Yadon Ke Panchhi
(0)
Author:
P. E. SonkamblePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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आत्मकथापरक शैली में लिखा गया यह बेजोड़ उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की कथा-यात्रा है जिसने भूख को सहने के साथ-साथ उसे नज़दीक से देखा है और भूख के विकराल जबड़ों से निकलकर भी वह अपनी इंसानियत, अपनी संवेदना नहीं खो पाया है। बढ़ती ज़िन्दगी के हर तरफ़ से रोके गए रास्तों के बावजूद जिजीविषा उसे आगे बढ़ाती है, टूटने नहीं देती। जिस जोहड़ में उच्च वर्ग के ढोर पानी पी सकते हैं, उसमें दलित वर्ग के इस नायक को अपना सूखा कंठ भिगोने की इजाज़त नहीं है। उसे मरुभूमि की अपनी यह यात्रा भूखे-प्यासे रहकर ही पूरी करनी है।</p> <p>इस उपन्यास में दलित वर्ग के हर प्रकार के शोषण का आकलन इतनी तटस्थ और सहज शैली में किया गया है कि बरबस लेखक के आत्म-संयम की दाद देनी पड़ती है। कमाल यह है कि जिनके कारण दलित वर्ग को इंसान से भी बदतर ज़िन्दगी जीनी पड़ रही है, उन्हें भी उपन्यास में काले रंग से नहीं पोता गया है। लेखक उच्च वर्ग के उन लोगों को भी नहीं भूला है जिनके कारण उसे क्षण-भर के लिए भी सुख या सांत्वना या प्रोत्साहन मिला है। कटुता-रहित भूख के अन्तरंग चित्र इस उपन्यास को प्रामाणिक दस्तावेज़ बनाते हैं।
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आत्मकथापरक शैली में लिखा गया यह बेजोड़ उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की कथा-यात्रा है जिसने भूख को सहने के साथ-साथ उसे नज़दीक से देखा है और भूख के विकराल जबड़ों से निकलकर भी वह अपनी इंसानियत, अपनी संवेदना नहीं खो पाया है। बढ़ती ज़िन्दगी के हर तरफ़ से रोके गए रास्तों के बावजूद जिजीविषा उसे आगे बढ़ाती है, टूटने नहीं देती। जिस जोहड़ में उच्च वर्ग के ढोर पानी पी सकते हैं, उसमें दलित वर्ग के इस नायक को अपना सूखा कंठ भिगोने की इजाज़त नहीं है। उसे मरुभूमि की अपनी यह यात्रा भूखे-प्यासे रहकर ही पूरी करनी है।</p>
<p>इस उपन्यास में दलित वर्ग के हर प्रकार के शोषण का आकलन इतनी तटस्थ और सहज शैली में किया गया है कि बरबस लेखक के आत्म-संयम की दाद देनी पड़ती है। कमाल यह है कि जिनके कारण दलित वर्ग को इंसान से भी बदतर ज़िन्दगी जीनी पड़ रही है, उन्हें भी उपन्यास में काले रंग से नहीं पोता गया है। लेखक उच्च वर्ग के उन लोगों को भी नहीं भूला है जिनके कारण उसे क्षण-भर के लिए भी सुख या सांत्वना या प्रोत्साहन मिला है। कटुता-रहित भूख के अन्तरंग चित्र इस उपन्यास को प्रामाणिक दस्तावेज़ बनाते हैं।
Book Details
-
ISBNYadonKePanchhiPaperBack
-
Pages134
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी में पिकरेस्क उपन्यासों की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है। 1928 में केदारनाथ अग्रवाल ने ‘पतिया’ लिखा, इसी के आसपास सूर्यकान्त त्रिापाठी ‘निराला’ के ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और ‘कुल्लीभाट’ भी लिखे गए। ये सभी उपन्यास, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, व्यक्ति- केन्द्रित हैं। पश्चिम में भी पिकरेस्क उपन्यासों का जन्म ‘डेविड कॉपरफील्ड’ जैसी व्यक्ति-केन्द्रित कथाओं से हुआ था।
सामन्ती व्यवस्था के अन्तिम दिनों में समाज में एक ऐसा वर्ग उभर रहा था जो औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य था। समाज के घूरे पर फेंक दिया गया यह वर्ग नाले के उस पार का है, रोज कुआँ खोदने को विवश जो केवल अपने जीवट के बल पर ही जीवित है। समाज के ये दईमारे, बेचारे, हारे हुए लोग रमेश दत्त दुबे के टोले के बाशिंदे हैं—इनके नाम भले अलग- अलग हों, पर इनके अभाव एक से हैं, इनके चेहरे एक से हैं, इनके जीवन की दुर्घटनाएँ एक सी हैं क्योंकि रूढ़ियों और अभावों की जिस चक्की में ये पिस रहे हैं, उसमें साबुत बचा न कोय।
रमेश के टोले में जो रहते हैं, कौन हैं वे लोग—बीड़ी और अवैध शराब बनानेवाले, गर्भपात करवानेवाले, मछली मारनेवाले, बैलगाड़ी हाँकने वाले। स्त्रियाँ हैं तो वे जंगल से लकड़ियाँ बीनने के लिए हैं, पति की मार खाने के लिए हैं, देह व्यापार के लिए हैं, लड़ने-झगड़ने के लिए हैं। इन्हें अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि इन्हें अपने जीवन से कोई अपेक्षा ही नहीं है।
‘टोला’ की कहानी का न कहीं से प्रारम्भ होता है, न कहीं अन्त क्योंकि इस कथा के पात्रों का न कोई आदि है, न अन्त। बरसात में उफनते नाले में जैसे कचरा बहता है वैसे ही टोले के पात्र आते-जाते हैं—एक-दूसरे को ठेलते हुए, थोड़ी देर के लिए, एक हहराती हुई गन्दगी को बहाकर आगे बढ़ाने के लिए ताकि वह नयी गन्दगी के लिए जगह बना सकें। किसी बेहतर जीवन का न कोई वायदा, न कोई यकीं, न कोई उम्मीद। पर लेखक को इन्तजार है। शायद यही इन्तजार ‘टोला’ को सर्जनात्मक संवेदना से मंडित करता है और उसे आस्था-विहीन नहीं बनाता।
—कान्तिकुमार जैन
Pratibandhit Hindi Sahitya : Vol. 1-2
- Author Name:
Rustam Roy
- Book Type:

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Description:
‘प्रतिबंधित हिन्दी साहित्य’ के दो खंडों में स्वाधीनता आंदोलन के दिनों की प्रतिबंधित रचनाओं का संकलन किया गया है। आजादी की लड़ाई के दिनों की याद ताजा करने तथा उस समय के रचना-मूल्यों को समझने के लिए यह संकलन ऐतिहासिक महत्त्व का है। पुस्तक के पहले खंड में प्रतिबंधित कहानियाँ और उपन्यास संकलित हैं तथा दूसरे खंड में कविताएँ। जिन रचनाकारों की रचनाएँ इनमें संकलित हैं, उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अपनी रचनाओं को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। अपनी रचनाओं द्वारा उन्होंने साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आम लोगों में विद्रोह और अवज्ञा की मानसिकता तैयार करने की कोशिश की। अंग्रेजों ने ऐसे लेखकों का दमन किया, उनकी क्रांतिकारी रचनाओं के लिए उन पर मुकद्दमा चलाया और प्रतिबंध लगा दिया। इन दो खंडों में हमने ऐसी ही प्रतिबंधित रचनाओं का संकलन किया है।
श्री रुस्तम राय ने काफी मेहनत करके काल कोठरी के अँधेरे से ये रचनाएँ निकाल कर पाठकों तक पहुँचाने में हमारी मदद की है। आशा है, इन रचनाओं से उस दौर के साहित्य की कुछ अछूती विशेषताएँ हमारे सामने आएँगी। साथ ही हम स्वाधीनता आंदोलन से सीधे जुड़े साहित्य का जायजा ले सकेंगे। आज भी देश की सामाजिक परिस्थितियों में कोई निर्णायक बदलाव नहीं आया है इसलिए ये रचनाएँ अब भी प्रासंगिक हैं।
पुस्तक के पहले खंड में पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, ऋषभ चरण जैन तथा मुनीश्वर दत्त अवस्थी की कहानियों के अलावा जिन कथाकारों की कहानियाँ शामिल हैं, उनके नाम हैं—यशपाल, लक्ष्मीचंद्र वाजपेयी ‘चन्द्र’, मुक्त, लीलावती बी.ए., जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, आचार्य चतुर सेन शास्त्री, विश्वंभर नाथ शर्मा ‘कौशिक’ तथा प्रेम बंधु । इस खंड में ब्रजेन्द्र नाथ गौड़ का उपन्यास ‘पैरोल पर’ भी संकलित है। इस उपन्यास ने स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में क्रांतिकारियों के बीच नया उत्साह पैदा कर दिया था। आशा है, ये रचनाएँ स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी रचनाशीलता पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी।
‘प्रतिबंधित हिन्दी साहित्य’ के दूसरे खंड में स्वाधीनता आंदोलन के दिनों की प्रतिबंधित कविताओं का संकलन किया गया है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतेन्दु युग में भी कविताएँ लिखी गईं, लेकिन बीसवीं सदी के द्विवेदी युग और छायावाद युग में भी क्रांतिकारी कविताओं की संख्या काफी है। ऐसी कविताएँ सैकड़ों की संख्या में ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंधित भी हुईं। इस खंड में ऐसे काव्य-संग्रह संकलित हैं जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था। संकलन और उनके रचनाकारों के नाम इस प्रकार हैं—‘खून के छींटे’ (बलभद्र गुप्त विशारद ‘रसिक’), ‘मुक्त संगीत’ (अभिराम शर्मा एवं प्रणयेश शर्मा), ‘विद्रोहिणी और तूफान’ (प्रह्लाद पांडेय ‘शशि’)।
स्वाधीनता आंदोलन से हिंदी कविता का रिश्ता बहुआयामी रहा है। द्विवेदी युग के मैथिलीशरण गुप्त और उनके मंडल के कवियों ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की घोषणा करके ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया। राष्ट्रीय धारा के माखनलाल चतुर्वेदी और दिनकर आदि कवियों ने राष्ट्रीय जागरण के लिए आह्वानपरक कविताएँ लिखीं। प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत जैसे छायावादी कवियों ने ‘स्वच्छंद’ मानसिकता को प्रश्रय देकर प्रकृति और प्रेम के आधार पर मुक्ति का आह्वान किया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान इन तीनों धाराओं के समानांतर एक और भी धारा थी जिसके कवियों ने सीधे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की। इस खंड में शामिल रचनाकार ऐसे ही कवि हैं। इनकी रचनाओं के स्वरूप और तत्कालीन समाज पर पड़े उनके प्रभाव का अध्ययन अभी शेष है। आशा है, यह संकलन इस कमी को पूरा करेगा।
ये क्रांतिकारी कविताएँ कलात्मकता और लोकप्रियता— दोनों ही स्तरों पर नए प्रतिमान गढ़ती हैं।
Ahasas-E-Ishtiyara
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- Description: इस काव्य-संकलन के माध्यम से रचनाकार तनुज कुमार ने जीवन के भिन्न-भिन्न आयामों को शायरी, गजलों एवं कविताओं द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। रचनाकार ने अहसासों एवं हालातों को कलम के जरिए मूर्त रूप दिया है, ताकि इसे पढक़र आम जनमानस अपने अंदर छिपी हुई भावनाओं को स्वत: अनुभव कर सके। रचनाकार ने भाषाई सीमाओं को लाँघते हुए हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी एवं अंग्रेजी के शब्दों का न्यायोचित उपयोग करते हुए अपनी रचनाओं को प्रभावशाली एवं दिल को छूने वाली बनाया है। इस कविता-संग्रह के माध्यम से रचनाकार ने अपने निजी अनुभवों को सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया है। पुस्तक ‘अहसास-ए-इश्तियारा’—जैसा नाम से विदित है—में रचनाकार ने इनसानी अहसासों को रूपक के माध्यम से रेखांकित किया है, जिसमें जीवन के कटु अनुभवों, सामाजिक व्यवस्थाओं एवं प्रेमानुकूल भावनाओं का यथासंभव चित्रण किया है। इस पुस्तक की कई रचनाएँ एक तरफ जहाँ हमें भाव-विभोर करती हैं, वहीं दूसरी तरफ आत्मचिंतन को भी विवश कर देती हैं। सुधी पाठकगण जब लेखक की रचनाओं का पठन करेंगे तो निश्चित तौर पर कोई अपने बिछड़े प्रेम को याद करेगा तो कोई अपने साथ हुए अन्याय को याद करेगा तो किसी के अंदर नई ऊर्जा का प्रादुर्भाव होगा।
Chhattisgarh Ki Lokkathayen
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