Samar Shesh Hai
(0)
Author:
Abdul BismillahPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकार हैं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है।</p> <p>‘समर शेष है’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है। कथा-नाटक है, सात-आठ साल का मातृविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी भारी विषमता से ग्रसित है। लेकिन पिता का असामयिक निधन तो उसे जैसे एक विकट जीवन-संग्राम में अकेला छोड़ जाता है। पिता के सहारे उसने जिस सभ्य और सुशिक्षित जीवन के सपने देखे थे, वे उसे एकाएक ढहते हुए दिखाई दिए। फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और पुरुषार्थ के बल पर अकेले ही अपने दुर्भाग्य से लड़ता रहा। इस दौरान उसे यदि तरह-तरह के अपमान झेलने पड़े तो किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए एक युवती के प्रेम और उसके ह्रदय की समस्त कोमलता का भी अनुभव हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में न तो वह कभी टूटा या पराजित हुआ और न ही अपने लक्ष्य को भूल पाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है।
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अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकार हैं। ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है।</p>
<p>‘समर शेष है’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है। कथा-नाटक है, सात-आठ साल का मातृविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी भारी विषमता से ग्रसित है। लेकिन पिता का असामयिक निधन तो उसे जैसे एक विकट जीवन-संग्राम में अकेला छोड़ जाता है। पिता के सहारे उसने जिस सभ्य और सुशिक्षित जीवन के सपने देखे थे, वे उसे एकाएक ढहते हुए दिखाई दिए। फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और पुरुषार्थ के बल पर अकेले ही अपने दुर्भाग्य से लड़ता रहा। इस दौरान उसे यदि तरह-तरह के अपमान झेलने पड़े तो किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए एक युवती के प्रेम और उसके ह्रदय की समस्त कोमलता का भी अनुभव हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में न तो वह कभी टूटा या पराजित हुआ और न ही अपने लक्ष्य को भूल पाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है।
Book Details
-
ISBN9788171780679
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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समाज लेकिन उतना वयस्क अभी नहीं हो सका है, न ही तमाम तकनीकी कौशल के बावजूद उतना आधुनिक, उदार और मानवीय कि किसी नई शुरुआत को स्वीकार कर सके। अस्तित्व के यौन-पक्ष को लेकर आज भी भारतीय समाज उत्कंठा और वितृष्णा के विपरीत बिन्दुओं के बीच डोलता रहता है। जिसे वह प्राकृतिक कहता है, वह सेक्स भी उसे सहज नहीं रहने देता; जिसे वह कहता ही अप्राकृतिक है, उसकी तो बात ही क्या!
श्लोक सिंह को अपने यौन रुझान के चलते नौकरी से निकाल दिया जाता है, और अनुराग जो उसका प्रेमी है, और संयोग से श्लोक की पत्नी का भाई, हर उस लांछना का सामना करता है जो किसी सफल-सुखी व्यक्ति के लिए यूँ भी लोगों की जेबों में हर समय तैयार रहती हैं। गालियाँ, फटकार, हत्या की धमकी आदि।
लेकिन मीरा, श्लोक की पत्नी, जिसे उन दोनों के प्रेम की सबसे ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ी, इतनी वयस्क है कि मनुष्य-मन की सूक्ष्मतर आत्मोप्लब्धियों को स्वीकार कर सके, अपनी स्वयं की क्षति को लाँघकर जीवन की नई दिशाओं के लिए द्वार खुला रख सके।
सरल और संक्षिप्त कथानक के माध्यम से यह उपन्यास धारा 377 के हटाए जाने के कुछ ही समय पहले शुरू होता है, और कोर्ट के इस वक्तव्य के कुछ बाद तक चलता है, कि ‘इतिहास को LGBTQ समुदाय से, उन्हें दी गई यातना के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए।’
वस्तुत: यह उपन्यास समाज की खोखली मान्यताओं और संकीर्ण घेरेबन्दियों के विरुद्ध ज़्यादा खुली दुनिया के निर्माण की एक मार्मिक पुकार है।
Himachal Pradesh Ki Lokkathayen
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Makaan
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नारायण एक सितारवादक है। जीविका के लिए वह परिवार को दूसरी जगह छोड़कर अपने पुराने शहर में आता है और यहीं से मकान की तलाश शुरू होती है। इस दौरान उसका सितार से साथ छूटने लगता है; और अब वह जिनके साथ जुड़ता है, उनमें मकान बाँटनेवाला अफ़सर है, कर्मचारी-यूनियन का नेता बारीन हालदार है, पुरानी शिष्या श्यामा है, वेश्या-पुत्री सिम्मी है और वे तमाम तत्त्व हैं जो ज़िन्दगी के बिखराव को तीखा बनाते हैं। इस संघर्ष, शोषण और अव्यवस्था के दौर से गुज़रते हुए तीक्ष्ण प्रतिक्रियाएँ व्यक्त होती हैं : ‘मज़ाक़ देखा तुमने? हम आसमान में उपग्रह उड़ा सकते हैं पर इस निगम के सीवेज़ के लिए मशीनों का जुगाड़ नहीं कर सकते। यहाँ सीवेज़ की सफ़ाई के लिए तो बलि के बकरे चाहिए, पर बिस्कुट बनाने के लिए यहाँ नई से नई मशीनें मौजूद हैं...’
‘जैसे कुछ तांत्रिक लोग शराब पीने से पहले माँ काली के नाम पर दो-चार बूँदें ज़मीन पर छिड़क देते हैं; वैसे ही हाउसिंग की पूरी-की-पूरी स्कीम गटकने से पहले चतुर लोग हरिजनों के नाम पर दस-बीस प्लॉट निकाल देते हैं...’ उपन्यास का अन्त सर्वथा अप्रत्याशित मोड़ पर होता है।
‘मकान’ यशस्वी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की बहुप्रशंसित कृति है। वस्तुत: संगीत की पृष्ठभूमि में कलाकार के जीवन की आकांक्षाओं, ज़िम्मेदारियों, विसंगतियों और तनावों को केन्द्र बनाकर लिखा गया हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला उपन्यास है।
Sardhana Ki Begham
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Rangnath Tiwari
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ऐतिहासिक उपन्यास में अपने समय की कहानी होती है जिसमें विराट काल-पुरुष के आँसू और मुस्कान, समय की सीमा को लाँघकर अविकल रूप से छलकते रहते हैं।
‘सरधाना की बेग़म’ एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें बेग़म समरू और आयरिश सोल्जर जॉर्ज थॉमस की रूहानी कशमकश साकार हो उठी है।
‘सरधाना की बेग़म’ एक अजीबो-ग़रीब शख़्सियत। सियासत जिसके ख़ून में रची-बसी थी और मक्कारी जिसके वजूद का हिस्सा। मैदाने-जंग में वह जब मर्दाना भेष में अपनी कवायदी फ़ौज और लाव-लश्कर के साथ उतरती तो अच्छे-अच्छों के छक्के छूट जाते।
दिल्ली का बादशाह शाहआलम उसे अपनी बेटी कहता और शाहआलम के वकील-ए-मुतल्लक (वजीर) माधोजी सिन्धिया उसे अपनी समशिरा बहन अर्थात् सगी बहन कहते और जिससे राखी बँधवाते।
‘‘संगीत उसकी साँसों में था
और नृत्य की लय उसके तन-बदन में
सूफ़ी तसव्वुफ़ उसका ईमान था
और ईसा मसीह की प्रेम-संवेदना
उसकी कहानी इकादत’’
जाट, मराठा, पठान, जर्मन, फ़्रांसीसी, आयरिश तथा अंग्रेज़ जांबाज़ों के हौसलों को बार-बार चकमा देकर अपनी बहादुरी और हुस्नोजमाल का भरम क़ायम रखनेवाली क़यामत का नाम है—‘सरधाना की बेग़म’, जिसके ज़िक्र के बिना अठारहवीं शताब्दी के उत्तरी भारत की अन्दरूनी कहानी अधूरी रह जाती है।
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