Duniya Anna Ki Nazar Se
(0)
Author:
Jostein GaarderPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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इस उपन्यास की कथा काल्पनिक है, लेकिन तथ्य, तर्क, विश्लेषण... सब वास्तविक है। यह मनोरंजक कहानी आपको दुनिया के अतीत, वर्तमान और भविष्य की वह सच्ची तस्वीर देती है, जिसे आप जीवन में देखते हैं और उपन्यास में महसूस करते हैं, इसलिए अंतिम पेज़ तक पहुँचते हुए आप बदल जाते हैं। इसकी कथा सिर्फ़ एक दिन की है। लेकिन इस एक दिन को एना अतीत और भविष्य से ऐसे देखती है कि हम अपने आत्मघाती व्यवहारों व भावी पीढ़ियों के प्रति अपनी जवाबदेहियों का साक्षात्कार कर लेते हैं। एक मनुष्य के रूप में अपने आत्मसाक्षात्कार का प्रभाव बहुत गहरा होता है। आप इस ग्रह के तमाम पारितंत्रों, जीव-जंतुओं और उनपर आसन्न संकटों के बारे में जानेंगे। आप अपने पैरों के नीचे की इस पृथ्वी को नई आँखों से देखेंगे। आसपास के पारिस्थितिक वैभव और उसके मूल्य को पहली बार महसूस करेंगे। यह किताब आपके ज्ञान और संवेदना का विस्तार करेगी। पृथ्वी के पारिस्थितिक संकट पर ढेरों किताबें पढ़ने से बेहतर है यह रुचिकर उपन्यास पढ़ना।
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इस उपन्यास की कथा काल्पनिक है, लेकिन तथ्य, तर्क, विश्लेषण... सब वास्तविक है। यह मनोरंजक कहानी आपको दुनिया के अतीत, वर्तमान और भविष्य की वह सच्ची तस्वीर देती है, जिसे आप जीवन में देखते हैं और उपन्यास में महसूस करते हैं, इसलिए अंतिम पेज़ तक पहुँचते हुए आप बदल जाते हैं। इसकी कथा सिर्फ़ एक दिन की है। लेकिन इस एक दिन को एना अतीत और भविष्य से ऐसे देखती है कि हम अपने आत्मघाती व्यवहारों व भावी पीढ़ियों के प्रति अपनी जवाबदेहियों का साक्षात्कार कर लेते हैं। एक मनुष्य के रूप में अपने आत्मसाक्षात्कार का प्रभाव बहुत गहरा होता है। आप इस ग्रह के तमाम पारितंत्रों, जीव-जंतुओं और उनपर आसन्न संकटों के बारे में जानेंगे। आप अपने पैरों के नीचे की इस पृथ्वी को नई आँखों से देखेंगे। आसपास के पारिस्थितिक वैभव और उसके मूल्य को पहली बार महसूस करेंगे। यह किताब आपके ज्ञान और संवेदना का विस्तार करेगी। पृथ्वी के पारिस्थितिक संकट पर ढेरों किताबें पढ़ने से बेहतर है यह रुचिकर उपन्यास पढ़ना।
Book Details
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ISBN9789392088124
-
Pages190
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Vyas Mishra
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- Description: आज़ादी के साथ ही हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जो जख़्म देश के दिल में घर कर गया वो समय के साथ मिटने के बजाय रह-रहकर टीसता रहता है। इसे सींचते हैं दोनों सम्प्रदायों के तथाकथित रहनुमा। अफ़वाहों, भ्रान्तियों को हवा देकर साम्प्रदायिकता की आग भड़काई जाती है और उस पर सेंकी जाती है स्वार्थ की रोटी। चन्द गुंडे-माफ़िया अपनी मर्ज़ी से हालात को मनचाही दिशा में भेड़ की तरह मोड़ देते हैं और व्यवस्था अपने चुनावी समीकरण पर विचार करती हुई राजनीति का खेल खेलती है। प्रशासन को पता भी नहीं होता और बड़ी से बड़ी दुर्घटना हो जाती है। क़ानून के कारिन्दे सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेताओं की कठपुतली बने रहते हैं। अपने को जनपक्षधर बतानेवाला लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी बाज़ार की माँग के अनुसार अपनी भूमिका निर्धारित करता है। प्रिंट ऑर्डर बढ़ाने के चक्कर में सम्पादकीय नीति रातोंरात बदल जाती है और अख़बार किसी ख़ास सम्प्रदाय के भोंपू में तब्दील हो जाता है। साम्प्रदायिकता के इसी मंज़रनामे को बड़ी ही संवेदनशील भाषा में चित्रित करता है यह उपन्यास ‘अगिन पाथर’। मगर इस चिन्ताजनक हालात में भी रामभज, अरशद आलम, चट्टोपाध्याय, हरिभाई चावड़ा, इला और शान्तनु जैसे आम लोग जो मानवीयता की लौ को बुझने नहीं देते। ‘अगिन पाथर’ व्यास मिश्र का पहला उपन्यास है, मगर इसका शिल्प-कौशल और भाषा-प्रवाह इतना सधा हुआ और परिमार्जित है कि पाठक इसे एक बैठक में ही पढ़ना चाहेंगे।
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