Shadi Ka Album
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गिरीश कारनाड के नाटकों में मन की तहें खुलती हैं। उनके पौराणिक कथा-सूत्रों पर आधारित नाटकों में पाठकों-दर्शकों ने मनुष्य की आदिम वृत्तियों, उसकी अकुंठ जिजीविषा, वासना, नैतिक वर्जनाओं में कुलबुलाते और उनके सच को उघाड़ते आत्म को अनेक रूपों में देखा है।यह उनका आधुनिक परिवेश में घटित नाटक है। इसमें इक्कीसवीं सदी के भारत की एकदम नई पीढ़ी और उसके पीछे अब भी खड़े पुराने भारत की छवियाँ हैं। इस लिहाज़ से इस नाटक में वह एक भिन्न आस्वाद की रचना करते हैं। लेकिन व्यक्ति के भीतर और बाहर तथा समाज के दैनिक व्यवहारों और नैतिक प्रतिज्ञाओं के बीच की फाँक को प्रकाशित करने की उनकी लेखकीय शपथ यहाँ भी उतनी ही तीव्र है।यह नाटक हमें बताता है कि अब भी हमारा जीवन दो समानान्तर यथार्थों के साथ ही सम्भव है, कि आज इंटरनेट और ग्लोबल गाँव के वातावरण में भी हम वह पारदर्शिता प्राप्त नहीं कर पाए जिसका सपना हमारा वास्तविक आत्म अपने सबसे स्वच्छ क्षणों में देखता है, और जिसका आकर्षक चित्रांकन हमारे सब धर्म और नीति-संहिताएँ करती हैं।कहानी एक परिवार की है जहाँ दो शादियाँ होनी हैं। किसी भी भारतीय परिवार में शादी के आसपास जैसा वातावरण होता है, उसे संवादों और दृश्यों के रूप में जिस तरह यहाँ गिरीश कारनाड ने रूपायित किया है, वह अद्भुत है और उसके साथ-साथ, परिवार के अतीत में बिंधी अब तक अनकही सच्चाइयों और भावी पीढ़ी के सुविधावादी समझौतों को जितने बारीक नश्तर से उकेरा है, वह भी।नाटक में कहीं भी ऐसे किसी दृश्य का आयोजन नहीं है जिसे मंच पर उतारना कठिन हो, और न ही कहीं इतना शिथिल कि पढ़नेवाला पढ़ता न चला जाए।
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गिरीश कारनाड के नाटकों में मन की तहें खुलती हैं। उनके पौराणिक कथा-सूत्रों पर आधारित नाटकों में पाठकों-दर्शकों ने मनुष्य की आदिम वृत्तियों, उसकी अकुंठ जिजीविषा, वासना, नैतिक वर्जनाओं में कुलबुलाते और उनके सच को उघाड़ते आत्म को अनेक रूपों में देखा है।यह उनका आधुनिक परिवेश में घटित नाटक है। इसमें इक्कीसवीं सदी के भारत की एकदम नई पीढ़ी और उसके पीछे अब भी खड़े पुराने भारत की छवियाँ हैं। इस लिहाज़ से इस नाटक में वह एक भिन्न आस्वाद की रचना करते हैं। लेकिन व्यक्ति के भीतर और बाहर तथा समाज के दैनिक व्यवहारों और नैतिक प्रतिज्ञाओं के बीच की फाँक को प्रकाशित करने की उनकी लेखकीय शपथ यहाँ भी उतनी ही तीव्र है।यह नाटक हमें बताता है कि अब भी हमारा जीवन दो समानान्तर यथार्थों के साथ ही सम्भव है, कि आज इंटरनेट और ग्लोबल गाँव के वातावरण में भी हम वह पारदर्शिता प्राप्त नहीं कर पाए जिसका सपना हमारा वास्तविक आत्म अपने सबसे स्वच्छ क्षणों में देखता है, और जिसका आकर्षक चित्रांकन हमारे सब धर्म और नीति-संहिताएँ करती हैं।कहानी एक परिवार की है जहाँ दो शादियाँ होनी हैं। किसी भी भारतीय परिवार में शादी के आसपास जैसा वातावरण होता है, उसे संवादों और दृश्यों के रूप में जिस तरह यहाँ गिरीश कारनाड ने रूपायित किया है, वह अद्भुत है और उसके साथ-साथ, परिवार के अतीत में बिंधी अब तक अनकही सच्चाइयों और भावी पीढ़ी के सुविधावादी समझौतों को जितने बारीक नश्तर से उकेरा है, वह भी।नाटक में कहीं भी ऐसे किसी दृश्य का आयोजन नहीं है जिसे मंच पर उतारना कठिन हो, और न ही कहीं इतना शिथिल कि पढ़नेवाला पढ़ता न चला जाए।
Book Details
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ISBN9788183618496
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Pages124
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: यह नाटक उच्चस्तरीय बौद्धिक रचना का प्रमाण देता है। नाटककार ने पूरे धार्मिक व्यवहार पर जो कटाक्ष किया है, वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। संवादों, घटनाओं तथा कार्यव्यापार के माध्यम से उभारा गया नाटकीय टकराव शिखर को छूता है। इस नाटक ‘धर्मगुरु’ की प्रस्तुति से पंजाबी नाटक नए क्षितिजों के द्वार खोलता है...। —गुरुशरण सिंह (नाटककार एवं निर्देशक) स्वराजबीर के नाटक पहली बार पंजाबी नाटक को उस नाट्य विधिविधान के साथ जोड़ते हैं जो भारतीय नाट्य रूप से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि ये नाटक अग्रदूत बनकर पंजाबी नाटक में पैदा हुई जड़ता को तोड़ते हैं। नाट्य-विधि के रूप में ही इनमें कविता और गद्य अन्तर्सम्बन्धित हैं। —डॉ. सुतिंदर सिंह नूर स्वराजबीर का नाटक ‘धर्मगुरु’ वर्तमान समय पर एक बड़ी टिप्पणी है जो धर्म और राजनीति की साँठ-गाँठ के माध्यम से समाज के समूचे अस्तित्व को अपनी गिरफ़्त में लेने के लिए सक्रिय है। इस समय इसकी प्रस्तुति एक साहसिक क़दम है। —‘नवांजमाना’ (दैनिक, जालंधर) यह नाटक ‘धर्मगुरु’ आज के दौर में फैले धार्मिक कठमुल्लापन और सामाजिक आपाधापी पर तीखा व्यंग्य है। तथाकथित धार्मिक नेताओं की मनमानियों और समाज की बेबसी की त्रासदी के दौर में इस नाटक का मंचन बुद्धिजीवियों और कलाकारों की बुलन्द आवाज़ और सच्चाई का प्रतीक है। —‘अजीत’ (दैनिक, जालंधर)
Nyayapriya
- Author Name:
Albert Camus
- Book Type:

-
Description:
सुविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू का यह ऐतिहासिक नाटक सन् 1903 के क्रान्तिकालीन रूस में आतंकवादियों के एक गुट द्वारा आयोजित एक बम कांड का यथातथ्य चित्रण करता है। जैसा कि लेखक ने स्वयं कहा है कि ‘इस नाटक की कुछ स्थितियाँ यथार्थतः ऐतिहासिक हैं। इसके सभी पात्र वास्तविक हैं और उन्होंने उसी तरह का आचरण किया था, जैसा कि मैंने बताया है।’ यहाँ तक कि ‘न्यायप्रिय’ के नायक का नाम कलियायेव भी वास्तविक है।
अतिवादियों के इस गुट ने, जो क्रान्तिकारी समाजवादी पार्टी का ही हिस्सा था, रूसी सम्राट के चाचा प्रधान ड्यूक सार्ज की हत्या की योजना बनाई थी, जिसे कलियायेव ने पूरा किया। लेकिन लेखक के लिए इस समूचे घटनाक्रम में ड्यूक की हत्या के बजाय वह महान उद्देश्य और उसे पूरा करते हुए बचाए गए वे मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण हैं, जो आतंकवाद को क्रान्तिकारिता के उच्चादर्श तक ले जाते हैं। कामू ने इस मुद्दे पर कलियायेव और दूसरे साथियों के बीच होनेवाली बहस को सर्वाधिक महत्त्व और विस्तार दिया है। सामाजिक अन्याय पर खड़ी एक दमनकारी राज्य-व्यवस्था से नाभिनालबद्ध दोषी व्यक्ति को खत्म करते हुए भी मानवीय करुणा, न्याय-भावना और आत्म-गौरव को बचाये रखने का संकल्प एक सच्चा क्रान्तिकारी ही साध सकता है। कलियायेव इन्हीं मूल्यों के लिए अपना बलिदान देता है और संसार के क्रान्तिकारी इतिहास में एक और अविस्मरणीय अध्याय जोड़ जाता है।
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