Dahan
(0)
Author:
Suchitra BhattacharyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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पुरुष-शासित समाज में मर्द को क्या कभी अहसास होगा कि औरत युग-युगान्तरों से अपने अन्तस में कितना अभिमान, अपमान, पीड़ा और ग्लानि छिपाए, उसे प्यार करती है? हज़ार असहमति, आपत्ति, विक्षोभ और असहनीय विसंगतियों के बावजूद, उसके साथ हमक़दम होकर सफ़र जारी रखती है? महानगर में हुई एक परिचित-सी घटना के सहारे लेखिका सुचित्रा भट्टाचार्य ने इस उपन्यास में वर्तमान समय और समाज की अँधेरी सच्चाइयों और मर्द की तानाशाहियों को क़लमबन्द किया है।</p> <p>‘दहन’ महानगर के टालीगंज इलाक़े में चार समाज-दुश्मन नौजवानों के अश्लील शिकंजे से किसी गृहवधू को बचाने के लिए अपूर्व साहस से कूद पड़नेवाली एक औरत के तजुर्बे की हक़ीक़त है; उसने पुरुषत्व के अहंकार में औरत को अपने जु़ल्म और अत्याचार का शिकार बनानेवाले मर्दों के ख़िलाफ़ सामाजिक इंसाफ़ की वकालत की; उन्हें उचित सज़ा दिलाने के लिए थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी तक भी दौड़ लगाने में हिचक नहीं की। अपनी साहसिकता के क्षणिक अभिनन्दन के बाद, उसने भयंकर अचरज के साथ आविष्कार किया कि नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानेवाली और उनसे जूझने को तैयार औरत पर कितने-कितने माध्यमों से, कितनी-कितनी तरह के दबाव उसे निष्क्रिय और तुच्छ बना देते हैं। उसका प्रतिवाद, यहाँ तक कि उस पर लगाए गए अनगिनत लांछन भी उस बर्बर दबाव में पिसकर रह जाते हैं।</p> <p>‘दहन’ उपन्यास, वर्तमान नारी-स्वातंत्र्य का असली चेहरा दिखाता है और पुरुष-शक्ति के नपुंसक और खोखले मूल्यबोध की हक़ीक़त बयान करता है, और वर्तमान समाज और पुरुषों द्वारा औरत की हिम्मत और मुक़ाबले की ताक़त को तोड़ने की साज़िश का पर्दाफ़ाश करता है।
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पुरुष-शासित समाज में मर्द को क्या कभी अहसास होगा कि औरत युग-युगान्तरों से अपने अन्तस में कितना अभिमान, अपमान, पीड़ा और ग्लानि छिपाए, उसे प्यार करती है? हज़ार असहमति, आपत्ति, विक्षोभ और असहनीय विसंगतियों के बावजूद, उसके साथ हमक़दम होकर सफ़र जारी रखती है? महानगर में हुई एक परिचित-सी घटना के सहारे लेखिका सुचित्रा भट्टाचार्य ने इस उपन्यास में वर्तमान समय और समाज की अँधेरी सच्चाइयों और मर्द की तानाशाहियों को क़लमबन्द किया है।</p>
<p>‘दहन’ महानगर के टालीगंज इलाक़े में चार समाज-दुश्मन नौजवानों के अश्लील शिकंजे से किसी गृहवधू को बचाने के लिए अपूर्व साहस से कूद पड़नेवाली एक औरत के तजुर्बे की हक़ीक़त है; उसने पुरुषत्व के अहंकार में औरत को अपने जु़ल्म और अत्याचार का शिकार बनानेवाले मर्दों के ख़िलाफ़ सामाजिक इंसाफ़ की वकालत की; उन्हें उचित सज़ा दिलाने के लिए थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी तक भी दौड़ लगाने में हिचक नहीं की। अपनी साहसिकता के क्षणिक अभिनन्दन के बाद, उसने भयंकर अचरज के साथ आविष्कार किया कि नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानेवाली और उनसे जूझने को तैयार औरत पर कितने-कितने माध्यमों से, कितनी-कितनी तरह के दबाव उसे निष्क्रिय और तुच्छ बना देते हैं। उसका प्रतिवाद, यहाँ तक कि उस पर लगाए गए अनगिनत लांछन भी उस बर्बर दबाव में पिसकर रह जाते हैं।</p>
<p>‘दहन’ उपन्यास, वर्तमान नारी-स्वातंत्र्य का असली चेहरा दिखाता है और पुरुष-शक्ति के नपुंसक और खोखले मूल्यबोध की हक़ीक़त बयान करता है, और वर्तमान समाज और पुरुषों द्वारा औरत की हिम्मत और मुक़ाबले की ताक़त को तोड़ने की साज़िश का पर्दाफ़ाश करता है।
Book Details
-
ISBN9788171195909
-
Pages167
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘दास्तान-ए-लापता’ और ‘सूखा बरगद’ जैसे चर्चित उपन्यासों के लेखक मंज़ूर एहतेशाम की यह नई औपन्यासिक कृति समकालीन हिन्दी उपन्यास के लय-ताल रहित परिदृश्य में एक सुखद हस्तक्षेप है। यह उपन्यास पुनः स्थापित करता है कि सिर्फ़ कहानी बता देना और प्रचलित विमर्शों की जुमलेबाज़ी का बघार डालते हुए ‘पोलिटिकली करेक्ट’ मोर्चे पर सीना तानकर खड़े हो जाना ही अच्छे उपन्यास की गारंटी नहीं है। हर उपन्यास को अपनी भाषा और संरचना में अपनी ही एक लय का आविष्कार करना पड़ता है, और यही वह चीज़ है जो उसे दशकों और सदियों तक पढ़नेवाले के दिलो-दिमाग़ का हिस्सा बनाती है।
यह उपन्यास सफलतापूर्वक इस ज़िम्मेदारी को अंजाम देता है। देश और काल के विभिन्न चरणों में आवाजाही करता हुआ यह उपन्यास स्मृतियों की पगडंडियों पर जैसे चहलक़दमी करते हुए, अपने पात्रों के भीतरी और बाहरी बदलावों की प्रक्रिया से गुज़रता है; उन सवालों से रूबरू होता है जो समय हमारे भीतर रोपता रहता है और उन यंत्रणाओं से भी जिनकी ज़िम्मेदारी तय करना कभी आसान नहीं होता।
किसी भी उम्दा रचना को लेकर यह कहना कभी सम्भव नहीं होता कि इसका उद्देश्य अमुक है, अथवा इससे हमें अमुक सन्देश प्राप्त होता है। वह हमारे ही जीवन का एक ज़्यादा उजले प्रकाश में बुना गया चित्र होता है जिससे हम जाने कितनी दिशाओं से रोशनी पाते हैं, और एक ज़्यादा खुली और रौशन जगह में अपना नया ठिकाना बनाते हैं।
ठिकानों और वक़्तों की उधेड़-बुन में रोशनी की किरचें पकड़ता हुआ यह उपन्यास पाठकों को निश्चय ही अनुभूति का एक नया धरातल देगा।
Goshalak
- Author Name:
Rajendra Ratnesh
- Book Type:

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वैदिक ही नहीं, बौद्ध और जैन दर्शनों को भी चुनौती देनेवाले गोशालक बुद्ध और महावीर के समकालीन थे। स्वभाव से विद्रोही और आचरण में तर्क तथा नवाचार की उँगली थामकर नई राहों का अन्वेषण करनेवाले गोशालक के विषय में कहा जाता है कि अपने समय में उनके अनुयायियों की संख्या बुद्ध से भी ज़्यादा थी। जनसाधारण में उनका विशेष आदर था।
एक ख़ानाबदोश जाति के निर्धन परिवार में जन्मे गोशालक ने आध्यात्मिकता के प्रति अपने जन्मजात रुझान के चलते युवावस्था के दौरान सात वर्ष भगवान महावीर के सान्निध्य में तपस्या की। लेकिन बाद में महावीर से उनके गहरे मतभेद हुए और महावीर के पुरुषार्थ के सिद्धान्त के मुक़ाबले उन्होंने नियतिवाद को स्थापित किया। कहते हैं कि महावीर से उनका विरोध इस हद तक बढ़ा कि अपनी सिद्धियों में उन्होंने महावीर पर प्राणघातक हमले भी किए, हालाँकि जीवन के अन्तिम क्षणों में उन्हें इस पर गहरा पश्चात्ताप भी हुआ जिसके प्रमाण जैन ग्रन्थों में पर्याप्त रूप में उपलब्ध हैं।
लेकिन जैन-मत के साथ बौद्ध ग्रन्थों में भी उनकी निन्दा अधिक मिलती है जहाँ न सिर्फ़ उनके विचारों की कड़ी आलोचना की गई बल्कि उनके चरित्र-हनन का भी प्रयास किया गया।
यह उपन्यास आजीवक गोशालक के बारे में सम्भवतः पहली रचना है जिनके बारे में अनेक पाठकों ने शायद कभी सुना भी नहीं होगा। आत्मकथात्मक शैली में निबद्ध यह कृति न सिर्फ़ गोशालक के जीवन-चरित्र को तमाम रंगों के साथ चित्रित करती है, बल्कि उन भ्रांतियों को भी दूर करती है जिनके आधार पर उस नवोन्मेषकारी विचारक को एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
Jenny Meharban Singh
- Author Name:
Krishna Sobti
- Book Type:

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Description:
भारतीय मूल के प्रवासी मेहरबान सिंह और उनकी पत्नी लिज़ा की इकलौती सन्तान सुनहरी बालों वाली जैनी पूर्व और पश्चिम, देश और विदेश के दोरंगी सम्मिश्रण की अनोखी तस्वीर है। चुलबुली मनमौजी, समझदार और गम्भीर एक साथ।
‘जैनी मेहरबान सिंह’ ज़िन्दगी के रोमांस, उत्साह, उमंग और उजास की पटकथा है जिसे कृष्णा सोबती ने गुनगुनी सादगी से प्रस्तुत किया है।
वैन्कूवर से दूर पिछवाड़े से झाँकते हैं एक-दूसरे के वैरी दो गाँव पट्टीवाल और अट्टारीवाल। एक-दूसरे को तरेरते दो कुनबों के बीच पड़ी गहरी दरारें, जान लेनेवाली दुश्मनियाँ और मरने-मारने की क़समें! ऐसे में मेहरबान सिंह और साहिब कौर की अल्हड़ मुहब्बत कैसे परवान चढ़ती! मेहरबान सिंह ने अपनी मुहब्बत की ख़ातिर जान बख़्श देने की दोस्ती निभाई और गाँव को पीठ दे कनाडा जा बसे। नए मुल्क में नई ज़िन्दगी चल निकली। लिज़ा को ख़ूब तो प्यार दिया, जैनी को भरपूर लाड़-चाव, फिर भी दिल से लगी साहिब कौर की छवि मद्धम न पड़ी—इसके बाद की चलचित्री कहानी क्या मोड़ लेती है— पढ़कर देखिए ‘जैनी मेहरबान सिंह’।
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