Kya Karen?
(0)
Author:
Nikolai ChernyshevskyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
450
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कोई एक कथाकृति किसी समाज को किस हद तक प्रभावित कर सकती है और इतिहास-निर्माताओं की एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित–दीक्षित करने में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, इसे जानने के लिए उन्नीसवीं शताब्दी के आख़िरी चार दशकों (और बीसवीं शताब्दी के पहले दशक) के दौरान रूसी समाज, और विशेषकर युवा समुदाय पर, ‘क्या करें?’ के प्रभाव का अध्ययन किया जा सकता है।</p> <p>यह उपन्यास अपने समय के प्रगतिशील युवाओं के सामने व्यावहारिक कार्रवाई की एक ठोस योजना प्रस्तुत करता है। ‘क्या करें?’ उपन्यास में एकदम नए क़िस्म के लोगों के जीवन की कहानी प्रस्तुत की गई है, जिनके सर्वथा नई क़िस्म की नैतिक और सामाजिक विचार थे, नए क़िस्म का पारिवारिक जीवन था। वे अपने श्रम के सहारे जीवनयापन करनेवाले लोग थे जो अपने व्यावहारिक जीवन के उदाहरण से लोगों को समाजवाद के विचारों का क़ायल करते थे। 1860 के दशक के रूस में प्रस्तुत चरित्र निस्सन्देह भविष्य के नागरिक थे।
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कोई एक कथाकृति किसी समाज को किस हद तक प्रभावित कर सकती है और इतिहास-निर्माताओं की एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित–दीक्षित करने में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, इसे जानने के लिए उन्नीसवीं शताब्दी के आख़िरी चार दशकों (और बीसवीं शताब्दी के पहले दशक) के दौरान रूसी समाज, और विशेषकर युवा समुदाय पर, ‘क्या करें?’ के प्रभाव का अध्ययन किया जा सकता है।</p>
<p>यह उपन्यास अपने समय के प्रगतिशील युवाओं के सामने व्यावहारिक कार्रवाई की एक ठोस योजना प्रस्तुत करता है। ‘क्या करें?’ उपन्यास में एकदम नए क़िस्म के लोगों के जीवन की कहानी प्रस्तुत की गई है, जिनके सर्वथा नई क़िस्म की नैतिक और सामाजिक विचार थे, नए क़िस्म का पारिवारिक जीवन था। वे अपने श्रम के सहारे जीवनयापन करनेवाले लोग थे जो अपने व्यावहारिक जीवन के उदाहरण से लोगों को समाजवाद के विचारों का क़ायल करते थे। 1860 के दशक के रूस में प्रस्तुत चरित्र निस्सन्देह भविष्य के नागरिक थे।
Book Details
-
ISBN9788126713806
-
Pages440
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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धर्म यदि राजनीति को नियंत्रित-निर्देशित करने लगे अथवा राजनीति ही धर्म की आड़ में अपना खेल खेलने लगे तो हिंसा निश्चय ही उसका अनिवार्य परिणाम होगी। सुपरिचित कथाकार सुरेश कांत ने इस उपन्यास के माध्यम से इसी सत्य को रेखांकित किया है।
इसके लिए लेखक ने प्रियदर्शी अशोक की मृत्यु (ई.पू. 236) के क़रीब सौ वर्ष बाद का समय चुना है, जबकि सम्पूर्ण उत्तर-पश्चिमी भारत यूनानी आक्रमणों का शिकार था और मगध साम्राज्य का महान सेनानी पुष्यमित्र मौर्यवंश के अस्तप्राय गौरव की पुनर्स्थापना में लगा हुआ था, जैन धर्म का अभी प्रादुर्भाव ही हुआ था और पतनशीलता के गर्त में पड़ा हुआ बौद्ध धर्म अहिंसा के नाम पर अपनी सर्वाधिक हिंसक एवं राष्ट्रविरोधी भूमिका में था। इस पृष्ठभूमि में लेखक ने धर्म और राजनीति के अन्तर्सम्बन्धों का गम्भीर विवेचन किया है और राष्ट्रीय स्वाभिमान के सन्दर्भ में हिंसा तथा अहिंसा की सार्थकता का सवाल उठाया है। उसके पास इतिहास को देखने की एक लोकोन्मुख दृष्टि है और उसे एक रोचक कथा-फलक प्रदान करने की रचनात्मक क्षमता भी।
वस्तुतः लेखक की यह ऐतिहासिक कथाकृति तथाकथित ‘धर्म’ के उस भयावह चेहरे को उघाड़ती है, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है और यह कार्य उसने कुछ इस कुशलता से किया है कि वर्तमान भारत में राजनीति करनेवाली धर्मोन्मादी शक्तियाँ—मठ और मन्दिर—अनायास हमारे सामने नग्न हो उठती हैं। हम उन धर्म-स्थानों और धर्म-गुरुओं को पहचान जाते हैं, जो जेतवन-विहार के विशाल चैत्य और संघ-स्थविर मोग्गलान-जैसे लोगों की शक्ल में यहाँ आज भी सक्रिय हैं। कहना न होगा कि इस कृति में रूपायित अतीत हमारे वर्तमान का ही एक चिन्तनीय अध्याय है।
Seemant
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Hemangini A. Ranade
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- Description: कौन-सी वह तीव्र अनुभूति है जो मानव-मन को किसी स्थान विशेष की ओर अनजाने ही आकर्षित करती है? यह आकर्षण भौगोलिक हदों तक सीमित नहीं, इसका सम्मोहन देशकाल की सीमाओं से परे है। उपन्यास की नायिका एंजेलिका, जिस देश में जन्मी, पली और बढ़ी है, उस समाज और वातावरण में अपने को सर्वथा अजनबी पाती है, जहाँ हज़ारहा कोशिशों के बावजूद उसे चैन और सुकून हासिल नहीं है। वह नहीं जानती कि इस छटपटाहट के पीछे कारण क्या हैं? माता-पिता की उसके प्रति रही उदासीनता को लेकर आक्रोश या स्वयं अपने स्वभाव में एक अनाम अधूरापन जिसका निर्धारण असम्भव है। अन्ततः जब वह अपने गन्तव्य—भारत आ पहुँचती है, बकौल उसकी जापानी सहेली फ्रुमिको के, अपने भारतीय पति को ‘भारत के एक टिकट के लिए भुनाकर’, तो क्या परिपूर्णता की उसकी खोज वाकई समाप्त हो जाती है? या अभी देशकाल की कई और भौतिक सीमाओं को उलाँघना बाक़ी है? परदेस जाकर बसनेवाले लोग किन-किन कारणों से अपने-अपने देशों का त्याग करते हैं, अपनाए हुए देश से उनकी क्या और कौन-सी अपेक्षाएँ हुआ करती हैं, इस प्रश्न को भी आयरलैंड और भारत की पृष्ठभूमि पर रचित इस उपन्यास में उपस्थित किया गया है।
Apavitra Aakhyan
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Abdul Bismillah
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- Description: अब्दुल बिस्मिल्लाह उन चन्द भारतीय लेखकों में से हैं, जिन्होंने देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को काफ़ी क़रीब से देखा है और उसे अपनी कहानियों और उपन्यासों का विषय बनाया है। समय की सबसे बड़ी विडम्बना है, मनुष्य का इनसान नहीं हो पाना। हम हिन्दू, मुसलमान तो हैं, लेकिन इनसान बनने की जद्दोजहद हमें बेचैन कर देती है। यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम रिश्ते की मिठास और खटास के साथ समय की तिक्ताओं और विरोधाभासों का भी सूक्ष्म चित्रण करता है। उपन्यास के नायक का सम्बन्ध ऐसी संस्कृति से है, जहाँ संस्कार और भाषा के बीच धर्म कोई दीवार खड़ा नहीं करता। लेकिन शहर का सभ्य समाज उसे बार-बार यह अहसास दिलाता है कि वह मुसलमान है। और इसलिए उसे हिन्दी और संस्कृत की जगह उर्दू या फ़ारसी की पढ़ाई करनी चाहिए थी। वहीं ऐसे पात्रों से भी उसका सामना होता है, जो अन्दर से कुछ तो बाहर से कुछ और होते हैं। उपन्यास की नायिका यूँ तो व्यवहार में नमाज़-रोज़े वाली है, लेकिन नौकरी के लिए किसी मुस्लिम नेता से हमबिस्तरी करने में उसे कोई हिचक भी नहीं होती। ‘अपवित्र आख्यान’ मौजूदा अर्थ केन्द्रित समाज और उसके सामने खड़े मुस्लिम समाज के अन्तर्वाह्य अवरोधों की कथा के बहाने देश-समाज की मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों का भी गहन चित्रण करता है।
Raavi Likhata Hai
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Abdul Bismillah
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Description:
पाश्चात्य और भारतीय सभ्यता-संस्कारों के बीच पुल बनाता, एक संवेदनशील तथा शालीन मुस्लिम परिवार का मार्मिक दस्तावेज़। लेखक ने वर्तमान के माध्यम से अतीत के कथाचित्र का सजीव चित्रण किया है और साहित्य की एक सशक्त प्रविधि 'फैंटेसी' का बख़ूबी प्रयोग करते हुए उपन्यास को एक नए सौन्दर्यशास्त्र से सृजित किया है।
उपन्यास में एक निम्न मध्यवर्गीय लेकिन कर्मशील मुस्लिम परिवार की कई पीढ़ियों की जीवनगाथा का रोचक ब्योरा प्रस्तुत किया गया है। उनकी संस्कृति व सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ यह उपन्यास ग्रामीण जीवन की गहनता, प्रकृति प्रेम, खेत-खलिहानों के दृश्यों का भी सफ़र करता है। भारतीयता की जड़ें कितनी सशक्त, गहरी और शाश्वत हैं और उनका प्रभाव कितना दूरगामी है, यह उपन्यास इस सच्चाई को स्थापित करता है। पाश्चात्य संस्कृति में पले बच्चे जिन्हें देशी रहन-सहन, खानपान, भाषा और अपनी दुर्व्यवस्था से अजीब-सा परहेज़ था, उनका सहज रूपान्तरण एक ख़ूबसूरत प्रक्रिया है।
लेखक ने नए और पुराने जीवन और समाज को बिना किसी टकराहट के एक शृंखला में बाँधने और सामंजस्य बनाने का एक सार्थक और अनिवार्य कार्य किया है जो आज के समय की आवश्यकता भी है।
इस उपन्यास में आज की कम्प्यूटर, मैसेज, ई-मेल की इलेक्ट्रॉनिक दुनिया और तेज़ रफ़्तार भौतिक जीवन के बीच सम्बन्धों, रिश्तों और संवेदनाओं को कैसे जीवित रखा जा सकता है, इन पहलुओं को भी सरल भाषा में सँजोया गया है। भाषा की रवानगी कृति की पठनीयता को बढ़ाती है और पाठक के अन्तर्मन से एक रिश्ता भी बनाती है।
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