Vote Le, Dariya Mein Daal
(0)
₹
299
₹ 239.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
शरद जोशी हिन्दी व्यंग्य के ‘आइकॉन’ हैं। व्यंग्य की तीव्रता को उन्होंने जिस भाषा और तेवर के साथ सम्भव किया, और जो मानक निर्मित किया, उनके बाद कोई भी व्यंग्यकार उसे पार नहीं कर सका। उनके व्यंग्य-लेख वर्तमान हालात पर भी आज के व्यंग्यकारों से ज़्यादा सार्थक, प्रासंगिक और बेधक लगते हैं। गहरे सामाजिक सरोकार, समाज और राजनीति की परिपक्व समझ, खुली दृष्टि और तीखे ‘ऑब्ज़र्वेशन’ ने उन्हें जो अलग जगह दी, वह हिन्दी में आज भी उन्हीं की है।</p> <p>इस पुस्तक में उनके राजनीतिकेन्द्रित लेखों को संकलित किया गया है, और उनमें भी ज़ोर चुनाव-विषयक टिप्पणियों पर है, इसीलिए इसका शीर्षक ‘वोट ले, दरिया में डाल’ पड़ा जो भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी है।</p> <p>पुस्तक में शामिल पचास से अधिक इन आलेखों में, जैसे हमारे देश की राजनीति की एक-एक कमज़ोर कड़ी का पोस्टमार्टम किया गया है। चुनाव में खड़े आदमी की छवि से शुरू करके शरद जोशी यहाँ ‘चुनाव गीतिका : सरलार्थ’ तक जाते हैं और लिखते हैं : ‘निशि व्यतीत हुई। ओ कज्जल-मलिन नयनोंवाली कामिनी, उठ। पोलिंग बूथों से राजनीति का कन्त तुझे टेर रहा है। चुनाव के कटे-कटे पोस्टरों से गृहों की दीवारें ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो किसी सुन्दरी के तन पर नख-क्षत हैं। प्रचार बन्द हो गया है। सभी जन मतदान हेतु केन्द्रों की ओर सत्वर गति से जा रहे हैं। ऐसे में हे गजगामिनी, तू गमन-विलम्बिनी होने की कलंकिनी मत बन।’ कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा का यह तत्सम ठाठ एक गहरे और सतह पर शान्त क्रोध की हुंकार है।</p> <p>आशा है, शरद जोशी के ये लेख पाठकों को पुनः प्रतिरोध व अस्वीकार की उसी तमतमाती दुनिया में ले चलेंगे।
Read moreAbout the Book
शरद जोशी हिन्दी व्यंग्य के ‘आइकॉन’ हैं। व्यंग्य की तीव्रता को उन्होंने जिस भाषा और तेवर के साथ सम्भव किया, और जो मानक निर्मित किया, उनके बाद कोई भी व्यंग्यकार उसे पार नहीं कर सका। उनके व्यंग्य-लेख वर्तमान हालात पर भी आज के व्यंग्यकारों से ज़्यादा सार्थक, प्रासंगिक और बेधक लगते हैं। गहरे सामाजिक सरोकार, समाज और राजनीति की परिपक्व समझ, खुली दृष्टि और तीखे ‘ऑब्ज़र्वेशन’ ने उन्हें जो अलग जगह दी, वह हिन्दी में आज भी उन्हीं की है।</p>
<p>इस पुस्तक में उनके राजनीतिकेन्द्रित लेखों को संकलित किया गया है, और उनमें भी ज़ोर चुनाव-विषयक टिप्पणियों पर है, इसीलिए इसका शीर्षक ‘वोट ले, दरिया में डाल’ पड़ा जो भारतीय लोकतंत्र पर एक टिप्पणी है।</p>
<p>पुस्तक में शामिल पचास से अधिक इन आलेखों में, जैसे हमारे देश की राजनीति की एक-एक कमज़ोर कड़ी का पोस्टमार्टम किया गया है। चुनाव में खड़े आदमी की छवि से शुरू करके शरद जोशी यहाँ ‘चुनाव गीतिका : सरलार्थ’ तक जाते हैं और लिखते हैं : ‘निशि व्यतीत हुई। ओ कज्जल-मलिन नयनोंवाली कामिनी, उठ। पोलिंग बूथों से राजनीति का कन्त तुझे टेर रहा है। चुनाव के कटे-कटे पोस्टरों से गृहों की दीवारें ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो किसी सुन्दरी के तन पर नख-क्षत हैं। प्रचार बन्द हो गया है। सभी जन मतदान हेतु केन्द्रों की ओर सत्वर गति से जा रहे हैं। ऐसे में हे गजगामिनी, तू गमन-विलम्बिनी होने की कलंकिनी मत बन।’ कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा का यह तत्सम ठाठ एक गहरे और सतह पर शान्त क्रोध की हुंकार है।</p>
<p>आशा है, शरद जोशी के ये लेख पाठकों को पुनः प्रतिरोध व अस्वीकार की उसी तमतमाती दुनिया में ले चलेंगे।
Book Details
-
ISBN9788126729494
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Tulsidas Chandan Ghisain
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Rating:
- Book Type:

-
Description:
हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था। यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है। पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मक़सद नहीं था। उनका मक़सद उसे बदलना था। और यह काम समाज-सत्य पर प्रामाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना सम्भव नहीं हो सकता। ख़ास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो। हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब ख़ूबियाँ मिलती हैं। उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है।
तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केन्द्रीय स्वर मुख्यत: सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं। इसमें हिन्दी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके सम्बन्धों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं। पाक्षिक ‘सारिका’ में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबन्धों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज़ करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है।
गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था। हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की ज़रूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे।
Kahat Kabeer
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

-
Description:
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उद् देश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा। न उन्होंने हवाई कहानियाँ बुनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया। अपने दौर की राजनीतिक उठापटक को भी वे उतनी ही ज़िम्मेदारी और नज़दीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को। यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तम्भों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनीतिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यंग्य-निबन्धों को।
इस पुस्तक में उनके चर्चित स्तम्भ 'सुनो भई साधो' में प्रकाशित 1983-84 के दौर की टिप्पणियाँ शामिल हैं। यह वह दौर था जब देश खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा था। ये टिप्पणियाँ उस पूरे दौर पर एक अलग कोण से प्रकाश डालती हैं, साथ ही अन्य कई राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं का उल्लेख भी इनमें होता है। ज़ाहिर है ख़ास परसाई-अन्दाज़ में। मसलन, 21 नवम्बर, 83 को प्रकाशित ‘चर्बी, गंगाजल और एकात्मता यज्ञ’ शीर्षक लेख की ये पंक्तियाँ। “काइयाँ साम्प्रदायिक राजनेता जानते हैं कि इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थनीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति। वह समझता है गौमाता, गौहत्या, चर्बी, गंगाजल, यज्ञ। वह मध्ययुग में जीता है और आधुनिक लोकतंत्र में आधुनिक कार्यकर्म पर वोट देता है। इस असंख्य मूढ़ मध्ययुगीन जन पर राज करना है तो इसे आधुनिक मत होने दो।”
Baital Chhabbisi
- Author Name:
Vinod Bhatt
- Book Type:

-
Description:
गुजराती के सुविख्यात व्यंग्य लेखक विनोद भट्ट की यह कृति अपने पृष्ठों में सैकड़ों ऐसी बेजोड़ व्यंग्य कथाएँ सँजोए हुए हैं, जो मनोरंजक तो है ही, हमारी परम्परागत संस्कारशीलता का परिष्कार भी करती हैं। ये अनायास ही हमें वहाँ तक ले जाती हैं, जहाँ स्थितियाँ, इतिहास और चरित्र नए अर्थ देने लगते हैं। विनोद वस्तुतः पौराणिक और ऐतिहासिक मिथकों के सहारे समकालीन समाज की बहुविध विसंगतियों और मानव-स्वभाव की क्षुद्रताओं पर तीखे कटाक्ष करते हैं। कम-से-कम शब्दों में बड़ी-से-बड़ी बात कहना उनकी ख़ास पहचान बन चुकी है।
यह व्यंग्य-संग्रह कई उप शीर्षकों में बँटा हुआ है, जिनमें संगृहीत कथाएँ एक ख़ास अन्दाज़ में एक ख़ास विषय को उठाती हैं। इसके लिए परम्परागत भारतीय लोक-कथाओं, जातक-कथाओं, पच्चीसी, बत्तीसी तथा मेघदूत की शैली का उपयोग किया गया है। इससे कथाओं की पठनीयता और सहज ग्राह्यता में बढ़ोतरी हुई है, यहाँ तक कि ये आसानी से हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं और इनकी प्रभावशीलता हमें दूसरों को सुनाने की उत्तेजना से
भर देती है।
Sarkari Karya Mein Badha
- Author Name:
Vibhanshu Keshav
- Rating:
- Book Type:

-
Description:
देश की रक्षा के उपायों से मेरी उलझन बढ़ती जा रही थी। सहायक सुलझाता जा रहा था—भाई साहब हैं राष्ट्र के सेवक। उनके नीचे और भी कई राष्ट्रसेवक नियुक्त हैं। भाई साहब उन्हीं से राष्ट्र को बचा रहे हैं। वे भी भाई साहब से माँग करते हैं कि जैसे आप राष्ट्र की चिन्ता कर रहे हैं, वैसे ही हमें भी करने का अवसर दिया जाए। एक नौकरशाह कहता है—दस प्रतिशत राष्ट्र मैं भी पेट में सुरक्षित रखना चाहता हूँ। एक इंजीनियर कहता है—पाँच प्रतिशत मैं भी सुरक्षित रखना चाहता हूँ। एक ठेकेदार कहता है—दो प्रतिशत मैं भी सुरक्षित रखना चाहता हूँ। ये सब सुरक्षा के नाम पर राष्ट्र को खा जाने की साजिश कर रहे हैं। पर भाई साहब ऐसा होने नहीं देंगे। राष्ट्र को बचाने के लिए उन्होंने राष्ट्र को अपने पेट में रख लिया है। राष्ट्र की चिन्ता पर अब सिर्फ भाई साहब का ‘कॉपीराइट’ रहेगा। उनकी पारखी नजर में जो खरा उतरेगा, उन्हें जो ईमानदार लगेगा, उसे चिन्ता का कुछ प्रतिशत सुरक्षित रखने के लिए देंगे।
— ‘राष्ट्र चिन्ता का कॉपीराइट’ शीर्षक व्यंग्य से
Tipoo Ka Afsana : Himmat-E-Marda
- Author Name:
Frank Huzur
- Book Type:

- Description: इस किताब में उत्तर प्रदेश के युवा, सुचर्चित, सुस्वीकृत, सजग और सफल मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव तथा समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री मुलायम सिंह यादव के बेटे, टीपू के राजनीतिक जीवन पर बने कार्टून इकट्ठे किए गए हैं। वे कार्टून जो ख़ुद अखिलेश यानी टीपू को भी उतने ही प्यारे हैं जितने देश के लाखों-लाख पाठकों को। या हो सकता है उनसे भी ज़्यादा, क्योंकि संस्कृति-साहित्य और रचनात्मकता से ख़ास लगाव रखनेवाला यह युवा समाजवादी कार्टून विधा में कुछ ज़्यादा ही रस लेता है। कार्टूनकार ने अपनी रेखाएँ उनके ख़िलाफ़ उकेरी हों तो भी अखिलेश उसके रचनात्मक आयाम को नज़रअन्दाज़ नहीं करते और अच्छे कार्टूनों को अपने फ़ोन में सहेजकर रखते हैं। यह नेता के रूप में उनकी वयस्कता और सोच के खुलेपन की निशानी है और समाजवादी सहिष्णुता की एक अनुकरणीय मिसाल। इन कार्टूनों में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल की खट्टी-मीठी झलकियाँ भी मिलेंगी और श्रेष्ठ कार्टून कला के संग्रहणीय नमूने भी जिन्हें आप भी अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे।
Nadi Mein Khada Kavi
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

-
Description:
अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बज़िद कि अब नहीं उठूँगी।
फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही उठूँगी। दादी उठती है। बिलकुल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वर्जनाओं-निषेधों से मुक्त, नए रिश्तों और नए तेवरों में पूर्ण स्वच्छन्द।
कथा लेखन की एक नई छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अन्दाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अन्तर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरन्तरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘क़त्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए।
और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन व मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जन्तु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सड़क या पुश्तैनी दरवाज़े की आवाज़ में बयान होती है) या गद्य और काव्य : ‘धम्म से आँसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूँद।’
Pratinidhi Vyang : Harishankar Parsai
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: हरिशंकर परसाई हिन्दी के पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के-फुल्के मनोरंजन की परम्परागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा है। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने खड़ा करती हैं, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असम्भव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन-मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान-सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा-शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सिर पर नहीं, सामने ही बैठा है।
Rashtriya Naak
- Author Name:
Vishnu Nagar
- Book Type:

-
Description:
विष्णु नागर का व्यंग्य सबसे पहला हमला हमारी आदतों और ‘कंडीशनिंग्स’ पर करता है—वे आदतें जो हमारे ‘सामान्य नागरिक’ होने के अहं का निर्माण और पोषण करती हैं और जिनके आधार पर हमारी सुविधा और हमारा यथास्थितिवाद खड़ा होता है। यह व्यंग्य हमारे मुहावरों को विचलित कर देता है और हम यकायक, विकल होकर देखते हैं कि हमारे दैनिक जीवन की जो चीज़ें हमें तक़रीबन ‘परम’ प्रतीत होती हैं, सवाल उन पर भी उठाया जा सकता है, और सबसे बड़ी बात कि, उन पर हँसा भी जा सकता है।
स्थितियों के भीतर व्यंग्य की इस उपस्थिति को पकड़ने के लिए कई बार विष्णु नागर का व्यंग्यकार कल्पना और अतिरंजना का सहारा भी लेता है, लेकिन यह उनका यथार्थ से हटना या कटना नहीं है, बल्कि यथार्थ की एक सुलभ परत से आगे जाकर उसकी कुछ दुर्लभ और दुरूह छवियों तक पहुँचने की कोशिश करना है, इसीलिए कई बार ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ और ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ जैसे मुहावरे भी उनकी व्यंग्य–रचना के प्रस्थान बिन्दु हो सकते हैं जो किसी व्यंग्य का निशाना होने के लिए इतने निरीह, निर्दोष और निष्पक्ष दिखाई देते हैं लेकिन विष्णु नागर उनसे भी अपना लक्ष्य साध लेते हैं।
Bholaram Ka Jeev
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Rating:
- Book Type:

- Description: परसाई के पास एक ऐसी नैतिक दृष्टि है जो गहरे पर्यवेक्षण, अनुभव, अध्ययन और वैचारिकता से बनी है। यह उन्हें साहसी तथा आत्मविश्वासी बनाती है, जो काइयाँ से काँइयाँपन में होड़ लेनेवाली भी है। हम उनके लेखन में बार-बार पाएँगे कि वे कुतर्कियों को यूँ ही बख्श नहीं देते, उनसे प्रतिस्पर्धा करते हैं और खदेड़ते हुए दूर तक उनके पीछे जाते हैं। परसाई श्रेष्ठ व्यंग्यकार इसलिए हैं कि वे केवल व्यंग्यकार ही नहीं हैं। हर स्थिति में व्यंग्य को नहीं बरतते; जब अनिवार्य होता है, तभी उसका उपयोग करते हैं। इसका सम्बन्ध परसाई के संवेदनशील-विचारधारायुक्त प्रगतिशील व्यक्तित्व से है जो उनके व्यंग्य नए रूपों में नैतिक और कलात्मक बनाता है। जब वे स्वार्थियों, शोषकों, भ्रष्टाचारियों, अहंकारियों, पाखंडियों, नैतिकता का मुखौटा लगाए व्यक्तियों का चित्रण करते हैं तो उनका रूप अलग होता है और सामान्य, शोषित, अभावग्रस्त, प्रतिकूल परिस्थितियों में पिस रहे लोगों का चित्रण करते समय वे एकदम बदल जाते हैं। कुल मिलाकर परसाई की ये रचनाएँ उनके रचना-संसार का दूसरा पक्ष प्रस्तुत करती हैं। इन रचनाओं में मामूली, सामान्य घरों के युवक-युवतियाँ और साहित्य-राजनीति के क्षेत्र के कुछ व्यक्तित्व मानवीयता और आचरण संहिता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। यह अमानवीयता के नीचे दबी मानवीय सम्भावनाओं का सर्जनात्मक-आग्रहपूर्वक प्रकटीकरण है जो पहले पक्ष का पूरक है और परसाई की रचनाओं के सौन्दर्य-बोध के ढाँचे को समझने में सहायक है।
Dulari Chachi
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
- Book Type:

- Description: ‘दुलारी चाची’ रोज-रोज बदल रहे भारतीय ग्रामीण समाज का आख्यान है। दिलचस्प यह है कि परिवर्तन की यह कथा उन तमाम जड़ताओं को अनावृत करती चलती है जो इस समाज की प्रगति की राह में सदियों से रोड़ा बनी हुई हैं। जाति के आधार पर ऊँच-नीच का वर्चस्ववादी विभाजन; धर्म, संस्कृति और परम्परा के नाम पर के नाम पर कुरीतियों का महिमामंडन, स्त्रियों की परवशता और उपेक्षा ऐसे ही रोड़े हैं जिनको लेखक ने खासे व्यंग्यात्मक अन्दाज में वर्णित किया है। वह दिखलाता है कि हमारे समाज की कथित महानताओं की नींव इन्हीं रोड़ों-पत्थरों पर टिकी हुई है, वास्तविक प्रगति के लिए उन्हें जल्द से जल्द उखाड़ फेंकना आवश्यक है। यह उपन्यास उस सत्ता-संरचना को करीने से उजागर करता है जिसमें उच्चासन पर बैठी जमात के वर्चस्व के पारम्परिक हथियारों की धार, बदल रहे वक्त के दबाव में, भोथरी होती जा रही है जबकि हमेशा से दबाए गए लोग अब मुखर हो रहे हैं। विशेष यह कि इस बदलाव की वाहक हैं वे स्त्रियाँ जो अब तक अपने मायके के गाँव और पति-पुत्र के नाम से ही अस्तित्व पाती रही हैं, जिन्हें ताउम्र उनके नाम से पुकारा तक नहीं गया। यह चन्द्रकिशोर जायसवाल की लेखनी का कौशल है कि इस उपन्यास में यथार्थ और स्वप्न एक-दूसरे से बिल्कुल घुलमिल गए हैं। यथार्थ जो असहज करता है, बेचैन करता है और स्वप्न जो आश्वस्त करता है, प्रेरित करता है। वस्तुतः ‘दुलारी चाची’ केवल वर्तमान का अंकन नहीं करता बल्कि उन रास्तों को भी रेखांकित करता चलता है जो हमारे समाज को इच्छित भविष्य तक ले जाने वाला है। एक अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय कृति।
To Angrej Kya Bure The
- Author Name:
Ravindra Badgaiya
- Book Type:

-
Description:
व्यंग्य आधुनिक साहित्य का अचूक अस्त्र है। विसंगतियों, विडम्बनाओं और पाखंड आदि पर प्रहार करते समय इसका उपयोग अत्यन्त रोचक अभिव्यक्तियों को जन्म देता है। ‘तो अंग्रेज़ क्या बुरे थे’ व्यंग्य-मिश्रित ललित गद्य का दिलचस्प उदाहरण है। इस पुस्तक में विभिन्न विषयों, मुद्दों और प्रसंगों पर तेज़-तर्रार टिप्पणियाँ हैं।
लेखक रविन्द्र बड़गैयाँ की दृष्टि उन बिन्दुओं पर टिकी है जिन्हें प्रायः हम सब महसूस करते हैं। रविन्द्र सामान्य अनुभवों के बीच ऐसे अन्तराल खोज लेते हैं जहाँ से कटाक्ष झाँकते हैं, ठहाके झिलमिलाते हैं और बेचैन कर देनेवाली व्यंजनाएँ प्रकाशित होती हैं।
इस पुस्तक में अनेक ऐसे वाक्य हैं जो व्यवस्था की विचित्र अवस्था का विश्लेषण करते हैं। जैसे ‘...सेवक को राजा बनाना आसान था पर राजा को वापस सेवक बनाना नामुमकिन।’ ऐसे कथनों के मूल में है सामाजिक मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान। लेखक इसमें पारंगत लगता है। समग्रतः यह पुस्तक पाठक को मुस्कुराते हुए कुछ सोचने के लिए विवश करती है।
Sharad Parikrama
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

-
Description:
शरद जोशी के व्यंग्य का क्षेत्र बहुत व्यापक और विविधवर्णी रहा है। लेखन उनकी आजीविका का भी साधन था। एक सम्पूर्ण लेखक का जीवन जीते हुए उन्होंने अपने दैनंदिन की लगभग हर घटना, हर ख़बर को अपने व्यंग्यकार की निगाह से ही देखा। उनके विषयों में प्रमुख यद्यपि समकालीन राजनीति और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार ही रहा, लेकिन क्षरणशील समाज की भी ज़्यादातर नैतिक दुविधाओं को उन्होंने अपना विषय बनाया।
मुक्तिबोध ने कहीं कहा था कि सच्चा लेखक सबसे पहले अपना दुश्मन होता है, अपने कठघरे में जो लेखक ख़ुद को खड़ा नहीं कर सकता, वह दूसरों को भी नहीं कर सकता। शरद जोशी भी जब मौक़ा आता है, ख़ुद भी अपने व्यंग्य के सामने खड़े हो उसकी धार का सामना करते हैं। अपने अनेक निबन्धों में उन्होंने अपनी मध्यवर्गीय सीमाओं, चिन्ताओं और हास्यास्पदताओं का मज़ाक़ बनाया है।
सच्चे व्यंग्यकार की तरह उन्होंने अपने लेखन में न सिर्फ़ जीवन की समीक्षा की, बल्कि व्यंग्य की ज़मीन पर जमे रहते हुए कहानी और लघु-कथाओं आदि विधाओं में भी प्रयोग किए। कवि-मंचों पर उनकी गद्यात्मक उपस्थिति तो अपने ढंग का प्रयोग थी ही।
‘परिक्रमा’ उनका पहला व्यंग्य-संग्रह है जिसका प्रकाशन 1958 में हुआ था। इस नज़रिए से इसका अध्ययन विशेष महत्त्व रखता है।
Kuchh Jamin Par Kuchh Hava Mein
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी व्यंग्य-विधा को जिन रचनाकारों ने सार्थकता सौंपी है, श्रीलाल शुक्ल उनकी पहली पंक्ति में गण्य हैं। हिन्दी जगत में उन्हें यह सम्मान ‘राग दरबारी’ और ‘पहला पड़ाव’ जैसे विशिष्ट उपन्यासों के कारण तो प्राप्त है ही, अपने व्यंग्यात्मक निबन्धों के लिए भी है। ‘यहाँ से वहाँ’, ‘अंगद का पाँव’ और ‘उमराव नगर में कुछ दिन’ उनकी पूर्व प्रकाशित व्यंग्य-कृतियाँ हैं और इस क्रम में यह उनकी एक अन्य महत्त्वपूर्ण कृति है।
इन निबन्धों में श्रीलाल शुक्ल की रचना-दृष्टि विभिन्न वस्तु-सत्यों को उकेरती दिखाई देती है। इनमें से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निबन्धों के लिए ‘ज़मीन पर’ और रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारित निबन्धों के लिए ‘हवा में’ कहकर भी उन्होंने जिस व्यंग्यार्थ की व्यंजना की है, उसकी ज़द में सर्वप्रथम वे स्वयं भी आ खड़े हुए हैं। इसमें उनके व्यंग्य की ईमानदारी भी है और अन्दाज़ भी। सामाजिक विसंगतियों, विडम्बनाओं और समकालीन जीवन की विकृतियों की बेलाग शल्य-चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास है।
साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, इतिहास और राजनीति—किसी की भी रुग्णता उनके सोद्देश्य व्यंग्योपचार का विषय हो सकती है। इसके अतिरिक्त यह संग्रह कुछ वरिष्ठ रचनाकारों को उनकी समग्र सृजनशीलता के सन्दर्भ में समझने का भी अवसर जुटाता है। कहना न होगा कि श्रीलाल शुक्ल की यह व्यंग्य कृति हिन्दी व्यंग्य को कुछ और समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Shaadi Himaqat Hai
- Author Name:
Shauqat Thanvi
- Book Type:

- Description: इस किताब में शौकत थानवी की चुनिन्दा मज़ाहिया तहरीरें शामिल हैं जिसमें न केवल आपको हँसाने और गुदगुदाने का सामान है बल्कि उर्दू की मिज़ाह-निगारी से आपका तआरुफ़ भी कराती हैं।
Jeep Par Sawar Illiyan
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

-
Description:
‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ एक ऐसा ‘व्यंग्य-संग्रह’ है जिसकी प्रत्येक रचना में शरद जोशी की पैनी दृष्टि किसी न किसी विसंगति का मार्मिक उद्घाटन करती है और रेखांकित करती है कि शरद जोशी की व्यंग्य-दृष्टि का कहीं कोई जोड़ नहीं है।
वस्तुतः संग्रह की रचनाएँ यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि शरद जोशी सतत जागरूक व्यंग्यकार की भूमिका में इसलिए चर्चित हुए कि उनकी नज़र अपने परिवेश पर ही नहीं, अपितु जीवन और समाज की हर छोटी-से-छोटी घटना पर टिकी रहती थी जिसके कारण इस संग्रह की रचनाओं में धर्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत आचरण और ऐसा ही बहुत कुछ समाया हुआ है—चकित करता हुआ, चौंकाता हुआ, चुटकी काटता हुआ या गुदगुदाता हुआ।
कम शब्दों में कहें तो शरद जोशी की यह कृति ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ व्यंग्य-विधा की कठिन चुनौतियों को पूरा करती है और व्यंग्य के निकष पर खरा उतरती है। उनके व्यंग्य भ्रष्ट नेताओं की कलई खोलनेवाले तो हैं ही, सामाजिक जीवन और लोकतंत्र की रखवाली भी करते हैं और उनकी व्यंग्य-दृष्टि इतनी पैनी है कि कोई भी विसंगति उससे बिंधे बिना नहीं रह पाती।
Mafia Zindabad
- Author Name:
Harish Naval
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Vikalang Shraddha Ka Daur
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

-
Description:
हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था–‘व्यंग्य’ अब ‘शूद्र’ से ‘क्षत्रिय’ मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है, ब्राह्मण नहीं, क्योंकि ब्राह्मण ‘कीर्तन’ करता है।
निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता, पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर, कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें–जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर।
विकलांग श्रद्धा का दौर के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं, ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।
Teparesi Ritarns
- Author Name:
B.N. Mallesh
- Rating:
- Book Type:

- Description: ಸಾಮಾಜಿಕ ವಿದ್ಯಮಾನಗಳನ್ನು ಸೂಕ್ಷ್ಮ ದೃಷ್ಟಿಯಿಂದ ನೋಡಿ ಅವುಗಳಿಗೆ ಹಾಸ್ಯದ ಲೇಪನ ನೀಡಿ, ವ್ಯಂಗ್ಯ, ವಿಡಂಬನೆಗಳ ಮೂಲಕ ಆರೋಗ್ಯಕರ ಸಮಾಜ ನಿರ್ಮಾಣದ ಆಶಯದೊಂದಿಗೆ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳಿವೆ. ಆಯ್ದ ವಸ್ತು, ನಿರೂಪಣಾ ಶೈಲಿ, ಸಾಮಾಜಿಕ ಹೊಣೆಗಾರಿಕೆಯ ಎಚ್ಚರ ಇಂತಹ ಸಾಹಿತ್ಯಕ ಅಂಶಗಳಿಂದ ಇಲ್ಲಿಯ ಬರಹಗಳು ಓದುಗರ ಗಮನ ಸೆಳೆಯುತ್ತವೆ. There are writings here with the hope of building a healthy society by looking at social phenomena from a sensitive point of view and giving them a coating of humor, irony and satire. The writings here attract the attention of the readers due to such literary elements as selected material, narrative style, awareness of social responsibility.
Pagdandiyon Ka Zamana
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
White House Mein Ramleela
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

-
Description:
आलोक पुराणिक ने अपनी रचनाओं से व्यंग्य विधा को एक नया शिल्प और सौन्दर्य प्रदान कर विशिष्ट पहचान दी है। ‘व्हाइट हाउस में रामलीला’ उनका महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इस व्यंग्य-संग्रह में उनकी आकार में छोटी दिखनेवाली टिप्पणियाँ विचार का एक
बड़ा कैनवस रचती हैं। आम आदमी की रोज़मर्रा की पीड़ा से लेकर व विश्व फ़लक पर होनेवाली घटनाओं तक सबको उन्होंने इसमें समेटा है।
आज की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विडम्बनाओं का परत-दर-परत खोलते हुए व्यंग्यकार ने उन कारणों की ओर भी संकेत किया है जो इन स्थितियों के मूल में हैं।
कुछ लेखों में धार्मिक आडम्बरों और ढोंगों पर भी व्यंग्य किया गया है जो लोगों की भावनाओं का लाभ उठाकर अपनी जेब भरते हैं।
समसामयिक जीवन और समाज के विभिन्न पक्षों पर तीखी निगाह से दृष्टिपात करते ये व्यंग्य-लेख निश्चय ही पाठकों को लम्बे समय तक याद रहेंगे।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book