Suni Ghati Ka Suraj
(0)
Author:
Shrilal ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
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‘सूनी घाटी का सूरज’ एक ग्रामीण युवक के बारे में है जो शिक्षित और प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्वयं को एक ऐसे समाज में पाता है, जहाँ उसकी सोच, आदर्शों और गुणों के व्यापारी प्रतिष्ठित हैं। लेकिन उस बाज़ार में अपनी गुणवत्ता और उपयोगिता को साबित करने के लिए उसके पास न तो सिफ़ारिश है, न उसके सम्बन्ध किसी ‘बड़े’ से हैं और न ही रिश्वत देने के लिए उसके पास धन हैं। उसने अपने पिता को क़र्ज़दार होकर एक ख़ानदानी ठाकुर के यहाँ बँधुआ जैसा जीवन जीते देखा है, और उनकी मृत्यु के बाद उसकी अपनी पढ़ाई एक हेडमास्साब के पास अनाथ की तरह रहकर, सेवा करके और फिर ट्यूशन आदि करके पूरी हुई, इसी तरह उसने एक मेधावी छात्र के रूप में प्रथम श्रेणी की डिग्रियाँ हासिल कीं। लेकिन अपनी उन सीमाओं के चलते जिनके लिए वह ख़ुद नहीं, बल्कि व्यवस्था ज़िम्मेदार है, वह अपने लिए कहीं जगह नहीं पाता। फलस्वरूप युग के आकर्षण, अतीत की प्रताड़ना और वर्तमान की निराशा को झाड़कर वह उसी अँधेरी और सुनसान घाटी में उतरने का फ़ैसला करता है, जहाँ उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है।
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‘सूनी घाटी का सूरज’ एक ग्रामीण युवक के बारे में है जो शिक्षित और प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्वयं को एक ऐसे समाज में पाता है, जहाँ उसकी सोच, आदर्शों और गुणों के व्यापारी प्रतिष्ठित हैं। लेकिन उस बाज़ार में अपनी गुणवत्ता और उपयोगिता को साबित करने के लिए उसके पास न तो सिफ़ारिश है, न उसके सम्बन्ध किसी ‘बड़े’ से हैं और न ही रिश्वत देने के लिए उसके पास धन हैं। उसने अपने पिता को क़र्ज़दार होकर एक ख़ानदानी ठाकुर के यहाँ बँधुआ जैसा जीवन जीते देखा है, और उनकी मृत्यु के बाद उसकी अपनी पढ़ाई एक हेडमास्साब के पास अनाथ की तरह रहकर, सेवा करके और फिर ट्यूशन आदि करके पूरी हुई, इसी तरह उसने एक मेधावी छात्र के रूप में प्रथम श्रेणी की डिग्रियाँ हासिल कीं। लेकिन अपनी उन सीमाओं के चलते जिनके लिए वह ख़ुद नहीं, बल्कि व्यवस्था ज़िम्मेदार है, वह अपने लिए कहीं जगह नहीं पाता। फलस्वरूप युग के आकर्षण, अतीत की प्रताड़ना और वर्तमान की निराशा को झाड़कर वह उसी अँधेरी और सुनसान घाटी में उतरने का फ़ैसला करता है, जहाँ उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है।
Book Details
-
ISBN9788126700417
-
Pages140
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘वाइरस’ की परिकल्पना का आधार कम्प्यूटर-प्रणाली की आम बीमारी वाइरस है लेकिन यह वाइरस आम नहीं है, वह एक साथ पूरे विश्व के कम्प्यूटरों को अपनी गिरफ़्त में लेता है और सभ्यता को पुनः उस युग में लौटने की आशंका खड़ी कर देता है, जब कम्प्यूटर नहीं थे, और तमाम काम मानव-श्रम की धीमी गति से होते थे। इस संकट को सामने देख पूरा विश्व अपने राजनैतिक मतभेद भुलाकर एकजुट होता है, और दुनिया के सात श्रेष्ठ वैज्ञानिक इसके कारणों की तलाश में जुट जाते हैं। और, जो कारण सामने आता है, वह इस उपन्यास की आधारभूत परिकल्पना का सर्वाधिक उत्तेजक और हमारी कल्पना के लिए स्तब्धकारी अंश है।
मराठी विज्ञान-ग़ल्प के प्रतिष्ठित लेखक की इस रचना में वे सभी गुण—यथा, तथ्यात्मकता, तर्कसंगति, कल्पना और मानव-कल्याण—हैं जो एक श्रेष्ठ विज्ञान-कथा में होने चाहिए।
The Boar Hunt
- Author Name:
V.M. Devadas +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: Kochi. Serene. Tranquil. Bright. Also, a burning cradle of bitter rivalries, revolt and rage. Against the sparkling, blue backwaters of the city, a mysterious Grusha rolls the dice on a deadly game of Russian roulette. Former gang members and sworn rivals masquerading as allies re-emerge, aching and hungry for their pound of flesh. Scores need to be settled. And nothing is certain – least of all, getting out alive. Set in the gritty 1980s post-Emergency India, V.M. Devadas’s celebrated crime saga (originally published in Malayalam as Pannivetta) chips away at the twisted and tragic fates of those pulled into the bloody playground of power and deceit. Unabashedly intense, this riveting tale of Kochi’s dark underbelly is a melange of heartbreak and deception that will reverberate in memory long after the last bullet.
Worlds First Book On Haiku Poetry
- Author Name:
Carlos Luis
- Rating:
- Book Type:

- Description: Haiku is a very short form of Japanese poetry consisting of 17 syllables arranged in three lines of 5, 7, and 5 syllables respectively. But against all odds, this is a collection of feelings written in three lines. An economical masterpiece that Trades you through realities of life; speaking of love, relationships, paradoxes in life, you name it you have it in here.
Apne Log
- Author Name:
Suchitra Bhattacharya
- Book Type:

-
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नितान्त अपनी ज़रूरत, अपने सुख, अपनी महत्त्वाकांक्षा, समृद्धि-लालसा की ख़ुदग़र्ज़ी के तक़ाज़े पर, इनसान ‘समूह’ बनाता है; समाज गढ़ता है; परिवार रचता है और अनगिनत रिश्तों के जाल में, अपने को उलझाए रखता है। लेकिन हैरत है, फिर भी हर इनसान निपट अकेला है, ज़िन्दगी-भर अकेला ही जीता है। ‘अपने लोग’ उपन्यास इसी निःसंग निर्जनता की तलाश है।
इस विशाल कथा की रूपरेखा समसामयिक है, पृष्ठभूमि समकालीन समाज है। माँ और बेटी के माध्यम से दो पीढ़ियों का इतिहास है और इनके इर्द-गिर्द अनगिनत रंग-बिरंगे चरित्र हैं; जिनमें कामयाब इनसान की गोपन नाकामी की स्वीकृति है; नाकामयाब इनसान का कामयाब न हो पाने का दर्द है, वहीं भावी पीढ़ी आशा-आकांक्षाओं, वर्तमान समाज की लाचारी और पापबोध के इर्द-गिर्द घूमती है। निरर्थक विद्रोह की पीड़ा और दो-दो पीढ़ियों के टकराव की दास्तान है। इसी के समानान्तर, पुरानी हवेली के खँडहरों पर नई इमारत के निर्माण की उपकथा है। नई इमारत, मानो समय के विवेक, मूल्यबोध और अनुशासन की मिसाल है। इन्हीं सबके माध्यम से लेखिका ने निःसंगता का उत्स ढूँढ़ने का प्रयास किया है।
इस वृहद उपन्यास में अनगिनत चरित्रों का जुलूस है—कोई बूढ़ा, कोई अधेड़, कोई किशोर, कोई किशोरी; जवान औरत-मर्द या फिर निरा शिशु। अलग-अलग पीढ़ियों से सम्बद्ध होने के बावजूद ये सब अभिन्न और एकमेक हैं। इन सबके अन्तस में दुःख और अवसाद चहलक़दमी कर रहा है। उपन्यास का नाम भी विराट व्यंजना का प्रतीक है। उपन्यास के सभी पात्र हमारे बेहद जाने-पहचाने, नितान्त क़रीबी लोग हैं, लेकिन नितान्त अपने होने के बावजूद, क्या सच ही कोई, किसी के क़रीब है ? क्या सचमुच नितान्त सगा, बिलकुल अपना है ? इन तमाम जीवनमुखी सवालों का जवाब है—‘अपने लोग’।
Sati Maiya Ka Chaura
- Author Name:
Bhairavprasad Gupt
- Book Type:

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Description:
‘सती मैया का चौरा’ में भैरवप्रसाद गुप्त गाँवों की मुक्ति का सवाल उठाते हैं। वे साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए किए जानेवाले संघर्ष को भी विस्तारपूर्वक अंकित करते हैं। उपन्यास की कहानी दो सम्प्रदायों के किशोरों—मुन्नी और मन्ने को केन्द्र में रखकर विकसित होती है। मन्ने गाँव के ज़मींदार का लड़का है, जबकि मुन्नी एक साधारण हैसियत वाले वैश्य परिवार से है। उनके किशोर जीवन के चित्र साम्प्रदायिक कट्टरता के विरुद्ध एक आत्मीय और अन्तरंग हस्तक्षेप के रूप में अंकित हैं।
भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में ही उत्पन्न साम्प्रदायिक राजनीति की शक्तियाँ गाँव को भी प्रभावित करती हैं। सती मैया के चौरा के लिए शुरू हुआ संघर्ष उन निहित स्वार्थों को निर्ममतापूर्वक उद्घाटित करता है जो धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर लोक-चेतना और लोक-संस्कृति के प्रतीकों को नष्ट करते हैं। ‘हिन्दू-मुसलमान की बात कभी अपने दिमाग़ में उठने ही न दो, यह समस्या धार्मिक नहीं राजनीतिक है और सही राजनीति ही साम्प्रदायिकता का अन्त कर सकती है।’ यह सही राजनीति क्या है? ‘मैं कभी भी महत्त्वाकांक्षी नहीं रहा। धन, यश, प्रशंसा को कभी भी मैंने कोई महत्त्व नहीं दिया। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद जो तकलीफ़ मैंने झेली, उसमें और आश्रम के जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम, जेल जीवन और पार्टी जीवन ने मुझे बिलकुल सफ़ेद कर दिया, सारी रंगीनियों को जला दिया...मैंने जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम में, जेल जीवन में, पार्टी जीवन में और अब पत्रकारिता और लेखक के जीवन में...।’
‘सती मैया का चौरा’ भैरवप्रसाद गुप्त का ही नहीं, समूचे हिन्दी उपन्यास में एक उल्लेखनीय रचना के रूप में समादृत रहा है।
Radheya
- Author Name:
Ranjeet Desai
- Book Type:

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‘कर्ण’ के जीवन की विडम्बनाएँ और उसके चरित्र की उदात्तता बार-बार आधुनिक रचनाकारों को आकर्षित करती रही हैं। उसका जीवन-चरित बार-बार नाटकों, खंड-काव्यों और उपन्यासों का विषय बनता रहा है। यह उपन्यास भी कर्ण के जीवन पर आधारित है।
ऐतिहासिक-पौराणिक कथानकों पर प्रभावशाली औपन्यासिक सृष्टि करने में सिद्धहस्त लेखक रणजीत देसाई ने अपनी इस कृति में कर्ण की एक व्यक्ति और एक परिस्थिति, दोनों रूपों में व्याख्या की है। माता-पिता के स्नेह से वंचित, सतत उपेक्षित और अपमानित कर्ण जीवन-भर किसी ऐसे अपराध की सज़ा भोगता रहता है, जिसमें वह कहीं शामिल नहीं था। क़दम-क़दम पर उससे उसकी जातिगत श्रेष्ठता का प्रमाण माँगा जाता है, जो वह नहीं दे पाता, जिसके कारण उसके व्यक्तित्व का प्राकृतिक तेज धूमिल पड़ जाता है। वह अकेला पड़ जाता है। ‘महाभारत’ के इतने विस्तृत फलक पर जिस तरह का अकेलापन कर्ण झेलता है, वह और कोई पात्र नहीं।
प्रस्तुत उपन्यास में गंगा के किनारे जाकर कर्ण को ध्यानस्थ होते देखना सचमुच उसे उस करुणा और सहानुभूति का अधिकारी बनाता है जिसे उसका देश-काल अपनी धार्मिक-सामाजिक सीमाओं के चलते नहीं दे पाया।
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