Vikalang Shraddha Ka Daur
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<span style="font-weight: 400;">हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था</span><span style="font-weight: 400;">–‘</span><span style="font-weight: 400;">व्यंग्य</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">अब </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">शूद्र</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">से </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">क्षत्रिय</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ब्राह्मण नहीं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">क्योंकि ब्राह्मण </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">कीर्तन</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">करता है।</span></p> <p><span style="font-weight: 400;">निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें</span><span style="font-weight: 400;">–</span><span style="font-weight: 400;">जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर।</span></p> <p><span style="font-weight: 400;">विकलांग श्रद्धा का दौर के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।</span>
Read moreAbout the Book
<span style="font-weight: 400;">हरिशंकर परसाई ने अपनी एक पुस्तक के लेखकीय वक्तव्य में कहा था</span><span style="font-weight: 400;">–‘</span><span style="font-weight: 400;">व्यंग्य</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">अब </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">शूद्र</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">से </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">क्षत्रिय</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">मान लिया गया है। विचारणीय है कि वह शूद्र से क्षत्रिय हुआ है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ब्राह्मण नहीं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">क्योंकि ब्राह्मण </span><span style="font-weight: 400;">‘</span><span style="font-weight: 400;">कीर्तन</span><span style="font-weight: 400;">’ </span><span style="font-weight: 400;">करता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">निस्सन्देह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">पर कीर्तन को और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है। कैसे-कैसे अवसर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">कैसे-कैसे वाद्य और कैसी-कैसी तानें</span><span style="font-weight: 400;">–</span><span style="font-weight: 400;">जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा विकलांग श्रद्धा का (यह) दौर।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विकलांग श्रद्धा का दौर के व्यंग्य अपनी कथात्मक सहजता और पैनेपन में अविस्मरणीय हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ऐसे कि एक बार पढक़र इनका मौखिक पाठ किया जा सके। आए दिन आसपास घट रही सामान्य-सी घटनाओं से असामान्य समय-सन्दर्भों और व्यापक मानव-मूल्यों की उद्भावना न सिर्फ रचनाकार को मूल्यवान बनाती है बल्कि व्यंग्य-विधा को भी नई ऊँचाइयाँ सौंपती है। इस दृष्टि से प्रस्तुत कृति का महत्त्व और भी ज्यादा है।</span>
Book Details
-
ISBN9788126701179
-
Pages147
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नई शैली में नई बात कहने के लिए ईश्वर की कहानियाँ साहित्य की दुनिया में चर्चित हैं। लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये कहानियाँ जहाँ भी छपी हैं, इन्हें पाठकों ने पसन्द किया है। इन पाठकों में बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी शामिल हैं। अपने ही ढंग की इन छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से हर पाठक अपने आसपास बिखरे यथार्थ के व्यंग्य को समझ सकता है। ये पाठक की कल्पनाशीलता को भी उर्वर करती हैं और वह अपने भीतर छिपी ऐसी तमाम कहानियों को ख़ुद गढ़ना शुरू कर देता है।
पाठक की कल्पना को इस तरह जाग्रत् करनेवाली रचनाएँ दुर्भाग्य से हमारे साहित्य में अधिक नहीं हैं। ईश्वर तो दरअसल यथार्थ को खोलने-उधेड़ने-जाँचने का बहाना है। लेकिन इस बहाने के बग़ैर यथार्थ के अनेक पक्ष प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित भी नहीं हो पाते। पहली बार इस पुस्तक में अभी तक प्रकाशित ईश्वर की सभी कहानियाँ एक साथ संकलित हैं।
Awara Bheed Ke Khatare
- Author Name:
Harishankar Parsai
- Book Type:

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‘आवार भीड़ के खतरे’ पुस्तक हिन्दी के अन्यतम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के निधन के बाद उनके असंकलित और कुछेक अप्रकाशित व्यंग्य-निबन्धों का एकमात्र संकलन है। अपनी कलम से जीवन ही जीवन छलकानेवाले इस लेखक की मृत्यु खुद में एक महत्त्वहीन-सी घटना बन गई लगती है। शायद ही हिन्दी साहित्य की किसी अन्य हस्ती ने साहित्य और समाज में जड़ जमाने की कोशिश करती मरणोन्मुखता पर इतनी सतत, इतनी करारी चोट की हो !
इस संग्रह के व्यंग्य-निबन्धों के रचनाकाल का और उनकी विषय-वस्तु का भी दायरा काफी लम्बा-चौड़ा है। राजनीतिक विषयों पर केन्द्रित निबन्ध कभी-कभी तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ की माँग करते हैं लेकिन यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो भी परसाई की मर्मभेदी दृष्टि, उनका वॉल्तेयरीय चुटीलापन इन्हें पढ़ा ले जाने का खुद में ही पर्याप्त कारण है। वैसे राजनीतिक व्यंग्य इस संकलन में अपेक्षाकृत कम हैं–सामाजिक और साहित्यिक प्रश्नों पर केन्द्रीकरण ज्यादा है।
हँसने और संजीदा होने की परसाई की यह आखिरी महफिल उनकी बाकी सारी महफिलों की तरह ही आपके लिए यादगार रहेगी।
Jeep Par Sawar Illiyan
- Author Name:
Sharad Joshi
- Book Type:

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Description:
‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ एक ऐसा ‘व्यंग्य-संग्रह’ है जिसकी प्रत्येक रचना में शरद जोशी की पैनी दृष्टि किसी न किसी विसंगति का मार्मिक उद्घाटन करती है और रेखांकित करती है कि शरद जोशी की व्यंग्य-दृष्टि का कहीं कोई जोड़ नहीं है।
वस्तुतः संग्रह की रचनाएँ यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि शरद जोशी सतत जागरूक व्यंग्यकार की भूमिका में इसलिए चर्चित हुए कि उनकी नज़र अपने परिवेश पर ही नहीं, अपितु जीवन और समाज की हर छोटी-से-छोटी घटना पर टिकी रहती थी जिसके कारण इस संग्रह की रचनाओं में धर्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत आचरण और ऐसा ही बहुत कुछ समाया हुआ है—चकित करता हुआ, चौंकाता हुआ, चुटकी काटता हुआ या गुदगुदाता हुआ।
कम शब्दों में कहें तो शरद जोशी की यह कृति ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ व्यंग्य-विधा की कठिन चुनौतियों को पूरा करती है और व्यंग्य के निकष पर खरा उतरती है। उनके व्यंग्य भ्रष्ट नेताओं की कलई खोलनेवाले तो हैं ही, सामाजिक जीवन और लोकतंत्र की रखवाली भी करते हैं और उनकी व्यंग्य-दृष्टि इतनी पैनी है कि कोई भी विसंगति उससे बिंधे बिना नहीं रह पाती।
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