Mahabharat
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
299
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‘महाभारत’ व्यास-कृत ‘महाभारत’ की सरल-संक्षिप्त प्रस्तुति—हिन्दी को निराला जी का एक विशिष्ट और अत्यन्त उपयोगी अवदान है।</p> <p>यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए लिखी गई है जो संस्कृत ज्ञान से वंचित हैं।</p> <p>निराला की इस पुस्तक से सभी महत्त्वपूर्ण घटना-प्रसंग समाविष्ट हैं। अपने संवादों में सारे प्रमुख पात्र भी पूरी तरह मुखर हैं।</p> <p>अठारह सर्गों की क्रमबद्ध कथा ऐसी सरल और प्रवाहमयी भाषा-शैली में प्रस्तुत की गई है कि मूल ग्रन्थ को नहीं पढ़ पाने के बावजूद उसके सम्पूर्ण घटनाक्रम और विशिष्ट भावना-लोक से पाठक का सहज ही गहरा रिश्ता बन जाता है।
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‘महाभारत’ व्यास-कृत ‘महाभारत’ की सरल-संक्षिप्त प्रस्तुति—हिन्दी को निराला जी का एक विशिष्ट और अत्यन्त उपयोगी अवदान है।</p>
<p>यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए लिखी गई है जो संस्कृत ज्ञान से वंचित हैं।</p>
<p>निराला की इस पुस्तक से सभी महत्त्वपूर्ण घटना-प्रसंग समाविष्ट हैं। अपने संवादों में सारे प्रमुख पात्र भी पूरी तरह मुखर हैं।</p>
<p>अठारह सर्गों की क्रमबद्ध कथा ऐसी सरल और प्रवाहमयी भाषा-शैली में प्रस्तुत की गई है कि मूल ग्रन्थ को नहीं पढ़ पाने के बावजूद उसके सम्पूर्ण घटनाक्रम और विशिष्ट भावना-लोक से पाठक का सहज ही गहरा रिश्ता बन जाता है।
Book Details
-
ISBN9788126718771
-
Pages288
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: वर्तमान भारतीय समाज का अभिजात नागर मन दो हिस्सों में विभाजित है—एक में है पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरे में वंशानुगत संस्कारवाद। इससे इस वर्ग के भीतर का द्वन्द्व पैदा होता है, उससे पूर्णता के बीच रिक्तता, स्वच्छन्दता के बीच अवरोध और प्रकाश के बीच अन्धकार आ खड़ा होता है। परिणामतः व्यक्ति ऊबने लगता है, भीतर ही भीतर क्रोध, ईर्ष्या और सन्देह जकड़ लेते हैं उसे, अपने ही लिए अजनबी हो उठता है वह, और तब इसे हम हरबंस की शक्ल में पहचानते हैं—हरबंस इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र, जो दाम्पत्य सम्बन्धों की सहज रागात्मकता, ऊष्मा और अर्थवत्ता की तलाश में भटक रहा है। हरबंस और नीलिमा के माध्यम से पारस्परिक ईमानदारी, भावनात्मक लगाव और मानसिक समदृष्टि से रिक्त दाम्पत्य जीवन का यहाँ प्रभावशाली चित्रण हुआ है। अपनी पहचान के लिए पहचानहीन होते जा रहे भारतीय अभिजातवर्ग की भौतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक महत्त्वाकांक्षाओं के अँधेरे बन्द कमरों को खोलनेवाला यह उपन्यास हिन्दी की विशिष्टतम कथाकृतियों में गण्य है
Anbita Vyatit
- Author Name:
Kamleshwar
- Book Type:

- Description: ''देखिए मैं आपकी पत्नी ज़रूर हूँ लेकिन मैं एक औरत भी हूँ…जिस दुनिया में आप रहते हैं, वह भी सही है और जिस दुनिया में मैं रह सकती हूँ? वह भी सही है...मेरा शरीर सन्तृप्त होता रहे और मेरा मन मृत होता रहे, यह मुझे आपके साथ बहुत दूर तक नहीं ले जा सकता...मैं जानती हूँ? पंछियों के केमिकल से युक्त भूसा-भरे शरीरों के करोड़ों रुपए के बिजनेस को छोड़ना या बन्द करना आपके लिए मुमकिन नहीं होगा...लेकिन मेरे लिए यह मुमकिन होगा कि मैं मुर्दों की इस दुनिया से बाहर चली जाऊँ।'' (इसी उपन्यास से) 1947 के बाद सामन्ती युग का पतन, पर्यावरण, पक्षियों से प्रेम तथा सहज मानवीय कोमल सम्बन्धों की यह कहानी बरबस ही आपको अपनी ओर आकर्षित कर लेगी।
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