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सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’। </p> <p>–‘द हिन्दू’</p> <p>‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है। </p> <p>–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’</p> <p> </p> <p>सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति। </p> <p>–‘सन्डे गार्डियन’</p> <p> </p> <p>‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है। </p> <p>–सुधीर मिश्रा
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सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’। </p>
<p>–‘द हिन्दू’</p>
<p>‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है। </p>
<p>–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’</p>
<p> </p>
<p>सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति। </p>
<p>–‘सन्डे गार्डियन’</p>
<p> </p>
<p>‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है। </p>
<p>–सुधीर मिश्रा
Book Details
-
ISBN9789388753005
-
Pages93
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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