Julaikhan
(0)
Author:
Asakad MukhtarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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प्रत्येक समाज और राष्ट्र का अपना साहित्य है, परन्तु कुछ साहित्य अपनी गहरी और व्यापक अनुभूतियों के बल से राष्ट्रीय साहित्य की सीमाओं को लाँघकर अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में पहुँच जाता है।</p> <p>उज़बेक लेखक अस्कद मुख़्तार का उपन्यास ‘बहिनें’ मुझे उसी श्रेणी की रचना जँची है।</p> <p>मुख़्तार के उपन्यास में चित्रित उज़बेक समाज के जीवन और उनकी समस्याओं की छवि मुझे उत्तर भारत के जीवन से इतनी मिलती-जुलती लगी कि उसे अपनी भाषा के पाठकों को दे सकने के उत्साह को दबा नहीं सका।</p> <p>उज़बेक उच्चारण की ध्वनि को बनाए रखने के लिए जुलैखाँ ही रहने दिया है।</p> <p>—यशपाल
Read moreAbout the Book
प्रत्येक समाज और राष्ट्र का अपना साहित्य है, परन्तु कुछ साहित्य अपनी गहरी और व्यापक अनुभूतियों के बल से राष्ट्रीय साहित्य की सीमाओं को लाँघकर अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में पहुँच जाता है।</p>
<p>उज़बेक लेखक अस्कद मुख़्तार का उपन्यास ‘बहिनें’ मुझे उसी श्रेणी की रचना जँची है।</p>
<p>मुख़्तार के उपन्यास में चित्रित उज़बेक समाज के जीवन और उनकी समस्याओं की छवि मुझे उत्तर भारत के जीवन से इतनी मिलती-जुलती लगी कि उसे अपनी भाषा के पाठकों को दे सकने के उत्साह को दबा नहीं सका।</p>
<p>उज़बेक उच्चारण की ध्वनि को बनाए रखने के लिए जुलैखाँ ही रहने दिया है।</p>
<p>—यशपाल
Book Details
-
ISBN9789352210022
-
Pages296
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र-युद्ध के पूर्व कहा था—“यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” वही श्रीकृष्ण जब उस काल में जन्मे थे और एक प्रकार से कुरुक्षेत्र-युद्ध के मुख्य नायक थे, तो मानना होगा कि धर्म की ग्लानि और अधर्म का बढ़ाव बहुत अधिक हुआ था। पृथ्वी भर के मनुष्य अत्याचार, अन्याय, दुख, कष्ट से बेचैन हो उठे थे। राज-शक्ति तथा क्षात्र-शक्ति पर लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, शून्यगर्भी अहंकार और आत्मनाशा बुद्धि छा गई थी। उसकी मति विभ्रान्त हो गई थी। तब क्या श्रीकृष्ण ने भारत को, पंक-शैया से उठाना और नित्य अवमानना से उसका उद्धार करना चाहा था? संभोगमत्त, मदगर्वित, निर्बोध-विकृत क्षात्र-शक्ति के हाथ से शासन छीनकर सद्बुद्धियुक्त सत्पुरुषों के हाथ में देश का दायित्व देना चाहा था? दरिद्र, पीड़ित, मूढ़, मूक, साधारण मनुष्यों की संघ-शक्ति को ही शासन-शक्ति में रूपान्तरित करना चाहा था? क्या इसी कारण उनके विख्यात घोषक-शंख को कोई अन्य नाम न देकर, उसका नाम पाञ्चजन्य रखा गया? क्या उन्होंने इसीलिए राजसूय यज्ञ में साधारण-जन के पाद-प्रक्षालन का भार ग्रहण किया था? ‘पाञ्चजन्य’ ग्रन्थ की महाभारत-कथा में लेखक ने इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजा है।
Penalty Corner Evam Anya Kahaniyan
- Author Name:
Ashwani Kumar 'Pankaj'
- Book Type:

- Description: "‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ झारखंड के औपनिवेशिक शोषण-दमन और उससे उपजी सामाजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों-विकृतियों को बेहद बारीकी से रेखांकित करती हैं। झारखंड के जनजीवन को संदर्भित करनेवाली ऐसी रचनाएँ और रचनाकार बहुत विरले हैं—हिंदी में तो और भी कम। दरअसल बहुत से रचनाकार यहाँ की जमीनी हकीकत से जुड़ ही नहीं पाते। संभवतः औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष उन्हें ऐसा करने नहीं देते। ‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ अश्विनी कुमार पंकज को उन रचनाकारों से भिन्न पाँत में खड़ा करती हैं—एक शिखर की तरह, नैदिन गार्डीमर की तरह। ‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियों का फलक बहुत विस्तृत है। इसमें एक ओर गिरिडीह-धनबाद की परित्यक्त कोयला-खदान हैं तो दूसरी ओर जादूगोड़ा का विकलांग-बाँझ कर देनेवाला प्रदूषित परिवेश। एक तरफ सिमडेगा, जलडेगा, बानो, मनोहरपुर के घाट-पहाड़, बाजार-हाट हैं तो दूसरी तरफ राँची-टाटा के चमचमाते फाइव-स्टार होटल। गरीबी और अमीरी का असह्य कंट्रास्ट। भाषा का रेंज भी उतना ही विस्तृत है, जितना इसका फलक। ठेठ गाँव-घर की हिंदी-नागपुरी से लेकर लेटेस्ट अंग्रेजी तक—‘चेंज योर माइंड इन राइट डायरेक्शन।’ अतिरिक्त प्रयास के बिना कथ्य के साथ सादा-सा शिल्प सहज रूप से कहानियों में आया है। एक नैसर्गिक आदिवासी परिवेश का प्रस्तुतिकरण सादगी-मौलिकता- सहजता के साथ। —विसेश्वर प्रसाद केशरी "
Himmat Jounpuri
- Author Name:
Rahi Masoom Raza
- Book Type:

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Description:
हिम्मत जौनपुरी एक ऐसे निहत्थे किरदार की कहानी है जो जीवन-भर जीने का हक़ माँगता रहा, सपने बुनता रहा लेकिन आत्मा की बेचैनी और सपनों के संघर्ष में उलझकर रह गया। यह बम्बई के उस फ़िल्मी माहौल की कहानी भी है जिसकी भूल-भुलैया और चमक-दमक आदमी को भटका देती है और वह कहीं का नहीं रह जाता।
राही मासूम रज़ा की सिद्ध शैली का ही कमाल है कि इसमें केवल सपनों या भूल-भुलैया का तिलस्म ही नहीं बल्कि उस समाज की भी कहानी कही गई है, जिसमें जमुना चाहकर भी अपनी असली ज़िन्दगी बसर नहीं कर पाती। एक तरफ़ इसमें व्यंग्यात्मक शैली में सामाजिक खोखलेपन को उजागर किया गया है तो दूसरी तरफ़ भावनाओं की उत्ताल लहरों की नक़्क़ाशी भी की गई है।
राही मासूम रज़ा साहब ने हिम्मत जौनपुरी को माध्यम बनाकर एक सामान्य व्यक्ति के टूटने और बिखरने को जिस नए अन्दाज़ और तेवर के साथ लिखा है वह उनके अन्य उपन्यासों से बिल्कुल अलग है।
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