Tulsi Ke Hanuman
(0)
Author:
Shriram MehrotraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
600
480 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास काव्य-जगत् के निर्विवाद साहित्य सम्राट हैं, यह सत्य है किन्तु कवि होते हुए उनके अद्वितीय जुझारू समाजसेवी व्यक्तित्व का विस्तार से प्रकाशन हो तो उन्हें साहित्य-सम्राट जैसी ही एक और उपाधि देने में संकोच नहीं होगा। ‘रा’ और ‘म’ दो अक्षर मात्र पर ‘रामबोला’ ने बारह आर्ष ग्रन्थों की रचना देश की परम राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल की विषमता में की। लेखन-कार्य सुरक्षित बन्द कोठरियों में किया किन्तु अपनों और ग़ैरों के धार्मिक मदान्धता के संकटों में खुले मैदानों में अखाड़ची ताल की ठोक में अकेले चलते हुए महाबीर जी के नगर-भर में एक-दो नहीं, बारह विग्रहों की स्थापना को कवि का असाधारण साहस कहना ग़लत नहीं होगा।</p> <p>अपने महान् वैभव और अस्मिता को भूली वीर वसुन्धरा की ‘अमृतस्य पुत्र: जाति’ को फिर से जगाने के समाजकाज के लिए रामकाज करनेवाले बल, बुद्धि, विद्या, युक्ति, शक्ति के धनी हनुमान की मूर्ति-प्रतिष्ठा का तुलसीदास ने क्रान्तिकारी कार्य किया। आज इसका कोई स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं है कि ये स्थापनाएँ कहाँ-कहाँ हैं। लेखक को मात्र दस मन्दिर मिले। काशी के एक कोने से दूसरे कोने तक आज इनकी वास्तविक स्थिति का पता लगानेवाला लेखा-जोखा श्री मेहरोत्रा का यह शोध-ग्रन्थ है।</p> <p>इस ग्रन्थ में उन अखाड़ों, लीलाओं का भी विवेचन है जिन्हें तुलसीदास जी ने नगर के कोने-कोने में मन्दिरों के साथ स्थापित किया था। ये स्थापनाएँ साबित करती हैं कि तुलसीदास एक व्यक्ति या साहित्यकार मात्र ही नहीं, सम्पूर्ण संस्कृति थे। आज हम सब का पुनीत कर्त्तव्य है कि इन सांस्कृतिक धरोहरों की पूर्ण निष्ठा से संरक्षा करें। तुलसीदास जी द्वारा स्थापित बारह अखाड़ों में आज मात्र दो शेष हैं। सम्भवत: राजमन्दिर से उन्होंने पहला रामलीला मंचन आरम्भ किया था जो आज धनाभाव के कारण बन्द है। उस लीला मंचन के भवन अभी तीन वर्ष पूर्व तक जीवित अवशेष थे जिन पर अब किसी का क़ब्ज़ा है। ये पुरातात्त्विक अवशेष राष्ट्र की धरोहर हैं। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने समाज और सरकार दोनों को इन्हें संरक्षित रखने का आह्वान किया है।
Read moreAbout the Book
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास काव्य-जगत् के निर्विवाद साहित्य सम्राट हैं, यह सत्य है किन्तु कवि होते हुए उनके अद्वितीय जुझारू समाजसेवी व्यक्तित्व का विस्तार से प्रकाशन हो तो उन्हें साहित्य-सम्राट जैसी ही एक और उपाधि देने में संकोच नहीं होगा। ‘रा’ और ‘म’ दो अक्षर मात्र पर ‘रामबोला’ ने बारह आर्ष ग्रन्थों की रचना देश की परम राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल की विषमता में की। लेखन-कार्य सुरक्षित बन्द कोठरियों में किया किन्तु अपनों और ग़ैरों के धार्मिक मदान्धता के संकटों में खुले मैदानों में अखाड़ची ताल की ठोक में अकेले चलते हुए महाबीर जी के नगर-भर में एक-दो नहीं, बारह विग्रहों की स्थापना को कवि का असाधारण साहस कहना ग़लत नहीं होगा।</p>
<p>अपने महान् वैभव और अस्मिता को भूली वीर वसुन्धरा की ‘अमृतस्य पुत्र: जाति’ को फिर से जगाने के समाजकाज के लिए रामकाज करनेवाले बल, बुद्धि, विद्या, युक्ति, शक्ति के धनी हनुमान की मूर्ति-प्रतिष्ठा का तुलसीदास ने क्रान्तिकारी कार्य किया। आज इसका कोई स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं है कि ये स्थापनाएँ कहाँ-कहाँ हैं। लेखक को मात्र दस मन्दिर मिले। काशी के एक कोने से दूसरे कोने तक आज इनकी वास्तविक स्थिति का पता लगानेवाला लेखा-जोखा श्री मेहरोत्रा का यह शोध-ग्रन्थ है।</p>
<p>इस ग्रन्थ में उन अखाड़ों, लीलाओं का भी विवेचन है जिन्हें तुलसीदास जी ने नगर के कोने-कोने में मन्दिरों के साथ स्थापित किया था। ये स्थापनाएँ साबित करती हैं कि तुलसीदास एक व्यक्ति या साहित्यकार मात्र ही नहीं, सम्पूर्ण संस्कृति थे। आज हम सब का पुनीत कर्त्तव्य है कि इन सांस्कृतिक धरोहरों की पूर्ण निष्ठा से संरक्षा करें। तुलसीदास जी द्वारा स्थापित बारह अखाड़ों में आज मात्र दो शेष हैं। सम्भवत: राजमन्दिर से उन्होंने पहला रामलीला मंचन आरम्भ किया था जो आज धनाभाव के कारण बन्द है। उस लीला मंचन के भवन अभी तीन वर्ष पूर्व तक जीवित अवशेष थे जिन पर अब किसी का क़ब्ज़ा है। ये पुरातात्त्विक अवशेष राष्ट्र की धरोहर हैं। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने समाज और सरकार दोनों को इन्हें संरक्षित रखने का आह्वान किया है।
Book Details
-
ISBN9788180319358
-
Pages164
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Shri Hanuman Chalisa Rahasy
- Author Name:
Shailesh Tiwari
- Rating:
- Book Type:

- Description: Book
Molige Maarayya : Molige Mahadevi
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

-
Description:
महिलाएँ इस दुनिया में सदैव ही उपेक्षित रही हैं। उनको सामाजिक भागीदारी से दूर रखा गया, अतः वे साहित्य एवं सांस्कृतिक लोक में हाशिए पर रही हैं। पर इस वचन साहित्य के सन्दर्भ में महिला अपने व्यक्तित्व विकास की बुलंदी पर पहुँच चुकी थी, ऐसा लगता है।
घास-फूस, झाड़ निकाले बिना खेत स्वच्छ न होता/अशुद्धि और मल को स्वच्छ किए बिना मन शुद्ध न होता/जीव का मूल जाने बिना तन शुद्ध न होता/काय जीव का सम्बन्ध जाने बिना ज्ञानलेपी नहीं होता/इस प्रकार जो भाव भ्रमित हैं उन्हें क्यों ज्ञान प्राप्ति/निष्कळंक मल्लिकार्जुन?॥ भक्त भगवान का सम्बन्ध, जल कमल की रीति के समान/भक्त भगवान सम्बन्ध, क्षीर-नीर की रीति के समान/तुम्हारे और मेरे लिए अलग-अलग ठाँव है क्या/निष्कळंक मल्लिकार्जुन?॥
—मोळिगे मारय्या
Awadh Ke Pramukh Vrat-Parva-Tyohar Evam Riti-Rivaj
- Author Name:
Dr. Vidya Vindu Singh
- Book Type:

-
Description:
हमारा भारतवर्ष मुख्य रूप से कथा धर्मी देश है। तप-साधना से तो नव-नव ज्ञान की सूझें मिलती ही हैं पर चित्त की रस तृप्ति द्वारा प्रेरित संरचनात्मक धर्मिता से भी हमारे देश ने कुछ कम उपलब्धियाँ नहीं पाईं। इस बात को मैं बार-बार कहते हुए भी नही अघाता हूँ कि मुख्य रूप से भारत ही एक ऐसा देश है जिसने पुराण कथाओं के संग्रह और भारत जैसे आसमुद्र हिमालय वाले महादेश में वैष्णवधर्मी एक राष्ट्रीयता का निर्माण करने के लिए नैमिषारण्य में कथा यूनिवर्सिटी बनाई थी।
लोक साहित्य-संगीत और कला में गहन रुचि रखने के साथ ही डॉ. विद्या विन्दु सिंह स्वयं भी कथाएँ लिखती हैं। कामना करता हूँ कि विदुषी लेखिका का कर्म और यश उत्तरोत्तर वर्द्धमान हो।
—अमृतलाल नागर
Vinay Patrika
- Author Name:
Tulsidass
- Book Type:

-
Description:
आत्म निवेदन का सीधा सम्बन्ध अन्तःकरण के आयतन से है। इस तरह की रचनाओं में आत्म-संवाद झलकता है। सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य के इतिहास में तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ और निराला की ‘अणिमा’ से लेकर ‘सांध्यकाकली’ तक की रचनाओं में यह स्वर विशेष रूप से सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखी होकर किया गया आत्मविश्लेषण, अन्तर्द्वन्द्वों की गहराई, निर्भय होकर की गई आत्म-समीक्षा और सामाजिकता इन रचनाओं को अपने युग का प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं।
तुलसीदास के ‘हौं’ और निराला के ‘मैं’ की प्रकृति, घनत्व और आत्मविस्तार का धरातल उन्हें भिन्न कालखंडों में भी समानधर्मा बनाता है—‘उत्पस्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा, कालो ह्यं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी’। ‘विनय पत्रिका’ और निराला की परवर्ती रचनाओं में अभिव्यक्त विनय-भावना कपोल कल्पना या आत्म-प्रवंचना नहीं है। यह दोनों कवियों के जीवन की गाढ़ी कमाई और सर्जनात्मक उपलब्धि है। दार्शनिक स्तर पर जीवन-जगत के प्रति द्वन्द्वात्मक अन्तर्दृष्टि एवं ‘अखिल कारुणिक मंगल’ के प्रसार की कामना ने भक्ति का साधारणीकरण कर दिया है। तुलसीदास का ‘हौं’ एवं निराला का ‘मैं’, अपने समाज से अन्तःक्रिया करते हुए बना है। आत्म-मुक्ति आत्म-प्रसार की भावना से अविच्छिन्न है। दोनों की विनय भावना का अन्त न तो भाग्यवाद में होता है और न ही निराशा में। इस दृष्टि से ‘विनय पत्रिका’ का अन्तिम पद और निराला की अन्तिम रचना सहज तुलनीय है।
Hindu Dharma Ki Dharohar : Bharatiya Sanskriti
- Author Name:
Sanjay Rai Sherpuria
- Book Type:

- Description: ‘हिंदू धर्म की धरोहरः भारतीय संस्कृति’ यह शीर्षक स्वयं में इस पुस्तक का समग्र परिचय करवा रहा है। सनातन हिंदू धर्म क्या है और किस प्रकार से यह भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि के रूप में निरंतर क्रियाशील है, यही तथ्य इस पुस्तक के आधार तत्व हैं। यज्ञ, हवन, शंख, पद्म, गाय, त्रिशूल, मंदिर, देवस्थान जैसे शब्द सनातन हिंदू वैदिक संस्कृति में ही हैं। ये केवल शब्द ही नहीं हैं बल्कि इन शब्दों के उच्चारण में ही ऐसा ध्वनित होता है कि जीवन और जीवन का रहस्य क्या है। हमारे देवी, देवता और धार्मिक प्रतीक क्या हैं? कैसे हैं? कितने महत्त्वपूर्ण हैं? क्यों हैं? स्वाभाविक है कि जिस प्रकार से समाज बदल रहा है और विश्व पटल पर अनेकानेक उपासना पद्धतियाँ जन्म ले रही हैं, ऐसे परिवेश में किसी को भी यदि हिंदू संस्कृति को जानना और समझना है तो संजय राय ‘शेरपुरिया’ की इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिस विशिष्टता से इस पुस्तक में सनातन प्रतीकों को मोतियों की माला में पिरोया गया है, वह अद्भुत है। भारतीयता, संस्कृति और हिंदू विरासत को समझने के लिए इस पुस्तक में सभी प्रमुख तथ्य, तत्त्व और प्रतीक उपस्थित हैं। यह पुस्तक एक ऐसी कुंजिका है जो भावी पीढ़ी को अपने मूल से जोड़ने और हिंदू संस्कृति को समझने में सक्षम भूमिका का निर्वहन करेगी। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य और निरंतरता बताती पठनीय पुस्तक।
Bahudha aur 9/11 ke baad ki dunia
- Author Name:
Balmeeki Prasad Singh
- Book Type:

-
Description:
इधर आतंकवाद और पुनरुत्थानवाद के उदय के कारण वैश्विक राजनीति में कुछ अहम परिवर्तन आए हैं। ये अभूतपूर्व चुनौतियाँ विश्व के नेताओं से एक नई, साहसी और कल्पनाशील राजनीति की माँग कर रही हैं। शान्ति की सदियों पुरानी तकनीकों से ऊपर उठने और विमर्श की हमारी भाषा की पुनर्रचना करने की ज़रूरत को रेखांकित करते हुए यह पुस्तक ‘बहुधा’ की अवधारणा को प्रस्तुत करती है; ‘बहुधा’—यानी एक शाश्वत सचाई, एक सातत्य; शान्तिपूर्ण जीवन और सौहार्द का संवाद। यह अवधारणा बहुजातीय समाजों और बहुवाद के अन्तर को बताती है, वैचारिक आदान-प्रदान की गुंजाइश देती है और सामूहिक कल्याण की समझ को प्रोत्साहित करती है।
पुस्तक को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में 1989 से 2001 की अवधि में घटी घटनाओं और विभिन्न देशों, संस्कृतियों और अन्तरराष्ट्रीय शान्ति पर पड़े उनके प्रभावों पर विचार किया गया है। मसलन—बर्लिन की दीवार का गिरना, हांगकांग का चीन में जाना और सितम्बर 11 को अमेरिका में हुआ हमला। दूसरे भाग में वेदों और पुराणों के उदाहरणों और अशोक, कबीर, गुरु नानक, अकबर व महात्मा गांधी की नीतियों के विश्लेषण के द्वारा बहुवादी चुनौतियों से निबटने के भारतीय अनुभवों को परखा गया है।
आगे के भागों में लेखक ने ‘बहुधा’ को सामूहिक सौहार्द की एक नीति के रूप में रेखांकित करते हुए विश्वस्तर पर इस दृष्टिकोण के अनुकरण पर विचार किया है। एक सद्भावनापूर्ण समाज की रचना के लिए लेखक शिक्षा और धर्म की भूमिका को केन्द्रीय मानते हैं और वैश्विक विवादों को हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ को शक्तिशाली बनाने की वकालत करते हैं।
लेखक की मान्यता है कि आतंकवाद का जवाब मानवाधिकारों के सम्मान और विभिन्न संस्कृतियों और मूल्य-व्यवस्थाओं के सम्मान में छिपा है। शान्तिपूर्ण विश्व के निर्माण के लिए, आवश्यक संवाद-प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए यह ज़रूरी है।
कई-कई विषय-क्षेत्रों में एक साथ विचरण करनेवाली यह कृति विद्यार्थियों, विद्वानों और इतिहास, दर्शन, राजनीति तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के शोधार्थियों के लिए समान रूप से रुचिकर साबित होगी।
Rigved : Mandal-9
- Author Name:
Govind Chandra Pandey
- Book Type:

-
Description:
वेद सनातनविद्या के काव्यात्मक प्रतिपादन हैं। ऋग्वेद संहिता के अनुवाद एवं व्याख्या का प्रयास अनेक भाषाओं में समय-समय पर होता रहा है, किन्तु अभी तक उपलब्ध सभी अनुवादों में काव्यपक्ष की उपेक्षा अथवा पद्यानुवाद की प्रस्तुति के असम्भव प्रयास ही किए गए हैं जो ऋचाओं के साथ पूरा न्याय नहीं करते हैं। वेदों में भावों की सनातनता एक व्यापक ध्वनि के रूप में सूक्तों, संवादों और आख्यानों में विद्यमान है। प्रस्तुत अनुवाद में पादानुसारी किन्तु भावपरक अनुवाद पर विशेष आग्रह सोद्देश्य है ताकि ऋचाओं की काव्यात्मकता का यथासम्भव सम्प्रेषण एवं मूल की अर्थयोजना का क्रम अनुवाद में सुरक्षित रहे।
भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
वेद आर्षकाव्य के निर्देशन के साथ-साथ अध्यात्मगवेषियों के मार्गदर्शक भी हैं। अतः ऋचाओं में संश्लिष्ट आधियाज्ञिक, आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक अर्थों को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। व्याख्याकारों में जहाँ विवाद की स्थिति है, वहाँ प्राचीन एवं नवीन दोनों ही मतों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार काव्यात्मक पक्ष की प्रस्तुति, निगूढ़ अर्थ के आयामों का विश्लेषण और विवादित स्थलों का तुलनात्मक विवेचन इस ग्रन्थ के अनुवाद एवं व्याख्या की अभीप्सित विशेषताएँ हैं।
इस खंड में ‘ऋग्वेद’ के नौवें मंडल का व्याख्या सहित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।
Sahaj Gita
- Author Name:
Arvind Kumar
- Book Type:

- Description: गीता के अनगिनत अनुवादों और भाष्यों के बावजूद आज ऐसे संस्करण उपलब्ध नहीं हैं जो आम आदमी को गीता पढ़ने में और उसके उपदेशों के बारे में निजी राय क़ायम करने में बहुत सहायता दे सकें—हालत यह है कि आम आदमी न तो गीता का मूल संस्कृत पाठ पढ़ पाता है, न अधिकतर अनुवादों की उलझी भाषा के कारण श्लोकों के अर्थ समझ पाता है—पाठकों की कठिनाइयाँ दूर करने के लिए यह सहज संस्करण एक साथ दो काम करता है—इसमें गीता के मूल संस्कृत पाठ को आम आदमी की सुविधा मात्र के लिए एक बिलकुल नई और सहज शैली में लिखा गया है—इस शैली के कारण संस्कृत के श्लोकों को पढ़ना काफ़ी हद तक सहज हो गया है। कहीं भी गीता के प्रवाह में व्यवधान नहीं आया है और न कहीं किसी प्रकार संस्कृत व्याकरण की हानि हुई है—वहीं इसमें गीता के श्लोकों का हिन्दी गद्य अनुवाद सीधे-सादे और छोटे-छोटे वाक्यों में किया गया है—भाषा आसान, आधुनिक और गैर–पंडिताऊ है, जिसे आज का आम पाठक बड़ी सहजता से समझ सकता है।
Chitt Basain Mahaveer : Jivan Aur Darshan
- Author Name:
Prem Suman Jain
- Book Type:

- Description: विश्व के साधक चिन्तकों में जैन दार्शनिक एवं तीर्थंकर कई दृष्टियों से स्मरण किए जाते हैं। उनका चिन्तन धर्म, जाति, देशकाल को गहरे प्रभावित करता है। उन्होंने प्राणीमात्र के कल्याण एवं विकास के सूत्र अपने उद्बोधनों में प्रदान किए हैं। भगवान महावीर का सन्देश है कि सुख, शान्ति, तनावरहित जीवन अपरिग्रह, सन्तोष, संयम से ही आ सकता है। तीर्थंकर महावीर ने अपने जीवन में व्यक्तिगत स्वामित्व के विसर्जन का प्रयोग करके बताया है। उन्होंने राज्यपद को त्यागा और पदार्थों के ढेर से अलग जा खड़े हुए, तब वे समता और शान्ति के स्वामी बने भगवान महावीर ने व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए एक ओर जहाँ आत्म-विकास का पथ प्रशस्त किया है, वहीं दूसरी ओर लोक-कल्याण के लिए सामाजिक मूल्यों का भी सृजन किया है। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त—ये तीनों मूल्य महावीर के सामाजिक अनुसन्धान के परिणाम हैं। तीर्थंकर महावीर के चिन्तन ने व्यक्ति को पुरुषार्थी और स्वावलम्बी बनने की शिक्षा दी है। उन्होंने मानव को सहिष्णु, निराग्रही होने का भी सन्देश दिया है। विचारों की उदारता से ही हम सत्य की तह तक पहुँच सकते हैं। तीर्थंकर महावीर का सारा जीवन आत्म-साधना के पश्चात् सामाजिक और नैतिक मूल्यों के निर्माण में ही व्यतीत हुआ। इसी कारण तीर्थंकर महावीर मानव जाति के गौरव के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ‘चित्त बसें महावीर’ पुस्तक में प्रो. प्रेम सुमन जैन ने तीर्थंकर महावीर के प्रेरणादायक जीवन और दर्शन को एक रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।
May Be We'll All Go Mad
- Author Name:
Ulla Berkewicz
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Urilinga Peddi-Kaalavve
- Author Name:
Kashinath Ambalge
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Prayagraj: Ardhkumbh, Kumbh, Mahakumbh
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
- Book Type:

- Description: भक्ति, तीर्थ, धर्म, ब्रह्म और मोक्ष की अवधारणा को समझे बिना भारत और उसकी चेतना को समझ पाना सम्भव नहीं है। भारत में जहाँ कहीं भी देवनदी के एक से अधिक प्रवाह एक साथ मिलकर बहने लगते हैं, धाराओं का वह मिलन-स्थान ‘प्रयाग’ बन जाता है। हिमालय क्षेत्र में पंचप्रयाग तीर्थ ऐसे ही बने हैं। परन्तु जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती की तीन धाराओं का मिलन होता है, उस स्थान को प्रयागराज कहा गया है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ स्नान के लिए, प्रति 6 वर्ष पर अर्धकुम्भ स्नान के लिए, प्रति 12 वर्ष पर कुम्भ स्नान के लिए और प्रति 144 वर्ष पर महाकुम्भ स्नान के लिए असंख्य लोग आते हैं। भाषा, जाति, प्रान्त आदि के भेदों को भुलाकर एक जन-समुद्र उमड़ आता है। भारतीय जीवन पद्धति में अमृतत्त्व का अनुसन्धान मानव जीवन का चरम लक्ष्य रहा है। अर्धकुम्भ, कुम्भ या महाकुम्भ के अवसर पर एकत्र होने वाला अपार जनसमुदाय सम्भवतः अमृत से भरे कुम्भ की अपनी अव्यक्त अभिलाषा को लेकर ही यहाँ पहुँचता है। प्रयागराज भारत का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है। कुम्भ सम्बन्धी पौराणिक मान्यता का सर्वाधिक प्रचार शंकराचार्य ने किया था। लेकिन आदि शंकराचार्य के पूर्व भी प्रयाग में कुम्भ का आयोजन होता रहा है। इसका सबसे पुराना ऐतिहासिक वर्णन ह्वेनत्सांग (7वीं सदी ई.) ने किया था। उस समय प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर दुनिया भर से ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा, सामन्त, कलाविद् और धर्मप्राण लोग लाखों की संख्या में एकत्र हुए थे। कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है। श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर खिंचे चले आते हैं। श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है। प्रयागराज और कुम्भ की गौरवशाली परम्परा के बारे में जानना एक सुखद अनुभूति है।
Sayiyin Vakuruthigal
- Author Name:
Sumit Ponda Bhaijee
- Book Type:

- Description: பாய்ஜி சிறுவயதிலிருந்தே சாயிபாபாவிடம் ஈர்க்கப்பட்டார் மற்றும் சாயி மீது ஆர்வம் கொண்ட எவருக்கும் பாபாவைப் பற்றி எண்ணற்று கைதகைள் கூறுவார் அவர் சாயிபாபாவிடமிருந்து உதவேகம் பெற்றார் என்று கூறுவார் பாபாவின் வாழ்ககை கைகைள் விவளிப்பதன் மூலமும் அவருடைய புகழைப் பாடுவதன் மூலமும் பாபாவின் பௌயர் பரப்பினார் அமுதம் போன்று சாயியின அன்பு சாபி அமிர்த் கதர் என்று அழைக்கப்பட்டு உலகெங்கிலும் பரவி வருகிறது பாயஜி தனது தனித்துவமான பாணியில் ஸ்ரீ சாயி சத்சரிதத்தின் போதைன்கைள இக்கால சங்கடங்களுடன தொடாபுபடுத்தி அதன் மூலம் ஏராளமான வாழ்ககை பிரச்சனைகளுக்கு விடை அளிக்கிறார். சாய்யாபா பற்றிய பாயறியிள வலைப்பதிவு: (Bleg) பத்து வட்சத்திற்கும் அதிகமான வாசிப்புகளைப் பெற்றுள்ளது. ஸ்ரீ சாயி அமிரத கதாவின் யூடியூப் சேன்ல் இருபது வடசம் பார்வைகளைக் கடந்துள்ளது. முகநூல் பக்கம் கிட்டத்தட்ட ஐந்து லட்சப் பின்தொடர்பவர்களைக் கொண்டுள்ளது பாய்றியிள தினசரி மேற்கோள் வாசகம் () மற்றும் அதன தெளிவான விரிவாக்கம் எப்போதும் அனைவராலும் எதிர்பார்க்கப்படுகிறது
Dashaguru Parampara Ke Navam Guru Shri Tegabahaduraji
- Author Name:
Dr. Kuldip Chand Agnihotri
- Book Type:

- Description: सप्तसिंधु क्षेत्र की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्होंने भारतवर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे पहली घटना तो सिंधु-सरस्वती सभ्यता का विकास है। दरअसल वर्तमान भारतीय विश्वासों, आस्थाओं एवं पूजा-पद्धति का आधार सिंधु-सरस्वती घाटी में ही मिलता है। इसके उपरांत वेद रचना का युग आता है। यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता का अगला चरण है—गंभीर चिंतन का युग। इस युग के चिंतन ने भारतवर्ष को ही नहीं, बल्कि पूरे जंबूद्वीप को आच्छादित किया। कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का युद्ध इस क्षेत्र की ऐसी घटना है, जिसने पूरे हिंदुस्तान को सप्तसिंधु के मैदान में लाकर खड़ा कर दिया था। बाद के काल में विदेशी आक्रांता येन-केन-प्रकारेण विजित प्रदेश के निवासियों को अपने मजहब में मतांतरित करने लगे थे। हमले क्योंकि सप्तसिंधु क्षेत्र से ही होते थे, इसलिए इसका सर्वाधिक दंश भी इसी क्षेत्र को सहना पड़ा। लेकिन इस नई आफत का सामना कैसे किया जाए, यह सबसे बड़ी चुनौती थी। इस मरहले पर दशगुरु परंपरा की शुरुआत एक दैवी योजना ही मानी जा सकती है। गुरु नानक देवजी इसके संस्थापक थे। दुर्भाग्य से दशगुरु परंपरा का मूल्यांकन आध्यात्मिक क्षेत्र में तो हुआ है, लेकिन ऐतिहासिक व सामाजिक क्षेत्र में समग्र रूप से नहीं हुआ। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कुदाल चलाने की जरूरत है और यह पुस्तक दशगुरु परंपरा को प्रकाश में लाने का स्तुत्य प्रयास है।
Jyotirling
- Author Name:
Bibek Debroy +1
- Book Type:

- Description: हिंदू त्रिदेवों में भगवान शिव कई आयामों वाले देवता हैं। स्वभाव से उग्र एवं दयालु भगवान शिव जीवन की द्वैतता के प्रतीक हैं। शैव धर्म के केंद्र में शिव की पूजा ही है। शिवलिंग और बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में श्रद्धालुओं की इतनी अधिक आस्था है कि वे अनादि काल से ही इसे अपना तीर्थस्थल मानते आ रहे हैं। ये प्रतिष्ठित स्तंभ व्यक्तिगत कथाओं और विद्वतापूर्ण शोध का हिस्सा बन गए हैं। इस पुस्तक के लेखकों में अमित कपूर, बिबेक देबरॉय, विभव कपूर और कॉनर मार्टिन शामिल हैं। ये सभी लेखक इन ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी कहानियों को संजोने के अलावा उनके सार और समय के साथ उनकी शाब्दिक और रूपक यात्राओं पर विचार करते हैं।
Jagadguru Adya Shankaracharya
- Author Name:
Shivdas Pandey
- Book Type:

- Description: "शंकराचार्य एक ऐसे शास्त्राचार्य का नाम है, जो संस्कृति-रक्षा को युद्ध मानकर शास्त्रार्थ करता है और जिसका अस्त्र-शस्त्र सबकुछ शास्त्र तथा जिसका युद्ध मात्र शास्त्रार्थ है एवं जिसकी शति हजारो-हजार वर्षों की ऋषि-प्रति-ऋषि एवं तपस्या-प्रति-तपस्या सिद्ध ज्ञान-संपदा है। वह न तो खलीफाओं की तरह युद्ध करता है और न नियोजित बोधिसवों की तरह, न ही जैसा देश, वैसा वेश, वैसा धर्म का सिका चलानेवाले ईसाई पादरियों की तरह। वह शास्त्र के शस्त्र से शास्त्रार्थ का युद्ध लड़ना जानता है—धर्म के क्षेत्र में ज्ञान तथा न्याय के निर्धारित विधानों के सर्वथा अनुरूप। यह युद्ध षड्दर्शनों तथा षड्चक्रों के साधकों के साथ-साथ इन ब्रह्मवादी शैव-दर्शन के तंत्रोन्मुख कश्मीरी शैवों से भी होता है और वह सोलह वर्षों में सभी विवादों का समाधान ढूँढ़कर वैदिक संस्कृति को पुन: स्थापित करता है। शंकराचार्य जैसा आचार्य होना, एक योगसिद्ध-ज्ञानसिद्ध तथा ध्यानसिद्ध आचार्य होना और ऐसे आचार्य का एक सिद्ध जगद्गुरु हो जाने का भी कोई विशेष अर्थ होता है। वह समय आ गया है, जब पुन: एक बार भारत को जगद्गुरु शंकराचार्य का मात्र दर्शन-चिंतन-मंथन वाला युग नहीं, वरन् भारत डॉट कॉम विश्वगुरुवाले नए युग का भी गौरवशाली जगद्गुरु पद प्राप्त होना चाहिए। भारतीय धर्म-दर्शन-संस्कृति परंपराओं के ध्वजवाहक कोटि-कोटि हृदयों के आस्थापुंज जगद्गुरु शंकराचार्य के प्रेरणाप्रद-अनुकरणीय जीवन पर केंद्रित पठनीय उपन्यास। "
Siddha Sant Aur Yogi
- Author Name:
Shambhuratna Tripathi
- Book Type:

- Description: इतिहास पर दृष्टि डालने पर कुछ शक्तियाँ सहज ही लक्ष्य की जा सकती हैं। यथा, सामरिक शक्ति, आर्थिक शक्ति, जनसमूह के संगठन की शक्ति, लेकिन जो शक्तियाँ वस्तुतः पृथ्वी को धारण करती हैं, वे साधारणतः प्रत्यक्षगोचर नहीं होती हैं। परंतु ऐसा भी नहीं है कि वे कभी हमारे सामने आती ही नहीं हैं। करुणावश, वे हमारे क्रियाकलाप में इस प्रकार हस्तक्षेप करती हैं कि हम उनको इस धरातल पर देख सकें। तोटकाचार्य अपने स्तोत्र में लिखते हैं—जगतीमवितुं कलिताकृतयो विचरन्ति महामहसश्छलतः। जगती की रक्षा करने हेतु महान् विभूतियाँ छद्म-शरीर धारण करके विचरण करती हैं। इन विभूतियाँ का संपर्क, इनके स्पर्श, इनकी वाणी, व इनके कटाक्ष सभी अभ्युदय हेतु होते हैं। ‘सिद्ध संत और योगी’ ऐसी विभूतियों के चिंतन व जीवनचरित का परिचय प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक एक संकलन के रूप में जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत रोचक है, पर दूसरी ओर इसमें चर्चित अधिकांश महात्माओं की जीवंत शिष्य-परंपराएँ विद्यमान हैं, जहाँ आर्त्त व जिज्ञासु आश्रय अथवा मार्गदर्शन हेतु जा सकते हैं। आसन्न संकटों से निबटने के लिए मानवजाति के सम्मुख चेतना के उन्नयन के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं है; इस पुस्तक में संकलित लेख कदाचित् इसी आशय से लिखे गए थे।
Vaidik Dharm Evam Shraman Parampara
- Author Name:
Akhand Pratap Singh
- Book Type:

-
Description:
वैदिक धर्म एवं श्रमण परम्परा में प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमूलक धर्म के कालगत प्रवाह व प्रभाव का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातकोत्तर के छात्रों का मार्गदर्शन कराने में सर्वथा उपयोगी है। पुस्तक में साहित्यिक व पुरातात्त्विक साक्ष्यों का यथास्थान उपयोग, तथ्य एवं चिन्तन का सन्निवेश, शोधपरक दृष्टि का समावेश और संस्कृतनिष्ठ भाषा का निर्वहन है।
इस पुस्तक का उद्देश्य ताम्राश्म काल (ई.पू. तृतीय सहस्त्राब्दी) से लेकर 12वीं, 13वीं शती ईस्वी सन् अर्थात् पूर्वमध्यकाल तक हुए धर्म-दर्शन के विकास का कालक्रमानुसार विवेचन है।
प्रामाणिक इतिहास हेतु जहाँ एक ओर वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् एवं पुराण साहित्य आदि का आश्रय लिया गया, वहीं दूसरी ओर पुरातात्त्विक सामग्रियों जैसे, मुहरें, मूर्तियाँ, मुद्राएँ एवं भित्ति-चित्रों से प्राप्त सूचनाओं का समावेश किया गया है।
Sanskrtik Virasat Ke Dhani : Bharat Aur Japan
- Author Name:
Shila Jhunjhunwala
- Book Type:

- Description: "जापान में भी ईश्वर की पूजा-अर्चना, सेवा, देवों का आह्वान करने की रीतियाँ भारतीय जीवन से बहुत कुछ मिलती-जुलती हैं। भारत की तरह जापान में भी मकान बनाने से पहले भूमि-पूजन करते हैं। परिवार के मंगल के लिए पितरों से आशीर्वाद लेते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा का दर्शन वहाँ भी होता है। जापान की पौराणिक कहानियों में पत्थर में परिवर्तित हुई लड़की अपने श्रीरामचरितमानस की अहल्या जैसी ही लगती है और जापान की सूर्य उपासना की पद्धति भारत के सूर्य नमस्कार के जैसी ही है। जिस प्रकार हिंदू कोई धर्म नहीं है, एक जीवन पद्धति है, उसी प्रकार शिंतो भी प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य की जीवन पद्धति है, जिसका किसी दर्शन, धर्म, ग्रंथ अथवा उपदेश से साम्य नहीं है, बस वह रहन-सहन का एक तरीका भर है। जापान में भी दीपावली की तरह जगमगाहट है; होली की तरह रंगों की फुहार है; पतंगों के उत्सव में भिन्न-भिन्न प्रकार के पतंगों से रँगा हुआ पूरा आसमान है; शादी-विवाह के मौकों पर संगीत से सजी हुई महफिलें हैं तो साकुरा के बागों तले फूलों की अल्हड़ बरसात है; कठपुतलियों के नृत्य हैं। काबुकी के रंग-मंच में अभिनय के रंगों में रँगी हुई कोमल भावनाएँ हैं और भारत से मिलता-जुलता हर जगह बहुत कुछ है। यह पुस्तक इन्हीं अनुभवों पर आधारित एक प्रतिबिंब है, जिसमें जापान के अनेक रंगों को समेटने का प्रयास किया गया है। "
Tulsi Dohawali
- Author Name:
Raghav 'Raghu'
- Book Type:

- Description: "हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को उत्तर भारत के घर-घर में अकूत सम्मान प्राप्त है। राम की अनन्य भक्ति ने उनका पूरा जीवन राममय कर दिया था। हालाँकि उनका आरंभिक जीवन बड़ा कष्टपूर्ण बीता, अल्पायु में माता के निधन ने उन्हें अनाथ कर दिया। उन्हें भिक्षाटन करके जीवन-यापन करना पड़ा। धीरे-धीरे वह भगवान् श्रीराम की भक्ति की ओर आकृष्ट हुए। हनुमानजी की कृपा से उन्हें राम-लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की। ‘रामलला नहछू’, ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘सतसई दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। यह पुस्तक उन्हीं तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनने की शिक्षा देते हैं। तुलसी की वाणी, उनकी रचनाएँ मन को छू लेनेवाली हैं; हमें मार्ग दिखानेवाली हैं। इनका संदेश हमारा पाथेय है।"
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book