Pragatiwad Aur Samanantar Sahitya
(0)
Author:
Rekha AwasthiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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‘प्रगतिवाद और समानान्तर साहित्य’ यह पुस्तक शोधग्रन्थ भी है और धारदार तर्क-वितर्क से भरी एक सृजनात्मक कृति भी है। इसमें प्रगतिशील आन्दोलन के ऐतिहासिक विकास-क्रम, उसके दस्तावेज़ों, उसके रचनात्मक और समालोचनात्मक पहलुओं तथा उस दौर में प्रचलित समानान्तर प्रवृत्तियों से उसके द्वन्द्वात्मक रिश्ते की पड़ताल की गई है।</p> <p>यह पुस्तक शोध, अन्वेषण, स्रोत सामग्री की छानबीन पर आधारित ऐतिहासिक विवेचना के क्षेत्र में एक नए ढंग की प्रामाणिकता के कारण हिन्दी के सभी प्रमुख समालोचकों के द्वारा सराही गई है तथा पाठक समुदाय ने इसका हार्दिक स्वागत किया है। अतः अध्यापकों, शोधार्थियों तथा नई पीढ़ी के साहित्यप्रेमी पाठकों के लिए यह प्रेरणादायी पठनीय पुस्तक है। 1930 से 1950 के साहित्यिक इतिहास के मुखर आईने के रूप में यह अद्वितीय आलोचनात्मक कृति है।</p> <p>पारदर्शी तार्किकता और सांस्कृतिक उत्ताप से भरपूर संवेदनशील मीमांसा के अपने गुणों के कारण रेखा अवस्थी की यह पुस्तक प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 75 वर्ष पूरा होने के मौक़े पर फिर से उपलब्ध कराई जा रही है क्योंकि पिछले दस सालों से यह पुस्तक बाज़ार में लाख ढूँढ़ने पर भी मिलती नहीं थी। इस नए संस्करण की विशिष्टता यह है कि परिशिष्ट के अन्तर्गत कुछ नए दस्तावेज़ भी जोड़े गए हैं।</p> <p>इस पुस्तक के पाँच अध्यायों में इतनी भरपूर विवेचनात्मक सामग्री है कि यह पुस्तक बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य के पूर्वार्द्ध का इतिहास ग्रन्थ बन जाने का गौरव प्राप्त कर चुकी है।</p> <p>उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक में शमशेर, केदार, नागार्जुन, अज्ञेय, गोपाल सिंह नेपाली के कृतित्व का मूल्यांकन तत्कालीन ऐतिहासिक सन्दर्भ में किया गया है। इसके साथ ही यह पुस्तक प्रगतिशील आन्दोलन के बारे में फैलाई गई भ्रान्तियों को तोड़ती है और दुराग्रहों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।
Read moreAbout the Book
‘प्रगतिवाद और समानान्तर साहित्य’ यह पुस्तक शोधग्रन्थ भी है और धारदार तर्क-वितर्क से भरी एक सृजनात्मक कृति भी है। इसमें प्रगतिशील आन्दोलन के ऐतिहासिक विकास-क्रम, उसके दस्तावेज़ों, उसके रचनात्मक और समालोचनात्मक पहलुओं तथा उस दौर में प्रचलित समानान्तर प्रवृत्तियों से उसके द्वन्द्वात्मक रिश्ते की पड़ताल की गई है।</p>
<p>यह पुस्तक शोध, अन्वेषण, स्रोत सामग्री की छानबीन पर आधारित ऐतिहासिक विवेचना के क्षेत्र में एक नए ढंग की प्रामाणिकता के कारण हिन्दी के सभी प्रमुख समालोचकों के द्वारा सराही गई है तथा पाठक समुदाय ने इसका हार्दिक स्वागत किया है। अतः अध्यापकों, शोधार्थियों तथा नई पीढ़ी के साहित्यप्रेमी पाठकों के लिए यह प्रेरणादायी पठनीय पुस्तक है। 1930 से 1950 के साहित्यिक इतिहास के मुखर आईने के रूप में यह अद्वितीय आलोचनात्मक कृति है।</p>
<p>पारदर्शी तार्किकता और सांस्कृतिक उत्ताप से भरपूर संवेदनशील मीमांसा के अपने गुणों के कारण रेखा अवस्थी की यह पुस्तक प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के 75 वर्ष पूरा होने के मौक़े पर फिर से उपलब्ध कराई जा रही है क्योंकि पिछले दस सालों से यह पुस्तक बाज़ार में लाख ढूँढ़ने पर भी मिलती नहीं थी। इस नए संस्करण की विशिष्टता यह है कि परिशिष्ट के अन्तर्गत कुछ नए दस्तावेज़ भी जोड़े गए हैं।</p>
<p>इस पुस्तक के पाँच अध्यायों में इतनी भरपूर विवेचनात्मक सामग्री है कि यह पुस्तक बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य के पूर्वार्द्ध का इतिहास ग्रन्थ बन जाने का गौरव प्राप्त कर चुकी है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक में शमशेर, केदार, नागार्जुन, अज्ञेय, गोपाल सिंह नेपाली के कृतित्व का मूल्यांकन तत्कालीन ऐतिहासिक सन्दर्भ में किया गया है। इसके साथ ही यह पुस्तक प्रगतिशील आन्दोलन के बारे में फैलाई गई भ्रान्तियों को तोड़ती है और दुराग्रहों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।
Book Details
-
ISBN9788126722006
-
Pages332
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. बच्चन सिंह तथा डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी जैसे महान समीक्षकों पर एक गवेषणात्मक दृष्टि डाली गई है।
Kavi Nirala
- Author Name:
Nandulare Vajpeyi
- Book Type:

- Description: ‘कवि निराला’ पुस्तक हिन्दी आलोचना में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी भी एक बहुमूल्य देन हैं। आचार्य वाजपेयी ने निराला को ‘शताब्दी का कवि’ और उनके काव्य को ‘शताब्दी काव्य’ कहा था। उन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से निराला के उस महाकवि को खोज लिया था जो गत, आगत और अनागत सभी को एकाकार कर लेता है। टी.एस. इलियट ने भी महान कवि के परिचय में यही कहा था कि महान कवि वह होता है जो आत्मसात् कर, वर्तमान सन्दर्भों में जीता हुआ भावी की पदचाप भी सुन लेता है। आधुनिक हिन्दी कविता का उद्गम भारतेन्दु-द्विवेदी युग से प्रारम्भ होकर छायावाद युग में पहुँचकर नई करवट लेता है और इस युग की कवि चतुष्टयी प्रसाद, निराला, पन्त और महादेवी के चार स्तम्भों पर उस काव्य को गढ़ता है जिसको सांस्कृतिक प्रौढ़ता आगामी कवियों के लिए न केवल आधार बनती है बल्कि उनके अनुकरण और विकास में स्वयं को धन्य मानती है।
Bhasha Aur Sameeksha Ke Bindu
- Author Name:
Satyadev Mishra
- Book Type:

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Description:
आधुनिक हिन्दी-समीक्षा के स्वरूप-विकास में पौर्वात्य से कहीं अधिक पाश्चात्य समीक्षा-दर्शन का अनुप्रभाव परिलक्षित हो रहा है। आज विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी-परीक्षाओं में जिन समीक्षा-सिद्धान्तों, आलोचनात्मक प्रत्ययों, समीक्षा-आन्दोलनों की चर्चा का विषय बनाया जा रहा है, प्रश्नांकनों की कसौटी पर कसा जा रहा है, उनमें से अधिकांश पाश्चात्य भाषा-विमर्श, साहित्य-कला-दर्शन और अन्य साहित्येतर अनुशासनों से अनुस्यूत हैं। इन नवोन्मेषी सिद्धान्तों, वादों और समीक्षात्मक संकल्पनाओं, साहित्येतर अवधारणाओं का प्रामाणिक विमर्श इस ग्रन्थ में है।
प्रस्तुत कृति संगोष्ठियों में विमर्श के अधुनातन सन्दर्भों से सम्पृक्त है। विश्वास है कि शिक्षकों-शिक्षार्थियों, प्रतियोगियों और जिज्ञासुओं के लिए यह उपादेय सिद्ध होगी।
Ghananad Ka Kavya
- Author Name:
Ramdev Shukla
- Book Type:

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Description:
घनानन्द के काव्य में भावस्थितियों के विकास का कोई क्रम बना-बनाया नहीं मिलता, किन्तु उनके शृंगार-काव्य में उसे ढूँढ़ना कठिन भी नहीं है। प्रिय के असाधारण रूप के प्रति आश्रय की रीझ, पूर्वराग की आवेगदशा, असाधारण सुख के अतिरेक के साथ रंकवत लालसा की सीत्कार और ‘शुद्ध सामीप्य’ जैसी तन्मयता वाला संयोग और उस संयोग के बाद स्वभावतः तीव्र विरहानुभूति, यह सब कुछ उनके काव्य में है।
घनानन्द में अतृप्ति है तो इस स्तर की है। इसके आधार पर इनको प्रेम का सुख न प्राप्त कर सकनेवाला भाग्यहीन नहीं घोषित किया जा सकता।
प्रेम के ऐसे विलक्षण अनुभव के बाद ही घनानन्द का विरह इतना तीव्र आवेगमय, इतना करुण और इतना गम्भीर हो सका है कि संसार की दृष्टि में प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक मीन और पतंग इनके सामने कायर और कपूत होकर हर जाते हैं।
घनानन्द के काव्य के शिल्प-पक्ष के सम्बन्ध में भी ऐसे ही निष्कर्ष निकाले गए हैं : ‘कवि की प्रवृत्ति अपने हृदय की परत खोलने की अधिक होती है, अपनी उक्ति को सजाने-सँवारने की कम।’
Dhoop Chhanh
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

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Description:
‘धूपछाँह’ हिन्दी साहित्य में अपने ढंग की एक दुर्लभ कृति है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा समय-समय पर दूसरी भाषाओं की रचनाओं से प्रेरित हो किशोरों के लिए लिखी गई इन कविताओं में ओजस्विता तो है ही, प्रांजल प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि का छंद-विधान और भाव-सम्प्रेषण भी अद्भुत है।
राष्ट्रकवि ने अपनी इन कविताओं की पृष्ठभूमि के बारे में लिखा है—“ ‘धूपछाँह’ में धूप कम और छाया अधिक है। इसकी सोलह कविताओं में से दो (‘दो बीघा ज़मीन’ और ‘पुरातन भृत्य’) के मूल लेखक रवि बाबू, दो (‘तन्तुवाय’ और ‘तीन दर्द’) की मूल लेखिका श्रीमती सरोजिनी नायडू और एक (‘नींद’) के मूल लेखक गॉड्फ्रे नामक एक पाश्चात्य कवि हैं। ‘बच्चे का तकिया’ और ‘वर-भिक्षा’ सत्येन्द्रनाथ दत्त की बांग्ला कविताओं से ली गई हैं, मगर इनके मूल रचयिता, क्रमशः मार्सेलिन बाल्मोर और नगूची हैं। ‘पानी की चाल’ नामक रचना भी सर्वथा मौलिक नहीं कही जा सकती, क्योंकि यह रॉबर्ट सदी और अकबर इलाहाबादी के अनुकरण पर लिखी गई है। ‘कवि का मित्र’ रचना भी, जिसने मेरे कितने ही घनिष्ठ मित्रों को सिर खुजलाते हुए कुछ सोचने को लाचार किया है, सोलह आना मेरी ही स्वानुभूति नहीं है। ऐसे चरित्र का वर्णन दो-एक अंग्रेज़ी लेखकों और कवियों ने भी किया है जिनमें एक का नाम जॉन गॉड्फ्रे सैक्से है। इसी प्रकार ‘रौशन बे की बहादुरी’ का प्लॉट लांगफेलो की एक कविता से लिया गया है।”
इस तरह देखें तो पुस्तक में संकलित रचनाएँ अपने कैनवस पर अपने विविध रंगों में परिचित दुनिया की आत्मीय और अविस्मरणीय रचनाएँ हैं। निस्सन्देह, राष्ट्रकवि दिनकर की यह कृति युवा पीढ़ी को एक नया सन्देश देगी, देती रहेगी।
Chintamani : Vol. 1
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
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“यदि वाणी की शक्ति ईश्वर का सबसे उत्तम प्रसाद है; यदि भाषा की उत्पत्ति बहुत-से विद्वानों द्वारा ईश्वर से मानी गई है? यदि शब्दों द्वारा अन्तःकरण के गुप्त रहस्य प्रकट किए जाते हैं; चित्त की वेदना को शान्ति दी जाती है; हृदय में बैठा हुआ शोक बाहर निकाल दिया जाता है; दया उत्पन्न की जाती है और बुद्धि चिरस्थायी बनाई जाती है; यदि बड़े ग्रन्थकारों द्वारा बहुत-से मनुष्य मिलकर एक बनाए जाते हैं; जातीय लक्षण स्थापित होता है; भूत और भविष्य तथा पूर्व और पश्चिम एक-दूसरे के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं; और यदि ऐसे लोग मनुष्य जाति में अवतार-स्वरूप माने जाते हैं—तो साहित्य की अवहेलना करना और उसके अध्ययन से मुख मोड़ना कितनी बड़ी भारी कृतघ्नता है।”
—‘साहित्य’ शीर्षक निबन्ध से
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