Titli
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Author:
Jaishankar PrasadPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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तितली ‘मनुष्य बनाम समाज’ के संघर्ष का ही उपन्यास न होकर मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा का भी उपन्यास है। इसमें तितली, शैला, माधुरी, श्यामकुमारी, राजकुमारी आदि नारी चरित्रवर्ग चरित्र न होकर ऐसी नारियाँ हैं जो अपनी कमजोरियों के कारण टूटती भी हैं और उसी से शक्ति अर्जित करके सामाजिक जीवन को बदलती भी हैं।<br>इस उपन्यास में महात्मा गांधी की मूल्य चेतना के साथ ही साथ उस महत्व की भी खोज की गई है जिससे एक वैश्विक सामरस्य का सृजन सम्भव हो सकता है। पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के प्रति विद्रोह के साथ ही साथ संभव बराबरी का लक्ष्य इस उपन्यास से निरन्तर बना हुआ है। त्याग, प्रेम, समता और करुणा के साथ-साथ इसमें इन मूल्यों के कारण मनुष्य में होने वाली हलचलों का संकेत औपन्यासिक शिल्प के विकास और क्षमता का भी प्रमाण प्रस्तुत करता है।<br>अर्थमय जगत में आत्म संस्कार की आवश्यकता महात्मा गांधी की ही तरह इस उपन्यास में सृजनात्मक आदर्श की तरह संरचना के साथ बुनी हुई है। सेवा भावना निष्कामना के साथ जुड़कर वाटसन और स्मिथ आदि चरित्रों का निर्माण कर सकी है।<br>वर्तमान हिन्दी उपन्यास को समझने में ही नहीं बल्कि आधुनिक चेतना तथा सत्याग्रहकालीन दृष्टि के संतुलन और वैषम्य की दृष्टि से भी यह उपन्यास महत्त्वपूर्ण है।
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तितली ‘मनुष्य बनाम समाज’ के संघर्ष का ही उपन्यास न होकर मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा का भी उपन्यास है। इसमें तितली, शैला, माधुरी, श्यामकुमारी, राजकुमारी आदि नारी चरित्रवर्ग चरित्र न होकर ऐसी नारियाँ हैं जो अपनी कमजोरियों के कारण टूटती भी हैं और उसी से शक्ति अर्जित करके सामाजिक जीवन को बदलती भी हैं।<br>इस उपन्यास में महात्मा गांधी की मूल्य चेतना के साथ ही साथ उस महत्व की भी खोज की गई है जिससे एक वैश्विक सामरस्य का सृजन सम्भव हो सकता है। पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के प्रति विद्रोह के साथ ही साथ संभव बराबरी का लक्ष्य इस उपन्यास से निरन्तर बना हुआ है। त्याग, प्रेम, समता और करुणा के साथ-साथ इसमें इन मूल्यों के कारण मनुष्य में होने वाली हलचलों का संकेत औपन्यासिक शिल्प के विकास और क्षमता का भी प्रमाण प्रस्तुत करता है।<br>अर्थमय जगत में आत्म संस्कार की आवश्यकता महात्मा गांधी की ही तरह इस उपन्यास में सृजनात्मक आदर्श की तरह संरचना के साथ बुनी हुई है। सेवा भावना निष्कामना के साथ जुड़कर वाटसन और स्मिथ आदि चरित्रों का निर्माण कर सकी है।<br>वर्तमान हिन्दी उपन्यास को समझने में ही नहीं बल्कि आधुनिक चेतना तथा सत्याग्रहकालीन दृष्टि के संतुलन और वैषम्य की दृष्टि से भी यह उपन्यास महत्त्वपूर्ण है।
Book Details
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ISBN9789393603883
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: "प्रसिद्ध लेखक श्री सुभाष मिश्र के पास शिल्प और भाषा का सुंदर संयोजन है। वे व्यंग्य के लिए सुरक्षित शिल्प में व्यंग्य की भाषा से ऐसी आत्मीयता स्थापित नहीं करते जिसमें कहन पीछे छूट जाता है और लेखक की भाषा पर मुग्धता बची रह जाती है और ध्येय अलक्षित रह जाता है। सुभाष समाज और समय की जटिल और विद्रुप होती जा रही निम्नतर, लेकिन अतिपरिचित स्थितियों के बीच एक संतुलित व्यंग्य भाषा में कथ्य-ध्येय का परिचय स्पष्ट करते हैं। व्यंग्य लेखक को व्यंग्य को तल्ख बनाना होता है, उसको आक्रामक नहीं, इसी संतुलन में सुभाष मिश्र निष्णात हैं, जिससे कई बार वे भाषा में व्यंग्य की अपेक्षा एक तल्ख टिप्पणी करते नजर आते हैं, लेकिन उसकी सपाट बयानगी से बचते हैं। एक व्यंग्य लेखक से ज्यादा निर्भिकता और आक्रामकता की अपेक्षा के कारण व्यंग्य लेखक को रचना और अपेक्षा के द्वंद्व के बीच कथ्य की रक्षा भी करनी होती है। सुभाष मिश्र की व्यंग्य-निर्भिकता कथ्य और भाषा दोनों में प्रकट होती है। लेकिन वे चीजों और स्थितियों के सरलीकरण और निष्कर्षों पर पहुँचने की उतावली नहीं दिखाते हैं। वे खुद को और पाठक को उन विसंगतियों से पैदा हुई दुर्बलताओं से बचते-बचाते हैं। सुभाष मिश्र की यह पुस्तक सामाजिक विसंगतियों, रूढि़यों और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ मामूली आदमी की ओर से एक प्रतिरोध बयान है। इसे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता के आग्रह में देखना उचित होगा। —भालचंद्र जोशी (‘अपनी बात’ से)
Dalhousie Diaries
- Author Name:
Shashank Srivastav
- Book Type:

- Description: कुछ क़ागज़ पड़ा था घर के कोने मे जाने कब डायरी बना दिया कहनी थी बस एक कहानी मुझे जाने कब शायरी बना दिया कभी कभी कुछ ऐसा लिखा भी मिल जाता हैं जो हम असल मे पढ़ना चाहते हैं और जिसे जी लेना चाहते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे मैंने जिया... डलहौज़ी डायरीज़ को । एक खुबसुरत गीत की तरफ सुबह-शाम दिन-रात । एक पचपन साल का बूढ़ा पोस्टमास्टर और एक बीस बरस की ‘पगली लड़की’, एक रोज़ाना गुज़रने वाली रेलगाड़ी और एक डलहौज़ी का एक छोटा सा रेलवे स्टेशन... बस यही तो हैं यह कहानी । पर क्या ये बहुत हैं इसके एहसास को समझने के लिये । शायद नही! एक सच्चाई और भी जो भीतर कही दबी हुई थी हमारे और हम इसे जानकर भी अंजान बने रहे । वो सच्चाई जो हमारी हैं और जिसे हमने बनाई हैं । कुछ पुरानी यादो, अनकहे रिश्ते, बदलते अहसास और एक काली सच्चाई का समागम हैं... डलहौज़ी डायरीज़ ।
Rajasthan Ki Lokkathayen
- Author Name:
Dr. Mahendra Bhanawat
- Book Type:

- Description: राजस्थान में कहानी को ‘वात’ नाम से भी जाना जाता है। वात के साथ ‘ख्यात’ नाम भी प्रचलन में है। कुछ जातियों का काम ही कहानियाँ सुनाना रहा। इन्हें बड़वाजी, रावजी अथवा बारैठजी कहते हैं, जो कहानियाँ सुनाने की एवज में यजमानों से मेहनताना स्वरूप नेग प्राप्त करते। कहानी का मजा पढ़ने में नहीं, उसके सुनने तथा सुनाने में है। सुनाई जानेवाली कहानियाँ ही अधिक रसमय लगती हैं। राजस्थान में कहानी-कथन की चार शैलियों में कथा-कथन, कथा-वाचन, कथा-गायन तथा कथा-नर्तन जैसी शैलियाँ प्रमुख रही हैं। कहानी चाहे कोई कहता हो, उसका हुंकारा अवश्य दिया जाता है। सुनने वालों में से किसी के द्वारा हुंकारा ‘हूँ’ कहकर दिया जाता है। हुंकारा देनेवाले को ‘हुंकारची’ कहते हैं। हुंकारा कहानी में जान लाता है और उसकी कथन-रफ्तार को बनाए रखता है। अत्यंत अजीबोगरीब तथा मीठी-मजेदार लगनेवाली ये लोककथाएँ निराश जीवन में आशा का संचार करती हैं तो कर्मशील बने रहने का जागरण देती हैं। ज्ञान का भंडार भरती हैं तो कल्पनाओं के कल्पतरु बन हमारी उत्सुकता और जिज्ञासा को शंखनाद देकर सवाया बनाती हैं। इन लोककथाओं में हास्य है तो विनोद भी; व्यंग्य है तो रुदन भी; जोश है तो उत्साह भी; सीख है तो उपदेश भी; कर्तव्य के प्रति समर्पण है तो मर-मिटने का जज्बा भी। इनके माध्यम से बच्चे अपनी स्मरणशक्ति, कल्पनाशक्ति और विचारशक्ति का संचयन करते हैं। शुद्ध सात्त्विक एवं शुचितापूर्वक जीवन-निर्वाह के लिए आध्यात्मिक अनुशासन एवं अंतर्मन में उजास भरते हैं।
Swasthaya Prashnottari
- Author Name:
Anil Agrawal
- Book Type:

- Description: आपके शरीर में यकृत (लिवर) क्या कार्य करता है? विटामिन आपके लिए क्यों आवश्यक हैं? मलेरिया से पीड़ित होने पर कौन सी दवा दी जानी चाहिए? क्या आप इन प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं? यदि हों, तो आपको इस पुस्तक से मदद मिल सकती हे । एक सामान्य पाठक को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक आपको मानव शरीर, पौष्टिकता, रोग और उनके उपचार की संपूर्ण जानकारी देती है । इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् आपको मानव शरीर, स्वास्थ्य व रोगों के विषय में बहुत सी नई जानकारियाँ प्राप्त होंगी ।
Aangan Mein Ek Vriksha
- Author Name:
Dushyant Kumar
- Book Type:

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Description:
दुष्यन्त कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है।
उपन्यास में एक सामन्ती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामन्त ज़मीन और उससे मिलनेवाली दौलत को क़ब्ज़े में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ़ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।
उपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अन्तत: सामन्त भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय रुतबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है, इसका ख़ुद उसे भी अहसास नहीं होता।
उपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चन्दन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग के हों—सब अपने परिवेश में पूरी जीवन्तता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है, और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है।
दुष्यन्त कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है—कहीं एक भी शब्द न फ़ालतू, न सुस्त।
अत्यन्त पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना।
Kuru-Kuru Swaha
- Author Name:
Manohar Shyam Joshi
- Book Type:

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Description:
नाम बेढब, शैली बेडौल, कथानक बेपेंदे का। कुल मिलाकर बेजोड़ बकवास। अब यह पाठक पर है कि ‘बकवास’ को ‘एब्सर्ड’ का पर्याय माने या न माने।
पहले शॉट से लेकर फ़ाइनल फ़्रीज तक यह एक कॉमेडी है, लेकिन इसी के एक पात्र के शब्दों में : “एइसा कॉमेडी कि दर्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यास्पद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य।”
उपन्यास का नायक है मनोहर श्याम जोशी, जो इस उपन्यास के लेखक मनोहर श्याम जोशी के अनुसार सर्वथा कल्पित पात्र है। यह नायक तिमंज़िला है। पहली मंज़िल में बसा है—मनोहर-श्रद्धालु-भावुक किशोर। दूसरी मंज़़िल में ‘जोशी जी’ नामक इंटेलेक्चुअल और तीसरी में दुनियादार श्रद्धालु ‘मैं’ जो इस कथा को सुना रहा है।
नायिका है पहुँचेली—एक अनाम और अबूझ पहेली, जो इस तिमंज़िला नायक को धराशायी करने के लिए ही अवतरित हुई है।
नायक-नायिका के चारों ओर है बम्बई का बुद्धिजीवी और अपराधजीवी जगत।
‘कुरु-कुरु स्वाहा’...में कई-कई कथानक होते हुए भी कोई कथानक नहीं है, भाषा और शिल्प के कई-कई तेवर होते हुए भी कोई तेवर नहीं है, आधुनिकता और परम्परा की तमाम अनुगूँजें होते हुए भी कहीं कोई वादी-संवादी स्वर नहीं है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जो स्वयं को नकारता ही चला जाता है।
यह मज़ाक़ है, या तमाम मज़ाक़ों का मज़ाक़, इसका निर्णय हर पाठक अपनी श्रद्धा और अपनी मनःस्थिति के अनुसार करेगा।
बहुत ही सरल ढंग से जटिल और बहुत ही जटिल ढंग से सरल यह कथाकृति सुधी पाठकों के लिए विनोद, विस्मय और विवाद की पर्याप्त सामग्री जुटाएगी।
Apsara Ka Shap
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
स्वातंत्र्योत्तर भारत के शिखरस्थ लेखकों में प्रमुख यशपाल ने अपने प्रत्येक उपन्यास को पाठक के मन-रंजन से हटाकर उसकी वैचारिक समृद्धि को लक्षित किया है। विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता ने उनकी रचनात्मकता को हर बार एक नया आयाम दिया, और उनकी हर रचना एक नए तेवर के साथ सामने आई ! 'अप्सरा का शाप' में उन्होंने दुष्यन्त-शकुन्तला के पौराणिक आख्यान को आधुनिक संवेदना और तर्कणा के आधार पर पुनराख्यायित किया है।
यशपाल के शब्दों में : 'शकुन्तला की कथा पतिव्रत धर्म में निष्ठा की पौराणिक कथा है। ‘महाभारत’ के प्रणेता तथा कालिदास ने उस कथा का उपयोग अपने-अपने समय की भावनाओं, मान्यताओं तथा प्रयोजनों के अनुसार किया है। उन्हीं के अनुकरण में 'अप्सरा का शाप' के लेखक ने भी अपने युग की भावना तथा दृष्टि के अनुसार शकुन्तला के अनुभवों की कल्पना की है। उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु दुष्यन्त का शकुन्तला से अपने प्रेम सम्बन्ध को भूल जाना है, इसी को अपने नज़रिए से देखते हुए लेखक ने इस उपन्यास में नायक 'दुष्यन्त' की पुनर्स्थापना की है और बताया है कि नायक ने जो किया, उसके आधार पर आज के युग में उसे धीरोदात्त की पदवी नहीं दी जा सकती।
Uska Bachpan
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

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Description:
‘उसका बचपन’ एक महत्त्वपूर्ण और असाधारण उपन्यास है और अपने शिल्प और शैली के आधार पर हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। इसमें एक संवेदनशील बच्चे के दृष्टिकोण से एक निर्धन परिवार के रोज़मर्रा के जीवन और जोखिम को अनेक दृश्य खंडों में उभारा गया है। इसका छोटा-सा संसार हमें विचलित भी करता है और एक गहरा आनन्द भी देता है।
यथार्थ से लबालब होते हुए भी यह उपन्यास यथार्थवादी उपन्यासों की कई पुरानी लकीरों के इधर-उधर होता हुआ आगे बढ़ता है। इसमें कोई एक कहानी नहीं, कोई बनावटी प्लाट नहीं। इसमें कृष्ण बलदेव वैद ने शब्दों का कहीं अपव्यय नहीं किया, न ही वे अतिभावुकता के शिकार हुए हैं। शिल्पगत आगाही और भाषागत ताज़गी के लिहाज़ से श्री वैद का यह पहला उपन्यास एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
1957 में अपने प्रथम प्रकाशन के समय ‘उसका बचपन’ हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट घटना थी। इस संस्करण से उस घटना की याद ताज़ा हो जाएगी, ऐसी हमारी आशा है।
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