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भारत में साम्प्रदायिक दंगे तो 6 दिसम्बर, 1992 के पहले भी होते थे, मगर तब उसका प्रभाव स्थानीय स्तर पर ही होता था। किसी शहर में दंगा हो रहा हो तो दूसरे शहर के हिन्दू-मुसलमान उसको लेकर चिन्तित भले ही होते थे, मगर आपसदारी में कोई कमी नहीं आती थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद स्थिति बदल गई। इस घटना ने पूरे देश के अल्पसंख्यक समुदाय के अन्दर दहशत और असुरक्षाबोध पैदा कर दिया। पहली बार भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के प्रति अल्पसंख्यकों का विश्वास डगमगाया। इस उपन्यास में इसी बदले हुए माहौल में भय और नाउम्मीदी के बीच जी रहे अल्पसंख्यक समुदाय के एक युवक के अन्तर्लोक और बाह्यलोक की पड़ताल करने की कोशिश की गई है।</p> <p>‘उपयात्रा’ मो. आरिफ का दूसरा उपन्यास है। पहला उपन्यास उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखा था। इस तरह हिन्दी में यह पहला ही है और इस दृष्टि से यह कृति लेखक की असीम सम्भावनाओं के प्रति आश्वस्त करती है। लेखक ने समय की विसंगतियों और विडम्बनाओं को झेल रहे एक नवयुवक के अन्तर्द्वन्द्वों को बहुत ही गहराई से उभारा है। बीसवीं शताब्दी के आख़िरी कुछ वर्षों में हिन्दीभाषी समाज में आई उथल-पुथल को समझने की दृष्टि से यह एक उल्लेखनीय कृति है।
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भारत में साम्प्रदायिक दंगे तो 6 दिसम्बर, 1992 के पहले भी होते थे, मगर तब उसका प्रभाव स्थानीय स्तर पर ही होता था। किसी शहर में दंगा हो रहा हो तो दूसरे शहर के हिन्दू-मुसलमान उसको लेकर चिन्तित भले ही होते थे, मगर आपसदारी में कोई कमी नहीं आती थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद स्थिति बदल गई। इस घटना ने पूरे देश के अल्पसंख्यक समुदाय के अन्दर दहशत और असुरक्षाबोध पैदा कर दिया। पहली बार भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के प्रति अल्पसंख्यकों का विश्वास डगमगाया। इस उपन्यास में इसी बदले हुए माहौल में भय और नाउम्मीदी के बीच जी रहे अल्पसंख्यक समुदाय के एक युवक के अन्तर्लोक और बाह्यलोक की पड़ताल करने की कोशिश की गई है।</p>
<p>‘उपयात्रा’ मो. आरिफ का दूसरा उपन्यास है। पहला उपन्यास उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखा था। इस तरह हिन्दी में यह पहला ही है और इस दृष्टि से यह कृति लेखक की असीम सम्भावनाओं के प्रति आश्वस्त करती है। लेखक ने समय की विसंगतियों और विडम्बनाओं को झेल रहे एक नवयुवक के अन्तर्द्वन्द्वों को बहुत ही गहराई से उभारा है। बीसवीं शताब्दी के आख़िरी कुछ वर्षों में हिन्दीभाषी समाज में आई उथल-पुथल को समझने की दृष्टि से यह एक उल्लेखनीय कृति है।
Book Details
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ISBN9788119092444
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Pages207
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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स्वयं से बाहर निकलकर ख़ुद को द्रष्टा-भाव में देखना और फिर अपने से या अपनों से मीठी चुटकियाँ लिए चलना भी स्त्री-लेखन की वह बड़ी विशेषता है जिसकी कई बानगियाँ गुच्छा-गुच्छा फूली हुई आपको हर क़दम पर इस उपन्यास में दिखाई देंगी! हर कवि के गद्य में एक विशेष चित्रात्मकता, एक विशेष यति-गति होती है, पर यह उपन्यास प्रमाण है इस बात का कि स्त्री-कवि के गद्य में रुक-रुककर मुहल्ले की हर टहनी के फूल लोढ़ते चली जानेवाली क़स्बाई औरतों की चाल का एक विशेष छंद होता है। अब हिन्दी में स्त्री उपन्यासकारों की एक लम्बी और पुष्ट परम्परा बन गई है। सुजाता का यह उपन्यास उसे एक सुखद समृद्धि देता है और ज़रूरी विस्तार भी।
—अनामिका
Wah Samay Yah Samay
- Author Name:
Krishna Sobti
- Book Type:

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Description:
‘वह समय’—कृष्णा जी ने इस टुकड़े को यही नाम दिया था, जिसे ‘ज़िन्दगीनामा’ के दूसरे भाग का हिस्सा होना था। सम्बन्धों के सामाजिक तर्कों और नैतिक आग्रहों के ऊपर चलती दिलों की यह कहानी शाह जी और राबयाँ की है। शाह जी अपने आधे को पार कर चुके हैं और राबयाँ जवानी की सीढ़ियाँ चढ़ रही है—तुकें मिलाती है, कवित्त लिखती है, शाह जी उसके लिखे को दुरुस्त करते हैं, उसे पढ़ाते-सिखाते हैं। इसी में उम्र, मज़हब और परिवारों की हदों से ऊपर उठ दोनों कहीं जुड़ जाते हैं...और उस दिन जब कचहरी से लौटते हुए शाह जी बाढ़ में घिर जाते हैं, राबयाँ अपनी छत से उन्हें देखती है और उन्हें बचाने पानी में कूद जाती है...दोनों को ढूँढ़ लिया जाता है, लेकिन शाह जी फिर लौट नहीं पाते, चले ही जाते हैं, और राबयाँ उनके पीछे... यह कहानी इश्क़ की है, इश्क़ की रूहानियत की, ...कृष्णा सोबती की क़लम ही इसकी पवित्रता को इतने सुच्चेपन से आँक सकती थी!
इस जिल्द में मौजूद दूसरी कृति का सम्बन्ध इस समय से है—आज की दिल्ली से। रियल एस्टेट के मगरमच्छों के हत्थे चढ़े एक युवक की यह कहानी पैसे के उथले दलदल में छपछपाते उस तबक़े के बारे में बताती है, जिसके लिए सबसे पहला और सबसे आख़िरी मूल्य पैसा ही है। यह भी कि गाँवों-क़स्बों से रोटी-रोज़गार की तलाश में आए लोगों को यह दलदल कैसी सफ़ाई से अपनी गिरफ़्त में ले लेता है!
Sookha Bargad
- Author Name:
Manzoor Ehtesham
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Description:
सुपरिचित कथाकार मंज़ूर एहतेशाम का यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास वर्तमान भारतीय मुस्लिम समाज के अन्तर्विरोधों की गम्भीर, प्रामाणिक और मूल्यवान पड़ताल का नतीजा है और यही कारण है कि इस उपन्यास को हिन्दी की कालजयी रचनाओं में गिना जाता है।
सामाजिक विकास के जिन अत्यन्त संवेदनशील गतिरोधों पर क़लम उठाने और उन्हें छूने-भर का साहस भी बहुत कम लोग कर पाते हैं, उन्हें इस उपन्यास में न सिर्फ़ छुआ गया है, बल्कि सबसे बड़े ख़ुदा—इंसान की ज़रूरतों, आशा-आकांक्षाओं और अस्तित्व के सन्दर्भ में उनकी गहरी छानबीन की गई है। धर्म, जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषा और साम्प्रदायिकता के जो सवाल आज़ादी के बाद हमारे समाज में यथार्थ के विभिन्न चेहरों में उभरे हैं, उनकी असहनीय आँच इस समूची कथाकृति में मौजूद है।
यही सारे सवाल आज भी हमारे आसपास एक ऐसे बरगद की झूलती जड़ें बनकर फैले हुए हैं, जिसके नीचे किसी भी कौम की तरक़्क़ी और ख़ुशहाली असम्भव है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि इस त्रासदी के पीछे किसका हाथ है और इसका हल क्या है? कहना न होगा कि इस प्रश्न का उत्तर देते हैं वे तमाम लोग जो इस समाज में शोषित, पीड़ित, अपमानित और लांछित हैं, लेकिन आज भी टूटे नहीं हैं।
Moolya Aadharit Shiksha
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
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- Description: "वर्तमान में विद्यालयों में अनुशासनहीनता एवं हिंसक व्यवहार की घटनाएँ निरंतर बढ़ रही हैं। अतः अगर हम अपनी शिक्षा को मूल्य-आधारित और संस्कार-आधारित बना पाएँ तो हम इस प्रकार की सभी समस्याओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षण के मानवतावादी पहलुओं पर जोर देते हुए भारत ने अपनी नई शिक्षा नीति में यह स्पष्ट किया है कि शिक्षा का तात्पर्य अध्यापकों, किताबों से प्राप्त जानकारी और सूचनाओं का संप्रेषण मात्र नहीं है। उन मूल्यों, योग्यताओं और प्रवृत्तियों को विकसित करना भी है, जो शांतिपूर्ण, न्यायोचित, समावेशी और टिकाऊ समाज के निर्माण के लिए विश्व समुदाय को एकत्र एवं प्रेरित कर विश्व-कल्याण में योगदान देने के लिए संकल्पबद्ध कर सकें। भारतीय ज्ञान-परंपरा में मूल्यपरक शिक्षा का बड़ा महत्त्व है। मूल्य-आधारित शिक्षा का अर्थ छात्रों को नैतिक मूल्यों, धैर्य, ईमानदारी, प्रेम, सद्भावना, दया, करुणा, मानवता, इत्यादि सार्वभौमिक मूल्यों को सिखाना है। मूल्य शिक्षा का संपूर्ण उद्देश्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में निहित है। मूल्य-आधारित शिक्षा से न केवल मानवीय गुणों का विकास होगा, बल्कि हम अपनी नागरिकता के प्रति जिम्मेदारी को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे। नैतिकता पर आधारित शिक्षा हो तो उसमें मूल्य अपने आप आ जाएँगे। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी हम मानवतावादी मूल्यों का समावेश करने हेतु कटिबद्ध हैं, जिससे कि भविष्य का भारत एक सुखी, संपन्न व मानव मात्र के लिए कल्याणकारी जीवन की अवधारणा के लक्ष्यों को पूरा करने हेतु अग्रसर हो तथा संपूर्ण विश्व में शांति, प्रेम व भाईचारे की स्थापना हेतु हम ध्वजवाहक बन सकें। "
Nadi
- Author Name:
Usha Priyamvada
- Book Type:

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Description:
‘बस—बहने दो जीवन सरिता को कहीं-न-कहीं—जल्दी या देरी से—कोई-न-कोई हल तो निकलेगा।' यही सूत्र है 'नदी' उपन्यास का। हिन्दी कथा-साहित्य में अविस्मरणीय ख्याति प्राप्त कर चुकीं उषा प्रियम्वदा का यह नया उपन्यास पठनीयता का पुनर्नवन है। नियति, अबूझ जीवन, प्रारब्ध—क्या नाम दें उस घटनाक्रम को जो 'नदी' की नायिका आकाशगंगा को जाने किस-किस रूप में कहाँ-कहाँ से विस्थापित करता है।
विदेश में निवास करती आकाशगंगा पुत्र भविष्य की मृत्यु के लिए इस सीमा तक अपने पति द्वारा उत्तरदायी मानी जाती है कि परिवार से विच्छिन्न कर दी जाती है। पति गगनेन्द्र दो बेटियों सहित भारत आ जाते हैं। यहीं से एकाकी छूट गई आकाशगंगा का संघर्ष प्रारम्भ होता है। वह अर्जुन सिंह और एरिक के प्रगाढ़ सम्पर्क में आती है। भारत लौटकर सास-ससुर, बेटियों की आत्मीयता में घिरने लगती है कि एक प्राय: अप्रत्याशित स्थिति उसे दूरदेश ले आती है।
प्रवीण दम्पति के साथ रहकर गंगा जीवन का नया अध्याय शुरू करती है। और एरिक के साहचर्य से उत्पन्न उसका बेटा स्तव्य स्टीवेन! आकाशगंगा अपने जीवन-प्रवाह में जिन ऊँचाइयों, गहराइयों, मैदानों, घाटियों, संकीर्ण-पथों प्रशस्त पाटों से गुज़रती है, उन्हें उषा प्रियम्वदा ने जीवन्त कर दिया है।
उषा प्रियम्वदा ने आकाशगंगा के बहाने स्त्री-जीवन के कटु-कठोर यथार्थ का मार्मिक चित्रण किया है। भाषा और शैली के लिए तो वे अलग से पहचानी ही जाती हैं।
‘नदी' जीवन-प्रवाह का ऐसा दृश्य...जिसमें अदृश्य के अँधेरे देर तक चमकते रहते हैं।
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