Shabdon Ka Safar : Vol. 3
(0)
Author:
Ajit WadnerkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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शब्दों में ज्योति है...इंसान के पास शब्द ना होते तो इंसान का रिश्ता भी संसार के साथ वैसा ही होता जैसाकि जानवर का होता है। आचार्य दंडी को याद करें, ‘शब्दों की ज्योति न होती तो तीनों लोक अँधियारे होते’। शब्दों में ज्योति है क्योंकि उनका अपना एक जीवन है। कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाता है, एक-एक शब्द का सफ़र! कैसे-कैसे अर्थ भरते जाते हैं शब्द में!</p> <p>हिन्दी की जीवन्तता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस भाषा ने संकीर्ण शुद्धतावाद को संस्कार कभी नहीं बनने दिया। न जाने कहाँ-कहाँ से आए शब्दों को हिन्दी ने अपनाया है। हिन्दी शब्दों के सफ़र को जानना हिन्दी भाषा के विकास के साथ-साथ हिन्दी समाज के मिज़ाज को भी जानना है।</p> <p>अजित वडनेरकर कई वर्षों से शब्दों के इस रोमांचक सफ़र में हम सबको शामिल करते रहे हैं। कमाल की सूझ-बूझ है उनकी और कमाल की मेहनत। कहने का अन्दाज़ निराला। ‘शब्दों का सफ़र’ कितने रोचक, प्रामाणिक और विश्वसनीय ढंग से एक-एक शब्द के विकास-क्रम और अन्य शब्दों के साथ उसके सम्बन्ध को पाठक के सामने रखता है, यह पढ़कर ही जाना जा सकता है। सफ़र के इस तीसरे पड़ाव पर उन्हें बधाई और साथ ही शुक्रिया भी।</p> <p>—डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल
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शब्दों में ज्योति है...इंसान के पास शब्द ना होते तो इंसान का रिश्ता भी संसार के साथ वैसा ही होता जैसाकि जानवर का होता है। आचार्य दंडी को याद करें, ‘शब्दों की ज्योति न होती तो तीनों लोक अँधियारे होते’। शब्दों में ज्योति है क्योंकि उनका अपना एक जीवन है। कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाता है, एक-एक शब्द का सफ़र! कैसे-कैसे अर्थ भरते जाते हैं शब्द में!</p>
<p>हिन्दी की जीवन्तता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस भाषा ने संकीर्ण शुद्धतावाद को संस्कार कभी नहीं बनने दिया। न जाने कहाँ-कहाँ से आए शब्दों को हिन्दी ने अपनाया है। हिन्दी शब्दों के सफ़र को जानना हिन्दी भाषा के विकास के साथ-साथ हिन्दी समाज के मिज़ाज को भी जानना है।</p>
<p>अजित वडनेरकर कई वर्षों से शब्दों के इस रोमांचक सफ़र में हम सबको शामिल करते रहे हैं। कमाल की सूझ-बूझ है उनकी और कमाल की मेहनत। कहने का अन्दाज़ निराला। ‘शब्दों का सफ़र’ कितने रोचक, प्रामाणिक और विश्वसनीय ढंग से एक-एक शब्द के विकास-क्रम और अन्य शब्दों के साथ उसके सम्बन्ध को पाठक के सामने रखता है, यह पढ़कर ही जाना जा सकता है। सफ़र के इस तीसरे पड़ाव पर उन्हें बधाई और साथ ही शुक्रिया भी।</p>
<p>—डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल
Book Details
-
ISBN9789394902657
-
Pages384
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जनपक्षधरता प्रेमचन्द के संवेदनामूलक और विचारप्रेरित स्वभाव में थी, लेकिन एक रचनाकार के रूप में उनके लक्ष्य में थी—कला सिद्धि। देश-विदेश के अनेक नामी कथाकारों को उन्होंने न केवल पढ़ा था, जब-तब साहित्यिक प्रश्नों और सौन्दर्यगत समस्याओं पर भी अपनी मान्यताओं का विवेचन भी किया था। हम उन्हें अपने कला-कर्म को निरन्तर निखारता पाते हैं—उनकी सृजन-यात्रा में कमतर-बेहतर का अन्तराल एक उत्कर्ष-क्रम में ही अधिक मिलता है। ‘सेवासदन’ जैसे आदर्श-प्रधान उपन्यास से ‘गोदान’ जैसे यथार्थ-प्रधान तक और ‘पंचपरमेश्वर’ जैसी नीति-निर्देशक कहानी से ‘कफ़न’ जैसी नीति विडम्बना-गर्भित कहानी तक की उनकी कथायात्रा काम विस्मयकारक नहीं है। ‘गोदान’ में फिर भी एक-सा कथाविन्यास नहीं है—उसकी श्रेष्ठता का जितना आधार होरी-धनिया की त्रासद जीवन-कथा है, उतना अवान्तर कथाएँ नहीं, जबकि ‘कफ़न’ मानवीय त्रास के एक अखंड कलानुभव की महत रचना है; केवल इसलिए नहीं कि वह कहानी के लघु कलेवर में है बल्कि इसलिए कि लेखक के कम से कम बोलने पर भी वह रचना इतना बोलती है कि बहुत सारे सच उजागर होते चलते हैं। अपने समाज के संतप्त निम्नजन से साक्षात्कार में एक तप:पूत कलाकर्मी की क़लम से जाने-अनजाने एक ऐसी कला-निर्मिति हुई है, जो अद्भुत अपूर्व है।
यह सुखद है कि युवा आलोचक पल्लव ने इस कहानी पर हिन्दी के कुछ बौद्धिकों के विचार-आलेखों को संकलित-सम्पादित कर इस किताब में प्रस्तुत कर दिया है। एक कहानी भी गम्भीर विमर्श का प्रस्थान बिन्दु हो सकती है और यह आयोजन वह दुर्लभ अवसर उपलब्ध करवाता है।
—प्रो. नवल किशोर
Manav Samaz
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

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मानव समाज से अलग नहीं रह सकता था, अलग रहने पर उसे भाषा से ही नहीं, चिन्तन से भी नाता तोड़ना पड़ता, क्योंकि चिन्तन ध्वनिरहित शब्द है। मनुष्य की हर एक गति पर समाज की छाप है। बचपन से ही समाज के विधि-निषेधों को हम माँ के दूध के साथ पीते हैं, इसलिए हम उनमें से अधिकांश को बंधन नहीं भूषण के तौर पर ग्रहण करते हैं, किन्तु वह हमारे कायिक, वाचिक कर्मों पर पग-पग पर अपनी व्यवस्था देते हैं, यह उस वक़्त मालूम हो जाता है, जब हम किसी को उनका उल्लंघन करते देख उसे असभ्य कह डालते हैं।
सीप में जैसे सीप प्राणी का विकास होता है, उसी प्रकार हर एक व्यक्ति का विकास उसके सामाजिक वातावरण में होता है। मनुष्य की शिक्षा-दीक्षा अपने परिवार, ठाठ-बाट, पाठशाला, क्रीड़ा तथा क्रिया के क्षेत्र में और समाज द्वारा विकसित भाषा को लेकर होती है।
‘मानव समाज’ हिन्दी में अपने ढंग की अकेली पुस्तक है। हिन्दी और बांग्ला पाठकों के लिए यह बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है।
Ek Kavi Ki Note Book
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

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कला या लिखने की सारी तरकीबें कलाकार या रचनाकार की सृजनात्मक क्षमताओं
और कौशल से ही हमेशा पैदा नहीं होतीं, कई रचनाकार ऐसे होते हैं जो हमेशा लिखने से बचने की
कोशिश करते रहते हैं। रचना जब भी उनकी खोपड़ी पर सवार हो जाती है या लिखने की बाध्यता
उनके सामने आ खड़ी होती है, वे इससे बचने के लिए बहाने खोजने लगते हैं। यह एक त्रासदायक
स्थिति है। इसमें बचने और लिखने का एक विकट द्वन्द्व चलता रहता है। गद्य लिखना मेहनत का
काम है। व्यवस्थित गद्य लिखना तो और भी ज़्यादा। उसके लिए जैसा व्यवस्थित अध्ययन और
जमकर बैठने की तैयारी एक लेखक की होनी चाहिए, वह मेरी कभी नहीं रही। मैं हमेशा ही एक बैक
बेंचर छात्र रहा हर जगह, जो क्लासरूम में बैठने के बजाय कैंटीन में बैठकर गप्पों में अपना समय
बिताना पसन्द करता रहा। इसलिए जो भी और जब भी लिखा टुकड़ों-टुकड़ों में लिखा। उन्हें डायरियाँ
भी कहना मुनासिब नहीं। डायरियों में एक व्यवस्था होती है। सुविधा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा इन्हें
नोट्स कहा जा सकता है। कुछ भी पढ़ते या सोचते हुए छोटी-छोटी पर्चियों पर या कॉपी के सफ़ों पर
बनी, वह भी उसे छोटे-छोटे नोट्स की शक्ल में ही लिखा। इस किताब में कवियों या कविता पर
केन्द्रित जो टिप्पणियाँ हैं या कविता की किताबों पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ, सब कुल मिलाकर
नोट्स ही हैं। यह एक ऐसी तरकीब है जिसे निबन्ध न लिख पाने की अपनी अक्षमता के चलते मैंने
अपनी काहिली और सुविधा के लिए ईजाद किया। इसलिए इसे आलोचना या समीक्षा जैसा काम तो
क़तई नहीं कहा जा सकता।
नोट्स में एक बेतरतीबी है। एक अव्यवस्था है। मुझे लगता है कि रचना के भीतर अर्जित की गई
स्वतंत्रता के अधिक क़रीब पहुँचने में यह कोशिश ज़्यादा कारगर है। हिन्दी कविता के लिए मुझे
अक्सर एक रूपक गढ़ने की इच्छा होती है कि इसकी काया मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ
अग्रवाल और त्रिलोचन के पाँच तत्त्वों से बनी है और इसके प्राणतत्त्व निराला हैं। हर रूपक की तरह
लेकिन यह रूपक भी अपर्याप्त है पर इससे हिन्दी कविता के नाक-नक्श कुछ हद तक तो पहचाने ही
जा सकते हैं। आठवें दशक की कविता को सामने रखकर अपने से पहले की कविता को टटोलने की
कोशिश में नोट्स का यह पुलिन्दा तैयार हो गया है।
यह एक कवि की नोटबुक है। इसलिए इसमें व्यवस्था कम, बहक ज़्यादा है।
Ramvilas Sharma Ka Mahattva
- Author Name:
Ravibhushan
- Book Type:

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रामविलास शर्मा उन भारतीय लेखकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों और मार्क्सवादी चिन्तकों में अग्रणी हैं जिन्होंने अपने समय में लेखन के ज़रिए निरन्तर और सार्थक हस्तक्षेप किया है। अपने समय और समाज की समस्याओं पर विचार किया है और उनके निदान भी सुझाए हैं।
अपने पहले लेख ‘निराला जी की कविता’ में उन्होंने लिखा था, ‘निराला जी की कविता नए युग की आँखों से यौवन को देखती हैं।’ उन्होंने सदैव नए युग की आँखों को महत्त्व दिया। आज जब बहुत सारे युवाओं ने हथियार डाल दिए हैं, और लेखक-आलोचक उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद जैसी बहसों में लिप्त हैं, हमें रामविलास जी की अडिगता, अविचलता और मार्क्सवादी दर्शन में अटूट आस्था तथा जन-संघर्षों में विश्वास को याद करने की ज़रूरत है।
रामविलास शर्मा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और निराला की अगली कड़ी हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि तुलसीदास को जो राम के नाम पर होता था, वही अच्छा लगता था। देश और जनता के हित में जो होता है, वह मुझे अच्छा लगता है। उनके लेखन की मुख्य चिन्ता हिन्दी और भारत रहे।
सम्भवत: बीसवीं सदी में विश्व की किसी और भाषा में कोई ऐसा दूसरा आलोचक नहीं है जिसने अपने जातीय समाज, जातीय भाषा और साहित्य के सम्बन्ध में एक साथ क्रान्तिकारी स्थापनाएँ दी हों। वे साहित्य समीक्षक, सभ्यता समीक्षक और संस्कृति समीक्षक एक साथ रहे हैं। यह पुस्तक आज के भारत के सन्दर्भ में उनका पुनर्पाठ करने का प्रयास है—अपने लम्बे लेखन-काल में उन्होंने जिन-जिन विषयों को व्यापक ढंग से छुआ, उनके सम्बन्ध में उनके विचारों को दुबारा पढ़ने का भी और वर्तमान घटाटोप में कोई रास्ता निकालने का भी।
Saundaryashastra Ke Tatva
- Author Name:
Kumar Vimal
- Book Type:

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कविता के सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता इसलिए है कि वह न सिर्फ़ मनुष्य के सर्जनात्मक अन्तर्मन की एक रचनात्मक प्रक्रिया है, बल्कि उसकी संरचना में अन्य कलाओं के तत्त्व और गुण भी समाहित होते हैं। भारतीय काव्य-चेतना की परम्परा के अनुसार भी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में कविता के कलात्मक अंश और काव्येतर तत्त्वों के समागम की अवहेलना नहीं की गई है। इसलिए ललित कलाओं की व्यापक पृष्ठभूमि में काव्य का तात्त्विक अध्ययन ज़रूरी है। इसी को कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन कहते हैं। लेकिन अनेक विद्वानों द्वारा समय-समय पर इस आवश्यकता को रेखांकित किए जाने के बावजूद हिन्दी आलोचना-साहित्य में अभी तक हम इस दिशा में छिटपुट निबन्धों, लेखों से आगे नहीं बढ़ सके हैं। जो काम सामान्यतः सामने आया है, वह अपेक्षित सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण और तात्त्विक विश्लेषण के अभाव के चलते सन्तोषजनक नहीं है।
यह पुस्तक हिन्दी साहित्य की उस कमी को पूरा करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसमें सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन की अभी तक उपलब्ध परम्परा की पूर्वपीठिका में काव्य के प्रमुख तत्त्वों, यथा—सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब और प्रतीक का विशद और हृदयग्राही विवेचन किया गया है। अपने विषय में ‘प्रस्थान-ग्रन्थ’ बन सकने की क्षमतावाली इस पुस्तक में सौन्दर्यशास्त्र को व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर उतारा गया है जिसका प्रमाण द्वितीय खंड में प्रस्तुत छायावादी कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन है।
इसकी दूसरी विशेषता है सौन्दर्यशास्त्र की स्वीकृत और अंगीकृत मान्यताओं के आधार पर काव्यशास्त्र की एक नई दिशा की ओर संकेत। कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से ज्ञान की परिधि का विस्तार करता है और हिन्दी साहित्य में सौन्दर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के सहारे निष्पन्न एक ऐसे अद्यतन काव्यशास्त्र का रूप उपस्थित करता है, जिसमें परम्परागत प्रणालियों के अनुशीलन से आगे बढ़कर नवीन चिन्तन और आधुनिक वैज्ञानिक उद्भावनाओं का भी उपयोग किया गया है।
Hindi Ki Shabd Sampada
- Author Name:
Vidhyaniwas Mishra
- Book Type:

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ललित निबन्ध की शैली में लिखी गई भाषाविज्ञान की यह पुस्तक अपने आपमें अनोखी है। इस नए संशोधित-संवर्द्धित संस्करण में 12 नए अध्याय शामिल किए गए हैं और कुछ पुराने अध्यायों में भी छूटे हुए पारिभाषिक शब्दों को जोड़ दिया गया है। जजमानी, भेड़-बकरी पालन, पर्व-त्योहार और मेले, राजगीर और संगतरास आदि से लेकर वनौषधि तथा कारख़ाना शब्दावली जैसे ज़रूरी विषयों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। अनुक्रमणिका में भी शब्दों की संख्या बढ़ा दी गई है।
बकौल लेखक : “यह साहित्यिक दृष्टि से हिन्दी की विभिन्न अर्थच्छटाओं को अभिव्यक्त करने की क्षमता की मनमौजी पैमाइश है : न यह पूरी है, न सर्वांगीण। यह एक दिङ्मात्र दिग्दर्शन है। इससे किसी अध्येता को हिन्दी की आंचलिक भाषाओं की शब्द-समृद्धि की वैज्ञानिक खोज की प्रेरणा मिले, किसी साहित्यकार को अपने अंचल से रस ग्रहण करके अपनी भाषा और पैनी बनाने के लिए उपालम्भ मिले, देहात के रहनेवाले पाठक को हिन्दी के भदेसी शब्दों के प्रयोग की सम्भावना से हार्दिक प्रसन्नता हो, मुझे बड़ी खुशी होगी।’’
Vaikalpik Bharat Ki Talash
- Author Name:
Ravibhushan
- Book Type:

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आज़ादी के बाद हमने एक नया भारत बनाने की योजनाएँ बनाई थीं। एक शोषणविहीन, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, समतामूलक भारत जहाँ न कोई किसी की दया का मोहताज हो, न किसी को किसी से भय हो, न धर्म के नाम पर लोग मरें, न जाति के नाम पर कोई समाज की मुख्यधारा से बाहर रहे। लेकिन ऐसा हो न सका।
कुल मिलाकर हम उतना आगे नहीं बढ़ सके, जितना अपेक्षित था। हममें से अनेक आज भी उस आज़ादी को तरस रहे जो उनके पुरखों ने गांधी, भगत सिंह की मौजूदगी में सोची थी। लोग बीमार हैं और अस्पतालों में उनके लिए जगह नहीं है, वो जिन्हें अपने उद्धारक प्रतिनिधियों के रूप में चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजते हैं, वो अगले दिन उन्हें पहचानने से इनकार कर देते हैं, जिस व्यवस्था के दायरे में वे अपने घर-परिवार के सपने बुनते हैं, वह एक दिन सिर्फ़ अपने लिए काम करती नज़र आती है।
वैकल्पिक भारत कोई दिमाग़ी शग़ल नहीं है। ज़रूरत है। जिन्हें अपने अलावा किसी भी और की चिन्ता है, वे सब इस ज़रूरत को महसूस करते हैं। रविभूषण सजग आलोचक और सरोकारों के साथ जीनेवाले विचारक हैं। इस पुस्तक में उनके उन आलेखों को शामिल किया गया है जो उन्होंने पिछले दिनों एक चिन्तनशील नागरिक और बौद्धिक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए लिखे हैं।
पुस्तक का विषय-क्रम देश के समय को एक-एक चरण में पार करते हुए आज तक आता है। दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द से शुरू करते हुए वे आज़ादी, बाद की सत्ता और समाज के चरित्र पर आते हैं और अन्त राष्ट्रवाद पर करते हैं। वही राष्ट्रवाद जो आज उन तमाम ताक़तों का मुखौटा बना हुआ है जिन्हें अपने अलावा किसी भी और का बोलना पसन्द नहीं। जो हिंसा को अपने अस्तित्व का पर्याय मानते हैं, और जिन्हें जाने क्यों लगने लगा है कि यह देश सिर्फ़ उनका है।
Aadhunik Bhasha Vigyan Ke Siddhant
- Author Name:
Ramkishor Sharma
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में भाषा-प्रयोग के विविध पक्षों का वैज्ञानिक परिचय देने का प्रयत्न किया गया है। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन मान्यताओं एवं विचारों की वर्तमान उपयोगिता क्या है तथा उनके आधार पर नवीन दिशाओं में जो कार्य हुआ है, उन सभी को समाहित करने की चेष्टा की गई है। विदेशी चिन्तकों द्वारा विश्व की अनेक भाषाओं को ध्यान में रखकर जो अध्ययन प्रस्तुत किया गया है, उसमें हिन्दी भाषा का समावेश नगण्य है। इस पुस्तक में नवीन सिद्धान्तों का आकलन तथा विवेचन करते समय 'हिन्दी' को केन्द्र में रखा गया है। अनूदित पुस्तकों को छोड़कर नवीन विषयों पर समग्रत: भाषा का सैद्धान्तिक विवेचन प्रस्तुत करने वाली पुस्तकों का प्राय: अभाव है। इसी अभाव की पूर्ति के लिए इस पुस्तक की रचना की गई है।
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