उनकी आकांक्षा, वैचारिक प्रतिबद्धता और परिष्कृत न्याय-बुद्धि है। यह आधारभूत प्रस्थान बिन्दु उनके उपन्यासों में जितनी स्पष्टता के साथ व्यक्त हुए हैं, उनकी कहानियों में वह ज़्यादा तरल रूप में ज़्यादा गहराई के साथ कथानक की शिल्प और शैली में न्यस्त होकर आते हैं। उनकी कहानियों का रचनाकाल चालीस वर्षों में फैला हुआ है। प्रेमचन्द के जीवनकाल में ही वे कथा-यात्रा आरम्भ कर चुके थे, यह अलग बात है कि उनकी कहानियों का प्रकाशन: किंचित् विलम्ब से आरम्भ हुआ। कहानीकार के रूप में उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने प्रेमचन्द के प्रभाव से मुक्त और अछूते रहते हुए अपनी कहानी-कला का विकास किया। उनकी कहानियों में संस्कारगत जड़ता और नए विचारों का द्वन्द्व जितनी प्रखरता के साथ उभरकर आता है उसने भविष्य के कथाकारों के लिए एक नई लीक बनाई, जो आज तक चली आ रही है। वैचारिक निष्ठा, निषेधों और वर्जनाओं से मुक्त न्याय तथा तर्क की कसौटियों पर ख़रा जीवन—ये कुछ मूल्य हैं जिनके लिए हिन्दी कहानी यशपाल की ऋणी है।
‘खच्चर और आदमी’ कहानी-संग्रह में उनकी ये कहानियाँ शामिल हैं : ‘वैष्णवी’, ‘मक्खी या मकड़ी’, ‘उपदेश’, ‘कलाकार की आत्महत्या आदमी या पैसा?’ ‘जीव दया’, ‘चोरी और चोरी’, ‘अश्लील!’, ‘सत्य का द्वन्द्व तथा खच्चर और आदमी’।
Grimm Bandhuon Ki Parikathayen
- Author Name:
J.L.C. Grimm, W.C. Grimm
- Book Type:

-
Description:
मोहक, रोचक और विचित्र घटनाओं से भरी परीकथाएँ विश्व की हर भाषा में कही-सुनी जाती हैं। किसी भी आयु का व्यक्ति इन्हें पढ़कर-सुनकर आनन्दित होता है। बचपन तो इन्हीं कथाओं के सहारे कल्पना की रंग-बिरंगी दुनिया में विचरण करता आया है। पशु, पक्षी, राक्षस, परी, जंगल, नदी, पुराना क़िला, जादू, शाप, वरदान, रहस्य, रोमांच, अत्याचार, न्याय, वशीकरण, साहस, चतुराई...आदि को समेटे ये परीकथाएँ आज भी बेमिसाल मनोरंजन का ख़ज़ाना हैं। ‘ग्रिम बन्धुओं की परीकथाएँ’ पुस्तक में ऐसी ही बेहद पठनीय कथाएँ संकलित हैं। ‘खरगोश की दुल्हन', ‘मेढक राजकुमार’, ‘जंगल में तीन बौने’, ‘सफ़ेद साँप’, ‘करामाती टेबिल’, ‘गधा तथा छड़’, ‘स्नोव्हाइट’, ‘कुत्ता और गौरैया’ व ‘सोने का हंस’ आदि सभी परीकथाएँ पाठक को आनन्द से भर देती हैं। इन कथाओं का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में किया जा चुका है। पाठकों के बीच इनकी अपार लोकप्रियता का कारण है मानव मन में उत्सुकता की भावना।
ग्रिम बन्धुओं ने संकलन और पुनर्लेखन करते हुए उत्सुकता तथा रोचकता को और बढ़ा दिया है। मनोरंजन करने के साथ ये कथाएँ किसी न किसी रूप में लोक-व्यवहार या नीति की शिक्षा भी देती हैं। सीधी और सरल भाषा में जीवन के जाने कितने रूप यहाँ व्यक्त हुए हैं। यह पुस्तक पाठकों के लिए मनोरंजन का अनूठा उपहार है।
Ka : Bhartiya Manas Aur Devataon Ki Kahaniyan
- Author Name:
Roberto Calasso
- Book Type:

-
Description:
एक अद्भुत, रोमांचक और रहस्यपूर्ण यात्रा से अभी-अभी लौटा हूँ। सिर घूम रहा है— कुछ भी स्थिर नहीं। मैं उस विचित्र विचार-यात्रा के अनुभव आप सबके साथ बाँटना चाहता हूँ। एक में अनेक मानस यात्राएँ, लेकिन ज़रा ठहरिए, अभी-अभी जान पाया हूँ कि जिस अद्भुत यात्रा की बात कर रहा हूँ, वह तो शुरू ही नहीं हुई अभी तक। बस मन में कामना जगी है। और मैं इसी को यात्रा का आरम्भ और अन्त मान बैठा। सब गड्ड-मड्ड हो रहा है। प्रस्थान बिन्दु ही गन्तव्य है, और जिसे मैं गन्तव्य कह रहा हूँ, वही तो आरम्भ था। कोई आरम्भ प्रथम नहीं, क्योंकि वह दूसरा है, अन्त में से निकला है। जो नया है वह पिछले अन्त के अवशेष-शेष पर टिका है और अन्त भी अन्तिम सलिए नहीं कि वही आरम्भ है। मैं हूँ लेकिन नहीं भी हूँ। मेरा होना मेरे न होने में समाया है।
कहते हैं बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। बोधिसत्व बुद्धत्व प्राप्त कर अन्तिम बार जीवन-मरण के चक्र से निकलकर परे चले गए थे। लेकिन हम तक तो बुद्ध अपने अवशेष-आनन्द पर आधारित रहकर ही पहुँचे थे। यदि आनन्द न होते तो क्या हम बुद्ध के विचारों से इस तरह परिचित हो पाते? यही बात मैं इटली के भारत प्रेमी विद्वान श्री रॉबर्तो कलासो के बारे में कहना चाहता हूँ। संक्षेप में कहूँ तो कलासो के माध्यम से ही मैंने जटिल पुरातन भारतीय विचार-दर्शन को कथारस की लपेटन में पहली बार स्पर्श किया है। उसे पूरी तरह समझकर ग्रहण करने की परम स्थिति अभी दूर है। निर्वाण से पहले अनेक बार बोधिसत्व बनना होगा। प्रायः ही मेरे जैसे सामान्यजनों की दृष्टि अपने अतीत में पुराणों तक ही पहुँच पाती है। प्रागैतिहासिक वैदिक काल पवित्र अज्ञान की तरह है जिसे दूर से ही प्रणाम किया जा सकता है। पहले मन था, फिर विचार आया, विचार में से दूसरा विचार। सागर में लहर पर लहर की तरह जो तब से आज तक लगातार उठती जा रही हैं। और यह क्रम थमने वाला नहीं, अनन्त काल तक चलता जाएगा, उन चक्रीय कथाओं की तरह जो अश्वमेध के घोड़े के बलिस्थल पर लौटने की प्रतीक्षा में दस दिन के अन्तराल पर अपने को दोहराती चली जाती थीं।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसी अनुभूति होती है मानो मैं एक चक्करदार झूले पर घूमता जा रहा हूँ। जो पहले था वही बार-बार दिखाई दे रहा है। आर्यों को ऐसा ही लगा था भारत-भूमि पर आगे बढ़ते हुए। न जाने क्यों ऐसा लगता था, जो नष्ट किया था, वही फिर से सामने प्रकट हो गया है और फिर ऐसा बार-बार होने लगा। वे चकित-चमत्कृत थे। फिर एक समय ऐसा आया, जब भारतीय विचार-दर्शन और जटिल कर्मकांडीय संयोजन की जटिलता ने मन को क्लान्त कर दिया। लोग चाहने लगे—गुनगुने सर्द मौसम में मद्धिम अलाव के चारों ओर बैठकर केवल रस-भरी कथाएँ सुनें और कुछ न करें। धीरे-धीरे यही क्रम चल निकला। जो कथाएँ संकोच से कर्मकांडीय अन्तराल के बीच चुपचाप सिमटकर आ बैठी थीं, वही प्रमुख हो गईं। अतीत के कर्मकांडीय सन्दर्भ कथा-विवरणों में ढल गए। इस पुस्तक के संयोजन में भी यही शैली अपनाई गई है। बात बिन्दु से उभरती है, विचार में ढलती है, विचार प्रक्रिया एक आवेशित, प्रचंड प्रवाह का रूप ले लेती है—लहरें इतनी ऊँची उठती हैं कि मन व्याकुल हो उठता है। और तभी कलासो कथा कहने लगते हैं। क़िस्सागोई का यह अन्दाज़ विचार-प्रवाह की गुरुता को कम नहीं करता उसे कहीं अधिक ग्राह्य बनाता है हम सभी के लिए।
श्री रॉबर्तो कलासो को बधाई। और उन जैसे भारत-प्रेमी विद्वान को जन्म देने के लिए इटली को धन्यवाद।—देवेन्द्र कुमार
Shahon Ka Shah
- Author Name:
Ryszard Kapuscinski
- Book Type:

-
Description:
‘शाहों का शाह' ईरान में शाह के अन्तिम वर्षों का लेखा-जोखा है। साथ ही ईरान में व्याप्त शाह के अभूतपूर्व भय और दमन का लोमहर्षक वृत्तान्त। अलग और विशिष्ट शैली में लिखी गई यह पुस्तक हमें ईरानी क्रान्ति के साथ-साथ वहाँ की संस्कृति और सामाजिक-धार्मिक और राजनीतिक ताने-बाने के विषय में भी गहन अन्तर्दृष्टि देती है।
रिषार्ड कापुश्चिंस्की पेशे से भले पत्रकार थे, लेकिन उनकी लेखनी में इतिहासकार, समाजविज्ञानी और कवि—तीनों का पुट मिलता है। ‘शाहों का शाह' की परिचयात्मक प्रस्तावना लिखनेवाले क्रिस्टोफ़र डि बेलाइग के अनुसार, ''वह इतिहास के अमूर्तनों पर अपने स्वयं के पत्रकारीय पर्यवेक्षणों को प्राथमिकता देते हैं।...वह राष्ट्रों और यहाँ तक कि घटनाओं को भी मानवीकृत स्वरूप में सामने रखते हैं, शैली की नफ़ासत सम्भवत: उन्हें मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्राप्त हुई है जो उन्हें पोलैंड में कभी पढ़ाया गया था।...कुल मिलाकर उनके इतिहास का स्रोत पुस्तकालय नहीं है, वह सड़कों से निकलता है, जहाँ गोलियों की पार्श्व-ध्वनियों के साए में मनुष्य धूल-धक्कड़ से जूझ रहा होता है। स्वयं कापुश्चिंस्की ने कहीं कहा है कि, जहाँ तक मुझे लगता है, जनता के विषय में तब तक लिखना ठीक नहीं है जब तक कुछ सीमा तक उसके जीवन को स्वयं भी जीकर समझ न लिया जाए।''
यह पुस्तक ईरान में घटित एक घटना-विशेष के साथ-साथ हमें पत्रकारिता की एक नई शैली से भी परिचित कराती है।
Donon Asmanon Ke Rang
- Author Name:
Zakia Zubairi
- Book Type:

-
Description:
दोनों आसमानों के रंग में संकलित कहानियाँ हैं—परायी धरती पर मुरझाते रिश्तों की, और स्त्री-विरोधी परम्पराओं में जकड़ी अपनी ज़मीन पर मुरझाने पर मजबूर कर दी गईं उम्मीदों की। ज़किया जुबैरी प्रवासी हिन्दी कथाकार हैं। इन कहानियों में उन्होंने एक तरफ लंदन और दूसरी तरफ भारत-पाकिस्तान की ज़मीन से अपने कथानक उठाए हैं।
लंदन या कह सकते हैं, यूरोप-अमेरिका के समृद्ध देशों में भारतीय उपमहाद्वीप के कितने ही लोग कभी सपनों और कभी मजबूरियों के हाथों बेबस हो बसने और कमाने-खाने जाते हैं। इसके लिए जो संघर्ष अपेक्षित है, वह करते, वे जो चाहते हैं, हासिल भी कर लेते हैं, लेकिन फिर भी कुछ होता है जो उनसे खो जाता है—रिश्ते, रिश्तों की गरमाहट और अपने आपको अपनों के भरोसे छोड़ निश्चिन्त हो जाने का भारतीय दुस्साहस। वह वहाँ उन्हें नहीं मिल पाता। ज़किया ज़ुबैरी अपने सुदीर्घ प्रवासी अनुभवों के आधार पर इन परिस्थितियों को एक स्त्री की निगाह से देखती हैं।
बाकी जिन कहानियों की पृष्ठभूमि भारतीय उपमहाद्वीप हैं उनमें पाकिस्तान से ली गईं दो कहानियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—‘दोनों आसमानों के रंग’ जिसमें भारत के प्रति घृणा को आधार बनाकर एक दिलचस्प कथानक बुना गया है, और दूसरी ‘दस्तक’ जिसमें पाकिस्तान के कुछ पिछड़े हिस्सों में आज भी प्रचलित ‘वानी’ की प्रथा के हवाले से एक रोंगटे खड़े करनेवाला घटनाक्रम हमारे सामने आता है।
Lawaris Nahi, Meri Maan Hai !
- Author Name:
Anil Kumar Pathak
- Book Type:

-
Description:
‘लावारिस नहीं, मेरी माँ हैं' यद्यपि लेखक का प्रथम कहानी-संग्रह है किन्तु कथ्य की इस विधा में लेखक लम्बे समय से सक्रिय हैं। इनकी कहानियाँ कई दशक पूर्व से आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित हो रही हैं। इन कहानियों में एक ओर जहाँ सहजता एवं सरसता है वहीं दूसरी ओर इनकी किस्सागोई पाठकों को आद्योपान्त बाँधकर रखने में भी सक्षम है।
प्रस्तुत संग्रह में कुल 11 कहानियाँ हैं। संग्रह की सभी कहानियों के कथानक नारी के विभिन्न स्वरूपों–माँ, मौसी, काकी, बुआ, सौतेली माँ आदि–के इर्द-गिर्द घूमते हैं जिनमें स्त्री के मूलभूत गुणों, यथा–प्रेम, दया, करुणा, सबको अपनाने की प्रवृत्ति एवं संघर्ष के बावजूद विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अनवरत तत्पर रहना इत्यादि–का मर्मस्पर्शी चित्रण है। जहाँ ये कहानियाँ काव्य के विभिन्न गुणों को अपने अन्दर समाहित करते हुए विशेषतया नारी के दृष्टिगत समाज में व्याप्त प्रतिकूल परिस्थितियों को उजागर करती हैं, वहीं सुखद वातावरण का सृजन करते हुए आशा की उजली किरणों की ओर भी ले जाती हैं।
Narak Le Janewali Lift
- Author Name:
Rajendra Yadav
- Book Type:

-
Description:
मेरे लिए अनुवाद दो भाषाओं की क्षमता, सम्भावना और शब्द-शक्तियों को खँगालने और सही अर्थ या मन्तव्य पकड़ सकने की चुनौती के रूप में आता है। यहाँ दोनों भाषाओं की अपनी बनावट ही नहीं, भौगोलिक स्थितियों और संस्कृतियों के साथ अलग समयों की यात्रा भी करनी पड़ती है। सौ-दो सौ या हज़ार साल पहले के समाज-समय को आज के मिज़ाज में ढालना सिर्फ़ शब्दार्थ देना ही नहीं है। इस प्रयास में प्रायः नाश अपनी भाषा का ही होता है। हमारे दिमाग़ पर मूल पाठ इतना हावी होता है कि अपनी भाषा-प्रकृति की तरफ़ ध्यान ही नहीं दे पाते।
अनुवाद में मैं पहली जवाबदेही अपनी भाषा के प्रति मानता हूँ। वह मूल के प्रति ईमानदार होने के साथ अधिक से अधिक सहज, सम्प्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि या तो आप स्वयं मूलपाठ से मुक्त होकर अनुवाद का संशोधन करें या दूसरे ऐसे व्यक्ति से मदद लें जो मूल से आक्रान्त न हो।
इन कहानियों के चुनाव के पीछे न कोई योजना है, न सिद्धान्त। जब जो कहानी पसन्द आ गई या जितनी फ़ुर्सत या मनःस्थिति सामने हुई, उसी हिसाब से कहानी चुन ली गई। चूँकि इन सारी कहानियों के अनुवाद की अवधि मोटे रूप से दस-पन्द्रह साल (1952-65) रही है, इसलिए शायद भाषा भी एक-सी नहीं है। फिर भी सम्भवतः पठनीय है।
—भूमिका से
Call Centre
- Author Name:
Chanchal Sharma
- Book Type:

-
Description:
दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की कहानियाँ हिन्दी कहानियों में कुछ नए ढंग का हस्तक्षेप करती हैं। यहाँ बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनका मैं ज़िक्र करना चाहता हूँ, लेकिन दो-तीन कहानियाँ तो अद्भुत हैं। आमतौर पर इस संग्रह की ज़्यादातर कहानियाँ दो-ढाई पेज से ज़्यादा की नहीं हैं और सबका अपना प्रभाव है। कई कहानियाँ तो इतने नए अनुभव लिए हुए हैं कि हिन्दी कहानी में दुर्लभ हैं।
आप ‘ढेढ़-मेढ़े रास्ते’ पढ़िए। आपको लगेगा कि आप एक नए महाभारत से जूझ रहे हैं जहाँ से स्त्री-स्वाभिमान की एक नई दुनिया खुलती है। पारम्परिक स्त्री-विमर्श से अलग यहाँ एक नए तरह का स्त्री-विमर्श है। चौसर पर यहाँ भी स्त्री है लेकिन अबकी स्त्री अपनी देह का फ़ैसला ख़ुद करती है। इसी के उलट ‘कॉल सेंटर’ स्त्री-स्वाधीनता के दुरुपयोग की अनोखी कथा है जो बहुत सीधे-सपाट लहज़े में लिखी गई है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ कहानियों में विविधता बहुत है। यहाँ आप अल्ट्रा मॉड समाज की विसंगतियों की कथा पाएँगे तो बिलकुल निचले तबक़े के अनोखे अनुभव भी, जो बिना यथार्थ अनुभव के सम्भव नहीं हैं। जैसे एक कहानी है—‘कच्चे-पक्के आशियाने’। यह कहानी ग़रीबी रेखा से नीचे जीनेवाले बच्चों की कहानी है जहाँ एक लड़की सिर्फ़ जीने के लिए अपनी देह का सौदा करती है। इसका अन्त तो अद्भुत है जब देह बेचनेवाली लड़की उस पर आरोप लगानेवाले सम्भ्रान्त मेहता से उनकी पत्नी के सामने कहती है कि मेहता साहब, आपके पाँच सौ रुपए मुझ पर बाक़ी हैं, आपकी बीवी को दे दूँगी। कहानी यहाँ सम्भ्रान्त समाज के पाखंड पर एक करारा तमाचा बन जाती है।
कुल मिलाकर दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की ये कहानियाँ इसलिए भी पढ़ी जानी चाहिए
कि इन्होंने हिन्दी कथा को कुछ नए और अनूठे अनुभव दिए हैं।
—शशिभूषण द्विवेदी
Yani Ki Ek Baat Thee
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

-
Description:
कुछ ही दिन पहले मेरी दो कहानियाँ पढ़कर दो पाठकों के क्रोध–भरे पत्र आए। एक ने लिखा था कि ‘अपने लेखों और अन्य कार्यक्रमों में मैं स्त्री–मुक्ति और आत्मनिर्भरता की बात करती हूँ, जबकि इस कहानी की नायिका की घुटन-भरी—दब्बू ज़िन्दगी हमें कोई ऐसा ‘सन्देश’ नहीं देती।’ दूसरे पाठक ने भी घुमा–फिराकर यही पूछा था कि ‘ठीक है, पात्रों की निजी दुनिया के दबावों और उनके सुख–दु:ख से कहानी हमारा साक्षात्कार तो कराती है, पर यह अन्त में आकर हमें ‘सिखाती’ क्या है ?’ मुझे लगता है कि एक बोझिल हितोपदेशी पाठ्यक्रम की किताबों से ‘साहित्य’ पढ़कर निकले ऐसे पाठक रचनात्मक साहित्य की आत्मा से अपरिचित ही रह आए हैं।
मुझे खेद है, मेरी कहानियाँ इनकी थोथी उपदेश–तृष्णा नहीं बुझा सकतीं। हर कहानी या उपन्यास घटनाओं–पात्रों के ज़रिए सत्य से एक आंशिक और कुतूहल-भरा साक्षात्कार होता है। साहित्य हमें जीवन जीना सिखाने के बजाय टुकड़ा–टुकड़ा ‘दिखाता’ है, वे तमाम नर्क–स्वर्ग, वे राग–विराग, वे सारे उदारता और संकीर्णता–भरे मोड़, जिनका सम्मिलित नाम मानव–जीवन है।
जो साहित्य उघाड़ता है, वह अन्तिम सत्य या सार्वभौम आदर्श नहीं, बहुस्तरीय यथार्थ होता है। हाँ, यदि जीवन में आदर्श या सत्य अनुपस्थित या अवहेलित हैं, तो उस विडम्बना को भी वह जताता जाता है। मेरी तहत साहित्य को रचना, परोक्ष रूप से सत्य से आंशिक साक्षात्कारों की ऐसी ही एक शृंखला पाठकों के लिए तैयार करना होता है, जिसके सहारे एक सहृदय व्यक्ति अपनी चेतना, अपनी संवेदना और अभिव्यक्ति–क्षमता का सहज ही कुछ और विस्तार होता पाए। चिन्तनपरक लेख और रचनात्मक लेखन के बीच का फ़ासला तर्कसंगत ज्ञान और संवेदनात्मक समझ के बीच का फ़ासला है।
Pratinidhi Kahaniyan : Omprakash Valmiki
- Author Name:
Omprakash Valmiki
- Book Type:

- Description: ओमप्रकाश वाल्मीकि को हिन्दी दलित साहित्यकारों की अग्रणी पंक्ति में गिना जाता है। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ ने दलित-वृत्तान्तों में एक क्लासिक का दर्जा हासिल किया और कई कहानियों और कविताओं को मानक रूप में स्वीकृत किया गया। उन्होंने दलित-साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर व्यवस्थित चिंतन किया जो वैचारिक उत्तेजना का कारण बना। उनकी कहानियों के इस प्रतिनिधि संकलन में उन कथा-रचनाओं को रखा गया है जिन्हें न सिर्फ दलित-चेतना बल्कि भाषा और शिल्प के स्तर पर भी जाति-आधारित समाज की सत्ता-संरचना को चुनौती देने वाला माना गया। जो जीवन उन्होंने जिया, और एक संवेदनशील लेखक के रूप में उसे जिस तरह समझा, वही इन कहानियों का आधार है। समाज को जाति-उत्पीड़न की भयावहताओं से अवगत कराने के साथ-साथ दलित-दमित जन को अपने सम्मान के प्रति सजग करना और प्रतिरोध का रास्ता दिखाना इन कहानियों की मूल प्रेरणा है। इन कहानियों को पढ़कर हम अपने समाज को भी समझ सकते हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि की कथा-सामर्थ्य को भी।
Pathar Ke Neeche Dabe Hue Hath
- Author Name:
Rajkamal Chaudhary
- Book Type:

-
Description:
राजकमल चौधरी की कहानियाँ परमाणु में पर्वत के समावेश की कहानियाँ हैं, जो मानव-जीवन के अनछुए प्रसंगों से उठाकर लाई गई हैं, जिनमें राजकमल की सारी की सारी कहानी-कला मौजूद है और लगता ऐसा है कि इनमें कोई कला नहीं दिखाई गई है। जनजीवन का सत्य ज्यों का त्यों रख दिया गया है। सच्ची घटनाएँ तो अख़बारी रिपोर्टों में बयान होती हैं, कहानी में घटनाएँ सच की तरह आती हैं। घटनाएँ सच हों, इससे ज़्यादा ज़रूरी है कि वे सच लगें भी। राजकमल की कहानियों की यह ख़ास विशेषता है कि वे सारी घटनाएँ सच हों या न हों, सच लगती अवश्य हैं।
धर्म, साहित्य, नौकरी, व्यापार, फ़िल्म, सामाजिक जीवन-यापन...तमाम क्षेत्रों की विकृतियों का इतनी सूक्ष्मता से यहाँ पर्दाफ़ाश किया गया है कि वे अचानक तार-तार हो जाती हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति, क्षणिक मनोवेगों की पुष्टि के लिए मनुष्य किस सीमा तक गिर सकता है; संन्यासी और सिद्ध योगी और यहाँ तक कि देवता की छवि रखनेवाला भी पल-भर में कैसा जानवर हो जाता है; ख़ूँख़ार जानवर कैसा गऊ हो जाता है; शेर की दहाड़ और आतंक का मालिक पल-भर में कैसे गीदड़, चूहा, केंचुआ, चींटी हो जाता है और रेंगने लगता है—मानव-जीवन की इसी उठा-पटक का एलबम है—राजकमल की कहानियाँ।
Olesya Tatha Anya Kahaniyan
- Author Name:
Aleksandr Kuprin
- Book Type:

- Description: तोल्स्तोय, गोर्की और चेख़ॅव की ही तरह रूसी समाज और बृहत्तर मानवीय नियति के द्रष्टा लेखक कुप्रिन की इन कहानियों में उनके समय की अनेक ऐसी स्थितियों के विवरण हैं जिनकी भयावहता स्तब्ध कर देती है। वस्तुत: ये कहानियाँ मानवीय जीवन को क्षत करने वाले विचारों और परिस्थितियों के विरुद्ध खड़ी ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें एक बार पढ़ लेने के बाद भुलाना मुमकिन नहीं है।
Ghar Bahar Ghar
- Author Name:
Harimohan
- Book Type:

-
Description:
सुपरिचित कथाकार हरिमोहन की कहानियों का यह संग्रह अपनी काव्यात्मक भाषा और सरल-सहज शिल्प के कारण अनायास ही आकर्षित करता है।
व्यक्ति के निजत्व की तलाश, प्रेम में चाँद को छूने की आकांक्षा, समसामयिक राजनीति की विद्रूपताओं व विडम्बनाओं, साम्प्रदायिक डायनासोर के आतंक, रिश्तों की रागात्मकता, प्रेम की मीठी व सुलगती हुई आँच, उपभोक्तावादी जीवन-शैली का एकाकीपन, दफ़्तरी जीवन का छल-छद्म आदि की काली-उजली छायाओं और गतिशील बिम्बों का मोहक कोलाज हैं ये कहानियाँ। भाषा की ताज़गी और कथ्य व विचारों की मौलिकता हरिमोहन की कहानियों की अनूठी विशेषता है।
सुचिंचित सरोकार वाली कथावस्तु, प्रवाहमय भाषा और संवेदनात्मक शिल्प के कारण ये कहानियाँ पाठकों को एक रचनात्मक लोक में ले जाने में सक्षम हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book